Q. वैश्विक शांति पहलों में भागीदारी से भारत की नैतिक और कूटनीतिक सामर्थ्य बढ़ती है, लेकिन इससे उसकी रणनीतिक स्वायत्तता भी कम हो सकती है। अमेरिका के नेतृत्व वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से भारत के अलग रहने के निर्णय के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत का दूर रहने का निर्णय: संदर्भ और विश्लेषण
  • निर्णय के बाद भारत को जिन मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है
  • क्या किया जा सकता है: आगे की राह 

उत्तर

वैश्विक शांति पहलों में भागीदारी भारत की नैतिक और राजनयिक सामर्थ्य को बढ़ाती है, जिससे ‘विश्व-मित्र’ (विश्व का मित्र) के रूप में उसकी छवि मजबूत होती है। हालाँकि, विशेषकर यू.एस.-नेतृत्व वाले बोर्ड ऑफ पीस (BoP) जैसे गैर-यूएन ढाँचों में भागीदारी, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर कर सकती है क्योंकि यह भारत की विदेश नीति को महाशक्तियों के एकतरफा एजेंडों से जोड़ देती है।

भारत का दूर रहने का निर्णय: संदर्भ और विश्लेषण

PM मोदी को न्योता मिलने के बावजूद भारत ने दावोस (जनवरी 2025-26) में BoP लॉन्च में हिस्सा नहीं लिया।

  • बहुपक्षवाद का क्षरण: BoP को एक “समानांतर मार्ग” के रूप में देखा जाता है, जो संघर्ष समाधान में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को प्रतिस्थापित करने का प्रयास करता है, जो भारत के संयुक्त राष्ट्र की प्रधानता के सैद्धांतिक दृष्टिकोण के विपरीत है।
  • अधिदेश और मिशन का विस्तार: हालाँकि शुरुआत में BoP का ध्यान गाजा के “फेज 2” पुनर्निर्माण पर था, जिसमें स्पष्ट भौगोलिक सीमाएँ नहीं बताई गई हैं।
  • ‘प्रवेश के लिए भुगतान’ मॉडल: इस बोर्ड में “स्थायी” सदस्यता के लिए $1 बिलियन का योगदान आवश्यक है, जिससे शांति स्थापना को वाणिज्यीकृत किया जा रहा है।
  • पाकिस्तान की लाल झंडी: पाकिस्तान का तुरंत शामिल होना और अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (ISF) के लिए सैनिकों की पेशकश करना, भारत को BoP के दक्षिण-एशियाई विवादों में दखल लेने के प्रति सतर्क बनाता है। 
    • उदाहरण: भारत को डर है कि शामिल होने पर BoP कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर मध्यस्थता कर सकता है, जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले मध्यस्थता की पेशकश की थी।

निर्णय के बाद भारत को जिन मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है

  • कूटनीतिक अलगाव: चीन के अलावा एकमात्र प्रमुख वैश्विक दक्षिण शक्ति होने के नाते जो इससे दूर रहती है, वह प्रतिद्वंद्वियों को रणनीतिक स्थान सौंप सकती है।
    • उदाहरण: सऊदी अरब, UAE, और तुर्की जैसे देश शामिल हो गए हैं, जिससे भारत पश्चिम एशिया में महत्त्वपूर्ण पुनर्निर्माण अनुबंधों से बाहर रह सकता है।
  • वॉशिंगटन के साथ तनाव: अमेरिकी राष्ट्रपति के “पैशन प्रोजेक्ट” को अस्वीकार करने से चल रही व्यापार वार्ता और iCET (महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर पहल) साझेदारी पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • ‘शांति निर्माता’ कथानक का हस्तांतरण: दूर रहने से पाकिस्तान पश्चिम-केंद्रित मंचों में वैश्विक स्थिरता में अधिक “सक्रिय” योगदानकर्ता के रूप में स्वयं को प्रस्तुत कर सकता है।

क्या किया जा सकता है: आगे की राह 

  • सिद्धांतपरक सहभागिता: भारत को BoP को UN-मान्यता प्राप्त एजेंसियों जैसे- UNRWA के साथ एकीकृत करने की माँग करनी चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय वैधता सुनिश्चित हो।
  • परामर्शात्मक कूटनीति: औपचारिक सदस्यता के बिना भी BoP के कार्यकारी बोर्ड (जिसमें जेरेड कुशनर और अजय बंगा जैसे सदस्य शामिल हैं) के साथ सक्रिय बैक-चैनल बनाए रखें।
    • उदाहरण: भारत BoP के केंद्रीकृत कोष के बजाय द्विपक्षीय सहायता या I2U2 फ्रेमवर्क के माध्यम से गाजा के पुनर्निर्माण में योगदान दे सकता है।
  • रणनीतिक रेड लाइन्स: स्पष्ट रूप से संप्रेषित करना कि भारत सिर्फ UN-फ्लैग वाले मिशनों में ही सैनिक योगदान देगा, ताकि इसकी सेना को गैर-UN “स्थिरता बलों” में उपयोग किए जाने से बचाया जा सके।

निष्कर्ष

भारत का “फर ऑफ मिसिंग आउट” (FOMO) के चलते कार्रवाई से इनकार करना इसकी एक प्रमुख शक्ति के रूप में परिपक्वता को दर्शाता है। भागीदारी से नैतिक पूँजी मिलती है, लेकिन वास्तविक रणनीतिक पूँजी उस क्षमता में निहित है कि वह उन पहलों को “ना” कह सके, जो पारदर्शिता से रहित हों और अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना करती हों। सिद्धांतपरक बहुध्रुवीयता को प्राथमिकता देकर, भारत सुनिश्चित करता है कि शांति के लिए उसकी आवाज स्वतंत्र, विश्वसनीय बनी रहे।

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