संदर्भ
भारत ने जैव विविधता पर अभिसमय के अंतर्गत अपनी सातवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें वर्ष 2022 में अपनाए गए कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा के अंतर्गत वर्ष 2030 के वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों की दिशा में देश की प्रगति का आकलन किया गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- वर्ष 2030 के लक्ष्यों की दिशा में सीमित प्रगति: 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों में से केवल दो लक्ष्य — जैव विविधता समावेशी भूमि और समुद्र उपयोग योजना (राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य 1) तथा पारितंत्र पुनर्स्थापन (राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य 2) — स्पष्ट रूप से वर्ष 2030 के लिए लक्षित निर्धारित मार्ग पर हैं।
- वन और वृक्ष आच्छादन में वृद्धि: भारत का वन और वृक्ष आच्छादन 8,27,357 वर्ग किलोमीटर (भौगोलिक क्षेत्र का 25.17 प्रतिशत) तक पहुँच गया है, जिसमें वर्ष 2021–2023 के बीच 1,445.81 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है।
- पारितंत्र पुनर्स्थापन के प्रयास: भारत ने बॉन चैलेंज के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर अवनत भूमि को पुनर्स्थापित करने का संकल्प लिया है, जिसमें से 24.1 मिलियन हेक्टेयर पहले ही पुनर्स्थापित हो चुकी है या पुनर्स्थापन की प्रक्रिया में है।
- प्रमुख प्रजातियों के संरक्षण में सफलता: इस रिपोर्ट में प्रमुख प्रजातियों की पुनर्प्राप्ति को रेखांकित किया गया है, जैसे:
- बंगाल टाइगर – संख्या 3,167
- एशियाई सिंह – संख्या में वृद्धि
- भारतीय गैंडा – स्थिर या बढ़ती हुई संख्या।
- इसमें हिम तेंदुए की जनसंख्या का पहला राष्ट्रीय आकलन भी शामिल है।
- कृषि और जैव विविधता का एकीकरण: वनों के बाहर के वृक्ष राष्ट्रीय वृक्ष आच्छादन में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, जबकि कृषि वानिकी अब भारत के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 8.65 प्रतिशत में फैली हुई है।
रिपोर्ट के बारे में
- यह रिपोर्ट पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा तैयार की गई है।
- तकनीकी समन्वय राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा किया गया।
- संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा वैश्विक पर्यावरण सुविधा-8 अंब्रेला कार्यक्रम के अंतर्गत समर्थन प्रदान किया गया।
- 33 केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों से प्राप्त इनपुट तथा 142 जैव विविधता संकेतकों पर निगरानी के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई।
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संरक्षण और पारितंत्र की स्थिति
- संरक्षित क्षेत्र का कवरेज: वर्तमान में भारत के भौगोलिक क्षेत्र का केवल 5 प्रतिशत से थोड़ा अधिक भाग औपचारिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों (जैसे- राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य आदि) के रूप में नामित है।
- संरक्षित क्षेत्रों के बाहर अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (OECMs) की पहचान के लिए प्रयास जारी हैं।
- मैंग्रोव और कार्बन भंडार: मैंग्रोव क्षेत्र में अल्प वृद्धि हुई है और वन कार्बन भंडार लगभग 7,285.5 मिलियन टन तक पहुँच गया है, जो पारितंत्र की पुनर्प्राप्ति और जलवायु लाभों का संकेत देता है।
- भूमि क्षरण की चिंता: भारत के भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 29.77 प्रतिशत (लगभग 97 मिलियन हेक्टेयर) अभी भी भूमि क्षरण से प्रभावित है, जो पारिस्थितिकी दबाव के बड़े स्तर को दर्शाता है।
मुख्य चुनौतियाँ, जिनसे निपटना आवश्यक है
- गैर-प्रमुख प्रजातियों पर सीमित डेटा: प्रमुख प्रजातियों के संरक्षण से संबंधित डेटा उपलब्ध है, लेकिन कम ज्ञात प्रजातियों और अन्य वर्गों के बारे में जानकारी सीमित है।
- जैव विविधता निगरानी का विखंडन: जैव विविधता से संबंधित डेटा विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों में विस्तृत है, जहाँ अलग-अलग पद्धतियाँ और निगरानी अंतराल अपनाए जाते हैं।
- पर्यावरणीय दबाव: पारितंत्र जलवायु परिवर्तन, बाढ़, सूखा, वनाग्नि और आवास विखंडन जैसी बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
