संदर्भ
बढ़ती गर्मी और AC की बढ़ती माँग के साथ, ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ भारतीय शहरों को आरामदायक बनाए रखने का एक माध्यम प्रदान करती है, साथ ही विद्युत की खपत और कार्बन उत्सर्जन को कम करती है।
संबंधित तथ्य
- GIFT सिटी पायलट परिणाम: गुजरात के GIFT सिटी में ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ से 6,100 मेगावाट विद्युत माँग में कटौती, वार्षिक 7,850 GWh की बचत, और प्रति वर्ष 6.6 मिलियन टन CO₂ उत्सर्जन की बचत की संभावना का अनुमान है।
शीतलन रणनीति में भारत द्वारा की गई पहलें:
- इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP, 2019): विश्व की पहली राष्ट्रीय स्तर की शीतलन रणनीति; वर्ष 2037–38 तक शीतलन माँग में 20–25% और रेफ्रिजरेंट उपयोग में 25–30% कटौती का लक्ष्य।
- ऊर्जा दक्षता बढ़ाने पर राष्ट्रीय मिशन (NMEEE): कुशल औद्योगिक शीतलन और ऊर्जा-बचत तकनीकों को बढ़ावा देता है।
- इको-निवास संहिता (भवन कोड), 2018: आवासीय भवनों के लिए तापीय संतुलन मानकों और निष्क्रिय डिजाइन को अनिवार्य बनाता है।
- कूल रूफ प्रोग्राम (तेलंगाना, 2023): उच्च परावर्तन वाले कूल रूफ के व्यापक उपयोग को बढ़ावा देकर शहरी ऊष्मा और शीतलन ऊर्जा माँग को कम करने हेतु।
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डिस्ट्रिक्ट कूलिंग के बारे में
- डिस्ट्रिक्ट कूलिंग एक केंद्रीकृत प्रणाली है, जो इमारतों के एक समूह को एयर-कंडीशनिंग की सुविधा प्रदान करती है, जैसे पूरे मोहल्ले या परिसर के लिए एक साझा एयर-कंडीशनर।
- डिस्ट्रिक्ट कूलिंग एक उपयोगिता सेवा (यूटिलिटी) की तरह कार्य करती है, जिसमें एकमुश्त कनेक्शन शुल्क, एक निश्चित माँग शुल्क और एक परिवर्तनीय उपभोग शुल्क से राजस्व प्राप्त होता है।
यह कैसे कार्य करती है?
- ठंडे जल का उत्पादन: इसमें एक बड़ा केंद्रीय संयंत्र ठंडा जल तैयार करता है और उसे इंसुलेटेड भूमिगत पाइपों के माध्यम से कई इमारतों तक वितरित करता है, जैसे- पाइप्ड प्राकृतिक गैस या विद्युत जैसी सार्वजनिक उपयोगिता सेवा।
- इनडोर कूलिंग प्रक्रिया: प्रत्येक इमारत के अंदर यह जल हीट एक्सचेंजर से होकर गुजरता है, गर्मी को अवशोषित करके अंदर की हवा को ठंडा करता है, फिर थोड़ा गर्म होकर केंद्रीय संयंत्र में वापस लौटता है, जहाँ इसे फिर से ठंडा कर नेटवर्क में भेज दिया जाता है।
- ये नेटवर्क से सीधे ‘कूलिंग ऐज ए सर्विस’ प्राप्त करते हैं।
- डिस्ट्रिक्ट कूलिंग टैरिफ संरचना: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग में सामान्यतः एकमुश्त कनेक्शन शुल्क, अधिकतम शीतलन क्षमता के लिए एक निश्चित माँग शुल्क, और वास्तविक ऊर्जा खपत के आधार पर उपयोग शुल्क लिया जाता है।

चुनौतियाँ
- उच्च पूँजी लागत: संयंत्रों, वितरण नेटवर्क और थर्मल स्टोरेज के लिए बड़े स्तर पर प्रारंभिक निवेश की आवश्यकता।
- निश्चित मांग शुल्क: भवनों में कम उपयोग होने पर भी ग्राहकों को आरक्षित क्षमता के लिए भुगतान करना पड़ता है, जिससे बिल अनिश्चित हो सकते हैं।
- उचित आकार निर्धारण और डिजाइन संबंधी समस्याएँ: शीतलन आवश्यकता का अधिक अनुमान या अक्षम आंतरिक प्रणालियाँ लागत बढ़ा सकती हैं।
- जल उपयोग संबंधी चिंताएँ: कूलिंग टॉवरों को जल की आवश्यकता होती है, जो यदि प्रभावी ढंग से प्रबंधित न किया जाए तो स्थानीय जल संसाधनों पर दबाव डाल सकता है।
लाभ
- उच्च-दक्षता शीतलन: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग संयंत्र बड़े, उच्च-दक्षता चिलर और कूलिंग टॉवरों का उपयोग करते हैं, जो व्यक्तिगत भवन प्रणालियों की तुलना में प्रति इकाई विद्युत पर अधिक शीतलन प्रदान करते हैं।
- उदाहरण के लिए: कई प्रणालियों में थर्मल स्टोरेज शामिल होता है, जो रात में 20–40% शीतलन का उत्पादन करता है, जब माँग और टैरिफ कम होते हैं।
