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प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय का COP15

1 Apr 2026

संदर्भ

ब्राजील में प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) के COP15 (मार्च 2026) में प्रवासी प्रजातियों की आबादी में चिंताजनक वैश्विक गिरावट को रेखांकित करते हुए नई प्रजातियों को संरक्षण सूचियों में शामिल किया गया।

CMS COP15 के बारे में

  • प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) का पक्षकार सम्मेलन (COP) इसका सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है, जो प्रत्येक तीन वर्ष में प्राथमिकताएँ और बजट निर्धारित करने के लिए बैठक करता है।
  • मेजबान एवं स्थान: 15वाँ COP (COP15) कैम्पो ग्रांडे, ब्राजील में आयोजित हुआ, जिसमें 130 से अधिक सदस्य देशों ने भाग लिया।
  • CMS COP15 की थीम: कनेक्टिंग नेचर टू सस्टेन लाइफ”, जिसमें आवासीय संपर्कता, प्रवासन गलियारों और समन्वित वैश्विक संरक्षण प्रयासों पर बल दिया गया।
  • CMS COP15 (2026) के प्रमुख परिणाम
    • प्रजातियों की सूचीकरण: 40 से अधिक प्रवासी प्रजातियों को CMS परिशिष्टों में जोड़ा गया, जिनमें चीता (जिम्बाब्वे), धारीदार लकड़बग्घा, ऊदबिलाव और ‘स्नोई’ उल्लू शामिल हैं, जिससे वैश्विक संरक्षण कवरेज सुदृढ़ हुआ।
    • समुद्री संरक्षण: ग्रेट और स्कैलप्ड हैमरहेड शार्क को परिशिष्ट I में शामिल किया गया, जबकि पैटागोनियन नैरोनोज स्मूथहाउंड को परिशिष्ट II में जोड़ा गया, जिससे समुद्री प्रजातियों का संरक्षण मजबूत हुआ।
    • क्षेत्रीय कार्य योजनाएँ: अमेजन क्षेत्र के प्रवासी कैटफिश के लिए एक क्षेत्रीय कार्य योजना को अपनाया गया, साथ ही अमेरिका क्षेत्र में जगुआर जैसी प्रजातियों के लिए लक्षित संरक्षण पहलें भी की गईं।
    • अवैध व्यापार नियंत्रण: प्रवासी प्रजातियों के अवैध और अस्थिर दोहन को रोकने के लिए एक नई वैश्विक पहल शुरू की गई, जो जैव विविधता के लिए एक प्रमुख खतरा है।
    • जलवायु और संपर्कता: इन चर्चाओं में सड़कें, बाँध जैसी अवसंरचनाओं के प्रवासन मार्गों पर प्रभाव को रेखांकित किया गया और संरक्षण रणनीतियों में आवासीय संपर्कता को एकीकृत करने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) के बारे में

  • CMS एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवासी जीवों और उनके आवासों का संरक्षण करना है।
  • उत्पत्ति: इसे वर्ष 1979 में जर्मनी के बॉन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के तत्त्वावधान में हस्ताक्षरित किया गया था और इसे बॉन अभिसमय भी कहा जाता है।
  • मुख्य उद्देश्य
    • सीमापार संरक्षण: राष्ट्रीय सीमाओं को पार करने वाली प्रजातियों के लिए समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई सुनिश्चित करना।
    • आवास संरक्षण: प्रवासन मार्गों और पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन को बढ़ावा देना।
  • प्रजाति सूचीकरण तंत्र
    • परिशिष्ट I (संकटग्रस्त प्रजातियाँ): इसमें वे प्रवासी प्रजातियाँ शामिल हैं, जिन्हें वन्य में विलुप्त, अति संकटग्रस्त से  संकटग्रस्त (IUCN) के रूप में आँका गया है; यह कड़े संरक्षण उपायों और सीमापार संरक्षण को अनिवार्य करता है।
    • परिशिष्ट II (गंभीर स्थिति): इसमें निकट संकटग्रस्त से अति संकटग्रस्त तक की प्रजातियाँ शामिल होती हैं; यह उनके संरक्षण और प्रबंधन हेतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समझौतों को प्रोत्साहित करता है।
  • पहलें और साधन
    • समझौते एवं MoUs: CMS प्रजातियों के संरक्षण के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते तथा गैर-बाध्यकारी समझौता ज्ञापन (MoUs) को प्रोत्साहित करता है।
    • वैज्ञानिक आकलन: यह स्टेट ऑफ माइग्रेटरी स्पीशीज रिपोर्ट (2026) जैसे वैश्विक प्रतिवेदन प्रकाशित करता है, जो साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण में सहायक होते हैं।

