प्रश्न की मुख्य माँग
- सैन्य हस्तक्षेपों की सीमाएँ
- समावेशी सुरक्षा संरचना की आवश्यकता
- बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में भारत की विदेश नीति में संतुलन एवं पुनर्समायोजन।
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परिचय
पश्चिम एशिया की हालिया घटनाएँ दर्शाती हैं कि सैन्य हस्तक्षेप अक्सर स्थायी शांति और स्थिरता स्थापित करने में विफल रहे हैं। साथ ही, क्षेत्रीय देशों द्वारा साझा चुनौतियों के समाधान हेतु संवाद, सहकारी सुरक्षा व्यवस्था तथा वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित सहभागिता की आवश्यकता को मान्यता मिल रही है।
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सैन्य हस्तक्षेपों की सीमाएँ
- संघर्षों में गतिरोध: दीर्घकालिक सैन्य अभियानों के बावजूद निर्णायक परिणाम प्राप्त नहीं हो सके हैं।
- उदाहरण: यूक्रेन, गाजा, लेबनान, सूडान और ईरान से जुड़े संघर्ष व्यापक सैन्य कार्रवाई के बावजूद गतिरोध की स्थिति में पहुँच गए हैं।
- मानवीय लागत: बमबारी और सशस्त्र हस्तक्षेपों के कारण बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत हुए हैं।
- राजनीतिक समाधान की अनिवार्यता: वार्ता और राजनीतिक समझौते के बिना केवल सैन्य शक्ति स्थायी शांति सुनिश्चित नहीं कर सकती है।
- क्षेत्रीय विस्तार का जोखिम: सैन्य हस्तक्षेप अक्सर प्रॉक्सी समूहों की भागीदारी के कारण संघर्षों का विस्तार कर देते हैं।
- उदाहरण: हिज्बुल्लाह को ईरान का समर्थन और उससे उत्पन्न इजरायल की सुरक्षा चिंताएँ दर्शाती हैं कि प्रॉक्सी राजनीति अस्थिरता को दीर्घकालिक बना देती है।
- बलपूर्वक दबाव की घटती प्रभावशीलता: देश बाहरी दबाव और सैन्य बल प्रयोग का पहले की तुलना में अधिक प्रतिरोध कर रहे हैं।
- उदाहरण: ईरान द्वारा इजरायली हितों तथा खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी परिसंपत्तियों को सीधे निशाना बनाना उसके अधिक मुखर क्षेत्रीय रुख को दर्शाता है।
समावेशी सुरक्षा संरचना की आवश्यकता
- खाड़ी देशों–ईरान संवाद: क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खाड़ी राजतंत्रों और ईरान के बीच संवाद एवं सहयोग आवश्यक है।
- उदाहरण: वर्ष 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली।
- प्रॉक्सी संघर्षों में कमी: सहकारी तंत्र सुरक्षा संबंधी चिंताओं का समाधान सशस्त्र प्रॉक्सी समूहों पर निर्भर हुए बिना कर सकते हैं।
- उदाहरण: हिज्बुल्लाह की कमजोर होती स्थिति ने क्षेत्रीय तनाव-न्यून करने पर नए विमर्श को प्रोत्साहित किया है।
- वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन: पश्चिम एशियाई देश अमेरिका के पारंपरिक गठबंधनों से आगे बढ़कर चीन और रूस सहित विभिन्न शक्तियों के साथ संतुलित साझेदारियाँ विकसित कर रहे हैं।
- ऊर्जा एवं व्यापार सुरक्षा: सामूहिक सुरक्षा व्यवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण ऊर्जा अवसंरचना एवं समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती हैं।
- उदाहरण: वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, जिसकी सुरक्षा के लिए खाड़ी क्षेत्र में सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
- क्षेत्रीय स्वामित्व: क्षेत्रीय देशों के नेतृत्व में विकसित सुरक्षा ढाँचे बाहरी शक्तियों द्वारा थोपे गए समाधानों की तुलना में अधिक टिकाऊ और प्रभावी होते हैं।
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भारत की विदेश नीति का संतुलन
- रणनीतिक संतुलन: भारत को किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय खाड़ी देशों एवं प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित और मजबूत संबंध बनाए रखने चाहिए।
- उदाहरण: भारत ने एक साथ संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब, इजरायल और ईरान के साथ अपनी साझेदारियो को बढ़ावा दिया है।
- प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में भारतीय नागरिकों के लिए निकासी तैयारी और कांसुलर सहायता को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: ऑपरेशन कावेरी (सूडान, 2023) तथा ऑपरेशन अजय (इजरायल, 2023)।
- ऊर्जा विविधीकरण: किसी एक आपूर्तिकर्ता पर निर्भरता कम करने के लिए कच्चे तेल एवं LNG आयात के स्रोतों में विविधता लाई जानी चाहिए।
- उदाहरण: भारत सऊदी अरब, इराक और UAE से ऊर्जा आयात करता है।
- कनेक्टिविटी पहल: आर्थिक लचीलापन बढ़ाने वाली व्यापार एवं परिवहन कनेक्टिविटी परियोजनाओं का विस्तार किया जाना चाहिए।
- उदाहरण: भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) पश्चिम एशिया के माध्यम से कनेक्टिविटी और व्यापार को सुदृढ़ करने का लक्ष्य रखता है।
- क्षेत्रीय संवाद का समर्थन: भारत को समावेशी सुरक्षा व्यवस्था एवं संघर्ष समाधान को बढ़ावा देने वाली कूटनीतिक पहलों का समर्थन करना चाहिए।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया का बदलता परिदृश्य स्पष्ट करता है कि केवल सैन्य शक्ति के माध्यम से स्थायी शांति स्थापित नहीं की जा सकती। भारत के लिए क्षेत्रीय संवाद को प्रोत्साहित करने, अपने प्रवासी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा ऊर्जा साझेदारियों में विविधता लाने पर आधारित संतुलित कूटनीति ही सबसे विवेकपूर्ण और प्रभावी रणनीति होगी।