संदर्भ
वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने नई दिल्ली में बड़े पैमाने पर औद्योगिक उपयोग के लिए अपनी नवोन्मेषी प्रौद्योगिकी, जिसका शीर्षक है ‘लिग्नोसेल्युलोजिक बायोमास से बायो-बिटुमेन – खेत के अवशेषों से सड़कों तक’ (Bio-Bitumen from Lignocellulosic Biomass – From Farm Residue to Roads) है, के प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम का आयोजन किया।
संबंधित तथ्य
- प्रमुख सहयोग: CSIR-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI) और CSIR-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP)
बायो-बिटुमेन के बारे में
- बायो-बिटुमेन, सड़क निर्माण में प्रयोग होने वाले पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन का एक नवीकरणीय और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प है।
- इसे बायोमास स्रोतों, जैसे कि कृषि अवशेषों, पौधों की सामग्री और जैविक कचरे से प्राप्त किया जाता है।
- स्रोत
- लिग्निन-समृद्ध बायोमास और बायो-आधारित तेल।
- चावल का छिलका, पुआल, लकड़ी का कचरा, शैवाल और भोजन का अपशिष्ट।
- उत्पादन तकनीक
- बायो-बिटुमेन का उत्पादन थर्मोकेमिकल और बायोकेमिकल प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है।
- महत्त्वपूर्ण तरीकों में पायरोलिसिस, हाइड्रोथर्मल द्रवीकरण और बायोमास रूपांतरण शामिल हैं।
- ये प्रक्रियाएँ बायोमास को बायो-ऑयल में बदल देती हैं, जिसे परिष्कृत करके बिटुमेन जैसा पदार्थ बनाया जाता है।
बिटुमेन के बारे में
- बिटुमेन एक काला पदार्थ है, जो मुख्य रूप से कच्चे तेल से प्राप्त होता है।
- इसमें जटिल हाइड्रोकार्बन होते हैं और इसमें कैल्शियम, लोहा, सल्फर और ऑक्सीजन जैसे तत्त्व शामिल होते हैं।
- बिटुमेन अपनी वॉटरप्रूफिंग और चिपकने वाले गुणों के लिए प्रसिद्ध है।
- यह इसे निर्माण क्षेत्र में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सामग्री बनाता है।
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अनुप्रयोग
- सड़क निर्माण और डामर पेवमेंट में उपयोग: बायो-बिटुमेन का उपयोग सड़क निर्माण और ‘एस्फाल्ट पेवमेंट’ (Asphalt Pavements) में एक बाइंडिंग सामग्री (जोड़ने वाले पदार्थ) के रूप में किया जाता है, जहाँ यह पारंपरिक बिटुमेन को पूर्ण या आंशिक रूप से प्रतिस्थापित करता है।
- छत निर्माण और वॉटरप्रूफिंग में अनुप्रयोग: अपने आसंजक (Adhesive) और जल-प्रतिरोधी गुणों के कारण, बायो-बिटुमेन का उपयोग छत की शीट्स (Roofing Sheets), सीलेंट (Sealants) और वॉटरप्रूफिंग सामग्रियों में किया जाता है।
- पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के विकल्प के रूप में: फॉर्मूलेशन और प्रदर्शन की आवश्यकताओं के आधार पर, बायो-बिटुमेन, पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के आंशिक या पूर्ण विकल्प के रूप में कार्य कर सकता है।
चुनौतियाँ
- उच्च उत्पादन लागत: उन्नत प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों और बड़े पैमाने पर उत्पादन की कमी के कारण, पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन की तुलना में बायो-बिटुमेन की उत्पादन लागत अधिक है।
- उदाहरण के लिए: चावल की भूसी जैसे कृषि अवशेषों को बायो-ऑयल में बदलने के लिए आवश्यक पायरोलिसिस प्लांट (Pyrolysis plants) में उच्च पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है, जिससे अंतिम उत्पाद पारंपरिक बिटुमेन की तुलना में महँगा हो जाता है।
- प्रदर्शन में भिन्नता: बायो-बिटुमेन की गुणवत्ता और प्रदर्शन इस्तेमाल किए गए बायोमास के प्रकार और उत्पादन विधि के आधार पर भिन्न होते हैं।
- उदाहरण के लिए: लिग्निन (लकड़ी के कचरे) से प्राप्त बायो-बिटुमेन, खाद्य अपशिष्ट या शैवाल (Algae) से उत्पादित बिटुमेन की तुलना में बेहतर बाइंडिंग गुण दिखा सकता है, जिससे सड़कों के स्थायित्व में अनिश्चितता पैदा होती है।
- सीमित व्यावसायीकरण: स्थापित आपूर्ति शृंखलाओं और उद्योग के भरोसे की कमी के कारण बायो-बिटुमेन को बड़े पैमाने पर अपनाने में बाधा आ रही है।
- उदाहरण के लिए: हालाँकि नीदरलैंड जैसे देशों ने बायो-डामर सड़कों के प्रयोग किए हैं, लेकिन अधिकांश परियोजनाएँ अभी भी पायलट चरण (प्रायोगिक स्तर) पर ही हैं और व्यापक व्यावसायिक उपयोग तक नहीं पहुँच पाई हैं।
- मानकीकरण और स्थायित्व परीक्षण का अभाव: बायो-बिटुमेन के लिए समान मानकों, विशिष्टताओं और दीर्घकालिक प्रदर्शन डेटा की अत्यंत आवश्यकता है।
- उदाहरण के लिए: भारत में, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) जैसे संस्थानों द्वारा शोध जारी है, लेकिन विभिन्न जलवायु परिस्थितियों (जैसे मानसून, अत्यधिक गर्मी) में इसके दीर्घकालिक स्थायित्व का परीक्षण अभी भी किया जा रहा है।
महत्त्व
- प्रतिस्थापन की क्षमता: बायो-बिटुमेन प्रदर्शन से समझौता किए बिना पारंपरिक बिटुमेन (डामर) के 30 प्रतिशत तक हिस्से को प्रतिस्थापित कर सकता है। इसने कम कार्बन उत्सर्जन के साथ-साथ अपनी मजबूती और टिकाऊपन का भी प्रदर्शन किया है।
- जलवायु लक्ष्यों और राष्ट्रीय पहलों के साथ तालमेल: बायो-बिटुमेन को अपनाना भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं, नेट जीरो (Net Zero) लक्ष्यों और आत्मनिर्भर भारत, राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा मिशन (National Bio-Energy Mission) तथा चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसे प्रमुख ढाँचों के साथ मजबूती से मेल खाता है।
- किसानों के लिए आय सृजन और पर्यावरणीय लाभ: उच्च-मूल्य वाले बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) के निर्माण में कृषि अवशेषों (पराली आदि) का उपयोग किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर प्रदान करता है। साथ ही, यह पराली जलाने की समस्या और पर्यावरणीय प्रदूषण को कम करने में भी सहायक है।
- आयात निर्भरता में कमी: पारंपरिक बिटुमेन के स्थान पर आंशिक रूप से बायो-बिटुमेन का उपयोग करने से आयात पर निर्भरता में काफी कमी आएगी। इससे आर्थिक लचीलापन मजबूत होगा और यह सुनिश्चित होगा कि बुनियादी ढाँचे का विकास वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से सुरक्षित रहे।
- उदाहरण के लिए: भारत सालाना लगभग 88 लाख टन बिटुमेन की खपत करता है, जिसमें से लगभग 50% से 58% आयात किया जाता है, जिसकी लागत 25,000 करोड़ रुपये से 30,000 करोड़ रुपये के बीच आती है।