भूल जाने का अधिकार

18 Apr 2026

संदर्भ

हाल ही में एक पत्रकार (वित्तीय क्षेत्र से संबंधित) ने दिल्ली के एक न्यायालय के उस व्यापक गैग ऑर्डर’ (प्रकाशन पर रोक के आदेश) को चुनौती दी है, जिसमें स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले (जिसमें संदेसरा समूह शामिल है) से संबंधित रिपोर्टों को हटाने और उन्हें डी-इंडेक्स’ करने का निर्देश दिया गया था। इस चुनौती के माध्यम से, सार्वजनिक हित के मामलों में भूल जाने के अधिकार’ (RTBF) और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच मौजूद संवैधानिक टकराव को उजागर किया गया है।

संदेसरा के प्रतिबंध आदेश की मुख्य विशेषताएँ

  • पृष्ठभूमि: यह प्रतिबंध आदेश स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले से संबंधित कार्यवाही के परिणामस्वरूप जारी किया गया है, जिसमें बड़े पैमाने पर बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं।
  • प्रतिबंध आदेश का दायरा: दिल्ली न्यायालय ने ऑनलाइन सामग्री को पूरी तरह से हटाने और डी-इंडेक्स करने का निर्देश दिया है, जिसके तहत निम्नलिखित आवश्यक है:
    • मीडिया आउटलेट्स को प्रकाशित रिपोर्टें हटानी होंगी।
    • सर्च इंजन को परिणामों से लिंक हटाने होंगे।
      • यह प्रतिबंध अभिलेखीय पत्रकारिता सामग्री पर भी लागू होता है, जिससे आदेश का दायरा व्यापक और पूर्वव्यापी हो जाता है।
  • कानूनी आधार और दावे: याचिका में अनुच्छेद-21 के तहत भूल जाने का अधिकार’ (RTBF) और प्रतिष्ठा के अधिकार का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि ऐसी रिपोर्टों की निरंतर उपलब्धता से प्रतिष्ठा को लगातार नुकसान पहुँचता है, विशेष रूप से उन मामलों में जो अभी तक सुलझे नहीं हैं या जो अभी भी चल रहे हैं।
  • चुनौती और व्यापक प्रभाव: एक वित्तीय पत्रकार ने इस आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया है कि यह खोजी पत्रकारिता और जनता के जानने के अधिकार को कमजोर करता है।
    • यह मामला भारत में RTBF, निजता और मीडिया की स्वतंत्रता के मध्य संतुलन बनाने के लिए एक स्पष्ट कानूनी ढाँचे की तत्काल आवश्यकता को उजागर करता है।

भूल जाने के अधिकार (RBTF) के बारे में

  • अवधारणा: ‘भूल जाने का अधिकार’ (RTBF) व्यक्तियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से अपने निजी डेटा को हटाने, डी-इंडेक्स करने या उस तक पहुँच को सीमित करने का अनुरोध करने में सक्षम बनाता है, जब ऐसी जानकारी पुरानी, ​​अप्रासंगिक, असंतुलित हो जाती है, या गोपनीयता और प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक होती है।
    • यह सूचनात्मक आत्मनिर्णय के सिद्धांत को दर्शाता है, जिससे व्यक्तियों को अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर अधिक नियंत्रण प्राप्त होता है।
  • वैश्विक विकास
    • यूरोपीय संघ का ढाँचा: RTBF का आधुनिक स्वरूप यूरोपीय संघ के न्याय न्यायालय के वर्ष 2014 के Google Spain मामले के निर्णय से सामने आया, जिसमें यह माना गया कि सर्च इंजन उन व्यक्तिगत डेटा के लिंक को हटाने के लिए बाध्य हैं, जो समय के साथ ‘अपर्याप्त, अप्रासंगिक या अब प्रासंगिक नहीं’ रह गए हैं।
      • यह सिद्धांत अब जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन’ के अनुच्छेद 17 के तहत संहिताबद्ध है, जो एक औपचारिक मिटाने का अधिकार’ प्रदान करता है।
        • हालाँकि, यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सार्वजनिक हित, अभिलेखीय उद्देश्यों और कानूनी दायित्वों जैसे अपवादों के अधीन है।

