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CMS के परिशिष्ट में धारीदार लकड़बग्घा

7 Mar 2026

संदर्भ

ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने जंगली प्राणियों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय के पक्षकारों के सम्मेलन के 15वें सत्र में धारीदार लकड़बग्घा (Striped Hyena) को परिशिष्ट I और II के अंतर्गत सूचीबद्ध करने का प्रस्ताव रखा।

इस सूचीकरण का महत्त्व

जंगली प्राणियों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय के परिशिष्टों के अंतर्गत धारीदार लकड़बग्घा को सूचीबद्ध करने से एक महत्त्वपूर्ण मृतभक्षी प्रजाति के संरक्षण तथा प्रवासी वन्यजीव आवासों की रक्षा के लिए वैश्विक सहयोग सुदृढ़ होता है।

धारीदार लकड़बग्घा (Striped Hyena) के बारे में

  • धारीदार लकड़बग्घा एक मध्यम आकार का रात्रिचर मांसाहारी जीव है तथा एक महत्त्वपूर्ण मृतभक्षी है, जो मृत पशुओं को खाकर पारितंत्र की स्वच्छता बनाए रखने में सहायता करता है।

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  • आवास: यह शुष्क और अर्द्ध-शुष्क परिदृश्यों में पाया जाता है, जिनमें सवाना, घासभूमियाँ, अर्द्ध-मरुस्थल, खुले वन क्षेत्र और पथरीले पर्वतीय क्षेत्र शामिल हैं।
  • वैश्विक वितरण: यह प्रजाति उत्तरी और उप-सहारा अफ्रीका, मध्य पूर्व, काकेशस, मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती है तथा भोजन की खोज में अक्सर लंबी दूरी तय करती है।
  • भारत में वितरण: भारत इस प्रजाति का एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ इसकी आबादी राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु (मुदुमलाई क्षेत्र) से रिपोर्ट की गई है।
  • मुख्य विशेषताएँ
    • रात्रिचर और दुर्लभ: यह प्रायः रात में सक्रिय रहता है और इसका अवलोकन करना कठिन होता है।
    • शक्तिशाली मृतभक्षी: इसके जबड़े अत्यंत मजबूत होते हैं, जो अस्थियों को तोड़कर उनके भीतर के मज्जा तक पहुँचने में सक्षम होते हैं।
      • इन्हें अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रमुख अपमार्जक और मृतभक्षी माना जाता है, क्योंकि ये प्रतिवर्ष लगभग 23 टन पशुधन शव अपशिष्ट को हटाकर रोगों के प्रकोप को रोकते हैं।
    • एकाकी व्यवहार: यह सामान्यतः अकेले या छोटे पारिवारिक समूहों में रहता है, जबकि चित्तीदार लकड़बग्घे समूह में रहते हैं।
  • संरक्षण स्थिति
    • IUCN  की रेड लिस्ट: निकट संकटग्रस्त।
    • वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972: अनुसूची I
    • प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय (CMS) का प्रस्ताव: अधिक सशक्त अंतरराष्ट्रीय संरक्षण के लिए परिशिष्ट I और II में शामिल करने का सुझाव दिया गया।

प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय (CMS) के बारे में 

  • प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय, जिसे बॉन अभिसमय भी कहा जाता है, प्रवासी जीवों और उनके आवासों के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अंतर्गत एक अंतर-सरकारी संधि है।
  • उद्गम: इस अभिसमय को वर्ष 1979 में अपनाया गया और वर्ष 1983 में यह प्रभाव में आया, वर्तमान में इसके 130 से अधिक सदस्य देश हैं।
  • उद्देश्य: इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण, प्रबंधन और सतत् उपयोग के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है।
  • CMS के परिशिष्ट
    • परिशिष्ट I: संकटग्रस्त प्रवासी प्रजातियाँ, जिनके लिए सख्त संरक्षण आवश्यक है।
    • परिशिष्ट II: ऐसी प्रजातियाँ जिनकी संरक्षण स्थिति अनुकूल नहीं है और जिनके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।
  • पक्षकारों का सम्मेलन (CMS COP): पक्षकारों का सम्मेलन निर्णय लेने वाली संस्था है, जो संरक्षण स्थिति की समीक्षा करता है, प्रजातियों की सूची में संशोधन करता है और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुदृढ़ करता है।
    • प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय के पक्षकारों के सम्मेलन की पंद्रहवीं बैठक 23–29 मार्च, 2026 के दौरान ब्राजील के कैम्पो ग्रांडे में आयोजित की जाएगी।
      • थीम: “कनेक्टिंग नेचर टू सस्टेन लाइफ”
      • केंद्रबिंदु: प्रवासी प्रजातियों और उनके आवासों के लिए अंतरराष्ट्रीय संरक्षण को सुदृढ़ करना तथा आवास हानि एवं जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों का समाधान करना।
  • भारत और अभिसमय
    • भारत वर्ष 1983 में इसका सदस्य बना।
    • इसने साइबेरियाई सारस, समुद्री कछुओं, डुगोंग और शिकारी पक्षियों के लिए समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं।
    • भारत ने वर्ष 2020 में गांधीनगर में CMS COP के 13वें सत्र की मेजबानी की थी।
CMS के परिशिष्ट में धारीदार लकड़बग्घा

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