प्रश्न की मुख्य माँग
- चीन से उत्पन्न अस्तित्वगत खतरे।
- सोवियत संघ की तुलना में यह अधिक चुनौतीपूर्ण क्यों है।
- आगे की राह।
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उत्तर
परिचय
अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता 21वीं सदी की सबसे निर्णायक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा बन चुकी है। शीतयुद्ध के विपरीत, चीन आर्थिक, प्रौद्योगिकीय, सैन्य तथा भू-राजनीतिक क्षमताओं का समन्वय करता है, जिससे वह संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए एक बहुआयामी रणनीतिक चुनौती बन गया है।
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चीन से उत्पन्न अस्तित्वगत खतरे
- आर्थिक प्रतिद्वंद्विता: चीन वैश्विक व्यापार एवं आपूर्ति शृंखलाओं में अमेरिका के प्रभुत्व को चुनौती देते हुए उसका प्रमुख आर्थिक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है।
- उदाहरण: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं के लिए चीन सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जिससे अमेरिका का प्रभाव सीमित होता है।
- प्रौद्योगिकीय चुनौती: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं उन्नत विनिर्माण जैसी महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में चीन की तीव्र प्रगति अमेरिका के तकनीकी नेतृत्व को चुनौती दे रही है।
- सैन्य प्रतिस्पर्द्धा: अमेरिका, चीन की बढ़ती सैन्य क्षमताओं का संतुलन बनाने के लिए क्वाड एवं ऑकस (AUKUS) जैसे गठबंधनों को बनाए हुए है।
- वैश्विक प्रभाव: चीन एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में अपने कूटनीतिक एवं आर्थिक प्रभाव का विस्तार कर रहा है, जिससे अमेरिका की रणनीतिक बढ़त कम हो रही है।
- उदाहरण: बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) की परियोजनाओं तथा “स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स” नेटवर्क ने क्षेत्र में चीन की उपस्थिति को सुदृढ़ किया है।
- रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा: चीन आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभाव के वैकल्पिक मॉडल को प्रस्तुत कर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पुनः आकार देने का प्रयास कर रहा है।
सोवियत संघ की तुलना में यह अधिक चुनौतीपूर्ण क्यों है
- आर्थिक एकीकरण: सोवियत अर्थव्यवस्था के विपरीत, चीन वैश्विक व्यापार एवं आपूर्ति शृंखलाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
- व्यापारिक निर्भरता: अमेरिका के अनेक सहयोगी देश, वॉशिंगटन के साथ सुरक्षा साझेदारी होने के बावजूद आर्थिक रूप से चीन पर निर्भर हैं।
- प्रौद्योगिकीय बढ़त: चीन केवल सैन्य शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों में अमेरिका से प्रतिस्पर्द्धा कर रहा है।
- उदाहरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में प्रतिस्पर्द्धा अमेरिका–चीन प्रतिद्वंद्विता का प्रमुख केंद्र बन गई है।
- वैश्विक पहुँच: चीन का प्रभाव केवल विचारधारा तक सीमित न रहकर अवसंरचना वित्तपोषण, निवेश एवं कनेक्टिविटी के माध्यम से भी विस्तृत हो रहा है।
- उदाहरण: चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC), हंबनटोटा बंदरगाह तथा ग्वादर बंदरगाह के माध्यम से चीन ने अपना प्रभाव बढ़ाया है।
- नियंत्रण की अत्यधिक लागत: परस्पर आर्थिक निर्भरता के कारण चीन को संतुलित करने में आर्थिक एवं सैन्य, दोनों प्रकार की भारी लागत आती है।
आगे की राह
- उत्तरदायी प्रतिस्पर्द्धा: रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के साथ-साथ साझा वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग का संतुलन बनाए रखा जाए।
- गठबंधनों को सुदृढ़ करना: स्थिर इंडो-पैसिफिक संतुलन बनाए रखने के लिए विश्वसनीय साझेदारियों को मजबूत किया जाए।
- उदाहरण: क्वाड एवं ऑकस (AUKUS) क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रमुख स्तंभ बने हुए हैं।
- प्रौद्योगिकीय लचीलापन: महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में सुरक्षित एवं विविधीकृत आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण किया जाए।
- उदाहरण: अमेरिकी चिप्स एंड साइंस एक्ट, 2022 घरेलू सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देता है।
- संकट संवाद: तनाव बढ़ने से रोकने के लिए सैन्य एवं कूटनीतिक संवाद को निरंतर बनाए रखा जाए।
- नियम-आधारित व्यवस्था: शांतिपूर्ण प्रतिस्पर्द्धा एवं अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान को सुनिश्चित करने वाले अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को बढ़ावा दिया जाए।
- उदाहरण: इंडो-पैसिफिक में नौवहन की स्वतंत्रता तथा UNCLOS के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
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निष्कर्ष
चीन, अपनी आर्थिक एकीकरण एवं प्रौद्योगिकीय क्षमता के कारण सोवियत संघ की तुलना में अधिक व्यापक रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरा है। वैश्विक स्थिरता बनाए रखने के लिए निरंतर संवाद, सुदृढ़ गठबंधन, संतुलित प्रतिस्पर्द्धा तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पालन अत्यंत आवश्यक है।