नॉरवेस्टर (कालबैशाखी तूफान)
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ओडिशा में हाल ही में आए भीषण नॉरवेस्टर तूफानों ने जनहानि और व्यापक नुकसान पहुँचाया, जिससे पूर्वी भारत में इनके विनाशकारी मानसून पूर्व प्रभाव उजागर हुए।
नॉरवेस्टर (Nor’wester) के बारे में
- नॉरवेस्टर मार्च से मई के बीच पूर्वी भारत और बांग्लादेश में आने वाले मानसून पूर्व तीव्र आँधी-तूफान होते हैं। इन्हें स्थानीय रूप से कालबैशाखी (पश्चिम बंगाल) और बोर्दोइसिला (असम) कहा जाता है।
- निर्माण की प्रक्रिया: इन तूफानों का निर्माण तब होता है, जब बंगाल की खाड़ी से आने वाली गर्म और नम हवाएँ तथा ऊपरी स्तर की ठंडी और शुष्क उत्तर-पश्चिमी हवाएँ परस्पर क्रिया करती हैं, जिससे वायुमंडलीय अस्थिरता उत्पन्न होती है।
- मौसम पर प्रभाव
- चरम मौसम घटनाएँ: ये तीव्र हवाएँ, भारी वर्षा, तड़ित झंझा और ओलावृष्टि लाते हैं, जिससे मौसम में अचानक परिवर्तन होता है।
- विनाश और खतरे: तेज हवाओं से पेड़ उखड़ जाते हैं, घरों को नुकसान होता है, बिजली आपूर्ति बाधित होती है और जनहानि भी हो सकती है।
- स्थानीय शीतलन प्रभाव: ये तूफान पूर्वी भारत में भीषण गर्मी से अस्थायी राहत प्रदान करते हैं।
महत्त्व
- कृषि में भूमिका: मानसून से पहले की वर्षा जूट, धान और चाय की खेती के लिए लाभकारी होती है, हालाँकि अत्यधिक तीव्रता फसलों को नुकसान पहुँचा सकती है।
- सांस्कृतिक महत्त्व: कालबैशाखी के रूप में ये बंगाल और असम की लोक संस्कृति और मौसमी पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।
- जलवायु संबंधी महत्त्व: ये तूफान गर्मी से मानसून की ओर संक्रमण का संकेत देते हैं और क्षेत्रीय मौसम प्रणाली में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
भारत की प्रमुख स्थानीय पवनें
- लू (उत्तर भारत और पाकिस्तान): मई–जून के दौरान चलने वाली अत्यधिक गर्म और शुष्क हवाएँ, जो लू लगने और निर्जलीकरण का कारण बनती हैं।
- आम्र वर्षा (कर्नाटक और केरल): मानसून पूर्व वर्षा, जो आम के शीघ्र पकने में सहायक होती है।
- बोर्दोइसिला (असम): तेज और मानसून पूर्व तीव्र तूफान, जो अक्सर नुकसान पहुँचाते हैं।
- आँधी / काली आँधी (उत्तर-पश्चिम भारत): राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में आने वाले धूल भरे तूफान, जो अचानक तापमान गिराते हैं और दृश्यता कम करते हैं।
- टी शावर (असम, ओडिशा): चाय बागानों के लिए महत्त्वपूर्ण मानसून पूर्व वर्षा।
- समुद्री और स्थल समीर (तटीय भारत): दैनिक पवन चक्र—दिन में समुद्री समीर, भूमि को ठंडा करती हैं, जबकि रात में स्थल समीर समुद्र की ओर बहती हैं।
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क्वांटम प्रयोगशालाएँ
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भारत सरकार ने राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के अंतर्गत 23 संस्थानों में क्वांटम प्रयोगशालाएँ स्थापित करने को मंजूरी दी है।
क्वांटम प्रयोगशालाएँ
- परिचय: क्वांटम प्रयोगशालाएँ विशेष केंद्र हैं, जहाँ क्वांटम प्रौद्योगिकियों के शिक्षण, प्रशिक्षण और अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा।
- क्षमता निर्माण: इनका उद्देश्य क्वांटम संगणन, संचार और संवेदन जैसे क्षेत्रों में कुशल मानव संसाधन विकसित करना है।
- अनुसंधान एवं नवाचार: ये प्रयोगशालाएँ क्वांटम कूटलेखन और उन्नत पदार्थों जैसी अत्याधुनिक तकनीकों में स्वदेशी अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करेंगी।
राष्ट्रीय क्वांटम मिशन
