चंबल में रेत का खनन

18 Apr 2026

संदर्भ

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने चेतावनी दी है कि यदि राज्य एक माह के भीतर कार्रवाई करने में विफल रहते हैं, तो राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में अवैध रेत खनन को रोकने हेतु अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती की जा सकती है।

संबंधित तथ्य

  • इसने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील अभयारण्य की सुरक्षा हेतु ठोस उपाय करने का निर्देश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के मुख्य बिंदु 

  • सीसीटीवी कैमरों की स्थापना: रेत खनन से प्रभावित क्षेत्रों में उच्च-रिजॉल्यूशन और वाई-फाई सक्षम सीसीटीवी कैमरे स्थापित किए जाएँ तथा इनसे प्राप्त लाइव दृश्य सीधे जिला पुलिस प्रमुखों एवं प्रभागीय वन अधिकारियों के कार्यालयों तक भेजे जाएँ।
  • जीपीएस उपकरणों का उपयोग: मध्य प्रदेश और राजस्थान को मुरैना और धौलपुर जिलों में खनन में प्रयुक्त वाहनों पर जीपीएस ट्रैकिंग उपकरण लगाने हेतु एक पायलट परियोजना प्रारंभ करनी चाहिए।
    • इन उपकरणों से प्राप्त डेटा जिलाधिकारी और पुलिस के लिए सुलभ होना चाहिए।
  • वाहन जब्ती: अवैध खनन में संलिप्त किसी भी वाहन या मशीनरी को तुरंत जब्त किया जाए तथा संबंधित सभी व्यक्तियों के विरुद्ध शीघ्र अभियोजन किया जाए।
  • संयुक्त गश्त: राज्यों को अभयारण्य के भीतर और आस-पास के जिलों में संयुक्त गश्ती दलों का गठन करने का निर्देश दिया गया है।
  • नीतिगत एवं विधिक उपाय: एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का निर्माण किया जाए।
    • SOP में निम्नलिखित को संबोधित किया जाए:
      • संगठित और हिंसक खनन गतिविधियाँ
      • अंतर-राज्य समन्वय

अवैध रेत खनन’ के बारे में 

  • यह नदी तल, बाढ़-मैदान, तटीय क्षेत्रों तथा अन्य पारिस्थितिकी तंत्रों से बिना नियामकीय अनुमति के रेत के अनधिकृत दोहन को संदर्भित करता है।
    • यह प्रायः पर्यावरणीय मानकों, खनन कानूनों तथा सतत् दोहन सीमाओं का उल्लंघन करता है।
  • नीतियाँ एवं विनियम
    • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986): यह पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक सुरक्षा प्रावधान प्रदान करता है।
    • पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना (2016): यह जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR) तथा सतत् रेत खनन के लिए पुनर्भरण अध्ययन को अनिवार्य बनाती है।
    • सतत् रेत खनन प्रबंधन दिशा-निर्देश (2016): यह रेत खनन प्रथाओं के वैज्ञानिक प्रबंधन और निगरानी पर केंद्रित हैं।

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अवैध रेत खनन के प्रमुख कारण 

  • निर्माण क्षेत्र से उच्च माँग: तीव्र शहरीकरण, अवसंरचना परियोजनाओं तथा आवासीय माँग के कारण रेत की खपत में अत्यधिक वृद्धि हुई है।
    • कंक्रीट के लिए बेहतर गुणवत्ता के कारण प्राकृतिक नदी रेत को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे नदी तल पर दबाव बढ़ता है।
  • खनन विनियमों का कमजोर प्रवर्तन: कानून होने के बावजूद, मानव संसाधन और निगरानी तंत्र की कमी के कारण कार्यान्वयन कमजोर रहता है। अवैध खनिक लाइसेंसिंग और निगरानी प्रणाली की खामियों का लाभ उठाते हैं।
  • प्रशासन और रेत माफिया के बीच संबंध: स्थानीय अधिकारियों, राजनेताओं और खनन माफियाओं के मध्य मजबूत साँठगाँठ, अवैध गतिविधियों को जारी रहने देती है। भ्रष्टाचार के कारण चयनात्मक प्रवर्तन या जानबूझकर निष्क्रियता देखी जाती है।
  • सस्ते विकल्पों की कमी: M-सैंड (M-sand) जैसे विकल्प या तो व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं हैं या महँगे हो जाते हैं। इससे प्राकृतिक नदी रेत पर निर्भरता बनी रहती है।
  • अंतर-राज्य समन्वय की कमी: नदियाँ प्रायः कई राज्यों से होकर गुजरती हैं, परंतु समन्वय के अभाव में नियामकीय अंतराल उत्पन्न होते हैं। अवैध खनिक राज्यों के बीच अधिकार-क्षेत्रीय भ्रम का लाभ उठाते हैं।

रेत खनन से संबंधित अंतरराष्ट्रीय रूपरेखा 

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP): UNEP रेत को एक रणनीतिक प्राकृतिक संसाधन के रूप में रेखांकित करता है तथा वैश्विक रिपोर्ट (जैसे—सैंड एंड सस्टेनेबिलिटी) प्रकाशित करता है, जो सतत् दोहन और सुशासन को प्रोत्साहित करती हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA): UNGA के प्रस्ताव सतत् संसाधन प्रबंधन पर बल देते हैं तथा रेत खनन सहित पर्यावरणीय क्षरण से निपटने हेतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग का आह्वान करते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य (SDGs): रेत खनन का अप्रत्यक्ष संबंध निम्नलिखित SDGs से है:
    • SDG 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता)
    • SDG 12 (उत्तरदायी उपभोग और उत्पादन)
    • SDG 14 (जल के नीचे जीवन)
    • SDG 15 (स्थलीय जीवन)

