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Q. डिजिटल सतर्कतावाद (Digital Vigilantism) का बढ़ता चलन केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग ही नहीं है, बल्कि औपचारिक न्याय वितरण तंत्र के भीतर मौजूद संस्थागत उदासीनता का एक स्पष्ट लक्षण भी है। इसका आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

April 30, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • दृष्टिकोण के  समर्थन में तर्क दीजिए।
  • दृष्टिकोण विरोध में तर्क दीजिए। 

उत्तर

डिजिटल सतर्कतावाद से तात्पर्य है कि व्यक्ति या समूह द्वारा सोशल मीडिया का उपयोग कर कथित अपराधियों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करते हैं और उनका न्याय स्वयं करने का प्रयास करते हैं। इसका बढ़ना न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग और विधिक प्रक्रिया के लिए खतरे को दर्शाता है, बल्कि न्याय में देरी, संस्थागत उदासीनता और औपचारिक निवारण तंत्रों में घटते जन-विश्वास को भी उजागर करता है।

दृष्टिकोण के  समर्थन में तर्क

  • संस्थागत देरी से ऑनलाइन प्रचार को बढ़ावा: लंबी न्यायिक प्रक्रियाएँ और न्याय में देरी पीड़ितों को त्वरित कार्रवाई के लिए सोशल मीडिया पर मुद्दा उठाने के लिए प्रेरित करती हैं।
    • उदाहरण: नवंबर 2022 के एयरलाइन दुर्व्यवहार मामले में कार्रवाई तभी हुई, जब मुद्दा ऑनलाइन सार्वजनिक हुआ।
  • औपचारिक तंत्रों में विश्वास की कमी: पीड़ित अक्सर पुलिस की उदासीनता, पीड़ित-दोषारोपण और जटिल प्रक्रियाओं के कारण औपचारिक शिकायत करने से हिचकते हैं।
    • उदाहरण: #MeToo आंदोलन में उत्पीड़न के मामलों पर अपर्याप्त संस्थागत प्रतिक्रिया के कारण सोशल मीडिया का सहारा लिया गया।
  • एक वैकल्पिक निवारण मंच के रूप में सोशल मीडिया: प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र के अभाव में, पीड़ित डिजिटल मंचों का उपयोग उत्पीड़न और न्याय के बीच की खाई को पाटने के लिए करते हैं।
    • उदाहरण: TikTok जैसे प्लेटफॉर्म का उपयोग उत्पीड़न की घटनाओं को साझा कर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए किया गया है।
  • संस्थागत विफलता के कारण जन-आधारित जवाबदेही: सार्वजनिक आक्रोश और वायरल प्रसार संस्थाओं पर कार्रवाई करने का दबाव बनाते हैं, जहाँ वे अन्यथा निष्क्रिय रहती हैं।

दष्टिकोण के विरोध में तर्क 

  • प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन: डिजिटल सतर्कतावाद विधिक प्रक्रिया को दरकिनार कर देता है, जिससे बिना सत्यापन और निष्पक्ष सुनवाई के ही निर्णय दिए जाते हैं।
    • उदाहरण: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि ऑनलाइन बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से आगे बढ़कर बिना सत्यापन के सार्वजनिक शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं।
  • झूठे आरोपों और गुमनामी के दुरुपयोग का जोखिम: सोशल मीडिया पर अप्रमाणित दावे तेजी से फैलते हैं, जिससे बिना जवाबदेही के किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँच सकता है।
    • उदाहरण: उड़ान से जुड़ी घटना में आरोपों को मीडिया और प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा स्वतंत्र सत्यापन के बिना बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।
  • न्याय के बजाय सार्वजनिक प्रदर्शन बनना: ऑनलाइन आक्रोश समाधान की बजाय दृश्यता को प्राथमिकता देता है, जिससे गंभीर मुद्दे वायरल सामग्री में बदल जाते हैं।
    • उदाहरण: उत्पीड़न से जुड़े मामलों में वायरल पोस्ट अक्सर कानूनी निष्कर्ष के बजाय आक्रोश पर केंद्रित रहती हैं।
  • वास्तविक सतर्कतावाद नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग: पारंपरिक सतर्कतावाद के विपरीत, इन गतिविधियों में संगठित प्रवर्तन का अभाव होता है और यह पीड़ित तथा आरोपित—दोनों को नुकसान पहुँचा सकता है।

निष्कर्ष

इस प्रकार, यह मुद्दा केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सार्वजनिक शर्मिंदगी का नहीं है, बल्कि उन संस्थागत विफलताओं का भी है, जो लोगों को न्याय के लिए सोशल मीडिया की ओर धकेलती हैं। डिजिटल सतर्कतावाद को रोकने के लिए औपचारिक शिकायत निवारण तंत्रों को सुदृढ़ करना और उनमें जन-विश्वास बहाल करना अत्यंत आवश्यक है।

The rise of digital vigilantism is not merely an abuse of free speech but a glaring symptom of systemic apathy within the formal justice delivery mechanism. Critically Examine. in hindi

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