प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के जल तनाव (Water Stress) से जल दिवालियापन (Water Bankruptcy) की ओर बढ़ने के कारण।
- वर्तमान जल प्रबंधन ढाँचे की कमियाँ।
- जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी रणनीति।
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उत्तर
परिचय
भारत की जल चुनौती अब मौसमी जल-अभाव से आगे बढ़कर संरचनात्मक जल-क्षरण का रूप ले चुकी है। यदि समय रहते व्यापक एवं प्रणालीगत सुधार नहीं किए गए, तो जल तनाव (Water Stress) अपरिवर्तनीय जल दिवालियापन (Water Bankruptcy) में बदल सकता है, जिससे आजीविका, खाद्य सुरक्षा तथा आर्थिक विकास गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।
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जल दिवालियापन के प्रमुख कारण
- भूजलभृत का क्षय: UNU-INWEH (2026) के अनुसार, विश्वभर में भूजलभृत सुरक्षित सीमा से अधिक दोहन का शिकार हो रहे हैं तथा भारत सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल है।
- नदी बेसिनों में जलाभाव: कई नदी बेसिनों में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता जल-अभाव की निर्धारित सीमा से नीचे पहुँच चुकी है।
- उदाहरण: CEEW के अनुसार, भारत के 15 प्रमुख नदी बेसिनों में से 11 जल तनावग्रस्त हैं; कृष्णा एवं कावेरी बेसिनों में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,000 घन मीटर से भी कम है।
- जलवायु परिवर्तनशीलता: अनियमित मानसून एवं लंबे शुष्क काल भूजल पुनर्भरण को कम करते हैं तथा घटते भूजल संसाधनों पर निर्भरता बढ़ाते हैं।
- उदाहरण: IMD (जून 2026) के अनुसार, मानसूनी वर्षा में 40% से अधिक की कमी दर्ज की गई।
- बढ़ती जल माँग: तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण एवं सिंचाई के विस्तार के कारण जल की माँग और आपूर्ति के मध्य अंतराल लगातार बढ़ रहा है।
- उदाहरण: एक अध्ययन के अनुसार, दिल्ली को अपनी दैनिक जल आवश्यकता का केवल लगभग 70% ही प्राप्त होता है।
- जल प्रदूषण: नदियों एवं भूजल के प्रदूषित होने से भौतिक रूप से जल उपलब्ध होने के बावजूद उपयोग योग्य मीठे जल की मात्रा घटती जा रही है।
जल प्रबंधन ढाँचे की कमियाँ
- डेटा का अभाव: जल निकासी, उपभोग एवं जल-हानि से संबंधित विश्वसनीय आँकड़ों की कमी के कारण साक्ष्य-आधारित योजना निर्माण प्रभावित होता है।
- विखंडित शासन व्यवस्था: विभिन्न एजेंसियाँ जल संसाधनों का प्रबंधन करती हैं, परंतु विभिन्न क्षेत्रों एवं नदी बेसिनों के मध्य समन्वय का अभाव है।
- उदाहरण: नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक, 2018 ने एकीकृत जल शासन की आवश्यकता पर बल दिया है।
- भूजल का अत्यधिक दोहन: कमजोर नियामक व्यवस्था, विशेषकर कृषि क्षेत्र में, भूजल के अस्थिर एवं अत्यधिक दोहन को बढ़ावा देती है।
- आपूर्ति-केंद्रित दृष्टिकोण: नीतियाँ अभी भी माँग प्रबंधन एवं जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के बजाय नई जल अवसंरचना के निर्माण को अधिक प्राथमिकता देती हैं।
- अपर्याप्त संरक्षण: वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग तथा जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन का प्रभावी एवं समान रूप से क्रियान्वयन नहीं हो पाया है।
जल सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु बहुआयामी रणनीति
- नदी बेसिन आधारित योजना: वास्तविक समय के जलवैज्ञानिक (Hydrological) एवं जल उपयोग संबंधी आँकड़ों के आधार पर एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन अपनाया जाए।
- उदाहरण: राष्ट्रीय जल नीति-2012 की सिफारिशें।
- माँग प्रबंधन: सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण तथा शहरी क्षेत्रों में जल के दक्ष उपयोग को बढ़ावा दिया जाए।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Per Drop More Crop)।
- भूजल संरक्षण: भूजलभृत मानचित्रण, सामुदायिक आधारित विनियमन तथा भूजल पुनर्भरण को सुदृढ़ किया जाए।
- उदाहरण: अटल भूजल योजना सहभागी भूजल प्रबंधन को प्रोत्साहित करती है।
- जल पुनर्चक्रण: शहरी एवं औद्योगिक क्षेत्रों में अपशिष्ट जल के उपचार, पुनः उपयोग तथा वर्षा जल संचयन का विस्तार किया जाए।
- उदाहरण: अमृत 2.0 (AMRUT 2.0) उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग को बढ़ावा देता है।
- संस्थागत सुधार: एकीकृत जल लेखांकन प्रणाली विकसित की जाए, स्थानीय निकायों को सशक्त बनाया जाए तथा सामुदायिक सहभागिता को प्रोत्साहित किया जाए।
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निष्कर्ष
जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संकट-आधारित प्रतिक्रियाओं के स्थान पर एकीकृत, विज्ञान-आधारित एवं समुदाय-नेतृत्व वाले जल शासन को अपनाना आवश्यक है। जल के दक्ष उपयोग, पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन तथा संस्थागत सुधारों के समन्वित प्रयासों से भारत अपने संभावित जल दिवालियापन को दीर्घकालिक जल लचीलापन एवं संधारणीयता में परिवर्तित कर सकता है।