Q. भारत में राजनीतिक वित्तपोषण न तो निष्पक्ष है और न ही पारदर्शी। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियों और ADR आंकड़ों के आलोक में इस कथन की चर्चा कीजिए। भारतीय लोकतंत्र में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए किन संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
  • ADR डेटा निष्कर्ष
  • आवश्यक संरचनात्मक सुधार।

उत्तर

भारत में राजनीतिक वित्तपोषण न तो निष्पक्ष है और न ही पारदर्शी। यह एक ऐसी व्यवस्था को संदर्भित करता है, जहाँ अक्सर ‘धन की शक्ति’ ‘मत की शक्ति’ से अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। सत्ताधारी दलों द्वारा संसाधनों तक असमान पहुँच और संभावित लेन-देन संबंधी समझौतों को छिपाने वाले गुमनाम दान की निरंतरता के कारण निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा का अभाव है।

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ (2024-25)

  • सूचना का अधिकार: न्यायालय ने निर्णय दिया कि इलेक्टोरल बॉण्ड योजना असंवैधानिक है, क्योंकि यह अनुच्छेद-19(1)(a) के अंतर्गत मतदाताओं के सूचना के अधिकार का उल्लंघन करती है।
  • अनुपातिकता की कसौटी: न्यायालय ने कहा कि काले धन पर अंकुश (घोषित उद्देश्य) दाताओं की पूर्ण गुमनामी को उचित नहीं ठहराता, क्योंकि कम प्रतिबंधात्मक उपाय उपलब्ध थे।
    • उदाहरण: न्यायालय ने योजना को ‘दोधारी तलवार’ बताया, जो सरकार को दाताओं की जानकारी देती है, पर जनता से उसे छिपाती है।
  • कॉरपोरेट गठजोड़ संबंधी चिंता: असीमित कॉरपोरेट चंदे की अनुमति देने वाले संशोधनों को निरस्त करते हुए न्यायालय ने कहा कि कॉरपोरेट दान अक्सर नीतिगत लाभों के बदले ‘व्यावसायिक लेन-देन’ बन जाते हैं।
    • न्यायालय की यह टिप्पणी कि दान पर 7.5% लाभ की सीमा हटाने से ‘भाई-भतीजावाद आधारित पूँजीवाद’ का मार्ग प्रशस्त हुआ।
  • गोपनीयता बनाम पारदर्शिता: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राजनीतिक संबद्धता निजी हो सकती है, पर नीति को प्रभावित करने हेतु किए जाने वाले बड़े पैमाने के वित्तपोषण पर सूचनात्मक गोपनीयता का अधिकार लागू नहीं होता।

चुनाव सुधार संस्था के आँकड़ों के निष्कर्ष

  • अज्ञात स्रोतों का प्रभुत्व: आँकड़ों से स्पष्ट है कि राजनीतिक आय का बड़ा भाग अब भी ऐसे स्रोतों से आता है, जिनकी पहचान जनता के समक्ष उजागर नहीं होती।
    • उदाहरण: हाल के वर्षों में राष्ट्रीय दलों को प्राप्त लगभग 60% धन ‘अज्ञात स्रोतों’ से आया।
  • वितरण में असंतुलन: आँकड़े दर्शाते हैं कि घोषित कॉरपोरेट तथा बॉण्ड-आधारित धन का अत्यधिक भाग सत्तारूढ़ दल को प्राप्त हुआ।
  • बॉण्ड-निर्भरता में वृद्धि: समाप्त होने से पूर्व निर्वाचन बॉण्ड ‘अज्ञात’ आय का प्रमुख माध्यम बन गए, जिससे धन का केंद्रीकरण और बढ़ा।
    • उदाहरण: वर्ष 2022–23 में राष्ट्रीय दलों की अज्ञात आय का 82% से अधिक हिस्सा विशेष रूप से निर्वाचन बॉण्ड से प्राप्त हुआ।
  • कॉरपोरेट क्षेत्र का प्रभाव: रिपोर्टों से पुष्टि होती है कि राष्ट्रीय दलों को प्राप्त घोषित दानों का लगभग 90% भाग व्यक्तियों के बजाय कॉरपोरेट/व्यावसायिक क्षेत्र से आया।
    • उदाहरण: वर्ष 2023–24 में कॉरपोरेट दाताओं ने राष्ट्रीय दलों को ₹2,262 करोड़ का योगदान दिया, जिसमें से 91% राशि एक ही दल को प्राप्त हुई।

आवश्यक संरचनात्मक सुधार

  • पूर्ण प्रकटीकरण अनिवार्यता: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन कर सभी दानों के प्रकटीकरण को अनिवार्य किया जाए तथा वर्तमान ₹20,000 की सीमा हटाई जाए।
  • राज्य वित्तपोषण (वस्तु-आधारित): निजी कॉरपोरेट निर्भरता कम करने हेतु इंद्रजीत गुप्ता समिति (वर्ष 1998) की आंशिक राज्य वित्तपोषण संबंधी सिफारिशों को लागू किया जाए।
  • महालेखा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा अनुमोदित लेखापरीक्षा: राजनीतिक दलों के खातों का स्वतंत्र लेखापरीक्षण सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: विधि आयोग लंबे समय से दलों के वित्त का ‘स्वतंत्र और कठोर’ लेखापरीक्षण करने की अनुशंसा करता रहा है।
  • दल-स्तरीय व्यय की सीमा: जहाँ प्रत्याशी व्यय पर सीमा है, वहीं दल-स्तर पर कोई सीमा नहीं, समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु वैधानिक सीमा आवश्यक है।
  • चुनाव आयोग को पंजीकरण रद्द करने की शक्ति: केवल धनशोधन या कर-अपवंचन के उद्देश्य से अस्तित्व में रहने वाले ‘फर्जी  दलों’ को अपंजीकृत करने का अधिकार दिया जाए।
  • केवल डिजिटल/पता-योग्य वित्तीय मार्ग: सभी राजनीतिक चंदे और व्यय डिजिटल या बैंकिंग माध्यमों से अनिवार्य किए जाएँ, ताकि राजनीति में ‘नकद-अर्थव्यवस्था’ समाप्त हो।
    • उदाहरण: राजनीतिक धन प्रवाह की वास्तविक-समय निगरानी हेतु ‘केंद्रीकृत डिजिटल भंडार’ की संभावना।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत दल: राजनीतिक दलों को ‘लोक प्राधिकरण’ के रूप में सूचना का अधिकार अधिनियम के दायरे में लाया जाए, ताकि नागरिकों के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही सुनिश्चित हो।
    • उदाहरण: वर्ष 2013 के केंद्रीय सूचना आयोग के निर्णय के बावजूद राजनीतिक दलों ने सामूहिक रूप से इस श्रेणीकरण का विरोध किया है।

निष्कर्ष

निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित करने के लिए केवल ‘कानूनी वैधता’ से आगे बढ़कर ‘नैतिक पारदर्शिता’ की आवश्यकता है। राज्य द्वारा वित्तपोषण और स्वतंत्र लेखापरीक्षा लागू करके भारत नीति निर्माण को राजनीतिक वित्तपोषण से अलग कर सकता है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि चुनाव ‘विचारों और प्रदर्शन’ की प्रतियोगिता हो, न कि ‘वित्तीय शक्ति’ की एकतरफा लड़ाई, जिससे भारतीय लोकतंत्र की नींव मजबूत होगी।

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