प्रश्न की मुख्य माँग
- क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव
- ऊर्जा कूटनीति पर प्रभाव
- अंतर-क्षेत्रीय संपर्क पर प्रभाव
- भारत के लिए आगे की राह।
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उत्तर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (जनवरी 2026) के मध्य हालिया उच्च स्तरीय बैठकों का प्रतिफल एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिए आशय-पत्र के रूप में सामने आया है। यह कदम पारंपरिक रूप से यू.ए.ई. को भारत की “पश्चिम एशिया पहुँच” की आधारशिला और पश्चिमी हिंद महासागर में एक वास्तविक रणनीतिक सहयोगी के रूप में स्थापित करता है।
क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव
- रक्षा औद्योगिक सहयोग: आशय-पत्र संयुक्त अभ्यास से आगे बढ़कर ड्रोन और नौसैनिक जहाजों जैसे सैन्य हार्डवेयर के संयुक्त निर्माण की ओर अग्रसर करता है, जिससे पश्चिमी आयात पर निर्भरता कम हो जाती है।
- उदाहरण के लिए: प्रस्तावित रणनीतिक रक्षा साझेदारी फ्रेमवर्क समझौते का उद्देश्य उन्नत प्रौद्योगिकियों और विशेष संचालन अंतरसंचालनीयता का सह-विकास करना है।
- समुद्री क्षेत्र जागरूकता: मजबूत नौसैनिक सहयोग होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब-अल-मंडेब जैसे महत्त्वपूर्ण चोकपॉइंट्स की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- उदाहरण के लिए: दोनों देशों ने समुद्री डकैती और गैर-राज्यीय खतरों का मुकाबला करने के लिए पश्चिमी हिंद महासागर में एक वास्तविक (डी फैक्टो) संरेखण को औपचारिक रूप दिया है।
- आतंकवाद-रोधी तालमेल: दोनों देश खुफिया जानकारी साझाकरण और वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (FATF) ढाँचे के तहत सीमा पार आतंकवाद और आतंकी वित्तपोषण के विरुद्ध एकीकृत रुख पर सहमति व्यक्त की है।
- उदाहरण के लिए: जनवरी 2026 के संयुक्त वक्तव्य में आतंकवाद की स्पष्ट निंदा दोहराई गई और आतंकी बुनियादी ढाँचे को नष्ट करने का आह्वान किया गया।
ऊर्जा कूटनीति पर प्रभाव
- दीर्घकालिक आपूर्ति निश्चितता: दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंधों के माध्यम से “क्रेता-विक्रेता” से “रणनीतिक भागीदार” की तरफ संक्रमण हुआ है, जो बाजार की अस्थिरता से सुरक्षा प्रदान करता है।
- उदाहरण के लिए: जनवरी 2026 में ADNOC गैस और HPCL के मध्य एक 10 वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए है, जिसके तहत ADNOC गैस वर्ष 2028 से प्रत्येक वर्ष HPCL को 0.5 मिलियन मीट्रिक टन एलएनजी की आपूर्ति करेगी।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR): संयुक्त अरब अमीरात, भारत के SPR कार्यक्रम में हिस्सेदारी रखने वाला एकमात्र देश बना हुआ है, जो वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के दौरान भौतिक तेल सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
- नागरिक परमाणु सहयोग: भारत के शांति कानून (2025) के अधिनियमन के बाद उन्नत परमाणु प्रौद्योगिकियों और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के क्षेत्र में सहयोग पर भी दोनों देश सहमत हुए है।
- उदाहरण के लिए: दोनों पक्ष व्यापक हरित ऊर्जा परिवर्तन के हिस्से के रूप में परमाणु ऊर्जा संयंत्र संचालन और रखरखाव में साझेदारी की तलाश कर रहे हैं।
पार-क्षेत्रीय संपर्कता पर प्रभाव
- आईएमईसी कार्यान्वयन: यू.ए.ई. भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे में एक प्राथमिक नोड है, इसका लक्ष्य रसद लागत को 30% कम करना है।
- उदाहरण के लिए: अफ्रीका और यूरोप में एमएसएमई निर्यात को सुव्यवस्थित करने के लिए जेबेल अली में “वर्चुअल ट्रेड कॉरिडोर” और “भारत मार्ट” विकसित किए जा रहे हैं।
- भारत-अफ्रीका सेतु: अफ्रीकी बाजारों को लक्षित करने वाले भारतीय सामानों के लिए पुन: निर्यात केंद्र के रूप में संयुक्त अरब अमीरात के विश्व स्तरीय लॉजिस्टिक्स (जैसे डीपी वर्ल्ड) का उपयोग करना।
- डिजिटल कनेक्टिविटी: “डिजिटल/डेटा दूतावास” की स्थापना करना और निर्बाध सीमा पार लेन-देन के लिए राष्ट्रीय भुगतान प्लेटफॉर्मों को आपस में एकीकृत करना।
- उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए भारत के UPI को यू.ए.ई. भुगतान प्रणालियों के साथ एकीकृत करने की व्यापक योजना पर काम चल रहा है।
भारत के लिए आगे की राह
- व्यापार दोगुना करना: वर्ष 2022 के व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA ) ढाँचे का लाभ उठाते हुए, दोनों देशों को वर्ष 2032 तक 200 बिलियन डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य की दिशा में कार्य करना चाहिए।
- संप्रभु संपदा निधि का एकीकरण: वर्ष 2026 में शुरू होने वाली द्वितीय एनआईआईएफ अवसंरचना निधि में यूएई फंड (जैसे- एडीआईए और मुबाडाला) से निवेश आकर्षित करना।
- ज्ञान सेतु: प्रौद्योगिकी-संचालित “मानव सेतु” को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त अरब अमीरात में आईआईटी-दिल्ली और आईआईएम-अहमदाबाद के अपतटीय परिसरों का विस्तार करना।
- अंतरिक्ष व्यावसायीकरण: IN-SPACe और यू.ए.ई. अंतरिक्ष एजेंसी के बीच सहयोग के माध्यम से संयुक्त अंतरिक्ष मिशन शुरू करना और प्रक्षेपण परिसर विकसित करना।
निष्कर्ष
भारत-यू.ए.ई. साझेदारी “श्रम के बदले तेल के लेन-देन” मॉडल से एक बहुआयामी रणनीतिक गठबंधन में विकसित हुई है। यू.ए.ई. को अपनी मुख्य सुरक्षा और कनेक्टिविटी संरचना में एकीकृत करके, भारत न केवल “पश्चिम की ओर देखो” नीति की तरफ अग्रसर हो रहा है बल्कि पश्चिम एशिया के बहुध्रुवीय पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। विश्वास और साझा वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं द्वारा समर्थित यह तालमेल यह सुनिश्चित करता है कि भारत-यू.ए.ई. की जोड़ी 21वीं सदी के इंडो-पैसिफिक में स्थिरता और समृद्धि के लिए एक महत्त्वपूर्ण धुरी बनी रहेगी।
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