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    • अन्य अधिकार क्षेत्रों में हुए घटनाक्रम
      • कनाडा (2023): ‘फेडरल कोर्ट ऑफ अपील’ ने पुष्टि की कि गूगल जैसे सर्च इंजन फेडरल प्राइवेसी कानून (PIPEDA) के अधीन हैं, जिससे खोज परिणामों को डी-लिस्टिंग का मार्ग प्रशस्त हुआ।
        • वर्ष 2025 में, गोपनीयता आयुक्त ने एक ऐतिहासिक निर्णय में इसे लागू करते हुए, विशिष्ट नुकसान-आधारित मामलों में डी-इंडेक्सिंग के सीमित अधिकार को बरकरार रखा।
      • संयुक्त राज्य अमेरिका (कैलिफोर्निया): ऑनलाइन इरेजर लॉ (2015) ने प्रारंभ में नाबालिगों को उनके द्वारा पोस्ट किए गए डेटा को हटाने की अनुमति दी, जबकि डिलीट एक्ट (2023) ने वयस्कों को भी इसी तरह के अधिकार प्रदान किए, जिससे डेटा ब्रोकरों द्वारा रखे गए व्यक्तिगत डेटा को हटाने में सक्षम बनाया गया।
        • यूनाइटेड किंगडम, अर्जेंटीना और जापान जैसे देशों ने भी RTBF जैसी सुरक्षा विकसित की है, हालाँकि उनके दायरे और प्रवर्तन मॉडल भिन्न-भिन्न हैं।

भारत में ‘भूल जाने के अधिकार’ (RTBF) की व्याख्या और स्थिति

  • संवैधानिक आधार: भारत में RTBF अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार से उत्पन्न होती है, जैसा कि के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में मान्यता दी गई है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने RTBF को एक व्युत्पन्न अधिकार के रूप में स्वीकार किया, लेकिन स्पष्ट किया कि यह पूर्ण नहीं है और इसे निम्नलिखित के साथ संतुलित किया जाना चाहिए:-
      • वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता {अनुच्छेद-19(1)(a)}
      • जनहित और पारदर्शिता
      • कानूनी और अभिलेखीय आवश्यकताएँ।
  • वैधानिक एवं विनियामक स्थिति: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 डेटा मिटाने के अधिकार को मान्यता देता है, जिससे व्यक्तियों को अनावश्यक होने पर व्यक्तिगत डेटा को हटाने का अनुरोध करने की अनुमति मिलती है।
    • हालाँकि, निम्नलिखित मामलों में इसके अनुप्रयोग को लेकर अस्पष्टता बनी हुई है:
      • न्यायालय के अभिलेख
      • मीडिया अभिलेखागार
      • सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारियाँ।
    • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया नैतिकता संहिता) नियम, 2021 के अंतर्गत मध्यस्थों को निर्धारित समय सीमा के भीतर गैर-कानूनी या गोपनीयता का उल्लंघन करने वाली सामग्री को हटाने या उस तक पहुँच को नियंत्रित करना अनिवार्य बनाया गया है, जिससे प्रक्रियात्मक उपायों को सुदृढ़ता प्राप्त होती है।
  • भारत में न्यायिक दृष्टिकोण 
    • प्रारंभिक आधारशिलाएँ: आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में एकांतता का अधिकार’ (Right to be let Alone) को मान्यता दी गई, लेकिन यह भी माना गया कि सार्वजनिक अभिलेख (जैसे- न्यायालय के निर्णयों) प्रकाशन के लिए खुले रहते हैं।
    • पुट्टास्वामी-पश्चात न्यायशास्त्र
      • धर्मराज भानुशंकर दवे बनाम गुजरात राज्य (2017): इस मामले में बरी होने के रिकॉर्ड हटाने से इनकार कर दिया गया और न्यायिक रिकॉर्ड की पारदर्शिता पर जोर दिया गया।
      • ओडिसा उच्च न्यायालय (2020): एक सुव्यवस्थित कानूनी ढाँचे की आवश्यकता पर जोर दिया गया, विशेष रूप से रिवेंज पोर्न’ जैसे मामलों में, और साथ ही RTBF की जटिलता को भी स्वीकार किया गया।
      • दिल्ली उच्च न्यायालय (2021): किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आजीविका की रक्षा के लिए केस के विवरण को डी-इंडेक्स करने की अनुमति दी गई, जो निजता-समर्थक दृष्टिकोण का संकेत है।
      • सर्वोच्च न्यायालय (2022): संवेदनशील वैवाहिक विवादों में सर्च इंजन से व्यक्तिगत विवरण हटाने के लिए तंत्रों को निर्देशित किया, जिससे RTBF के दायरे का विस्तार हुआ।
      • केरल उच्च न्यायालय (2023): चल रही न्यायिक कार्यवाही में, ‘खुले न्याय’ और ‘जनहित’ का हवाला देते हुए RTBF से इनकार कर दिया गया।
      • हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (2024): एक दुष्कर्म के मामले में नामों को हटाने का आदेश दिया गया, यह मानते हुए कि बरी होने के बाद भी नामों का खुलासा जारी रहने से लंबे समय तक कलंक और अन्याय हो सकता है।

