इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट (IBER), 2026

21 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) के 14वें स्थापना दिवस कार्यक्रम के दौरान इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट, 2026 जारी की गई।

संबंधित तथ्य

  • बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल का 14वाँ स्थापना दिवस नई दिल्ली में आयोजित किया गया, जहाँ केंद्रीय मंत्री ने भारत की जैव-अर्थव्यवस्था के तीव्र विस्तार को रेखांकित किया।
  • यह विकास भारत के नवाचार-आधारित विकास, गहन-प्रौद्योगिकी विकास और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में प्रयासों की पृष्ठभूमि में सामने आया है।

इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट (IBER), 2026 के बारे में

  • समग्र क्षेत्रीय मूल्यांकन: यह रिपोर्ट भारत की जैव-अर्थव्यवस्था का एक समग्र और आँकड़ा-आधारित मूल्यांकन प्रस्तुत करती है, जिसमें विकास प्रवृत्तियाँ, क्षेत्रीय योगदान, नवाचार गतिशीलता और नीतिगत परिणाम सम्मिलित हैं।
  • बहु-हितधारक दृष्टिकोण: जैव-प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत तैयार यह रिपोर्ट अकादमिक जगत, उद्योग, नवउद्यमों और नीति-निर्माताओं से प्राप्त अंतर्दृष्टियों को समाहित करती है, जिससे एक व्यापक और समावेशी विश्लेषणात्मक ढाँचा सुनिश्चित होता है।
  • विकास के लिए रणनीतिक मार्गदर्शिका: यह एक नीतिगत मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में कार्य करती है, जो अनुसंधान वित्तपोषण, औद्योगिक विस्तार, नियामकीय सुधार और वैश्विक एकीकरण में लक्षित हस्तक्षेप को सक्षम बनाती है।

इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट, 2026 के प्रमुख बिंदु

  •  वृहद विस्तार और संरचनात्मक वृद्धि: लगभग 20 गुना वृद्धि [लगभग 10 अरब डॉलर (2014) से लगभग 195 अरब डॉलर (2025)] केवल नीतिगत समर्थन और वैज्ञानिक प्रगति को ही नहीं दर्शाती, बल्कि जैव-आधारित समाधानों की घरेलू तथा वैश्विक माँग में वृद्धि को भी प्रतिबिंबित करती है।
    • यह विभिन्न क्षेत्रों में जैव-प्रौद्योगिकी की संरचनात्मक गहराई को दर्शाती है, जिससे यह एक मुख्य आर्थिक चालक बनती जा रही है।
  • निरंतर उच्च विकास दर: 17–18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर अनुसंधान संस्थानों, उद्योग और नीतिगत ढाँचों के बीच मजबूत समन्वय को दर्शाती है।
    • यह निरंतर गति इस क्षेत्र की लचीलापन, विस्तार क्षमता और नवाचार-आधारित विस्तार की क्षमता को रेखांकित करती है।
  • आर्थिक एकीकरण और मुख्यधारा में प्रवेश: लगभग 5 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद में योगदान के साथ, जैव-अर्थव्यवस्था अब एक परिधीय क्षेत्र नहीं रही, बल्कि भारत की व्यापक आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा बन रही है।
    • यह उत्पादकता, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और अर्थव्यवस्था के विविधीकरण में जैव-प्रौद्योगिकी की बढ़ती केंद्रीय भूमिका को दर्शाता है।
  • नवाचार-आधारित और नवउद्यम-प्रेरित विकास मॉडल: 11,800 से अधिक जैव-प्रौद्योगिकी नवउद्यमों का उदय एक नीचे-से-ऊपर, उद्यमशीलता-प्रेरित नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र की ओर परिवर्तन को दर्शाता है।
    • यह प्रवृत्ति सार्वजनिक निवेश के साथ निजी क्षेत्र की गतिशील भूमिका को भी प्रदर्शित करती है, जिससे अनुसंधान के वाणिज्यीकरण और प्रौद्योगिकी के प्रसार में तीव्रता आती है।

इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट (IBER), 2026 का विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण और रणनीतिक महत्त्व

  • संरचनात्मक आर्थिक परिवर्तन का संकेतक: यह रिपोर्ट भारत के विकास प्रतिमान में एक मौलिक परिवर्तन को दर्शाती है, जहाँ देश संसाधन-प्रधान और कारक-आधारित मॉडल से हटकर ज्ञान-आधारित और नवाचार-केंद्रित जैव-अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है।
    • यह रेखांकित करती है कि जैव-प्रौद्योगिकी किस प्रकार सतत् और समावेशी विकास का एक प्रमुख सक्षमकर्ता बनकर उभर रही है, जिससे आर्थिक विकास की आधारशिला पुनः संरचित हो रही है।
  • घातीय और प्रणालीगत क्षेत्रीय गहनता का प्रमाण: 10 अरब अमेरिकी डॉलर (2014) से बढ़कर 195 अरब अमेरिकी डॉलर (2025) तक का विस्तार केवल मात्रात्मक वृद्धि नहीं दर्शाता, बल्कि अर्थव्यवस्था के गुणात्मक परिवर्तन को भी प्रतिबिंबित करता है।
    • यह जैव-प्रौद्योगिकी के विविध क्षेत्रों—जैसे स्वास्थ्य सेवा, कृषि, औद्योगिक विनिर्माण, और पर्यावरणीय स्थिरता—में व्यापक एकीकरण को दर्शाता है।
  • राष्ट्रीय विकास उद्देश्यों के साथ रणनीतिक समन्वय: जैव-अर्थव्यवस्था की विकास यात्रा भारत के आत्मनिर्भर भारत, सतत् विकास, और वैश्विक प्रौद्योगिकीय नेतृत्व के लक्ष्यों के साथ निकटता से संरेखित है।
    • यह इस क्षेत्र को वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर की जैव-अर्थव्यवस्था के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में स्थापित करता है, साथ ही उभरती प्रौद्योगिकियों में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है।

