18वीं लोकसभा के कार्यकाल के लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी आचार समिति का गठन नहीं किया गया है।
संबंधित तथ्य
संसदीय कार्य मंत्री ने कहा कि विपक्ष के नेता के विरुद्ध प्रस्ताव को, अध्यक्ष के निर्णय के अधीन, आचार समिति (Ethics Committee) को संदर्भित किया जा सकता है।
लोकसभा की आचार समिति के बारे में
संरचना एवं कार्यकाल: आचार समिति में 15 सदस्य होते हैं, जिन्हें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है तथा प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल एक वर्ष की अवधि के लिए होता है।
कार्य: समिति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा संदर्भित लोकसभा सदस्यों के अनैतिक आचरण से संबंधित शिकायतों की जाँच करती है और अपने निष्कर्षों के आधार पर उपयुक्त सिफारिशें प्रस्तुत करती है।
उद्भव
सर्वप्रथम वर्ष 1996 में दिल्ली में आयोजित पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में दोनों सदनों अर्थात् लोकसभा और राज्यसभा के लिए आचार समितियों की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया था।
4 मार्च, 1997 को तत्कालीन उपराष्ट्रपति तथा राज्यसभा के सभापति के. आर. नारायणन ने उच्च सदन की आचार समिति का गठन किया, ताकि सदस्यों के नैतिक और आचरण संबंधी व्यवहार की निगरानी की जा सके तथा उनसे संबंधित संदर्भित कदाचार के मामलों की जाँच की जा सके।
लोकसभा में, विशेषाधिकार समिति के एक अध्ययन समूह ने वर्ष 1997 में आचार समिति के गठन की अनुशंसा की थी; तथापि, उस समय इस प्रस्ताव पर कार्यवाही नहीं की गई।
विशेषाधिकार समिति द्वारा अंततः13वीं लोकसभा के दौरान आचार समिति की स्थापना की अनुशंसा की।
वर्ष 2000 में दिवंगत लोकसभा अध्यक्ष जी. एम. सी. बालयोगी ने एक तदर्थ आचार समिति का गठन किया, जिसे वर्ष 2015 में लोकसभा की स्थायी समिति बना दिया गया।
शिकायतों की प्रक्रिया
कोई भी व्यक्ति किसी लोकसभा सदस्य के विरुद्ध, कथित कदाचार के साक्ष्यों सहित तथा यह शपथ-पत्र देते हुए कि शिकायत “झूठी, तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण” नहीं है, किसी अन्य लोकसभा सांसद के माध्यम से शिकायत कर सकता है। यदि सदस्य स्वयं शिकायत करता है, तो शपथ-पत्र की आवश्यकता नहीं होती है।
अध्यक्ष किसी सांसद के विरुद्ध प्राप्त किसी भी शिकायत को समिति के पास संदर्भित कर सकते हैं।
समिति केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर या न्यायालय में लंबित (सब ज्यूडिस) मामलों पर आधारित शिकायतों पर विचार नहीं करती है।
समिति किसी शिकायत की जाँच करने का निर्णय लेने से पूर्व प्रथमदृष्टया (Prima facie) जाँच करती है। साथ ही शिकायत का मूल्यांकन करने के बाद वह अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करती है।
समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष को प्रस्तुत करती है, जो सदन से पूछते हैं कि क्या रिपोर्ट पर विचार किया जाए। रिपोर्ट पर आधे घंटे की चर्चा का भी प्रावधान है।
राज्यसभा की आचार समिति
भारत की किसी भी विधायिका द्वारा गठित इस प्रकार की पहली समिति का गठन 4 मार्च, 1997 को राज्यसभा के सभापति द्वारा किया गया था, ताकि सदस्यों के नैतिक और आचरण संबंधी व्यवहार की निगरानी की जा सके।
संरचना: राज्यसभा के सभापति द्वारा नियुक्त 10 सदस्य।
कार्यकाल: समिति तब तक बनी रहती है, जब तक नई समिति का गठन नहीं किया जाता; बीच में उत्पन्न आकस्मिक रिक्तियों को सभापति समय-समय पर भरते हैं।
विशेषाधिकार समिति के साथ अतिव्यापन
आचार समिति और विशेषाधिकार समिति के अधिकार-क्षेत्र कभी-कभी परस्पर आच्छादित होते हैं, विशेषकर सांसदों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों जैसे मामलों में; तथापि, अधिक गंभीर आरोप सामान्यतः विशेषाधिकार समिति को संदर्भित किए जाते हैं।
विशेषाधिकार समिति का दायित्व संसद की स्वतंत्रता, अधिकारिता और गरिमा की रक्षा करना है, जिसमें व्यक्तिगत सदस्यों तथा सदन को सामूहिक रूप से शामिल किया जाता है।
विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही किसी सांसद या यहाँ तक कि सामान्य व्यक्ति के विरुद्ध भी प्रारंभ की जा सकती है, यदि उनके कृत्य सदन की अधिकारिता को कमजोर करते हों।
इसके विपरीत, आचार समिति केवल संसद सदस्यों से संबंधित कदाचार के मामलों से ही विशिष्ट रूप से निपटती है।
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