स्टेट ऑफ माइग्रेटरी स्पीशीज रिपोर्ट (2026) के मुख्य बिंदु

  • जनसंख्या में गिरावट: CMS में सूचीबद्ध लगभग 49% प्रवासी प्रजातियाँ घट रही हैं, जो व्यापक पारिस्थितिकी दबाव को दर्शाता है; उदाहरण के लिए, भारत के तटीय क्षेत्रों में कई तटीय पक्षी (Shorebird) आबादियाँ दीर्घकालिक गिरावट दिखा रही हैं।
  • विलुप्ति का बढ़ता जोखिम: लगभग 24% प्रवासी प्रजातियाँ विलुप्ति के खतरे का सामना कर रही हैं, जिनमें उत्तरी हिंद महासागर के शार्क और रे जैसी समुद्री प्रजातियाँ शामिल हैं, जो बढ़ते मानवजनित दबाव को दर्शाती हैं।
  • बढ़ते खतरे: प्रमुख खतरों में अत्यधिक दोहन, आवास हानि और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं; उदाहरण के लिए, मत्स्यपालन में बायकैच प्रवासी समुद्री प्रजातियों जैसे कछुए और शार्क को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
  • आवासीय संवेदनशीलता: प्रवासी प्रजातियों के लिए महत्त्वपूर्ण लगभग 47% प्रमुख जैव विविधता क्षेत्र (KBAs) संरक्षित क्षेत्रों के बाहर स्थित हैं, जैसे प्रवासी पक्षियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि आवास।
  • रोग का प्रभाव: H5N1 एवियन इन्फ्लुएंजा का महाद्वीपों में प्रसार कई प्रवासी प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है, जो वन्यजीव आबादी के लिए उभरते जैविक खतरों को दर्शाता है।
  • मिश्रित संरक्षण परिणाम: जहाँ दक्षिण एशिया में गिद्धों जैसी कुछ प्रजातियाँ लक्षित संरक्षण के कारण धीरे-धीरे सुधार दिखा रही हैं, वहीं कई अन्य प्रजातियाँ लगातार घट रही हैं, जो संरक्षण प्रयासों की असमान सफलता को उजागर करता है।

IUCN स्थिति में परिवर्तन वाली प्रमुख प्रजातियाँ

वैज्ञानिक नाम प्रजातियों के नाम  CMS परिशिष्ट IUCN की स्थिति में परिवर्तन
एंसर सिग्नोइड्स स्वान गूज (Swan Goose) I/II सुभेद्य → संकटग्रस्त
असारकॉर्निस स्कुटुलाटा व्हाइट विंगड डक II संकटग्रस्त → अति संकटग्रस्त
हिरुंडो एट्रोकेरुलिया ब्लू स्वालो I/II सुभेद्य → संकटग्रस्त
ओटिस टार्दा ग्रेट बस्टर्ड I/II सुभेद्य → संकटग्रस्त
एनोएक्सीप्रिस्टिस कुस्पिडाटा नैरो सॉफिश I/II संकटग्रस्त → अति संकटग्रस्त

CMS का महत्त्व

  • वैश्विक समन्वय: CMS उन प्रजातियों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सक्षम बनाता है, जो अनेक अधिकार-क्षेत्रों को पार करती हैं।
  • जैव विविधता संरक्षण: यह पारिस्थितिकी रूप से महत्त्वपूर्ण प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण में सहायक है, जिससे पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रतिक्रिया: यह जलवायु परिवर्तन से प्रभावित प्रवासन गलियारों की सुरक्षा के माध्यम से अनुकूलन रणनीतियों को समर्थन प्रदान करता है।

प्रवासी प्रजातियों के दोहन पर वैश्विक पहल (GTI)

  • GTI एक सहयोगात्मक वैश्विक पहल है, जिसमें सरकारें, संरक्षण संगठन और स्थानीय समुदाय शामिल हैं, जिसका उद्देश्य प्रवासी प्रजातियों के अवैध और अस्थिर दोहन का समाधान करना है।
  • प्रारंभ: CMS COP15 में
  • उद्देश्य: GTI का उद्देश्य देशों को जैव विविधता प्रतिबद्धताओं की प्राप्ति में सहायता करना है, जिसमें कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचे के अंतर्गत प्रजातियों की पुनर्बहाली और विलुप्ति की रोकथाम शामिल है।
  • मुख्य क्षेत्र
    • डेटा एवं निगरानी: प्रवासी प्रजातियों के अवैध और अस्थिर उपयोग की ट्रैकिंग हेतु डेटा संग्रह प्रणालियों को सुदृढ़ करना।
    • विधिक ढाँचे: प्रभावी वन्यजीव संरक्षण और प्रवर्तन के लिए राष्ट्रीय कानूनों और नीतियों को मजबूत करना।
    • सामुदायिक सहभागिता: स्थानीय समुदायों की भागीदारी को बढ़ावा देना, ताकि संरक्षण और सतत् प्रथाओं को प्रोत्साहित किया जा सके।
  • जागरूकता निर्माण: प्रवासी प्रजातियों के प्रति खतरों और संरक्षण आवश्यकताओं के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाना।
  • साझेदार संगठन
    • जैव विविधता अभिसमय, 1992: यह रियो अर्थ समिट में अपनाई गई एक वैश्विक संधि है, जिसका उद्देश्य जैव विविधता का संरक्षण, सतत् उपयोग और आनुवंशिक संसाधनों के लाभों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है।
    • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP, 1972): यह संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख पर्यावरणीय संस्था है, जो वैश्विक पर्यावरणीय एजेंडा निर्धारित करती है और सतत् विकास को बढ़ावा देती है।
    • यूएनईपी विश्व संरक्षण निगरानी केंद्र (1988): यह एक विशेषीकृत केंद्र है, जो वैश्विक संरक्षण प्रयासों के लिए जैव विविधता डेटा, विश्लेषण और निर्णय-सहायता उपकरण प्रदान करता है।
  • विश्व वन्यजीव कोष (WWF, 1961): यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है, जो वन्यजीव संरक्षण, आवास संरक्षण और सतत् विकास हेतु कार्य करता है।
  • ट्रैफिक (TRAFFIC, 1976): यह एक वैश्विक नेटवर्क है, जो अवैध वन्यजीव व्यापार की निगरानी और नियंत्रण तथा जैव विविधता के सतत् उपयोग को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

निष्कर्ष

CMS COP15 वैश्विक संरक्षण ढाँचों को सुदृढ़ करने की तात्कालिक आवश्यकता को रेखांकित करता है, क्योंकि प्रवासी प्रजातियों के प्रति बढ़ते खतरों के समाधान हेतु समन्वित, वैज्ञानिक-आधारित और सीमापार नीतिगत प्रतिक्रियाएँ आवश्यक हैं।

प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय का COP15

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