जैव-अर्थव्यवस्था (बायोइकोनॉमी) के बारे में

  • संकल्पनात्मक सीमा और परिभाषा: जैव-अर्थव्यवस्था उन आर्थिक गतिविधियों को संदर्भित करती है, जो जैविक संसाधनों, प्रक्रियाओं और प्रणालियों के सतत् उपयोग पर आधारित होती हैं, जिनमें स्वास्थ्य सेवा, कृषि, जैव-ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादन जैसे क्षेत्र सम्मिलित हैं।
    • यह जैव-प्रौद्योगिकी, जैव-आधारित पदार्थों और जीवन-विज्ञान नवाचारों के अनुप्रयोग को समाहित करती है, जिससे आर्थिक मूल्य का सृजन होता है तथा सामाजिक चुनौतियों का समाधान किया जाता है।

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  • सततता-उन्मुख आर्थिक मॉडल: जैव-अर्थव्यवस्था एक प्रणालीगत परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है, जो नवीकरणीय, जैव-आधारित इनपुट्स की ओर अग्रसर है और जीवाश्म ईंधनों तथा उत्खनन-आधारित औद्योगिक मॉडलों पर निर्भरता को कम करती है।
    • यह चक्रीय अर्थव्यवस्था और निम्न-कार्बन अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को बढ़ावा देती है, जिससे संसाधन दक्षता, अपशिष्ट का मूल्यवर्द्धन और जलवायु सहनशीलता सुनिश्चित होती है।
  • अंतर्विषयक और एकीकृत प्रकृति: जैव-अर्थव्यवस्था स्वभावतः बहु-क्षेत्रीय है, जो जीवन-विज्ञान, अभियांत्रिकी, डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ (कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विशाल आँकड़े) तथा पर्यावरण विज्ञान का एकीकरण करती है।
    • यह अभिसरण नवाचार का एक सशक्त प्रेरक बनता है, जिससे नए उत्पाद, प्रक्रियाएँ और सतत् विकास मार्ग विकसित होते हैं।

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था के क्षेत्र

  • जैव-औषधि और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र
    • स्वास्थ्य प्रणाली को सुदृढ़ करना: यह क्षेत्र सुलभ टीकों, जैव-समान औषधियों और नैदानिक साधनों के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिससे जन स्वास्थ्य की पहुँच और सहनशीलता में वृद्धि होती है, विशेषकर एक विशाल जनसंख्या वाले देश में।
    • वैश्विक नेतृत्व की भूमिका: किफायती दवाओं की वैश्विक आपूर्ति की भारत की क्षमता इसे “विश्व की औषधशाला” के रूप में स्थापित करती है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य समानता को बल मिलता है।

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  • जैव-कृषि क्षेत्र
    • जलवायु-सहिष्णु कृषि को सक्षम बनाना: आनुवंशिक रूप से उन्नत फसलों, जैव-उर्वरकों और जैव-कीटनाशकों को बढ़ावा देकर यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन तथा मृदा क्षरण के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में सहायक है।
    • खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना: यह उच्च उत्पादकता और सतत् कृषि पद्धतियों को समर्थन प्रदान करता है, जिससे खाद्य उपलब्धता तथा पोषण संबंधी चुनौतियों दोनों का समाधान होता है।
  • औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र
    • हरित औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करना: औद्योगिक प्रक्रियाओं में जैव-आधारित इनपुट्स का उपयोग पेट्रो-रसायनों पर निर्भरता को कम करता है, जिससे निम्न-कार्बन औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
    • चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल का समर्थन: औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी अपशिष्ट से संसाधन रूपांतरण को सक्षम बनाती है, जिससे संसाधन दक्षता और सततता में वृद्धि होती है।
  • जैव-सेवा क्षेत्र
    • वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करना: अनुबंध अनुसंधान, क्लिनिकल परीक्षण और जैव-सूचना विज्ञान में भारत की विशेषज्ञता इसे वैश्विक अनुसंधान एवं विकास आउटसोर्सिंग के लिए एक प्रमुख गंतव्य बनाती है।
    • ज्ञान अर्थव्यवस्था का विस्तार: यह क्षेत्र उच्च-मूल्य सेवाओं और बौद्धिक पूँजी के विकास में योगदान देता है, जिससे वैश्विक नवाचार नेटवर्क में भारत की स्थिति मजबूत होती है।
  • पर्यावरणीय जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र
    • पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान: यह क्षेत्र जैव-उपचार (बायोरिमेडिएशन), अपशिष्ट उपचार और कार्बन अवशोषण प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित है, जो प्रदूषण नियंत्रण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था में प्रमुख अवसर

  • जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग: भारत का युवा, कुशल और वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित मानव संसाधन का विशाल भंडार अनुसंधान उत्कृष्टता, नवाचार तथा जैव-प्रौद्योगिकी उद्यमिता के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है।
    • यह जनसांख्यिकीय लाभ देश की ज्ञान-आधारित उद्योगों को विस्तार देने और दीर्घकालिक प्रौद्योगिकीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बनाए रखने की क्षमता को सुदृढ़ करता है।
  • विस्तारित और गतिशील नव उद्यम पारिस्थितिकी तंत्र: जैव-प्रौद्योगिकी नवउद्यमों का तीव्र उदय विघटनकारी नवाचार, प्रयोग और अनुसंधान परिणामों के त्वरित वाणिज्यीकरण की संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है।
    • यह पारिस्थितिकी तंत्र भारत को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ एकीकृत करने के साथ-साथ घरेलू नवाचार क्षमता को भी सुदृढ़ कर रहा है।
  • सतत् समाधानों की बढ़ती वैश्विक मांग: हरित प्रौद्योगिकियों, जैव-आधारित उत्पादों और जलवायु-सहिष्णु समाधानों की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान भारत के लिए निर्यात विस्तार और सतत् नवाचार बाजारों में नेतृत्व करने के महत्त्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करते हैं।
    • यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और वैश्विक स्थायित्व पहलों में भागीदारी के नए मार्ग भी खोलता है।
  • डिजिटल और उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ अभिसरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और विशाल आँकड़ों का जैव-प्रौद्योगिकी के साथ एकीकरण सटीक चिकित्सा, जीनोमिक्स, औषधि खोज और स्मार्ट जैव-विनिर्माण प्रणालियों में प्रगति को गति दे रहा है।
    • यह अभिसरण दक्षता, सटीकता और विस्तार क्षमता को बढ़ाता है, जिससे समग्र नवाचार परिदृश्य रूपांतरित हो रहा है।
  • रणनीतिक वैश्विक स्थिति और नेतृत्व की संभावनाएँ: भारत के पास सुलभ, विस्तार योग्य और समावेशी जैव-प्रौद्योगिकी समाधानों के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभरने की क्षमता है, विशेषकर विकासशील देशों के लिए।
    • यह भारत को वैश्विक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान में एक प्रमुख भूमिका निभाने की स्थिति में स्थापित करता है, विशेष रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ के संदर्भ में।

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जैव-अर्थव्यवस्था को संचालित करने वाली प्रमुख वैज्ञानिक प्रगति

  • स्वदेशी टीका विकास और जैव-औषधि नेतृत्व: भारत की वैक्सीन विकास क्षमता और वृहद स्तर पर विनिर्माण की समग्र क्षमता ने स्वास्थ्य सुरक्षा और महामारियों के प्रति सहनशीलता को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ किया है।
    • इसने भारत को सुलभ टीकों के एक वैश्विक आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरने में सक्षम बनाया है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य कूटनीति और आपूर्ति शृंखला स्थिरता में इसकी भूमिका सुदृढ़ हुई है।
  • सटीक चिकित्सा और जीनोमिक प्रौद्योगिकियों में प्रगति: जीन एडिटेड, जीनोमिक्स और व्यक्तिगत उपचार पद्धतियों में प्रगति स्वास्थ्य सेवा को अधिक लक्षित, पूर्वानुमेय और रोगी-केंद्रित प्रणाली में रूपांतरित कर रही है।
    • ये नवाचार निदान की सटीकता, उपचार की दक्षता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों में सुधार कर रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवा प्रदाय मॉडल पुनर्परिभाषित हो रहे हैं।
  • वैकल्पिक प्रोटीन और खाद्य जैव-प्रौद्योगिकी में नवाचार: पौध-आधारित, संवर्द्धित और सूक्ष्मजीव-आधारित प्रोटीनों का विकास खाद्य सुरक्षा, पोषण पर्याप्तता तथा पर्यावरणीय स्थिरता से संबंधित महत्त्वपूर्ण मुद्दों का समाधान कर रहा है।
    • ये समाधान संसाधन-गहन पशुधन प्रणालियों पर निर्भरता को कम करते हैं, जिससे कार्बन उत्सर्जन और पारिस्थितिकी क्षरण में कमी आती है।
  • कार्बन अवशोषण और जैव-आधारित पदार्थों में नवाचार: कार्बन अवशोषण, जैव-ईंधन और जैव-अवक्रमणीय पदार्थों में प्रगति निम्न-कार्बन तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण को सुगम बना रही है।
    • ये प्रौद्योगिकियाँ जलवायु शमन, अपशिष्ट में कमी और सतत् औद्योगिक उत्पादन प्रणालियों में योगदान देती हैं।
  • जैव-कृत्रिम बुद्धिमत्ता एकीकरण और बायो-फाउंड्री: जैव-कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्रों और स्वचालित बायो-फाउंड्री का उदय कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा जैविक विज्ञानों के अभिसरण को दर्शाता है, जिससे नवाचार चक्र तीव्र होते हैं।
    • यह एकीकरण औषधि खोज, संश्लेषित जीव विज्ञान और औद्योगिक जैव-प्रौद्योगिकी को सुदृढ़ करता है, जिससे सटीकता, विस्तार क्षमता और दक्षता में सुधार होता है।

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था क्यों अत्यंत आवश्यक है?

  • स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करना: जैव-अर्थव्यवस्था सुलभ, सुगम्य और स्वदेशी स्वास्थ्य समाधान के विकास को सक्षम बनाती है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होती है।
    • यह जन स्वास्थ्य की सहनशीलता और उभरती बीमारियों तथा स्वास्थ्य संकटों के प्रति तैयारी को सुदृढ़ करती है।

