वायुमंडलीय पुनः प्रवेश

2 Mar 2026

संदर्भ

भारत द्वारा गगनयान जैसे उन्नत मिशनों और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा किए जा रहे पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान प्रयोगों के साथ, अंतरिक्ष सुरक्षा और मिशन डिजाइन में पुनः प्रवेश गलियारे की अवधारणा ने प्रमुखता प्राप्त कर ली है।

वायुमंडलीय पुनः प्रवेश (Atmospheric Re-entry) क्या है?

  • पुनः प्रवेश वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कोई अंतरिक्षयान ऑर्बिट से पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते हुए वापस लौटता है।
  • इसमें लगभग 28,000 किमी/घंटा की कक्षीय गति से नियंत्रित मंदी शामिल है।
    • वापसी के लिए यह (अंतरिक्ष यान) अपनी गति को कम करने हेतु अपनी यात्रा की दिशा के बिल्कुल विपरीत दिशा में इंजन से दहन (थ्रस्ट) करता है, जिसे डी-ऑर्बिट बर्न कहा जाता है।
    • इससे वेग कम हो जाता है, जिससे पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण अंतरिक्ष यान को वायुमंडल की ओर अवरोही प्रक्षेप वक्र में खींच लेता है।

विशेषताएँ नियंत्रित पुनः प्रवेश अनियंत्रित पुनः प्रवेश
परिभाषा

अंतरिक्ष यान का वायुमंडल में उतरना जानबूझकर एक नियोजित प्रक्षेप पथ के साथ निर्देशित किया जाता है।

अंतरिक्ष यान या मलबा प्राकृतिक कक्षीय क्षय के बाद बिना किसी मार्गदर्शन के वायुमंडल में पुनः प्रवेश करता है।

प्रक्षेप वक्र

सटीक रूप से परिकलित; विशिष्ट पुनःप्रवेश गलियारे का अनुसरण करता है।

यादृच्छिक या अनियंत्रित; प्रक्षेप पथ कक्षीय क्षय पर निर्भर करता है।

उद्देश्य

इसका उपयोग मानवयुक्त मॉड्यूल, उपग्रहों या वैज्ञानिक पेलोड को सुरक्षित रूप से वापस लाने के लिए किया जाता है।

यह आमतौर पर रॉकेट के इस्तेमाल हो चुके चरणों या विफल उपग्रहों पर लागू होता है।

गर्मी एवं तनाव प्रबंधन

तापीय सुरक्षा प्रणाली, पैराशूट और नेविगेशन सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चित करते हैं।

कोई सक्रिय नियंत्रण नहीं; इसके कुछ हिस्से अप्रत्याशित रूप से जल सकते हैं या पृथ्वी पर गिर सकते हैं।

लैंडिंग/प्रभाव

पूर्व-निर्धारित स्थान पर लक्षित लैंडिंग या जलप्रपात।

मलबा महासागरों, भूमि पर गिर सकता है या टूटने तक कक्षा में बना रह सकता है।

मानव/संपत्ति को खतरा कम, डिजाइन और योजना द्वारा नियंत्रित।

ऊँचाई पर, क्योंकि मलबा अप्रत्याशित रूप से गिर सकता है।

उदाहरण भारत का SRE-1, CARE, गगनयान मिशन।

पुराने उपग्रहों या रॉकेट चरणों का अनियंत्रित रूप से कक्षा से बाहर निकलना।

पुनः प्रवेश गलियारा इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?

  • सुरक्षित अवमंदन सुनिश्चित करता है: यह अंतरिक्ष यान को वायुमंडलीय घर्षण का उपयोग करके धीरे-धीरे धीमा होने देता है।
  • जलने से बचाता है: यदि प्रवेश कोण बहुत अधिक हो, तो अत्यधिक गर्मी और दबाव अंतरिक्ष यान को नष्ट कर सकते हैं।
    • उदाहरण के लिए: यदि अंतरिक्ष यान बहुत तीव्र कोण पर वायुमंडल में प्रवेश करता है, तो उसे अत्यधिक वायुगतिकीय तापन का सामना करना पड़ता है, जिससे संरचनात्मक विफलता हो सकती है।
      • यदि अंतरिक्ष यान बहुत कम कोण पर प्रवेश करता है, तो वह सुरक्षित रूप से नीचे उतरने के बजाय वायुमंडल से अंतरिक्ष की तरफ विचलित होकर वापस जा सकता है।
  • अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा करता है: चालक दल की सुरक्षा के लिए गर्मी और गुरुत्वाकर्षण बल को नियंत्रणीय स्तर पर बनाए रखता है।

