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थोरियम और भारत का वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा मिशन

7 Mar 2026

संदर्भ

भारत दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्राप्त करने और वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट की परमाणु क्षमता के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए थोरियम-आधारित परमाणु ऊर्जा की खोज कर रहा है।

  • भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडार हैं, जिससे यह देश के ऊर्जा भविष्य के लिए एक रणनीतिक संसाधन बन जाता है।

परमाणु ऊर्जा लक्ष्य

  • भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को लगभग 100 गीगावाट तक बढ़ाना है।
  • वर्तमान में वैश्विक परमाणु उत्पादन क्षमता लगभग 380 गीगावाट है, जिसके आने वाले दशकों में 1,400 गीगावाट तक बढ़ने की अपेक्षा है।
  • भारत का नियोजित परमाणु विस्तार मुख्यतः तापीय रिएक्टरों पर आधारित होगा, जिनके लिए बड़ी मात्रा में यूरेनियम ईंधन की आवश्यकता होती है।
  • मुख्य चिंता: 100 गीगावाट लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिवर्ष 18,000–20,000 टन यूरेनियम की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान वैश्विक यूरेनियम उत्पादन का लगभग एक-तिहाई है।

यूरेनियम-आधारित परमाणु ऊर्जा की सीमाएँ

  • सीमित घरेलू उपलब्धता: भारत में निम्न-गुणवत्ता और सीमित यूरेनियम भंडार हैं, जिससे इसका निष्कर्षण महँगा हो जाता है और बड़े पैमाने पर परमाणु विस्तार के लिए पर्याप्त नहीं है।
  • आयात पर निर्भरता: परमाणु रिएक्टरों का निरंतर संचालन बनाए रखने के लिए भारत आयातित यूरेनियम पर अत्यधिक निर्भर है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।
  • अस्थिर ईंधन चक्र: पारंपरिक ‘यूरेनियम ईंधन चक्र’ ईंधन की ऊर्जा क्षमता के केवल एक छोटे हिस्से का उपयोग करता है, जिससे संसाधनों का उपयोग अल्प-कुशल हो जाता है।
  • रेडियोधर्मी अपशिष्ट और प्रसार संबंधी चिंताएँ: यूरेनियम–प्लूटोनियम चक्र दीर्घकालिक रेडियोधर्मी अपशिष्ट और ऐसे पदार्थ उत्पन्न करते हैं, जो परमाणु प्रसार संबंधी जोखिम बढ़ा सकते हैं।

भारत के लिए एक रणनीतिक विकल्प के रूप में थोरियम

  • प्रचुर घरेलू भंडार: भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जो मुख्यतः तटीय क्षेत्रों की मोनाजाइट रेत में पाए जाते हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: थोरियम भारत की आयातित यूरेनियम पर निर्भरता को कम करता है, जिससे ऊर्जा स्वतंत्रता और रणनीतिक स्वायत्तता सुदृढ़ होती है।
  • सतत् परमाणु ईंधन चक्र: थोरियम (Th-232) को यूरेनियम-233 में परिवर्तित किया जा सकता है, जो एक विखंडनीय पदार्थ है और परमाणु अभिक्रियाओं को बनाए रख सकता है।
  • कम परमाणु प्रसार जोखिम: थोरियम-आधारित ईंधन चक्र कम हथियार-उपयोग योग्य पदार्थ उत्पन्न करते हैं, जिससे वे पारंपरिक यूरेनियम–प्लूटोनियम चक्रों की तुलना में प्रसार-प्रतिरोधी बनते हैं।
  • भारत के त्रि-चरणीय परमाणु कार्यक्रम का केंद्रीय भाग: थोरियम का उपयोग भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के तीसरे चरण का निर्माण करता है, जो सदियों तक स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करता है।