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  • कृषि स्थिरता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना: जैव-प्रौद्योगिकी जलवायु परिवर्तनशीलता, मृदा क्षरण और घटती उत्पादकता जैसी चुनौतियों का समाधान करती है।
    • यह जलवायु-सहिष्णु फसलों, जैव-उर्वरकों और सतत् कृषि पद्धतियों के विकास को समर्थन प्रदान करती है।
  • ऊर्जा संक्रमण और सुरक्षा को सुगम बनाना: जैव-ईंधन और जैव-आधारित ऊर्जा समाधान जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करते हैं और ऊर्जा मिश्रण का विविधीकरण करते हैं।
    • यह ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देता है और भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं का समर्थन करता है।
  • पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना: जैव-अर्थव्यवस्था प्रदूषण नियंत्रण, अपशिष्ट पुनर्चक्रण और चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं को सक्षम बनाती है।
    • यह पर्यावरणीय क्षरण को कम करने और जलवायु कार्रवाई लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • आर्थिक विकास और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना: यह क्षेत्र अनुसंधान, विनिर्माण और सेवाओं में उच्च-मूल्य रोजगार उत्पन्न करता है, जिससे आर्थिक विस्तार में योगदान होता है।
    • यह नवाचार-आधारित विकास को प्रोत्साहित करता है और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करता है।
  • रणनीतिक और प्रौद्योगिकीय स्वायत्तता को सुदृढ़ करना: विदेशी प्रौद्योगिकियों और महत्त्वपूर्ण आयातों पर निर्भरता को कम करके जैव-अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय सहनशीलता और आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करती है।
    • यह उभरती प्रौद्योगिकियों में भारत की रणनीतिक स्थिति को भी मजबूत बनाती है।

जैव-अर्थव्यवस्था से संबंधित प्रमुख पहलें

  • मुख्य नीति एवं रणनीतिक रूपरेखाएँ
    • बायोE3 नीति: बायोE3 नीति एक व्यापक और एकीकृत रूपरेखा प्रदान करती है, जो आर्थिक विकास को पर्यावरणीय स्थिरता और रोजगार सृजन के साथ संरेखित करती है, जिससे जैव-प्रौद्योगिकी को भारत की विकास रणनीति के केंद्र में स्थापित किया जाता है।
      • यह सतत् जैव-विनिर्माण, जैव-आधारित उद्योगों और चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडलों की ओर संक्रमण को बढ़ावा देती है, साथ ही संश्लेषित जीव विज्ञान, स्मार्ट प्रोटीन और कार्बन अवशोषण जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता देती है।
    • राष्ट्रीय जैव-प्रौद्योगिकी विकास रणनीति: यह रणनीति भारत को एक वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने हेतु एक दीर्घकालिक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है, जिसमें नवाचार, प्रतिस्पर्द्धात्मकता और स्थिरता पर बल दिया गया है।
      • यह अनुसंधान अवसंरचना को सुदृढ़ करने, उद्योग-शैक्षणिक सहयोग को बढ़ावा देने और कुशल मानव संसाधन आधार विकसित करने पर बल देती है, ताकि भविष्य की वृद्धि का समर्थन किया जा सके।
  • वित्तपोषण एवं नवाचार समर्थन तंत्र
    • अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) कोष: ₹1 लाख करोड़ की विशाल राशि के साथ यह कोष जैव-प्रौद्योगिकी जैसे डीप-टेक क्षेत्रों में दीर्घकालिक पूँजी की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा करता है, जहाँ सामान्यतः उच्च जोखिम और लंबी परिपक्वता अवधि होती है।
      • यह अनुसंधान और वाणिज्यीकरण के बीच की वित्तीय अंतराल को पाटने का लक्ष्य रखता है, साथ ही निजी क्षेत्र की भागीदारी और वेंचर कैपिटल निवेश को भी प्रोत्साहित करता है।
    • जैव-प्रौद्योगिकी इग्निशन अनुदान: यह योजना प्रारंभिक चरण के जैव-प्रौद्योगिकी नव-उद्यमों को बीज वित्तपोषण, मार्गदर्शन और इन्क्यूबेशन समर्थन प्रदान करती है, जिससे वे नवोन्मेषी विचारों को प्रमाण-अवधारणा मॉडल में परिवर्तित कर सकें।
      • यह नवाचार पाइपलाइन को सुदृढ़ करने और जमीनी स्तर की उद्यमिता को पोषित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • प्रमुख मिशन एवं राष्ट्रीय कार्यक्रम
    • राष्ट्रीय जैव-औषधि मिशन: यह मिशन स्वदेशी जैव-औषधि नवाचार और विनिर्माण को तीव्र करने पर केंद्रित है, विशेषकर टीकों, जैव-समान औषधियों और नैदानिक साधनों के क्षेत्रों में।
      • यह आयात निर्भरता को कम करने, स्वास्थ्य सेवा पहुँच में सुधार करने और औषधि क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सुदृढ़ करने में सहायक है।
    • जीनोम इंडिया परियोजना: इसका उद्देश्य भारत की विविध जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करने वाला एक समग्र जीनोमिक डाटाबेस तैयार करना है, जिससे सटीक चिकित्सा, रोग पूर्वानुमान और व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवा में प्रगति संभव हो सके।