भूल जाने के अधिकार (RTBF) की आवश्यकता

  • डिजिटल स्थायित्व बनाम गोपनीयता का समाधान: डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में, सूचना लगभग स्थायी रूप से दिखाई देती है, जबकि पूर्व-डिजिटल युग में अभिलेख दुर्गम अभिलेखागारों में लुप्त हो जाते थे।
    • इससे डिजिटल स्थायित्व और निजता के अधिकार के बीच एक संरचनात्मक तनाव उत्पन्न होता है, जिसके चलते RTBF की आवश्यकता पड़ती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यक्तियों को ऐसे पुराने डेटा के संपर्क में अनिश्चित काल तक न रहना पड़े, जो अब अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।
  • व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और गरिमा का संरक्षण: पुरानी या भ्रामक जानकारी की निरंतर उपलब्धता के कारण होने वाली प्रतिष्ठा की क्षति को रोकने के लिए RTBF अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • दोषमुक्ति या समझौते के बाद भी, पुराने आरोप खोजे जा सकते हैं, जिससे व्यक्ति के गरिमा और निष्पक्ष पहचान पुनर्निर्माण के अधिकार का हनन होता है।
  • संवैधानिक समर्थन- अनुच्छेद-21 के तहत गोपनीयता का अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय ने के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में गोपनीयता को एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी, जिसमें व्यक्तिगत डेटा के प्रसार को नियंत्रित करने की क्षमता शामिल है।
    • RTBF इसी सिद्धांत पर आधारित है, जिसके तहत व्यक्तियों को यह अधिकार दिया जाता है कि डेटा साझा करने का उद्देश्य पूरा हो जाने के बाद उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए’
  • दीर्घकालिक सामाजिक और आर्थिक नुकसान की रोकथाम: ऑनलाइन डेटा की निरंतर उपस्थिति से ‘डिजिटल स्कर्स’ (डिजिटल निशान) बनते हैं, जिनके ठोस परिणाम होते हैं:
    • रोजगार संबंधी बाधाएँ: नियोक्ता अक्सर ऑनलाइन पृष्ठभूमि जाँच करते हैं, जिससे भर्ती संबंधी निर्णय प्रभावित होते हैं।
    • सामाजिक कलंक: पुरानी जानकारी पारिवारिक और सामाजिक संबंधों को नुकसान पहुँचा सकती है।
    • पुनर्वास संबंधी चुनौतियाँ: बरी हुए व्यक्तियों या पूर्व अपराधियों के लिए, RBTF अतीत की घटनाओं के अत्यधिक संपर्क को सीमित करके समाज में पुनः एकीकरण में सहायता करता है।
  • मीडिया ट्रायल’ पर रोक लगाना और निष्पक्षता सुनिश्चित करना: स्टर्लिंग बायोटेक बैंक धोखाधड़ी मामले जैसे विवादों सहित कई हाई-प्रोफाइल मामलों में, व्यक्तियों का तर्क है कि न्यायिक कार्यवाही समाप्त हो जाने के बावजूद, मीडिया में चल रही चर्चाएँ ऑनलाइन अनिश्चित काल तक जारी रहती हैं।
    • RBTF अपुष्ट या पूर्व-परीक्षण रिपोर्टिंग से उत्पन्न निरंतर प्रतिष्ठा को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद करता है, जिससे निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया का समर्थन होता है।

