प्रश्न की मुख्य माँग
- शिक्षा के वस्तुकरण से संबंध।
- बदलते पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों से संबंध।
- व्यावहारिक समाधान।
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उत्तर
भारत में छात्र आत्महत्याओं की प्रवृत्ति में वृद्धि संस्थागत विफलता मात्र नहीं है बल्कि व्यापक सामाजिक एनोमी (अलगाव की स्थिति) का भी संकेत देती है। अत्यंत दबाव युक्त शिक्षा-प्रणाली, परिणाम आधारित अपेक्षाएँ, और परिवर्तनशील पारिवारिक मूल्य संयुक्त रूप से युवाओं में गहरी अलगाव की भावना उत्पान करते हैं — जिससे शिक्षा सशक्तीकरण की अपेक्षा निराशा का स्रोत बन जाती है।
मुख्य भाग
शिक्षा के व्यावसायीकरण से जुड़ाव
- दबाव-प्रेरित कोचिंग संस्कृति: छात्र समग्र रूप से सीखने की अपेक्षा अंतहीन रूप से टेस्ट-तैयारी और प्रवेश-परीक्षा की कोचिंग के कारण तीव्र तनाव का सामना करते हैं।
- उदाहरण: 2013–2023 की अवधि में छात्र आत्महत्याओं में 65% वृद्धि हुई, जो भयावह शैक्षणिक दबाव को दर्शाती है।
- सफलता का वस्तुकरण: डिग्रियाँ, अंक और संस्थान सामाजिक प्रस्थिति के निर्धारक बन जाते हैं, जिससे छात्रों पर “हर कीमत पर प्रदर्शन” करने का दबाव बनता है।
- उदाहरण: IITs, IIMs और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में 2019–2023 की अवधि में 98 आत्महत्याएँ हुईं, जो दर्शाता है कि उच्च-स्तरीय सफलता भी निराशा को रोक नहीं पाती।
- असफलता का भय सामाजिक मृत्यु के समतुल्य है: परीक्षाओं या प्रदर्शन में असफलता अक्सर सीखने के बजाय शर्म उत्पन्न करती है, जिससे मानसिक टूटन होती है।
- उदाहरण: केवल वर्ष 2022 में ही परीक्षा असफलता से जुड़ी 2,200 से अधिक छात्र आत्महत्याएँ दर्ज की गईं।
- संस्थानों में भावनात्मक समर्थन की कमी: संस्थान अक्सर छात्रों को संख्या के रूप में देखते हैं; उनमें मानसिक-स्वास्थ्य और काउंसलिंग समर्थन सुविधाएँ अपर्याप्त रहती हैं।
परिवर्तनशील पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों से संबंध
- अभिभावकों की उच्च अपेक्षाएँ: परिवार शैक्षणिक सफलता को ही सुरक्षा का एकमात्र मार्ग मानते हैं, जिससे बच्चों पर अवास्तविक आकाँक्षाओं का बोझ पड़ता है।
- घर में भावनात्मक अलगाव की भावना: समृद्ध या महत्त्वाकांक्षी परिवार अक्सर बच्चों की मानसिक आवश्यकताओं की उपेक्षा करते हैं और केवल परिणामों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
- सामूहिक समर्थन और समानुभूति में गिरावट: पारंपरिक घनिष्ठ पारिवारिक या सामुदायिक समर्थन कमजोर हो गया है, जिससे छात्र अधिक असुरक्षित हो जाते हैं।
- उदाहरण: विशेषज्ञों का कहना है कि कई आत्महत्या करने वाले छात्रों ने स्वयं को न कि केवल शैक्षणिक रूप से बोझिल बल्कि “समझा न जा सकने वाला और असमर्थित” भी महसूस किया।
- असफलता और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कलंक: परिवार अक्सर परीक्षा में असफलता या भावनात्मक तनाव को अस्वीकार्य मानते हैं, जिससे सहायता की अपेक्षा चुप्पी बढ़ती है।
व्यावहारिक समाधान
- परिसर में मानसिक-स्वास्थ्य समर्थन को मजबूत करना: अनिवार्य काउंसलिंग केंद्र, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक और सहकर्मी-समर्थन समूह स्कूलों और कॉलेजों में शुरुआती तनावों का पता लगा सकते हैं।
- शैक्षणिक दबाव और परीक्षा तनाव को कम करना: उच्च-प्रतिष्ठा वाली परीक्षाओं से हटकर सतत और विविध मूल्यांकन पद्धतियों की ओर बढ़ना, जिसमें प्रोजेक्ट कार्य और बहु-प्रयास परीक्षाएँ शामिल हों।
- अभिभावक जागरूकता और सहायक पारिवारिक वातावरण: अभिभावकों को यथार्थवादी अपेक्षाओं, सहानुभूति और भावनात्मक समर्थन पर काउंसलिंग देने से बच्चों पर अनावश्यक प्रदर्शन दबाव कम होता है।
- सुगम हेल्पलाइन और संकट हस्तक्षेप: 24/7 छात्र हेल्पलाइन और कैंपस संकट टीमें परेशान छात्रों को तत्काल सहायता प्रदान करती हैं।
- उदाहरण: “टेली-मानस” मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन प्रतिदिन संकटग्रस्त छात्रों से हजारों कॉल प्राप्त करती है।
- जीवन-कौशल और भावनात्मक साक्षरता शिक्षा: सामना करने की तकनीकें, भावनात्मक नियंत्रण, निर्णय-निर्माण और दृढ़ता सिखाने से छात्र तनाव को बेहतर ढंग से संभालने में सक्षम होते हैं।
- उदाहरण: दिल्ली का “हैप्पीनेस करिकुलम “ छात्रों में भावनात्मक कल्याण में सुधार के साथ चिंता स्तर में कमी लाया।
निष्कर्ष
छात्र आत्महत्याओं में बढ़ोतरी मात्र संस्थागत उपेक्षा नहीं बल्कि गहरे सामाजिक पतन को दर्शाती है; जहाँ शिक्षा का वस्तुकरण हो गया है और पारिवारिक सहानुभूति क्षीण होती जा रही है। समर्थन प्रणालियों का पुनर्निर्माण, अंकों से जुड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा को कम करना, और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना, इस अराजकता के संकट के समाधान में सहायक हो सकती हैं।
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