- दक्षता और ऊर्जा बचत: अच्छी तरह संचालित डिस्ट्रिक्ट कूलिंग प्रणालियाँ स्वतंत्र भवन की तुलना में दोगुनी दक्षता से कार्य कर सकती हैं।
- उदाहरण के लिए: ये शीतलन के लिए विद्युत उपयोग को 30–50% तक और उच्चतम ग्रिड माँग को 20–30% तक कम करती हैं।
- पर्यावरणीय लाभ: कम विद्युत उपयोग से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 15–40% की कटौती हो सकती है, केंद्रीकृत उपकरण भवनों में रेफ्रिजरेंट की मात्रा को 80% तक कम करते हैं, और बाहरी एसी इकाइयाँ शहरी गर्मी को घटाने में मदद करती हैं, जहाँ विदेशों में कुछ क्षेत्रों में स्थानीय तापमान में 1–2°C तक की गिरावट देखी गई है।
- ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ में जल दक्षता: ‘डिस्ट्रिक्ट कूलिंग’ एक क्लोज्ड-लूप प्रणाली का उपयोग करती है, जिसमें बहुत कम जल की खपत होती है—लगभग 10,000-टन संयंत्र के लिए 1 किलोलीटर जल और केंद्रीकृत बड़े पैमाने के डिजाइन के कारण उपचारित सीवेज या अपशिष्ट जल का भी उपयोग किया जा सकता है।
- भारत की नेशनल कूलिंग एक्शन प्लान के साथ संरेखण: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग विद्युत उपयोग को कम करती है और कुछ माँग को रात के समय स्थानांतरित करती है, जिससे ग्रिड पर दबाव कम होता है, ऊर्जा सुरक्षा में सुधार होता है और हीटवेव के दौरान विद्युत बाधित होने का जोखिम घटता है।
- जलवायु और शहरी लाभ: केंद्रीकृत डिस्ट्रिक्ट कूलिंग उत्सर्जन को कम करती है, कम-GWP रेफ्रिजरेंट के उपयोग की अनुमति देती है, जिससे भारत की किगाली प्रतिबद्धताओं को समर्थन मिलता है और शहरों में सेवाओं, आईटी, अस्पतालों और डेटा सेंटरों के लिए विश्वसनीय शीतलन प्रदान करती है।
- डिस्ट्रिक्ट कूलिंग के लिए सबसे उपयुक्त क्षेत्र: डिस्ट्रिक्ट कूलिंग उन क्षेत्रों में सबसे प्रभावी होती है, जहाँ शीतलन की माँग अधिक, सघन और पूर्वानुमेय होती है, जैसे वाणिज्यिक जिले, ट्रांजिट कॉरिडोर, हवाई अड्डे, अस्पताल, विश्वविद्यालय तथा आईटी पार्क।
आगे की राह
- कूलिंग जोन का सीमांकन: शहरी प्राधिकरणों को मास्टर प्लान में डिस्ट्रिक्ट कूलिंग जोन चिह्नित करने चाहिए, संयंत्रों और पाइप कॉरिडोर के लिए भूमि आरक्षित करनी चाहिए और भूमिगत उपयोगिताओं का समन्वय करना चाहिए।
- नगर निकायों की भूमिका: नगर निकायों को सशक्त और मजबूत बनाने की आवश्यकता है ताकि वे स्पष्ट रियायत नियम, सेवा मानक और दीर्घकालिक ढाँचे लागू कर सकें, जिससे निजी क्षेत्र को निवेश की वसूली का भरोसा मिल सके।
- नियामक और तकनीकी समर्थन: राज्य नियामक और DISCOMs शीतलन भार को रात में स्थानांतरित कर सकते हैं, इसे टैरिफ से जोड़ सकते हैं और उच्चतम क्षमता का मूल्यांकन कर सकते हैं, जबकि केंद्रीय एजेंसियाँ दिशा-निर्देश प्रदान कर सकती हैं और डेवलपर भवनों को रेडी कनेक्शन पॉइंट्स के साथ डिजाइन कर सकती हैं।
इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) के बारे में
- वर्ष 2019 में शुरू किया गया इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) भारत के लोगों के जीवन की गुणवत्ता और उत्पादकता में सुधार करने तथा सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने से संबंधित है।
इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान का उद्देश्य है:
- वर्ष 2037–38 तक विभिन्न क्षेत्रों में शीतलन माँग को 20% से 25% तक कम करना।
- वर्ष 2037–38 तक रेफ्रिजरेंट माँग को 25% से 30% तक घटाना।
- वर्ष 2037–38 तक शीतलन ऊर्जा आवश्यकताओं को 25% से 40% तक कम करना।
- “कूलिंग और संबंधित क्षेत्रों” को राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (S&T) कार्यक्रम के अंतर्गत अनुसंधान का प्रमुख क्षेत्र मान्यता देना।
- स्किल इंडिया मिशन के साथ समन्वय करते हुए वर्ष 2022–23 तक 1,00,000 सर्विसिंग सेक्टर तकनीशियनों का प्रशिक्षण और प्रमाणन करना।
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