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  • व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग और अत्यधिक संग्रहण को रोकना: डिजिटल प्लेटफॉर्म, डेटा ब्रोकर और निगरानी-आधारित अर्थव्यवस्थाओं के उदय के साथ, व्यक्तिगत डेटा का अक्सर अत्यधिक संग्रहण, भंडारण और प्रसार होता है।
    • RBTF अनावश्यक संग्रहण और दुरुपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए एक तंत्र प्रदान करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि डेटा का उपयोग केवल वैध और उचित उद्देश्यों के लिए किया जाए।
  • डेटा संप्रभुता और सूचनात्मक स्व-निर्धारण को बढ़ावा देना: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 डेटा प्रिंसिपल अधिकारों की अवधारणा को प्रस्तुत करता है, जो इस बात पर बल देता है कि व्यक्तियों को अपने व्यक्तिगत डेटा के जीवनचक्र पर नियंत्रण होना चाहिए।
    • RBTF व्यक्तियों को अनावश्यक डेटा को मिटाने या अलग करने में सक्षम बनाकर डेटा संप्रभुता को मजबूत करता है, जिससे गोपनीयता को मानवीय गरिमा के साथ जोड़ा जा सके।

भूल जाने के अधिकार (RTBF) को लागू करने में प्रमुख चुनौतियाँ

  • मौलिक अधिकारों और संवैधानिक चिंताओं के मध्य संघर्ष: सबसे बड़ी बाधा अनुच्छेद-19(1)(a) (प्रेस की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद-21 (निजता और गरिमा का अधिकार) के बीच का टकराव है।
    • संदेसरा का प्रतिबंध आदेश मीडिया रिपोर्टिंग पर पूर्व प्रतिबंध और अप्रत्यक्ष सेंसरशिप को सक्षम बनाकर इस संघर्ष को और गहरा कर देता है।
    • यह जनहित को कमजोर करता है, विशेष रूप से सार्वजनिक धन से जुड़े बड़े वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में, जहाँ पारदर्शिता और जवाबदेही आवश्यक हैं।
    • यह ओपन जस्टिस’ का सिद्धांत को भी चुनौती देता है, जो न्यायिक कार्यवाही और तथ्यात्मक अभिलेखों तक सार्वजनिक पहुँच को अनिवार्य बनाता है।
  • प्रक्रियात्मक खामियाँ और कानूनी कार्यनीति: न्यायालयों में ये आदेश प्राप्त करने का तरीका कई व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न करता है:
    • जॉन डो’ (John Doe) ट्रैप: ‘अज्ञात व्यक्तियों’ के खिलाफ मामले दर्ज करके, वादी समाचार प्रकाशकों को बिना बताए ही अपनी बात को गुप्त रखने का आदेश प्राप्त कर लेते हैं। यह प्राकृतिक न्याय के मूल कानूनी सिद्धांत का उल्लंघन है, जिसके अनुसार दोनों पक्षों को सुना जाना चाहिए।
    • SLAPP मुकदमे (डराने-धमकाने वाली मुकदमेबाजी): शक्तिशाली संस्थाएँ अक्सर सार्वजनिक भागीदारी के विरुद्ध रणनीतिक मुकदमे (SLAPP) का प्रयोग करती हैं। इनका उद्देश्य मुकदमा जीतना नहीं होता, बल्कि पत्रकारों को कानूनी खर्चों और भय दिखाकर उन्हें सटीक रिपोर्टें हटाने के लिए मजबूर करना होता है।
    • उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों की अनदेखी:  न्यायालय अक्सर समाचार के “स्पष्ट रूप से झूठे” होने की जाँच किए बिना ही तत्काल अस्थायी आदेश (एकतरफा निषेधाज्ञा) जारी कर देते हैं। यह मुकदमे से पहले सेंसरशिप के संबंध में हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई चेतावनियों (जैसे- ब्लूमबर्ग के निर्णय) की अनदेखी करता है।
  • इतिहास का संरक्षण बनाम डिजिटल स्वच्छता
    • अतीत को पुनः लिखना: पत्रकारिता अभिलेखागार ‘इतिहास का पहला मसौदा’ होते हैं। यदि न्यायालय रिपोर्टों को हटाने का आदेश देते हैं, तो वे अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय अभिलेखों पर सेंसरशिप लगा रहे होते हैं।
      • इससे भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए यह समझना असंभव हो जाता है कि बड़े घोटाले या कानूनी मामले कैसे घटित हुए।
    • समझौता बनाम निर्दोषता: एक बड़ी चुनौती यह है कि समझौता मुकदमे को रोकने का एक सौदा होता है; यह निर्दोषता की घोषणा नहीं है। हालाँकि, RTBF का उपयोग पूर्ण दोषमुक्ति (‘क्लीन चिट’) के रूप में किया जा रहा है, जिससे सार्वजनिक अभिलेखों में भ्रम उत्पन्न होता है।
  • तकनीकी और वैश्विक वास्तविकता 
    • स्ट्राइसैंड इफेक्ट’ (Streisand Effect): जानकारी छिपाने की कोशिश अक्सर उसे और अधिक मशहूर बना देती है। हालाँकि न्यायालय गूगल को भारत में किसी लिंक को ‘डी-इंडेक्स’ करने का आदेश दे सकती है, लेकिन जानकारी सर्वर पर बनी रहती है और VPN के जरिए उस तक पहुँचा जा सकता है।
    • वैश्विक संप्रभुता: भारतीय दंड संहिता (IPC) या नए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की शक्ति केवल भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर है। यूट्यूब या मेटा जैसे वैश्विक प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री को चुनौती देने में जटिल अंतरराष्ट्रीय डेटा नियम शामिल होते हैं, जिन्हें भारतीय जिला न्यायालय हमेशा संभालने में सक्षम नहीं होते हैं।
  • मानक नियमों का अभाव
    • कोई विशिष्ट कानून नहीं: यद्यपि DPDP अधिनियम (2023) में ‘मिटाने’ का उल्लेख है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं करता कि इसे आपराधिक रिकॉर्ड या समाचारों पर कैसे लागू किया जाना चाहिए।
    • न्यायालयों के निर्णयों में असंगति: एक उच्च न्यायालय किसी बरी हुए व्यक्ति को RTBF प्रदान कर सकता है, जबकि दूसरा किसी अन्य अपराध के लिए इसे अस्वीकार कर सकता है। इस न्यायिक असंगति के कारण मीडिया संस्थानों के लिए यह जानना मुश्किल हो जाता है कि वे क्या प्रकाशित कर सकते हैं और क्या नहीं।

