प्रश्न की मुख्य माँग
- निम्न प्रजनन दर एवं वृद्ध होती जनसंख्या से उत्पन्न होने वाली राजकोषीय, सामाजिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ।
- वृद्ध जनसंख्या के कल्याण एवं सुरक्षा हेतु आवश्यक नीतिगत ढाँचे एवं उपाय।
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उत्तर
परिचय
भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) घटकर 1.9 प्रति महिला हो गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से कम है, जो एक निम्न-प्रजनन समाज की ओर संक्रमण का संकेत देती है। यह जनसांख्यिकीय परिवर्तन असमान है, जिसमें दिल्ली (1.2) और केरल (1.3) जैसे राज्यों में अति-निम्न प्रजनन दर है, जबकि बिहार (2.9) और उत्तर प्रदेश (2.6) जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत उच्च प्रजनन दर बनी हुई है। यह स्थिति भौगोलिक स्तर पर गंभीर जनसांख्यिकीय विचलन उत्पन्न करती है, जिससे दक्षिणी और पश्चिमी राज्य नकारात्मक रूप से प्रभावित हो रहे हैं , जबकि उत्तरी राज्य सक्रिय जनसांख्यिकीय लाभांश के चरण में हैं। वर्ष 2050 तक वृद्ध जनसंख्या के लगभग 347 मिलियन (~कुल जनसंख्या का 20%) तक पहुँचने का अनुमान है।
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राजकोषीय, सामाजिक एवं स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ
- कमज़ोर वृद्धावस्था आय सुरक्षा: अधिकांश वृद्धजनों के पास अंशदायी पेंशन का अभाव है; लगभग 78% के पास पेंशन कवरेज नहीं है, जबकि 70% परिवार पर निर्भर हैं।
- उदाहरण: अटल पेंशन योजना (APY) में नियमित योगदान आवश्यक होता है, जिसे असंगठित क्षेत्र के श्रमिक स्थायी रूप से वहन नहीं कर पाते है।
- स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव: वृद्धावस्था में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, डिमेंशिया तथा पेलिएटिव केयर जैसी दीर्घकालिक बीमारियों का प्रबंधन बढ़ जाता है।
- उदाहरण: जिला स्तर की स्वास्थ्य योजना एवं प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में जेरियाट्रिक (Geriatric) केंद्रित सेवाओं का अभाव है।
- पारंपरिक सामाजिक सुरक्षा का क्षरण: शहरीकरण, एकल परिवार व्यवस्था तथा महिलाओं की कार्यबल में बढ़ती भागीदारी के कारण पारिवारिक देखभाल प्रणाली कमजोर हो रही है।
- उदाहरण: ग्रामीण क्षेत्रों में ‘ वृद्धजन’ धन प्रेषण के बावजूद अकेलेपन एवं स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करते हैं।
- अंतर-राज्यीय प्रवासन एवं श्रम असंतुलन: समृद्ध राज्यों में वृद्ध जनसंख्या बढ़ने से युवा श्रमिकों का अन्य राज्यों से प्रवास आवश्यक हो जाता है, जिससे सामाजिक सुरक्षा की पोर्टेबिलिटी की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
- उदाहरण: उत्तर प्रदेश से दिल्ली या केरल जैसे राज्यों में जाने वाले श्रमिकों के लिए कल्याणकारी अधिकारों का स्थानांतरण आवश्यक है, ताकि वृद्ध होती जनसंख्या का समर्थन सुनिश्चित हो सके।
वृद्ध जनसंख्या के कल्याण हेतु नीति ढाँचा
- सार्वभौमिक एवं महँगाई-सूचकांकित पेंशन: सभी वृद्धजनों के लिए न्यूनतम पेंशन सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, जिसे महँगाई के अनुरूप समायोजित किया जाए तथा इसे अंशदायी प्रणालियों के साथ पूरक बनाया जाए।
- समेकित जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवा: जेरियाट्रिक सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली, जिला अस्पतालों तथा नर्सिंग शिक्षा पाठ्यक्रम में समाहित किया जाए।
- उदाहरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के उन्नयन के तहत जिला अस्पतालों में जेरियाट्रिक विंग की स्थापना।
- प्रवासन एवं कल्याण पोर्टेबिलिटी नीति: अंतर-राज्यीय प्रवासियों के लिए सामाजिक सुरक्षा एवं कल्याणकारी लाभों की स्थानांतरणीयता सुनिश्चित की जाए।
- निवारक एवं सामुदायिक सहायता प्रणाली: सक्रिय वृद्धावस्था कार्यक्रम, गृह-आधारित देखभाल तथा डिजिटल स्वास्थ्य निगरानी को प्रोत्साहित किया जाए। साथ ही सिल्वर इकोनॉमी को विकसित करने हेतु सीनियरकेयर एजिंग ग्रोथ इंजन (SAGE) और SACRED पोर्टल जैसी पहलों को प्रभावी रूप से क्रियान्वित किया जाए, जिससे वृद्ध देखभाल एक निष्क्रिय कल्याण मॉडल से सक्रिय आर्थिक परिसंपत्ति प्रणाली में परिवर्तित हो सके।
- राजकोषीय योजना एवं संसाधन आवंटन: वृद्ध जनसंख्या के लिए राज्यों एवं केंद्र के बजट आवंटन को सुदृढ़ किया जाए, साथ ही उच्च प्रजनन दर वाले क्षेत्रों में युवा कौशल विकास में निवेश बढ़ाया जाए।
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निष्कर्ष
भारत का निम्न-प्रजनन एवं वृद्धावस्था की ओर संक्रमण एक समग्र दृष्टिकोण की माँग करता है, जिसमें राजकोषीय सुरक्षा, जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाएँ, सामाजिक समर्थन प्रणाली तथा श्रम गतिशीलता के ढाँचे को एकीकृत किया जाए। सक्रिय एवं दूरदर्शी संस्थागत सुधारों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि जनसांख्यिकीय असंतुलन न तो वृद्ध जनसंख्या के कल्याण को प्रभावित करे और न ही युवा कार्यबल की उत्पादकता को बाधित करे।