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Q. अनुच्छेद 164 के अंतर्गत 'राज्यपाल का प्रसादपर्यंत' एक पूर्ण विवेकाधीन शक्ति नहीं है, बल्कि संवैधानिक रूप से विधान सभा के विश्वास से बंधी हुई है। संविधान सभा की बहसों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

May 9, 2026

GS Paper IIIndian Polity

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अनुच्छेद-164 के अंतर्गत ‘राज्यपाल के प्रसादपर्यंत’ का अर्थ समझाइए।
  • इसका विधानसभा के विश्वास से संबंध की चर्चा कीजिए।

उत्तर

अनुच्छेद-164 के अनुसार मुख्यमंत्री राज्यपाल के “प्रसादपर्यंत” पद धारण करता है, किंतु संसदीय लोकतंत्र में यह प्रसाद (इच्छा) राज्यपाल का व्यक्तिगत विवेक नहीं होता। यह संवैधानिक रूप से विधानसभा में प्राप्त बहुमत समर्थन द्वारा सीमित होता है।

अनुच्छेद-164 के अंतर्गत ‘राज्यपाल के प्रसादपर्यंत’ का अर्थ

  • संवैधानिक अभिव्यक्ति: अनुच्छेद-164(1) के अनुसार, मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है तथा वह राज्यपाल के ‘प्रसादपर्यंत’ पद धारण करता है।
  • संसदीय शासन प्रणाली का स्वरूप: भारत वेस्टमिंस्टर मॉडल का अनुसरण करता है, जिसमें वास्तविक कार्यपालिका निर्वाचित मंत्रिपरिषद होती है, न कि राज्यपाल।
    • उदाहरण: भारतीय संविधान में राज्यपाल को राष्ट्रपति के समान एक संवैधानिक प्रमुख बनाया गया है।
  • व्यक्तिगत इच्छा नहीं: राज्यपाल केवल व्यक्तिगत असंतोष या राजनीतिक मतभेद के आधार पर मुख्यमंत्री को पद से नहीं हटा सकता।
  • विधानसभा का नियंत्रण: ‘प्रसादपर्यंत’ का सिद्धांत तभी तक लागू रहता है, जब तक मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
    • उदाहरण: संवैधानिक रूप से पद से हटाने का आधार राज्यपाल की राय नहीं, बल्कि बहुमत का खोना होता है।
  • संविधान-निर्माताओं का उद्देश्य: संविधान सभा के सदस्यों ने अनुच्छेद-164 के अंतर्गत राज्यपाल के मनमाने विवेकाधिकार के विरुद्ध चेतावनी दी थी।
    • उदाहरण: डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि राज्यपाल सामान्यतः संवैधानिक परंपराओं के अनुसार कार्य करेंगे, न कि व्यक्तिगत इच्छाओं के आधार पर।

विधानसभा के विश्वास से संबंध

  • बहुमत का सिद्धांत: मुख्यमंत्री तभी तक पद पर बना रहता है, जब तक उसे विधानसभा का विश्वास और बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
    • उदाहरण: चुनाव में पराजय के बाद, यदि नई विधानसभा किसी अन्य नेता का समर्थन करती है, तो निवर्तमान मुख्यमंत्री को त्याग-पत्र देना पड़ता है।
  • फ्लोर टेस्ट का सिद्धांत: बहुमत की जाँच का उचित माध्यम विधानसभा का पटल है, न कि राजभवन का आकलन।
    • उदाहरण: एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने फ्लोर टेस्ट को प्राथमिकता दी।
  • सीमित विवेकाधिकार: यदि बहुमत को लेकर संदेह हो, तो राज्यपाल फ्लोर टेस्ट कराने का निर्देश दे सकता है। इस  प्रमाण के बिना राज्यपाल मुख्यमंत्री को पद से नहीं हटा सकता है।
    • उदाहरण: नबम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष (2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपालों द्वारा विवेकाधिकार के दुरुपयोग पर सीमाएँ निर्धारित कीं।
  • जब विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो जाता है और नई बहुमत व्यवस्था आती है, तब निवर्तमान मंत्रिपरिषद अपनी वैधता खो देती है।
    • उदाहरण: ऐसी स्थिति में राज्यपाल को बहुमत दल के नेता को सरकार गठन हेतु आमंत्रित करना चाहिए।
  • न्यायिक पुनरावलोकन: यदि राज्यपाल की कार्रवाई मनमानी या दुर्भावनापूर्ण हो, तो वह न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होती है।
    • उदाहरण: शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में न्यायालय ने कहा कि कुछ सीमित परिस्थितियों के अलावा, राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है।

निष्कर्ष

अनुच्छेद-164 के अंतर्गत राज्यपाल का ‘प्रसादपर्यंत’ एक संवैधानिक औपचारिकता है, न कि स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति का स्रोत। लोकतांत्रिक वैधता का वास्तविक आधार विधानसभा का विश्वास है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि राज्य में शासन का निर्धारण राज्यपाल के विवेक से नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के बहुमत समर्थन से हो।

The ‘pleasure of the Governor’ under Article 164 is not an absolute discretionary power but is constitutionally tethered to the confidence of the legislative assembly. Examine this statement in light of Constituent Assembly debates and Supreme Courts judgments. in hindi

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