      • यह उन्नत जीनोमिक अनुसंधान और जन स्वास्थ्य नियोजन में भारत की क्षमताओं को भी सुदृढ़ करता है।
    • मिशन कोविड सुरक्षा: स्वदेशी टीका विकास और विनिर्माण क्षमता को तीव्र करने हेतु प्रारंभ किया गया यह मिशन भारत के जैव-औषधि पारिस्थितिकी तंत्र और महामारी की तैयारी को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ करता है।
      • इसके दीर्घकालिक प्रभाव टीका संबंधी आत्मनिर्भरता और वैश्विक आपूर्ति शृंखला संबंधी सहनशीलता पर पड़ते हैं।
  • औद्योगिक एवं विनिर्माण संवर्द्धन
    • औषधियों के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना: यह योजना महत्त्वपूर्ण दवाओं, सक्रिय औषधीय संघटकों और जैव-औषधियों के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करती है, जिससे आयात पर निर्भरता कम होती है तथा आपूर्ति शृंखला सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
      • यह वृहद स्तर के विनिर्माण और वैश्विक औषधि मूल्य शृंखलाओं में एकीकरण को भी बढ़ावा देती है।
    • मेक इन इंडिया: यह जैव-प्रौद्योगिकी और संबंधित क्षेत्रों में स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं के विकास को प्रोत्साहित करता है, जिससे आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
      • यह जैव-आधारित उत्पादों और प्रौद्योगिकियों के लिए एक मजबूत घरेलू औद्योगिक आधार के निर्माण का समर्थन करता है।
  • नव-उद्यम एवं उद्यमिता पारिस्थितिकी तंत्र
    • स्टार्ट-अप इंडिया: यह प्रमुख पहल नियामक सरलीकरण, वित्त तक पहुँच और इन्क्यूबेशन समर्थन प्रदान कर एक सशक्त नव उद्यम संस्कृति को बढ़ावा देती है, विशेषकर जैव-प्रौद्योगिकी उद्यमियों के लिए।
      • यह नवाचार-आधारित विकास और नव-उद्यमों के तीव्र विस्तार को सक्षम बनाती है, जो जैव-अर्थव्यवस्था पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं।
    • जैव-प्रौद्योगिकी पार्क एवं क्लस्टर विकास: जैव-प्रौद्योगिकी पार्कों, इन्क्यूबेटरों और नवाचार क्लस्टरों की स्थापना प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सहयोग और अनुसंधान के वाणिज्यीकरण को सुगम बनाती है।
      • ये क्लस्टर क्षेत्रीय विकास और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के विकेंद्रीकरण को भी प्रोत्साहित करते हैं, विशेषकर उभरते शहरों में।
  • स्थायित्व, कृषि एवं ऊर्जा पहलें
    • राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा मिशन: यह जैव-ईंधन, बायोमास उपयोग और अपशिष्ट-से-ऊर्जा प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता में कमी आती है।
      • यह ग्रामीण आय सृजन और जलवायु परिवर्तन शमन प्रयासों का भी समर्थन करता है।
    • गोबर-धन योजना: इसका उद्देश्य कार्बनिक अपशिष्ट को बायोगैस, बायो-CNG और जैव-उर्वरकों में परिवर्तित करना है, जिससे चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं और सतत ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलता है।
      • यह संसाधन दक्षता को बढ़ाता है और अपशिष्ट प्रबंधन चुनौतियों का समाधान करता है।
    • सतत् कृषि पर राष्ट्रीय मिशन: यह जैव-उर्वरकों, जलवायु-सहिष्णु फसलों और सतत् कृषि पद्धतियों के अपनाने को प्रोत्साहित करता है।
      • यह कृषि में जैव-प्रौद्योगिकी के एकीकरण के माध्यम से दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा और पारिस्थितिकी संतुलन सुनिश्चित करता है।
  • उन्नत अनुसंधान एवं भविष्य की प्रौद्योगिकियाँ
    • जैव-फाउंड्री और जैव-कृत्रिम बुद्धिमत्ता केंद्र: ये उन्नत स्वचालित अनुसंधान प्लेटफॉर्म हैं, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जैविक विज्ञानों के साथ एकीकृत करते हैं, जिससे उच्च-प्रवाह प्रयोग और तीव्र नवाचार चक्र संभव होते हैं।
      • ये विशेष रूप से औषधि खोज और संश्लेषित जीव विज्ञान में प्रयोगशाला खोजों को औद्योगिक अनुप्रयोगों में परिवर्तित करने के समय और लागत को कम करते हैं।
    • जैव-प्रौद्योगिकी विभाग की भूमिका: जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) एक नोडल एजेंसी के रूप में नीति निर्माण, वित्तपोषण और समन्वय को संचालित करता है, जिससे जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र का सुसंगत और समेकित विकास सुनिश्चित होता है।
      • यह अनुसंधान संस्थानों, अवसंरचना विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का समर्थन करता है।
  • संस्थागत समर्थन तंत्र
    • जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद: यह वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक अनुप्रयोग के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य करती है, जिससे नवाचारों का वाणिज्यीकरण और नवउद्यमों का विस्तार संभव होता है।
      • वित्तपोषण, इन्क्यूबेशन और मार्गदर्शन के माध्यम से, यह प्रयोगशाला से बाजार तक की पूरी नवाचार मूल्य शृंखला को सुदृढ़ करती है।

जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) के बारे में

  • जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) एक गैर-लाभकारी, सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रम (PSE) है, जिसकी स्थापना भारत सरकार के जैव-प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा की गई है।
  • यह एक इंटरफेस एजेंसी के रूप में कार्य करती है, जिसका उद्देश्य उभरते जैव-प्रौद्योगिकी उद्यमों को रणनीतिक अनुसंधान और नवाचार करने के लिए सशक्त और सक्षम बनाना है।
  • मार्च 2026 तक, BIRAC भारत के जैव-प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र का प्रमुख वास्तुकार बना हुआ है, जिसका मूल्यांकन 195.3 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है।

BIRAC के प्रमुख स्तंभ

  • समग्र वित्तपोषण पारिस्थितिकी तंत्र: BIRAC विभिन्न अनुदान और इक्विटी योजनाओं का प्रबंधन करता है, जिनमें बायोटेक्नोलॉजी इग्निशन ग्रांट (BIG) (विचार-स्तर के लिए), लघु व्यवसाय नवाचार अनुसंधान पहल (SBIRI) (प्रारंभिक चरण अनुसंधान के लिए), तथा जैव-प्रौद्योगिकी उद्योग साझेदारी कार्यक्रम (BIPP) (उच्च-जोखिम उन्नत विकास के लिए) शामिल हैं।
  • राष्ट्रीय अवसंरचना नेटवर्क: बायोNEST (Bio incubation Nurturing Entrepreneurship for Scaling Technologies) कार्यक्रम के माध्यम से, BIRAC देशभर में 100 जैव-इन्क्यूबेटरों का समर्थन करता है, जो 10.45 लाख वर्ग फुट से अधिक विशेषीकृत प्रयोगशाला स्थान, उपकरण और पायलट संयंत्र उपलब्ध कराते हैं।
  • रणनीतिक कोष प्रबंधन: सरकार की नई ₹1 लाख करोड़ पहल के अंतर्गत, BIRAC को BIRAC-RDI (अनुसंधान, विकास और नवाचार) कोष के लिए द्वितीय-स्तरीय कोष प्रबंधक नियुक्त किया गया है, जिसके तहत पाँच वर्षों में ₹2,000 करोड़ की राशि डीप-टेक नव-उद्यमों के समर्थन हेतु व्यय की जानी है।
  • बायोE3 नीति का कार्यान्वयन: BIRAC, बायोE3 (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव-प्रौद्योगिकी) नीति का प्रमुख कार्यान्वयन एजेंसी है, जो हरित रसायन, स्मार्ट प्रोटीन और कार्बन अवशोषण जैसे क्षेत्रों में उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण पर केंद्रित है।
  • उभरते प्रौद्योगिकी केंद्र: परिषद ने हाल ही में जैव-एआई केंद्र स्थापित किए हैं, जिनका उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग को औषधि खोज, सटीक कृषि और जीनोमिक निदान में एकीकृत करना है, ताकि जैव-आधारित उत्पादों के बाजार तक पहुँचने के समय को कम किया जा सके।
  • बौद्धिक संपदा एवं प्रौद्योगिकी प्रबंधन: यह बौद्धिक संपदा (IP) संरक्षण के लिए समग्र समर्थन प्रदान करता है, जिसमें पेटेंट योग्यता खोज और फ्रीडम-टू-ऑपरेट (FTO) विश्लेषण शामिल हैं, जिससे नवप्रवर्तकों को जटिल वैश्विक नियामक ढाँचों में मार्गदर्शन मिलता है।
  • सामाजिक नवाचार एवं वैश्विक साझेदारी: ग्रैंड चैलेंजेज इंडिया (GCI) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से—जो बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी है—BIRAC मातृ स्वास्थ्य, संक्रामक रोगों और जलवायु-सहिष्णु कृषि के लिए समाधान को वित्तपोषित करता है।

भारत में जैव-अर्थव्यवस्था से संबंधित चुनौतियाँ

  • वाणिज्यीकरण अंतराल: प्रयोगशाला नवाचारों को औद्योगिक उत्पादन में परिवर्तित करने में एक अंतराल विद्यमान है, जिससे वाणिज्यीकरण क्षमता सीमित होती है।
    यह अनुसंधान परिणामों को आर्थिक मूल्य में परिवर्तित करने को प्रभावित करता है।

    • इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान का एक महत्त्वपूर्ण भाग प्रारंभिक चरण (TRL 1–4) तक सीमित रहता है, जिसमें औद्योगिक स्तर पर तैनाती के लिए सीमित संक्रमण होता है।

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  • उभरते क्षेत्रों में कौशल की कमी: संश्लेषित जीव विज्ञान, जैव-सूचना विज्ञान और संगणनात्मक जीवविज्ञान जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक विशेषज्ञ प्रतिभा की कमी है।
    • यह क्षेत्र की नवाचार क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को सीमित करता है।
    • विश्व आर्थिक मंच ने संकेत दिया है कि भारत को उन्नत अंतर्विषयक प्रतिभा की कमी का सामना करना पड़ रहा है, विशेषकर संश्लेषित जीव विज्ञान, जैव-सूचना विज्ञान, संगणनात्मक जीव विज्ञान और जीव विज्ञान-डिजिटल अभिसरण क्षेत्रों में।
  • वित्तपोषण एवं निवेश संबंधी बाधाएँ: वेंचर कैपिटल और दीर्घकालिक जोखिम वित्तपोषण तक सीमित पहुँच नवाचार को बाधित करती है।
    • यह विशेष रूप से डीप-टेक और उच्च-जोखिम अनुसंधान-आधारित नवउद्यमों को प्रभावित करता है।
    • आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के अनुसार, जैव-प्रौद्योगिकी और जैव-आधारित नवाचार अक्सर वित्तीय अंतराल का सामना करते हैं, क्योंकि इनमें उच्च जोखिम, लंबे विकास चक्र और विशेषीकृत जोखिम-न्यूनन तथा संयुक्त-वित्त साधनों की आवश्यकता होती है।
  • नियामकीय एवं प्रक्रियात्मक बाधाएँ: जटिल और समय-ग्रहणशील स्वीकृति प्रक्रियाएँ तीव्र नवाचार और वैश्विक बाजार में प्रवेश के लिए बाधाएँ उत्पन्न करती हैं।
    • यह जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र में व्यवसाय करने की सुगमता को कम करता है।
    • राष्ट्रीय एकल विंडो प्रणाली जैसे सुधारों के बावजूद, स्वीकृतियों में देरी, बहु-स्तरीय अनुपालन आवश्यकताएँ और अनुमोदन तंत्र का असमान एकीकरण अभी भी विद्यमान हैं।
  • नैतिक, जैव-सुरक्षा और डेटा संबंधी चिंताएँ: आनुवंशिक संशोधन, जैव-सुरक्षा और डेटा गोपनीयता से संबंधित मुद्दों के लिए सुदृढ़ शासन ढाँचे की आवश्यकता है।
    • नैतिक मानकों और जन विश्वास को सुनिश्चित करना एक प्रमुख चुनौती बना हुआ है।
    • जीनोमिक डेटा प्लेटफॉर्मों के उदय ने नीति आयोग द्वारा इंगित डेटा गोपनीयता, सहमति और जैव-सुरक्षा जोखिमों को लेकर चिंताएँ उत्पन्न की हैं।
  • पारिस्थितिकी तंत्र के विकास में क्षेत्रीय असमानताएँ: अवसंरचना, वित्तपोषण और अनुसंधान संस्थानों का असमान वितरण असंतुलित विकास को जन्म देता है।
    • यह जैव-अर्थव्यवस्था के समावेशी और राष्ट्रव्यापी विस्तार को सीमित करता है।
    • इंडिया बायोइकोनॉमी रिपोर्ट, 2026 दर्शाती है कि जैव-प्रौद्योगिकी क्लस्टर मुख्यतः कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में केंद्रित हैं, जबकि पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में इनकी उपस्थिति सीमित है।