सतत रेत खनन’ हेतु भारत सरकार की पहलें 

  • खनिज एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR अधिनियम):
    • रेत को लघु खनिज के रूप में वर्गीकृत किया गया है, और इसका विनियमन मुख्यतः राज्य सरकारों के अधीन है।
    • यह अधिनियम राज्यों को खनन, परिवहन तथा भंडारण के लिए नियम बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
  • सतत् रेत खनन प्रबंधन दिशा-निर्देश, 2016
    • इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है, ताकि पर्यावरणीय रूप से सतत् और वैज्ञानिक खनन सुनिश्चित किया जा सके।
    • यह नदी पारिस्थितिकी संरक्षण, नियंत्रित दोहन तथा निगरानी तंत्र पर केंद्रित है।
  • रेत खनन के लिए प्रवर्तन एवं निगरानी संबंधी दिशा-निर्देश, 2020 (EMGSM)
    • इसे निगरानी और पर्यवेक्षण को सुदृढ़ करने तथा अवैध खनन पर अंकुश लगाने के लिए प्रस्तुत किया गया।
    • यह उपग्रह चित्रण और रिमोट सेंसिंग जैसी तकनीकों के उपयोग को प्रोत्साहित करता है।
  • रेत खनन रूपरेखा, 2022: इसे खनन मंत्रालय द्वारा राज्यों के साथ परामर्श में तैयार किया गया है।
    • इसका उद्देश्य सततता, पारदर्शिता, वहनीयता तथा रेत की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
  • जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR): खनन पट्टा प्रदान करने से पहले रेत युक्त क्षेत्रों की पहचान, पुनर्भरण दर तथा पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों का निर्धारण अनिवार्य किया गया है।
  • पर्यावरणीय स्वीकृति तंत्र: खनन परियोजनाओं को राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) से वैज्ञानिक आकलन के आधार पर स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है।
    • यह खनन की गहराई, मात्रा तथा पारिस्थितिकी सुरक्षा उपायों पर सीमाएँ सुनिश्चित करता है।

आगे की राह

  • प्रवर्तन और जवाबदेही को सुदृढ़ करना: नियामक प्राधिकरणों की प्रवर्तन क्षमता को बेहतर मानव संसाधन, प्रशिक्षण और संसाधनों के माध्यम से बढ़ाने की आवश्यकता है।
    • अधिकारियों की स्पष्ट जवाबदेही तय करने से प्रशासनिक उदासीनता और भ्रष्टाचार में कमी आएगी।

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  • प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी: आधुनिक तकनीक को अपनाने से रियल-टाइम निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है। उपकरण, जैसे:
    • खनन हॉटस्पॉट्स पर सीसीटीवी कैमरे
    • परिवहन वाहनों की जीपीएस ट्रैकिंग
    • ड्रोन और उपग्रह चित्रण।
  • सतत् विकल्पों को बढ़ावा: निर्मित रेत (M-sand) तथा पुनर्चक्रित निर्माण सामग्री के उपयोग को प्रोत्साहित करने से प्राकृतिक रेत पर दबाव कम किया जा सकता है।
  • सामुदायिक भागीदारी और स्थानीय निगरानी: स्थानीय समुदायों को शामिल करना जमीनी स्तर की प्रभावी निगरानी व्यवस्था के रूप में कार्य कर सकता है। जागरूकता अभियान पर्यावरणीय उत्तरदायित्व को बढ़ावा दे सकते हैं।
  • अंतर-राज्य समन्वय को सुदृढ़ करना: नदियाँ कई राज्यों से होकर गुजरती हैं, अतः समन्वित नदी बेसिन प्रबंधन की आवश्यकता है। राज्यों को समान नीतियाँ और संयुक्त प्रवर्तन तंत्र विकसित करने चाहिए।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य के बारे में

  • स्थापना: वर्ष 1979 में स्थापित, यह देश का पहला और एकमात्र त्रि-राज्य संरक्षित क्षेत्र (राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश) है।
  • जैव-विविधता: यह विश्व के लगभग 90% शेष जंगली घड़ियाल तथा लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन का आवास है।
    • अन्य महत्त्वपूर्ण प्रजातियाँ: मार्श क्रोकोडाइल (मगर), रेड-क्राउन रूफ टर्टल, स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव, लकड़बग्घा
  • पक्षी संरक्षण: इस स्थल को महत्त्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) के रूप में नामित किया गया है, जो इसकी पक्षी संरक्षण में महत्ता को दर्शाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय मान्यता: इसे रामसर अभिसमय के अंतर्गत शामिल करने का प्रस्ताव है तथा यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए भी एक संभावित विकल्प है।
  • IUCN वर्गीकरण: इसे IUCN श्रेणी IV संरक्षित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो आवास एवं प्रजाति प्रबंधन पर केंद्रित है।

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