आगे की राह

  • स्पष्ट और व्यापक कानूनी ढाँचा लागू करना: भारत को RTBF के मामले में न्यायिक व्याख्या से हटकर, इसे स्पष्ट वैधानिक मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। हालाँकि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023′ इस दिशा में एक आधार प्रदान करता है, लेकिन समाचार अभिलेखागार (News Archives) के संबंध में यह अभी भी अस्पष्ट बना हुआ है।
    • दायरा और प्रयोज्यता परिभाषित करना: कानून को निजी व्यक्तिगत डेटा (जिसे आसानी से मिटाया जा सके) और सार्वजनिक अभिलेखों (जो व्यापक सामाजिक उद्देश्य की पूर्ति करते हैं) के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए।
    • हटाने के विशिष्ट आधार: स्पष्ट मापदंड निर्धारित किए जाने चाहिए, जैसे कि जानकारी का अप्रासंगिक या असंगत होना, अथवा उससे स्पष्ट रूप से नुकसान पहुँचने की संभावना, ताकि इस कानून का उपयोग असुविधाजनक सच्चाइयों को छिपाने के लिए न किया जा सके।
    • अपवादों को औपचारिक रूप देना: वैध पत्रकारिता, ऐतिहासिक शोध और कानूनी अभिलेखों को सार्वजनिक अभिलेखों की अखंडता बनाए रखने के लिए हटाने’ के अनुरोधों से कानूनी रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए।
  • एक स्वतंत्र न्यायनिर्णयन तंत्र का गठन: स्थानीय दीवानी न्यायालयों द्वारा व्यापक प्रतिबंधात्मक आदेश” जारी करने से रोकने के लिए, एक सशक्त डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड (DPB) को RTBF दावों के लिए प्राथमिक निकाय होना चाहिए।
    • विशेषज्ञता: तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञों से संबद्ध एक बोर्ड समयबद्ध और तर्कसंगत निर्णय प्रदान कर सकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि डेटा हटाने की कार्रवाई मनमानी न हो।
    • न्यायिक भार को कम करना: इससे प्रक्रिया सुव्यवस्थित होगी, जिससे न्यायालय सर्च नतीजों को ‘हटाने’ की प्रत्येक अलग-अलग अनुरोध के बजाय, संवैधानिक अपीलों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगी।