वैश्विक जैव-अर्थव्यवस्था संबंधी नीतिगत  रूपरेखाएँ

  • G20 जैव-अर्थव्यवस्था कार्यसूची: G20 ने सदस्य देशों में स्थायी, नवाचार और समावेशी आर्थिक विकास पर बल देते हुए एक समन्वित जैव-अर्थव्यवस्था कार्यसूची विकसित की है।
    • यह प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, क्षमता निर्माण और सुदृढ़ जैव-आधारित मूल्य शृंखलाओं को बढ़ावा देती है, विशेष रूप से विकसित तथा विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के बीच अंतराल को पाटने पर ध्यान केंद्रित करती है।
  • आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) जैव-अर्थव्यवस्था रूपरेखा: OECD जैव-अर्थव्यवस्था विकास हेतु साक्ष्य-आधारित नीति रूपरेखाओं और आँकड़ा-आधारित शासन तंत्र को आगे बढ़ाता है।
    • यह जैव-प्रौद्योगिकी नवाचार, नियामकीय समरूपीकरण और सतत् विकास तथा हरित विकास रणनीतियों के साथ संरेखण में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुगम बनाता है।

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  • यूरोपीय संघ (EU) जैव-अर्थव्यवस्था रणनीति का कार्यान्वयन: यूरोपीय संघ (EU) अपने जैव-अर्थव्यवस्था रणनीति को अनुसंधान वित्तपोषण कार्यक्रमों, जैव-रिफाइनरी विकास और क्षेत्रीय नवाचार क्लस्टरों के माध्यम से सक्रिय रूप से लागू कर रहा है।
    • ये पहलें बायोमास के चक्रीय उपयोग, अपशिष्ट से संसाधन रूपांतरण और जलवायु-तटस्थ तथा संसाधन-दक्ष औद्योगिक प्रणालियों की ओर संक्रमण को बढ़ावा देती हैं।
  • वैश्विक जैव-अर्थव्यवस्था शिखर सम्मेलन (GBS) और नॉलेज प्लेटफॉर्म: वैश्विक जैव-अर्थव्यवस्था शिखर सम्मेलन (GBS) नीति संवाद, ज्ञान आदान-प्रदान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक उच्च-स्तरीय मंच के रूप में कार्य करता है।
    • यह बहु-हितधारक सहभागिता, श्रेष्ठ प्रथाओं के साझा करने और समन्वित वैश्विक कार्यसूचियों के विकास को सक्षम बनाता है।
  • मिशन इनोवेशन (MI) जैव-ऊर्जा एवं स्वच्छ प्रौद्योगिकी पहलें: मिशन इनोवेशन (MI) एक वैश्विक पहल है, जो स्वच्छ ऊर्जा नवाचार को बढ़ावा देती है, जिसमें जैव-ऊर्जा, जैव-ईंधन और निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं।
    • यह अनुसंधान एवं विकास निवेश, प्रौद्योगिकी कार्य और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को तीव्र करता है, जिससे सतत् ऊर्जा संक्रमण संभव होता है।

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  • खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) जैव-अर्थव्यवस्था कार्यक्रम: खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) सतत् कृषि, जैव-संसाधनों के कुशल उपयोग और जलवायु-सहिष्णु कृषि प्रणालियों के माध्यम से जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है।
    • इसकी पहलें खाद्य सुरक्षा उद्देश्यों को जैव-आधारित नवाचारों के साथ एकीकृत करती हैं, जिससे ग्रामीण आजीविका और पारिस्थितिकी स्थिरता को सुदृढ़ किया जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य (UN SDGs) के साथ एकीकरण: जैव-अर्थव्यवस्था पहलें, संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों (UN SDGs) के साथ घनिष्ठ रूप से संरेखित हैं, विशेषकर जलवायु कार्रवाई, उत्तरदायी उपभोग और स्थलीय जीवन से संबंधित लक्ष्यों के साथ।
    • यह संरेखण आर्थिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समानता को एकीकृत कर समग्र विकास सुनिश्चित करता है।
  • वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी एवं जैव-विनिर्माण साझेदारियाँ: देश जैव-प्रौद्योगिकी, टीका विकास और जैव-विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में सीमा-पार सहयोग को बढ़ा रहे हैं।
    • ये साझेदारियाँ वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा, आपूर्ति शृंखला सहनशीलता और उन्नत जैव-आधारित प्रौद्योगिकियों के प्रसार को सुदृढ़ करती हैं।
  • जैव-अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP): सरकारें और निजी क्षेत्र सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से जैव-आधारित उत्पादों, वैकल्पिक प्रोटीन और सतत् पदार्थों में नवाचार को तीव्र कर रहे हैं।
    • ऐसे सहयोग वाणिज्यीकरण, प्रौद्योगिकी विस्तार और प्रतिस्पर्द्धी जैव-आधारित बाजारों के निर्माण को सुगम बनाते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन और चक्रीय अर्थव्यवस्था रूपरेखाओं के साथ एकीकरण: वैश्विक जैव-अर्थव्यवस्था पहलें, पेरिस समझौता जैसी जलवायु परिवर्तन रूपरेखाओं और चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडलों के साथ बढ़ते हुए एकीकृत हो रही हैं।
    • ये कार्बन उत्सर्जन में कमी, अपशिष्ट न्यूनकरण और पुनर्योजी तथा सतत् उत्पादन प्रणालियों के विकास में योगदान देती हैं।

