संदर्भ
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने 17 अप्रैल को भारत और अन्य देशों को लगभग एक महीने तक समुद्र में ही रूस के प्रतिबंधित तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने की छूट जारी की।
संबंधित तथ्य
- इस कदम का उद्देश्य वैश्विक ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित करना है, जो ईरान के साथ अमेरिका-इजरायल युद्ध के दौरान काफी बढ़ गई थीं।
प्रतिबंध छूट (Sanctions Waiver) के बारे में
- प्रकृति: यह एक अस्थायी सामान्य लाइसेंस था, जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा जारी किया गया था, जो मौजूदा प्रतिबंधों से सीमित छूट प्रदान करता था।
- उद्देश्य
- वैश्विक तेल आपूर्ति संकट को कम करना
- अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को स्थिर करना।
- रूसी तेल प्रावधान: यह देशों को उस रूसी कच्चे तेल के आयात की अनुमति देता था, जिसे एक निर्दिष्ट ‘कट-ऑफ’ तिथि से पहले टैंकरों पर लोड किया जा चुका था।
- संचालनात्मक लचीलापन: यह छूट एक सीमित अवधि के लिए प्रतिबंधित संस्थाओं, जहाजों और बीमा कंपनियों से संबंधित लेन-देन को सक्षम बनाती थी।
संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रतिबंध छूट क्यों दी गई?
- भू-राजनीतिक व्यवधान: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति मार्गों में व्यवधान उत्पन्न हुआ।
- चोकपॉइंट प्रभाव: इसके परिणामस्वरूप हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के माध्यम से आवाजाही में कमी आई।
- रणनीतिक महत्त्व: हॉर्मुज जलडमरूमध्य एक महत्त्वपूर्ण चोकपॉइंट है, जिसके माध्यम से वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% गुजरता है।
- आपूर्ति बाधा: परिणामस्वरूप, वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति में कमी उत्पन्न हुई।
- कीमतों में वृद्धि: इसके कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें उच्च स्तर पर बनी रहीं।
भारत को प्रतिबंध पर छूट से कैसे लाभ हुआ?
- रूसी तेल आयात में वृद्धि: भारत के लिए, रूसी तेल पर छूट ने पश्चिम एशिया से आपूर्ति में बड़े व्यवधान के बीच रूस के तेल के आयात में तीव्र वृद्धि की अनुमति दी।
- फरवरी में, भारत ने 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) से थोड़ा अधिक रूसी कच्चा तेल आयात किया, जो वर्ष 2025 के 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन (bpd) से अधिक के लक्ष्य का लगभग आधा था।
- परिणामस्वरूप, भारत के कुल कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 44% तक बढ़ गई, जिससे वह प्रमुख आपूर्तिकर्ता बन गया।
- प्रतिबंधित आपूर्ति शृंखलाओं तक पहुँच: इस छूट ने भारतीय रिफाइनरों को पहले से प्रतिबंधित आपूर्ति शृंखलाओं के साथ जुड़ने में सक्षम बनाया, जिसमें ‘रोसनेफ्ट’ और ‘लुकोइल’ जैसी कंपनियों के साथ प्रत्यक्ष लेन-देन शामिल है।
- इसने प्रतिबंधित टैंकरों, बीमा कंपनियों और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क के उपयोग की भी अनुमति दी।
- उदाहरण के लिए, रिफाइनर उन जहाजों से डिलीवरी स्वीकार कर सकते थे, जिन्हें अन्यथा अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत प्रतिबंधित किया जाता।
- रणनीतिक विविधीकरण: भारत ने इस छूट का उपयोग पश्चिम एशिया में व्यवधान के बीच कच्चे तेल के स्रोतों में विविधता लाने के लिए किया, जिससे हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता के कारण कम हुई आपूर्ति की भरपाई की जा सकी।
- इसने रियायती रूसी कच्चा तेल भी प्राप्त किया, जिससे कुल आयात बिल में कमी आई।