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  • पत्रकारिता की स्वतंत्रता और अभिलेखीय अखंडता की रक्षा: RTBF में ऐसे मजबूत सुरक्षा उपाय शामिल होने चाहिए, जो यह सुनिश्चित करें कि यह डिजिटल रूप से किताबों को नष्ट करने का जरिया न बन जाए।
    • व्यापक निष्कासन नहीं: सुरक्षा उपायों से पत्रकारिता अभिलेखागारों के पूर्ण विलोपन को रोका जाना चाहिए। विलोपन के बजाय, न्यायालयों को मूल रिपोर्ट को अभिलेखागार में सुरक्षित रखते हुए डी-इंडेक्सिंग (सामग्री को खोज से बाहर करना) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • मध्यस्थों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश विकसित करना: गूगल और मेटा जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को इन अनुरोधों को निष्पक्ष रूप से सँभालने के लिए नियमों का एक मानकीकृत फ्रेमवर्क होना चाहिए।
    • सूचना और हटाने के मानक: एक पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें प्लेटफॉर्म यह बताए कि सामग्री क्यों हटाई गई या रखी गई।
    • अति-अनुपालन की रोकथाम: स्पष्ट नियमों के बिना, प्लेटफॉर्म केवल कानूनी दायित्व या सरकार से जुर्माने से बचने के लिए मनमानी सेंसरशिप में शामिल हो सकते हैं।
  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों और उचित प्रक्रिया को सुनिश्चित करना: संदेसरा मामले ने प्राकृतिक न्याय की कमी को उजागर किया।
    • पूर्व सूचना: मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को किसी भी सामग्री को हटाने का आदेश लागू करने से पहले सूचित किया जाए और उन्हें सुनवाई का अवसर दिया जाए।
    • जॉन डो’ आदेशों के दुरुपयोग को समाप्त करना: न्यायालयों को ‘अज्ञात व्यक्ति’ के विरुद्ध मुकदमों के इस्तेमाल पर तब रोक लगानी चाहिए, जब प्रकाशकों की पहचान आसानी से की जा सकती हो; ऐसा करके यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि वादी अपने कानूनी विरोधियों को दरकिनार न कर सकें।
  • डेटा न्यूनीकरण और जवाबदेही को बढ़ावा देना: डेटा एकत्र करने वाली संस्थाओं (निजी और सरकारी दोनों) को उद्देश्य और भंडारण सीमा के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
    • आवधिक समीक्षा: संगठनों के पास ऐसी नीतियाँ होनी चाहिए, जिनके तहत उस डेटा की समीक्षा और उसे हटाया जा सके, जो उस उद्देश्य के लिए आवश्यक नहीं रह गया है, जिसके लिए इसे एकत्र किया गया था।
    • जवाबदेही: संस्थाओं को संवेदनशील डेटा को जरूरत से ज्यादा समय तक अपने पास रखने के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, जिससे ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) से जुड़ी गुजारिशों की आवश्यकता ही कम हो जाती है।
  • मानहानि, सुधार और प्रासंगिक अद्यतन विकल्प: जहाँ रिपोर्टिंग झूठी या भ्रामक हो, वहाँ मानहानि कानून, सुधार, उत्तर देने का अधिकार और प्रासंगिक अद्यतन जैसे उपाय मिटाने की तुलना में बेहतर हैं।
    • यह गलतियों को दूर करते हुए सार्वजनिक इतिहास को पुनः लिखने या वैध पत्रकारिता को दबाने के लिए RTBF के दुरुपयोग को रोकता है।
  • व्यापक रूप से हटाने के बजाय कम प्रतिबंधात्मक विकल्पों को प्राथमिकता देना: न्यायालयों को कम-से-कम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाना चाहिए, जिसमें अद्यतन, गुमनामीकरण, संपादन, प्रासंगिक अस्वीकरण या सीमित डी-इंडेक्सिंग को हटाने की तुलना में प्राथमिकता दी जाए।
    • ऐसे संतुलित उपाय निजता और गरिमा को प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक अभिलेखों के संरक्षण के साथ संतुलित करते हैं।
  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से सीखना: भारत को यूरोपीय संघ के GDPR के सफल तत्त्वों को अपनाना चाहिए, विशेष रूप से:-
    • मिटाने का अधिकार’ (Right to Erasure) मानक: अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों में पहले से ही परीक्षित सुस्पष्ट मानकों का उपयोग करना।
    • शिकायत निवारण: ऐसे संस्थागत तंत्र बनाना, जो नागरिकों को महँगे मुकदमेबाजी के बिना अपने ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ पर विवाद करने की अनुमति देना।
  • एक समान संतुलन परीक्षण को संस्थागत रूप देना: असंगत और मनमाने परिणामों से बचने के लिए, न्यायालयों या प्रस्तावित डेटा संरक्षण बोर्ड को निम्नलिखित पर आधारित एक संरचित संतुलन परीक्षण अपनाना चाहिए:-
    • सूचना की प्रकृति – क्या यह पूरी तरह से निजी है या सार्वजनिक मामलों से जुड़ी है?
    • व्यक्ति की स्थिति – निजी नागरिक या प्रसिद्ध व्यक्ति/आर्थिक अपराधी।
    • कार्यवाही का चरण और परिणाम – आरोप, मुकदमा, बरी होना, समझौता, दोषसिद्धि।
    • निरंतर सार्वजनिक हित – क्या समाज को अभी भी जानकारी तक पहुँच का वैध हित है?
    • हुए नुकसान की सीमा – प्रतिष्ठा, व्यावसायिक, मनोवैज्ञानिक या गोपनीयता से संबंधित।
    • उपलब्ध न्यूनतम प्रतिबंधात्मक उपाय – क्या हटाने के बजाय सुधार, संपादन या डी-इंडेक्सिंग पर्याप्त हो सकते हैं?

निष्कर्ष

RTBF की बहस निजता बनाम प्रेस की स्वतंत्रता से कहीं आगे जाती है, क्योंकि डिजिटल प्लेटफॉर्म सूचना और सार्वजनिक स्मृति तक पहुँच को आकार देते हैं। यह डिजिटल संवैधानिकवाद की माँग करती है, जो यह सुनिश्चित करे कि गरिमा, पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उचित प्रक्रिया राज्य तथा निजी मध्यस्थों दोनों का मार्गदर्शन करें।

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