आगे की राह

  • प्रौद्योगिकी एवं वाणिज्यीकरण को सुदृढ़ करना:प्रयोगशाला-से-बाजार अंतराल” को पाटने हेतु प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तंत्र, इनक्यूबेशन पारिस्थितिकी तंत्र और उद्योग-शिक्षा साझेदारियों को सुदृढ़ करने की अत्यंत आवश्यकता है।
    • यह सुनिश्चित करेगा कि वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रभावी रूप से विस्तार योग्य, बाजार-तैयार उत्पादों और औद्योगिक समाधानों में परिवर्तित किया जाए।
  • दीर्घकालिक वित्तपोषण और जोखिम पूँजी का विस्तार: पेशेंट कैपिटल, वेंचर फंडिंग और मिश्रित वित्त मॉडल तक पहुँच का विस्तार उच्च-जोखिम, उच्च-प्रतिफल जैव-प्रौद्योगिकी नवाचारों के समर्थन के लिए आवश्यक है।
    • RDI फंड जैसे साधनों को सुदृढ़ करने से निवेश जोखिम कम करने और निजी क्षेत्र की भागीदारी आकर्षित करने में सहायता मिल सकती है।
  • उन्नत मानव पूँजी और कौशल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: भारत को विशेषीकृत शिक्षा, अंतर्विषयक प्रशिक्षण और कौशल विकास में निवेश करना होगा, विशेषकर सिंथेटिक बायोलॉजी, बायोइन्फॉर्मेटिक्स और बायो-एआई जैसे उभरते क्षेत्रों में।
    • यह एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी, नवाचार-तैयार कार्यबल का निर्माण करेगा, जो दीर्घकालिक विकास को बनाए रख सके।
  • नियामकीय सुधार और व्यवसाय करने में सुगमता: अनुमोदन प्रक्रियाओं को सरल बनाना, नियमों का मानकीकरण करना और जैव-सुरक्षा तथा नैतिक मानकों को बनाए रखते हुए तीव्र स्वीकृतियाँ सुनिश्चित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • एक पूर्वानुमेय और पारदर्शी नियामकीय ढाँचा नवाचार की गति और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाएगा।
  • क्षेत्रीय नवाचार क्लस्टरों और समावेशी विकास को बढ़ावा देना: टियर-II और टियर-III शहरों में बायोटेक हब, बायो-क्लस्टर और इनक्यूबेशन केंद्रों की स्थापना से नवाचार का विकेंद्रीकरण किया जा सकता है।
    • यह संतुलित क्षेत्रीय विकास, व्यापक भागीदारी और जैव-अर्थव्यवस्था पारिस्थितिकी तंत्र के समावेशी विकास को सुनिश्चित करेगा।
  • उन्नत अवसंरचना और अनुसंधान प्लेटफॉर्म का विस्तार: बायोफाउंड्री, जीनोमिक प्रयोगशालाएँ और बायो-एआई हब का विस्तार उच्च-प्रवाह अनुसंधान और त्वरित प्रोटो टाइपिंग क्षमताओं को तीव्र करेगा।
    • ऐसी अवसंरचना उच्च-स्तरीय नवाचार और जैव-प्रौद्योगिकी में वैश्विक नेतृत्व के लिए आवश्यक है।
  • वैश्विक सहयोग और मूल्य शृंखला एकीकरण को सुदृढ़ करना: भारत को अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौतों और वैश्विक जैव-प्रौद्योगिकी मूल्य शृंखलाओं में भागीदारी को बढ़ाना चाहिए।
    • यह उन्नत प्रौद्योगिकियों, बाजारों और अनुसंधान नेटवर्क तक पहुँच में सुधार करेगा, जिससे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी।
  • सततता और चक्रीय अर्थव्यवस्था सिद्धांतों का समावेशन: विभिन्न क्षेत्रों में हरित प्रौद्योगिकियों, जैव-आधारित सामग्रियों और चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं का एकीकरण पर्यावरणीय रूप से सतत् विकास सुनिश्चित करेगा।
    • यह जलवायु प्रतिबद्धताओं और दीर्घकालिक पारिस्थितिकी संतुलन के साथ जैव-अर्थव्यवस्था को संरेखित करता है।
  • शासन, नैतिकता और जैव-सुरक्षा ढाँचों को सुदृढ़ करना: नैतिक चिंताओं, डेटा गोपनीयता, जैव-सुरक्षा और जैव-सुरक्षा जोखिमों से निपटने हेतु सुदृढ़ ढाँचे विकसित करना आवश्यक है।
    • यह जन-विश्वास का निर्माण करेगा और जिम्मेदार नवाचार सुनिश्चित करेगा।

निष्कर्ष

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था नवाचार-प्रेरित, सतत् और समावेशी विकास की दिशा में एक रणनीतिक संक्रमण को प्रतिबिंबित करती है, जिसे मजबूत नीतिगत समर्थन और एक गतिशील पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा संचालित किया जा रहा है। वर्ष 2030 तक 300 अरब डॉलर के लक्ष्य को प्राप्त करना आर्थिक प्रत्यास्थता को सुदृढ़ करेगा, रोजगार सृजन करेगा, तथा समानतापूर्ण जैव-प्रौद्योगिकी प्रगति में भारत को एक वैश्विक अग्रणी के रूप में स्थापित करेगा।

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