थोरियम के उपयोग में चुनौतियाँ

  • प्रौद्योगिकीय जटिलता: थोरियम सीधे परमाणु शृंखला अभिक्रिया को बनाए नहीं रख सकता और इसे पहले यूरेनियम-233 में परिवर्तित करना पड़ता है, जिसके लिए उन्नत रिएक्टर प्रौद्योगिकियों और ईंधन चक्रों की आवश्यकता होती है।
  • वाणिज्यिक स्तर के रिएक्टरों का अभाव: थोरियम-आधारित रिएक्टर अभी भी मुख्यतः अनुसंधान और विकास के चरण में हैं तथा वैश्विक स्तर पर इनका वाणिज्यिक उपयोग सीमित है।
  • उच्च अनुसंधान और अवसंरचना लागत: थोरियम ईंधन चक्र के विकास के लिए उन्नत रिएक्टरों, ईंधन निर्माण और पुनर्संसाधन प्रौद्योगिकियों में महत्त्वपूर्ण निवेश की आवश्यकता होती है।
  • सीमित परीक्षण और अवसंरचना: भारत में वर्तमान में त्वरित विकिरण परीक्षण और बड़े पैमाने पर प्रदर्शन के लिए पर्याप्त सुविधाएँ नहीं हैं, जिससे थोरियम के उपयोग की गति धीमी पड़ती है।

भारत का त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

  • भारत का त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम 1950 के दशक में होमी जहाँगीर भाभा द्वारा दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए परिकल्पित किया गया था।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य रिएक्टर प्रौद्योगिकियों के क्रमिक विकास के माध्यम से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थोरियम संसाधनों को परमाणु ईंधन में परिवर्तित करना है।
  • प्रथम चरण – दाबित भारी जल रिएक्टर:
    • ईंधन: प्राकृतिक यूरेनियम
    • मंदक और शीतलक: भारी जल
    • मुख्य विशेषताएँ: ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम (यूरेनियम-238 और यूरेनियम-235) का उपयोग करता है।
      • रिएक्टर के संचालन के दौरान उप-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम-239 उत्पन्न करता है।
      • उत्पन्न प्लूटोनियम दूसरे चरण के लिए ईंधन बनता है।
  • द्वितीय चरण – तीव्र प्रजनक रिएक्टर
    • ईंधन: प्लूटोनियम-239 के साथ यूरेनियम या थोरियम
    • उद्देश्य: उपभोग से अधिक ईंधन उत्पन्न करना
    • मुख्य विशेषताएँ: प्रथम चरण के रिएक्टरों से प्राप्त प्लूटोनियम का ईंधन के रूप में उपयोग करता है।
      • यूरेनियम-238 को प्लूटोनियम या थोरियम को यूरेनियम-233 में परिवर्तित करता है।
      • जितना उपभोग करता है उससे अधिक विखंडनीय पदार्थ उत्पन्न करता है (ब्रीडर प्रक्रिया)।
  • तृतीय चरण – थोरियम-आधारित रिएक्टर
    • ईंधन: थोरियम से प्राप्त यूरेनियम-233
    • मुख्य विशेषताएँ: यूरेनियम-233 नामक विखंडनीय ईंधन उत्पन्न करने के लिए थोरियम-232 का उपयोग करता है।
      • भारत के विशाल थोरियम भंडारों का उपयोग करने के लिए अभिकल्पित।
      • सदियों तक सतत परमाणु ऊर्जा प्रदान करने की अपेक्षा।

भारत के परमाणु ऊर्जा विकास के लिए सतत दोहन एवं उन्नति अधिनियम (शांति अधिनियम, 2025)

  • शांति अधिनियम, 2025 भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के आधुनिकीकरण तथा परमाणु प्रौद्योगिकी विकास में व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाने के उद्देश्य से एक प्रमुख सुधार है।
  • परमाणु क्षेत्र को खोलना: यह अधिनियम परमाणु अनुसंधान, विकास और प्रौद्योगिकी के उपयोग में निजी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों तथा उद्योग की भागीदारी की अनुमति देता है।
    • पूर्व में परमाणु ऊर्जा से संबंधित गतिविधियाँ मुख्यतः वर्ष 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के अंतर्गत सरकार के नियंत्रण में थीं।
  • अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा: अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और उद्योग के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करता है।
  • परमाणु पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक और निजी हितधारकों को सम्मिलित करते हुए एक व्यापक परमाणु नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण का उद्देश्य रखता है।
थोरियम और भारत का वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा मिशन

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