चुनौतियाँ

  • अत्यधिक तापन: हाइपरसोनिक गति पर वायु संपीडन से 1,500–2,000°C से अधिक तापमान उत्पन्न होता है, जिससे संरचनात्मक क्षति का खतरा होता है।
  • प्लाज्मा निर्माण और संचार अवरोध: कैप्सूल के चारों ओर आयनित गैसें (प्लाज्मा आवरण) बन जाती हैं, जो कई मिनटों तक रेडियो संकेतों को अवरुद्ध कर देती हैं।
  • वायुगतिक अस्थिरता: गलत अभिविन्यास या कोण के कारण कैप्सूल का पलटना या पुनः प्रवेश गलियारे से विचलन हो सकता है।
  • सटीक नेविगेशन आवश्यकता: प्रवेश कोण की थोड़ी-सी भी गलत गणना के कारण कैप्सूल अंतरिक्ष में वापस चला जाना (ओवरशूट) या जल जाना (अंडरशूट) हो सकता है।

भारत के लिए वायुमंडलीय पुनः प्रवेश का महत्त्व

  • मानव अंतरिक्ष उड़ान और राष्ट्रीय प्रतिष्ठा: पुन: प्रवेश  पर महारत हासिल करना अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करता है, जो गगनयान परियोजना का मुख्य आधार है।
    • उदाहरण: CARE ने भारत के क्रू मॉड्यूल हीट शील्ड और पैराशूट सिस्टम का सफलतापूर्वक परीक्षण किया।
      • इससे भारत उन चुनिंदा देशों (अमेरिका, रूस, चीन) में शामिल हो गया है, जो स्वतंत्र रूप से मानव अंतरिक्ष उड़ान में सक्षम हैं।
  • रक्षा और मिसाइल प्रौद्योगिकी: वापसी तकनीक बैलिस्टिक मिसाइल प्रणालियों से सीधे तौर पर जुड़ी है, जहाँ युद्धक सामग्री अतिध्वनिक गति से वायुमंडल में पुनः प्रवेश करती है।
    • उदाहरण: भारत की अग्नि-V उन्नत पुनः प्रवेश वाहन तकनीक का उपयोग करती है, जो अत्यधिक उच्च तापमान को सहन करने में सक्षम है।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सॉफ्ट पॉवर: उन्नत पुनः प्रवेश क्षमता वाले देश वैश्विक मिशनों में विश्वसनीय भागीदार बन जाते हैं।

पुनः प्रवेश के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढाँचा

  • बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 (Outer Space Treaty, 1967): राज्य अपने अंतरिक्ष पिंडों के लिए उत्तरदायी हैं और उनसे होने वाली क्षति के लिए जिम्मेदार हैं; पुनः पृथ्वी में प्रवेश करने के बाद भी उनका अधिकार क्षेत्र बना रहता है।
  • पंजीकरण पर सम्मेलन, 1976 (Convention on Registration, 1976): राज्यों को संयुक्त राष्ट्र के साथ अंतरिक्ष पिंडों का पंजीकरण कराना होगा, जिसमें कक्षा, उद्देश्य और पुनः पृथ्वी में प्रवेश करने का विवरण देना होगा।
  • दायित्व सम्मेलन, 1972 (Liability Convention, 1972): राज्य पृथ्वी को होने वाली क्षति के लिए पूर्णतः उत्तरदायी हैं और अपने पिंडों द्वारा अंतरिक्ष में होने वाली क्षति के लिए आंशिक रूप से उत्तरदायी हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र अंतरिक्ष मलबे के दिशा-निर्देश: पुनः पृथ्वी में प्रवेश के दौरान खतरों को न्यूनतम किया जाना चाहिए; नियंत्रित पुनः पृथ्वी में प्रवेश या कब्रिस्तान कक्षा में निपटान को प्रोत्साहित किया जाता है।

आगे की राह

  • उन्नत नियंत्रित पुनःप्रवेश: मानवयुक्त और मानवरहित मिशनों के लिए सटीक नेविगेशन और मार्गदर्शन प्रणालियों का विकास करना।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: पुनःप्रवेश और मलबा शमन संबंधी संयुक्त राष्ट्र संधियों और दिशा-निर्देशों का अनुपालन सुदृढ़ करना।
  • स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास: स्वचालित पुनःप्रवेश, पैराशूट तैनाती और पुनर्प्राप्ति प्रणालियों में इसरो की क्षमता का विस्तार करना।

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