- परिचय: राष्ट्रीय क्वांटम मिशन भारत का एक व्यापक कार्यक्रम है, जिसे वर्ष 2023 में शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य अत्याधुनिक क्वांटम प्रौद्योगिकियों का विकास करना है।
कार्यान्वयन निकाय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग
- वित्तपोषण और अवधि: कुल लागत: लगभग ₹6,003.65 करोड़; अवधि: वर्ष 2023–24 से 2030–31।
- उद्देश्य: क्वांटम संगणन, संचार, संवेदन और पदार्थों में क्षमता निर्माण तथा 50 से 1000 क्यूबिट क्षमता वाले क्वांटम कंप्यूटर विकसित करना।
- वैश्विक संदर्भ: भारत इस प्रकार का मिशन शुरू करने वाला विश्व का सातवाँ देश बन गया है, इससे पहले अमेरिका, ऑस्ट्रिया, फिनलैंड, फ्राँस, कनाडा और चीन इस दिशा में पहल कर चुके हैं।
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8.2 हजार वर्ष पूर्व की शीतलन घटना

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हालिया अध्ययन में पाया गया है कि ग्रीनलैंड में लगभग 8,200 वर्ष पूर्व हुई अचानक शीतलन घटना ने भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर कर दिया था, जो वैश्विक जलवायु तंत्रों के आपसी संबंध को दर्शाता है।
विस्तृत समाचार
- शोधकर्ताओं ने छत्तीसगढ़ के कोरबा स्थित तुमान झील से तलछट के नमूने एकत्र किए और उनमें संरक्षित जीवाश्म परागकणों का अध्ययन किया।
- परागकणों का विश्लेषण करके उन्होंने अतीत के वनस्पति पैटर्न का पुनर्निर्माण किया, जिससे उन्हें प्राचीन जलवायु परिस्थितियों का अनुमान लगाने में सहायता मिली।
8.2 हजार वर्ष पूर्व की शीतलन घटना
- परिचय: यह एक अचानक और अल्पकालिक वैश्विक शीतलन चरण था, जो लगभग 8,200 वर्ष पूर्व वर्तमान भू-वैज्ञानिक काल होलोसीन युग में हुआ।
- होलोसीन युग: यह वर्तमान भू-वैज्ञानिक काल है, जो लगभग 11,700 वर्ष पूर्व अंतिम हिमयुग के अंत से शुरू हुआ।
- तापमान में गिरावट: इस घटना के दौरान, ग्रीनलैंड का तापमान अपेक्षाकृत कम समय में लगभग 3 डिग्री सेल्सियस गिर गया।
- कारण: इसका मुख्य कारण हडसन खाड़ी के माध्यम से उत्तरी अटलांटिक में अगासिज झील से भारी मात्रा में ताजे जल का अचानक प्रवाह था।
- इस प्रवाह ने अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (AMOC) को बाधित कर दिया, जो वैश्विक ताप वितरण को नियंत्रित करता है।
- यह एक विशाल समुद्री धाराओं की प्रणाली है, जो वैश्विक कन्वेयर बेल्ट की तरह काम करती है, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म सतही जल को यूरोप तक ले जाती है और ठंडे, सघन जल को वापस दक्षिण की ओर लौटाती है।
- यह वैश्विक जलवायु संतुलन, विशेषकर उत्तरी यूरोप को समशीतोष्ण बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
8.2 हजार वर्ष पूर्व हुई शीतलन घटना के वैश्विक जलवायु पर प्रभाव
- मानसून का कमजोर होना: वैश्विक शीतलन के कारण भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून सहित उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में वर्षा में कमी आई।
- जल चक्र में परिवर्तन: वर्षा के पैटर्न में बदलाव हुआ, जिससे कुछ क्षेत्र अधिक शुष्क हो गए, जबकि अन्य क्षेत्रों में अस्थिरता बढ़ी।
- वायुमंडलीय मेथेन में कमी: मेथेन स्तर में गिरावट आई, जो आर्द्रभूमि गतिविधियों में कमी और पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तन का संकेत है।
- टेली-कनेक्शन (दूरस्थ जलवायु संबंध): यह घटना दर्शाती है कि उच्च अक्षांशों (जैसे ग्रीनलैंड) में होने वाले परिवर्तन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों (जैसे- भारत) के मौसम को भी प्रभावित कर सकते हैं।
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