प्रश्न की मुख्य माँग
- क्षेत्रीय सुरक्षा में जटिलताएँ
- राजनयिक स्थिति में जटिलताएँ
- भारतीय विदेश नीति का भविष्य (वर्ष 2026)।
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उत्तर
नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का कमजोर होना, जो बहुपक्षीय संस्थाओं के क्षरण और ‘संसाधनों के दुरुपयोग’ के उदय से चिह्नित है, भारत के पड़ोसी देशों में गहन राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न कर रहा है। यह दोहरा संकट भारत को एक अस्थिर परिदृश्य में आगे बढ़ने के लिए मजबूर करता है, जहाँ पारंपरिक गुटनिरपेक्षता की जगह ‘बहु-गठबंधन’ और रणनीतिक व्यावहारिकता ने ले ली है।
क्षेत्रीय सुरक्षा में जटिलताएँ
- सीमा सुरक्षा में वृद्धि: म्याँमार और बांग्लादेश के साथ खुली सीमाएँ विद्रोहियों तथा नशीले पदार्थों की तस्करी का मार्ग बन गई हैं और इन देशों में आंतरिक संकट ने इस समस्या को और भी बढ़ा दिया है।
- उदाहरण: वर्ष 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन ने ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर और सीमा पार घुसपैठ को लेकर चिंताएँ पुनः बढ़ा दी हैं।
- समुद्री घेराबंदी का खतरा: मालदीव और श्रीलंका जैसे द्वीपीय देशों में अस्थिरता बाहरी शक्तियों को ‘ऋण राहत’ या सुरक्षा के बहाने रणनीतिक उपस्थिति स्थापित करने का अवसर देती है।
- उदाहरण: मालदीव में चीन समर्थक बदलाव (2025) भारत के ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र’ और एक प्रमुख सुरक्षा प्रदाता के रूप में उसकी पारंपरिक भूमिका के लिए सीधा खतरा है।
- आतंकवाद की दिशा में बदलाव: पाकिस्तान में बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता और अफगानिस्तान में तालिबान के मजबूत होने से आतंकी ठिकानों को नई ऊर्जा मिली है, जो जम्मू-कश्मीर के महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को निशाना बना रहे हैं।
- पड़ोसी देशों में संसाधन संबंधी संघर्ष: नेपाल और भूटान में राजनीतिक अस्थिरता भारत की क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण दीर्घकालिक जलविद्युत और जल-बँटवारे समझौतों में बाधा डालती है।
- उदाहरण: नेपाल में बार-बार होने वाले नेतृत्व परिवर्तन ने पंचेश्वर बहुउद्देशीय परियोजना को रोक दिया है, जिससे उत्तरी भारत के विद्युत ग्रिड पर असर पड़ा है।
कूटनीतिक स्थिति निर्धारण में जटिलताएँ
- सामरिक स्वायत्तता पर दबाव: रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में तनाव जैसे वैश्विक संघर्ष भारत को ‘किसी एक पक्ष का साथ देने’ के लिए मजबूर करते हैं, जिससे उसकी ‘सभी के साथ मित्रतापूर्ण संबंध’ वाली छवि जटिल हो जाती है।
- उदाहरण: भारत द्वारा रूस से तेल की निरंतर खरीद के कारण वर्ष 2025 के अंत में कुछ भारतीय निर्यातों पर अमेरिका ने 25% का दंडात्मक शुल्क लगा दिया।
- ग्लोबल साउथ नेतृत्व का अंतर: जहाँ भारत ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करने का प्रयास कर रहा है, वहीं अफ्रीका और एशिया में चीन की ‘निवेश-आधारित कूटनीति’ अक्सर भारत के ‘क्षमता-निर्माण’ दृष्टिकोण से आगे निकल जाती है।
- उदाहरण: बांग्लादेश और श्रीलंका में चीन के बंदरगाह निवेश से एक ‘सामरिक रिक्तता’ उत्पन्न होती है, जिसे भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति भरने में संघर्ष करती है।
- संस्थागत हाशिए पर जाने का संकट: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और विश्व व्यापार संगठन के कमजोर होने से भारत को क्वाड या ब्रिक्स जैसे खंडित ‘लघुपक्षीय’ समूहों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिनके अधिदेश अक्सर परस्पर विरोधी होते हैं।
भारतीय विदेश नीति के लिए आगे की राह (2026)
- नेबरहुड फर्स्ट 2.0: सरकारी संबंधों से आगे बढ़कर ‘जन-केंद्रित’ कूटनीति की ओर बढ़ना, जिससे भारत-विरोधी भावनाओं का मुकाबला करने के लिए सहायता सीधे स्थानीय समुदायों तक पहुँचे।
- रणनीतिक भंडार जनादेश: वैश्विक आपूर्ति शृंखला के दुरुपयोग से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए राष्ट्रीय ‘महत्त्वपूर्ण खनिज भंडार’ और ‘पेट्रोलियम भंडार’ विकसित करना।
- उदाहरण: वर्ष 2026 तक 90 दिनों की ईंधन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का विस्तार।
- लघुपक्षीयता का सुदृढ़ीकरण: शत्रुतापूर्ण समुद्री अवरोधों से बचने के लिए वैकल्पिक व्यापार मार्ग बनाने हेतु I2U2 और IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा) को मजबूत करना।
- रक्षा स्वदेशीकरण (आत्मनिर्भरता): वैश्विक प्रतिबंधों के दौरान ‘पसंद की संप्रभुता’ सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2026 तक किसी एक राष्ट्र पर रक्षा आयात निर्भरता को 80% तक कम करना।
- डिजिटल अवसंरचना निर्यात: पड़ोसी और अफ्रीकी देशों में ‘तकनीकी निर्भरता’ विकसित करने के लिए भारत के डिजिटल नेटवर्क (UPI, आधार) का कूटनीतिक उपकरण के रूप में उपयोग करना।
- उदाहरण: भारत का लक्ष्य वर्ष 2026 तक पाँच और दक्षिण एशियाई और खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्थाओं में यूपीआई को एकीकृत करना है।
- चीन के साथ व्यावहारिक संबंध: वर्ष 2025 के आर्थिक सर्वेक्षण की अनुशंसा के अनुसार, पूर्ण अलगाव को रोकने के लिए ‘नियंत्रित आर्थिक संबंध’ बनाए रखते हुए सीमा विवादों को स्थिर रखना।
- संस्थागत सुधार की वकालत: पश्चिमी देशों के बाद के विश्व के पुनर्गठन को दर्शाते हुए, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक अंतरिम स्थायी सीट के लिए दबाव बनाने हेतु वर्ष 2026 के G4 शिखर सम्मेलन का लाभ उठाना।
निष्कर्ष
वर्ष 2026 में भारतीय विदेश नीति को ‘प्रतिक्रियात्मक संतुलन’ से ‘सक्रिय आकार देने’ की ओर अग्रसर होना चाहिए। अपनी आर्थिक शक्ति और डिजिटल क्षमता का लाभ उठाते हुए, भारत अपने संघीय हितों को वैश्विक अपेक्षाओं के अनुरूप ढाल सकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वह बहुध्रुवीय विश्व में एक ‘अपरिहार्य ध्रुव’ बना रहे और साथ ही अपनी सीमाओं को ‘अस्थिरता के दायरे’ से सुरक्षित रख सके।
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