- नीति और क्रियान्वयन के बीच अंतर: वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों के साथ नीतिगत स्तर पर अच्छी सामंजस्यता होने के बावजूद, वास्तविक क्रियान्वयन और मापने योग्य परिणाम अभी भी असमान बने हुए हैं।
आगे की राह
- संरक्षण क्षेत्र का विस्तार: 30×30 संरक्षण लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संरक्षित क्षेत्रों और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (OECMs) का विस्तार करना आवश्यक है।
- जैव विविधता निगरानी को मजबूत बनाना: जैव विविधता के आकलन के लिए मानकीकृत संकेतकों और एकीकृत डेटा प्रणालियों का विकास किया जाना चाहिए।
- पारितंत्र पुनर्स्थापन पर ध्यान: राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए क्षतिग्रस्त भूमि और पारितंत्रों के पुनर्स्थापन की प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है।
- प्रजाति संरक्षण का विस्तार: संरक्षण प्रयासों को केवल प्रमुख प्रजातियों तक सीमित न रखकर कम ज्ञात प्रजातियों और संपूर्ण पारितंत्र की जैव विविधता तक विस्तारित किया जाना चाहिए।
जैव विविधता पर अभिसमय (CBD)
- परिचय: इसे जैव विविधता अभिसमय या UNCBD भी कहा जाता है। यह एक बहुपक्षीय संधि है, जिसका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, इसके घटकों का सतत् उपयोग तथा आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभों का न्यायसंगत और समान वितरण सुनिश्चित करना है।
- यह संधि 5 जून, 1992 को रियो डी जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन के दौरान हस्ताक्षर के लिए उपलब्ध कराई गई और 29 दिसंबर, 1993 को लागू हुई।
- अनुमोदन (Ratification): यह एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि है, जिसे 196 देशों ने अनुमोदित किया है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राज्य अमेरिका एकमात्र संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश है, जिसने इसे अनुमोदित नहीं किया है।
- भारत भी इस संधि का पक्षकार है।
- शासी निकाय: इसका सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) है,
- जिसमें वे सभी देश शामिल होते हैं, जिन्होंने संधि का अनुमोदन किया है।
- सचिवालय: मॉन्ट्रियल, कनाडा।
- तीन उद्देश्य
- जैव विविधता का संरक्षण (आनुवंशिक विविधता, प्रजाति विविधता और आवास विविधता)।
- जैव विविधता का सतत् उपयोग।
- आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभों का न्यायसंगत और समान वितरण।
- जैव विविधता पर अभिसमय के ढाँचे के अंतर्गत दो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी समझौते अपनाए गए हैं।
- कार्टाजेना प्रोटोकॉल: इसे वर्ष 2000 में अपनाया गया और वर्ष 2003 में यह लागू हुआ।
- यह जीवित संशोधित जीवों के सीमा-पार आवागमन को विनियमित करता है।
- नगोया प्रोटोकॉल: इसे वर्ष 2010 में अपनाया गया।
- यह आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच तथा उनके उपयोग से प्राप्त लाभों के न्यायसंगत और समान वितरण के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी ढाँचा स्थापित करता है।
- CBD के अंतर्गत प्रमुख प्रोटोकॉल
- कार्टाजेना प्रोटोकॉल ऑन बायोसेफ्टी (2000): यह जीवित संशोधित जीवों के सुरक्षित प्रबंधन, परिवहन और उपयोग को विनियमित करता है।
- नगोया प्रोटोकॉल (2010): यह आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच तथा लाभों के न्यायसंगत वितरण के लिए एक ढाँचा स्थापित करता है।
- हाल का वैश्विक ढाँचा: वर्ष 2022 में सदस्य देशों ने कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा को अपनाया, जिसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक जैव विविधता की हानि को रोकना और उसे उलटना है। इसमें 30×30 लक्ष्य शामिल है, जिसके तहत वर्ष 2030 तक विश्व की 30 प्रतिशत भूमि और महासागरों को संरक्षित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
- भारत और CBD
- भारत CBD की प्रतिबद्धताओं को जैव विविधता अधिनियम, 2002 के माध्यम से लागू करता है।
- संस्थागत तंत्र में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण, राज्य जैव विविधता बोर्ड, और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs) शामिल हैं।

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