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Q. अनियोजित शहरीकरण और नीतिगत विरोधाभासों ने भारत में मिश्रित उपयोग वाली वाणिज्यिक इमारतों को संभावित अग्नि जाल में बदल दिया है। इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और अदूरदर्शी कार्रवाई के बजाय दीर्घकालिक संरचनात्मक और प्रशासनिक समाधानों के सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

June 25, 2026

GS Paper IIIDisaster Management

प्रश्न की मुख्य माँग 

  • मिश्रित-उपयोग (Mixed-Use) भवनों के अग्नि के प्रति अधिक संवेदनशील होने के संरचनात्मक एवं प्रशासनिक कारण।
  • सुरक्षित शहरी अवसंरचना के निर्माण हेतु दीर्घकालिक उपाय।

उत्तर

परिचय

कोचिंग संस्थानों, होटलों एवं दुकानों जैसे मिश्रित-उपयोग भवनों में आग लगने की घटनाएँ शहरी नियोजन तथा नियामकीय प्रवर्तन की गंभीर कमियों को उजागर करती हैं। अनेक भवन अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक उपयोग में लाए जाते हैं तथा भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में स्थित होने के कारण मानव जीवन एवं संपत्ति के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं। ऐसे मामलों में केवल तात्कालिक प्रतिक्रियाएँ, जैसे भवनों को ध्वस्त करना या सील करना, पर्याप्त नहीं हैं; बल्कि इनके मूल संरचनात्मक एवं प्रशासनिक कारणों का समाधान आवश्यक है।

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संरचनात्मक एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ

  • अत्यधिक भीड़भाड़ एवं मिश्रित-उपयोग संबंधी उल्लंघन: आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृत भवनों का उपयोग प्रायः वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए किया जाता है, जिससे अग्नि-भार (Fire Load) बढ़ जाता है।
    • उदाहरण: लखनऊ में अग्निकांड से प्रभावित भवन को आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृति मिली थी, किंतु उसमें वाणिज्यिक प्रतिष्ठान संचालित होने के कारण जनहानि का जोखिम बढ़ गया।
  • कमज़ोर शहरी अवसंरचना: कई भवनों तक पहुँचने वाले मार्ग राष्ट्रीय भवन संहिता (NBC), 2016 के भाग-4 (अग्नि एवं जीवन सुरक्षा) के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, जिसमें उच्च-आवासीय अथवा मिश्रित-उपयोग वाले वाणिज्यिक भवनों के लिए 9–12 मीटर चौड़ी पहुँच सड़क अनिवार्य की गई है।
  • नियामकीय कमियाँ एवं नीतिगत विरोधाभास: ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के अंतर्गत अनुपालन मानकों में दी गई छूट कई बार कठोर अग्नि-सुरक्षा जाँच को कमजोर कर देती है।
    • उदाहरण: निर्धारित ऊँचाई सीमा (सामान्यतः 15 मीटर से कम) वाले भवन अनेक राज्यों के अग्निशमन सेवा अधिनियमों के अंतर्गत अनिवार्य फायर अनापत्ति प्रमाण-पत्र (Fire NOC) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं, जिससे बिना निगरानी वाले जोखिमपूर्ण क्षेत्र विकसित हो जाते हैं।
  • हितधारकों में जागरूकता का अभाव: भवन स्वामियों, निवासियों एवं स्थानीय निकायों द्वारा मूलभूत अग्नि-सुरक्षा मानकों का पर्याप्त पालन नहीं किया जाता है।
    • उदाहरण: अनेक शहरी भवनों में कार्यशील अग्निशामक यंत्र तथा आपातकालीन निकास संकेतक उपलब्ध नहीं होते हैं।
  • भ्रष्टाचार एवं कमजोर निगरानी व्यवस्था: रिश्वतखोरी एवं अनियमित स्वीकृतियों के कारण सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती है, जिससे असुरक्षित भवनों का संचालन जारी रहता है।

दीर्घकालिक संरचनात्मक एवं प्रशासनिक समाधान

  • समेकित शहरी नियोजन: मिश्रित-उपयोग वाले विकास क्षेत्रों में उचित भूमि-उपयोग जोनिंग, पर्याप्त सड़क चौड़ाई तथा आपातकालीन पहुँच मार्ग सुनिश्चित किए जाएँ।
  • अनिवार्य अग्नि-सुरक्षा अवसंरचना: अधिक आवागमन वाले सभी भवनों में फायर अलार्म, स्प्रिंकलर प्रणाली, अग्निशामक यंत्र तथा सुरक्षित आश्रय क्षेत्र अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाएँ।
  • नियमित लेखा-परीक्षण एवं प्रभावी प्रवर्तन: एकबारगी सीलिंग या ध्वस्तीकरण के बजाय नियमित निरीक्षण, सुरक्षा ऑडिट तथा मानकों के उल्लंघन पर कठोर दंड की संस्थागत व्यवस्था विकसित की जाए।
  • जागरूकता एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम: भवन स्वामियों, निवासियों तथा स्थानीय निकायों के कर्मचारियों को अग्नि-सुरक्षा मानकों एवं आपातकालीन प्रतिक्रिया के संबंध में नियमित प्रशिक्षण दिया जाए।
    • उदाहरण: स्वच्छता संबंधी नगर निगम अभियानों की तर्ज पर जन-जागरूकता कार्यक्रम अग्नि-सुरक्षा अनुपालन में सुधार ला सकते हैं।
  • डिजिटलीकरण एवं निगरानी: भवन स्वीकृतियों, अग्नि-सुरक्षा ऑडिट तथा सुरक्षा प्रमाण-पत्रों का केंद्रीकृत डिजिटल डेटाबेस विकसित कर सतत् निगरानी सुनिश्चित की जाए।

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निष्कर्ष

अनियोजित शहरीकरण और नीतिगत विरोधाभासों ने मिश्रित-उपयोग वाले भवनों को गंभीर अग्नि-जोखिम में बदल दिया है। अतः इन चुनौतियों का समाधान केवल तात्कालिक और प्रतिक्रियात्मक उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए सुनियोजित शहरी नियोजन, सुदृढ़ प्रवर्तन तंत्र, अवसंरचनात्मक उन्नयन, हितधारकों में जागरूकता तथा संस्थागत निगरानी जैसी दीर्घकालिक एवं प्रणालीगत पहलों की आवश्यकता है।

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Unplanned urbanisation and policy paradoxes have transformed mixed-use commercial buildings in India into potential fire traps. Critically analyse the statement and suggest long-term structural and administrative solutions over knee-jerk reactions. in hindi

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