- सीमित ईरानी तेल पुनः आयात: इस छूट ने भारत को कई वर्षों के बाद सीमित मात्रा में ईरानी कच्चे तेल का आयात पुनः प्रारंभ करने की अनुमति दी।
- हालाँकि, इसकी मात्रा रूसी आयात की तुलना में अपेक्षाकृत कम रही।
भारत के लिए प्रमुख चुनौतियाँ
- प्रतिबंध जोखिम: भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा द्वितीयक प्रतिबंधों के जोखिम का सामना करना पड़ता है, जिसके कारण उसे प्रतिबंधित संस्थाओं, जहाजों तथा वित्तीय माध्यमों के साथ लेन-देन से बचना आवश्यक है।
- ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का लगभग 88% आयात करता है और पश्चिम एशिया तथा रूस के अलावा बड़े पैमाने पर वैकल्पिक स्रोत सीमित हैं।
- भू-राजनीतिक संतुलन: भारत को संयुक्त राज्य अमेरिका (एक प्रमुख साझेदार) और रूस (एक प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता) के बीच अपने रणनीतिक संबंधों का सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखना होता है।
USA प्रतिबंध
| आधार |
प्राथमिक प्रतिबंध |
द्वितीयक प्रतिबंध |
| प्रयोज्यता |
अमेरिकी नागरिकों, कंपनियों और संस्थाओं पर लागू |
गैर-अमेरिकी (विदेशी) संस्थाओं पर भी लागू |
| अधिकार क्षेत्र |
प्रत्यक्ष अमेरिकी विधिक अधिकार क्षेत्र |
अमेरिकी वित्तीय प्रणाली के माध्यम से अप्रत्यक्ष/वैश्विक प्रभाव |
| लक्ष्य |
अमेरिकी व्यक्तियों को प्रतिबंधित देशों/संस्थाओं से लेन-देन से रोका जाता है। |
प्रतिबंधित संस्थाओं से लेन-देन करने वाली विदेशी कंपनियाँ/बैंक। |
| उद्देश्य |
लक्षित राज्यों के साथ अमेरिकी भागीदारी को सीमित करना। |
अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रति वैश्विक अनुपालन सुनिश्चित करना। |
| कार्रवाई के उदाहरण |
अमेरिकी कंपनियों को ईरान के साथ व्यापार से प्रतिबंधित किया जाता है। |
ईरान के साथ व्यापार करने पर भारतीय/चीनी कंपनियों पर दंडात्मक कार्रवाई। |
| दबाव का प्रकार |
अमेरिकी प्रणाली के भीतर विधिक प्रतिबंध |
अमेरिकी डॉलर, बैंकिंग और बाजारों तक पहुँच के माध्यम से आर्थिक दबाव |
| मुख्य उपकरण |
व्यापार प्रतिबंध, संपत्ति फ्रीज (अमेरिकी संस्थाएँ)। |
अमेरिकी डॉलर पहुँच अवरोध, प्रतिबंध सूची, वीजा प्रतिबंध। |
| तृतीय देशों पर प्रभाव |
प्रत्यक्ष प्रभाव सीमित।` |
वैश्विक व्यापार और वित्त पर उच्च प्रभाव। |
| भारत जैसे देशों के लिए प्रमुख जोखिम |
सीमित (केवल अमेरिकी कंपनियाँ प्रभावित)। |
ऊर्जा आयात, बैंकिंग लेन-देन, शिपिंग मार्ग प्रभावित। |
| आलोचना |
सीमित क्षेत्रीय प्रभाव |
संप्रभुता का उल्लंघन / आर्थिक दबाव के रूप में देखा जाता है। |
आगे की राह
- ऊर्जा स्रोतों में विविधता: भारत को कुछ चुनिंदा आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करने हेतु अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से कच्चे तेल की आपूर्ति का विस्तार करना चाहिए।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को सुदृढ़ करना: भारत को वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों और मूल्य तनावों से निपटने के लिए अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को बढ़ाना चाहिए।
- नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण में तेजी: दीर्घकालिक रूप से आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर तीव्र प्रोत्साहन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- कूटनीतिक संतुलन: भारत को अपने प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ रणनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए, प्रतिबंध-संबंधी जोखिमों से बचाव और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु व्यावहारिक कूटनीति जारी रखनी चाहिए।