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Q. सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों (Public charitable trusts) में भारत के विकास को अधिक समावेशी बनाने की क्षमता है क्योंकि वे कुछ महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दों से जुड़े होते हैं। टिप्पणी कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

June 13, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • समावेशी विकास की संभावना
  • समावेशन के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ।

उत्तर

परिचय

सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882 जैसे विधिक ढाँचों के अंतर्गत कार्य करते हैं और कल्याणकारी सेवाओं की आपूर्ति में राज्य की क्षमता को पूरक रूप से सुदृढ़ करते हैं। ये स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में मौजूद अंतरालों को कम करने में सहायक होते हैं। उनकी जमीनी स्तर तक पहुँच और लचीलापन उन्हें अधिक समावेशी एवं सहभागी विकास परिणामों को आगे बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण साधन बनाता है।

समावेशी विकास की संभावनाएँ

  • सेवा वितरण: ट्रस्ट स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण जैसे क्षेत्रों में अंतिम छोर तक पहुँच सुनिश्चित कर राज्य क्षमता की कमी को पूरा करते हैं।
    • उदाहरण: टाटा ट्रस्ट आकांक्षी जिलों (नीति आयोग) में जनजातीय स्वास्थ्य सेवाओं और कुपोषण उन्मूलन कार्यक्रमों का समर्थन करता हैं।
  • लक्षित सहायता: ये संगठन महिलाओं, SC/ST एवं दिव्यांगों जैसे कमजोर वर्गों पर ध्यान केंद्रित कर समानता सुनिश्चित करते हैं।
    • उदाहरण: अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ग्रामीण एवं वंचित क्षेत्रों में सरकारी स्कूल शिक्षा सुधार पर कार्य करती है।
  • नवाचारी मॉडल: ट्रस्ट कम लागत वाले मापनीय समाधान विकसित कर उन्हें बाद में सरकारी प्रणालियों में अपनाने योग्य बनाते हैं।
    • उदाहरण: अरविंद आई केयर सिस्टम का मॉडल किफायती नेत्र चिकित्सा सेवा वितरण में राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी रहा है।
  • सामुदायिक भागीदारी: ये स्थानीय सहभागिता को बढ़ावा देकर जवाबदेही और स्वामित्व को मजबूत करते हैं।
    • उदाहरण: एकीकृत जलसंभर क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP) के तहत ट्रस्टों द्वारा संचालित वाटरशेड परियोजनाएँ ग्राम संस्थानों को शामिल करती हैं।
  • संसाधन जुटाव: ये निजी परोपकार को सार्वजनिक उद्देश्यों में परिवर्तित कर सीमित सरकारी संसाधनों को पूरक बनाते हैं।
    • उदाहरण: कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत CSR-संबंधित ट्रस्ट स्वच्छता, शिक्षा और कौशल विकास परियोजनाओं को वित्तपोषित करते हैं।

समावेशन की चुनौतियाँ

  • कमज़ोर निगरानी: राज्य ट्रस्ट कानून, आईटी अधिनियम और FCRA जैसे विखंडित नियामक ढाँचों के कारण निगरानी एवं प्रवर्तन में अंतराल उत्पन्न होते हैं।
    • उदाहरण: विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के अंतर्गत अनुपालन संबंधी समस्याओं के कारण गृह मंत्रालय की रिपोर्टों में हजारों NGO/ट्रस्टों के पंजीकरण रद्द किए गए।
  • वित्तीय अपारदर्शिता: अपर्याप्त प्रकटीकरण मानकों के कारण निधियों के दुरुपयोग या अप्रभावी उपयोग की संभावना बनी रहती है।
    • उदाहरण: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्टों में सरकारी सहायता प्राप्त योजनाओं के तहत NGO/ट्रस्ट निधियों के उपयोग में अनियमितताएँ उजागर हुई हैं।
  • क्षेत्रीय असंतुलन: ट्रस्टों की गतिविधियाँ अधिकतर विकसित राज्यों में केंद्रित रहती हैं, जिससे उच्च आवश्यकता वाले क्षेत्र उपेक्षित रह जाते हैं।
    • उदाहरण: नीति आयोग एनजीओ दर्पण डेटा के अनुसार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में NGO संख्या अधिक है, जबकि BIMARU राज्यों में अपेक्षाकृत कम है।
  • नीतिगत असंगति: कई परियोजनाएँ सरकारी प्राथमिकताओं के समानांतर संचालित होती हैं, जिससे उनका प्रणालीगत प्रभाव सीमित हो जाता है।
  • दाता-प्रेरित पूर्वाग्रह: फोकस क्षेत्र अक्सर स्थानीय आवश्यकताओं की बजाय दाताओं की प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।
    • उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण में यह उल्लेख है कि परोपकारी निवेश मुख्यतः शहरी शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित रहता है, जबकि ग्रामीण आजीविका अपेक्षाकृत उपेक्षित रहती है।

Public Charitable Trusts

निष्कर्ष

सार्वजनिक परोपकारी ट्रस्ट्स (Public Charitable Trusts) को यदि राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप संरेखित एवं पारदर्शी एवं प्रभावी विनियमन के माध्यम से सुदृढ़ तथा सरकारी कार्यक्रमों के साथ बेहतर ढंग से एकीकृत किया जाए, तो वे समावेशी विकास को और अधिक मजबूत कर सकते हैं। बढ़ी हुई जवाबदेही, न्यायसंगत पहुँच और संस्थागत समन्वय सुनिश्चित करके भारत में इनके परिवर्तनकारी विकासात्मक संभावनाओं को अधिकतम किया जा सकता है।

Public charitable trusts have the potential to make India’s development more inclusive as they relate to certain vital public issues. Comment. in hindi

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