संदर्भ
हाल ही में राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने न्यायिक नियुक्तियों में विविधता लाने के लिए संविधान में संशोधन हेतु एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया है।
संबंधित तथ्य
- इस विधेयक में सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की भी वकालत की गई है।
क्षेत्रीय पीठों की आवश्यकता
- न्याय तक सीमित पहुँच: वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय केवल दिल्ली में स्थित होने से दूरदराज के राज्यों के नागरिकों के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच मुश्किल हो जाती है।
- मामलों का भारी लंबित बोझ: जनवरी 2026 तक 90,000 से अधिक मामले लंबित थे।
- दिल्ली में मामलों की अधिकता के कारण सुनवाई में देरी और लंबित मामलों की संख्या बढ़ जाती है।
- क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना: प्रमुख शहरों (जैसे- कोलकाता, मुंबई, चेन्नई) में क्षेत्रीय पीठें स्थापित करने से विभिन्न क्षेत्रों में न्याय तक समान पहुँच सुनिश्चित हो सकती है।
- संघीय सिद्धांतों को मजबूत करना: सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना, राज्यों और नागरिकों के लिए न्याय की पहुँच बढ़ाकर, भारतीय संघीय ढाँचे के सम्मान और सुदृढ़ीकरण में सहायक होती है।
समाधान
- संसद समितियों और विधि आयोग द्वारा अतीत में की गई अनुशंसाओं के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठें संविधान के मौजूदा प्रावधानों के तहत ही स्थापित की जा सकती हैं।
- न्यायालय आरंभ में एक क्षेत्र में पीठ स्थापित करने और समयबद्ध तरीके से अन्य क्षेत्रों में इसका विस्तार करने पर भी विचार कर सकता है।
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विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- न्यायपालिका में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करना।
- निम्नलिखित को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करना अनिवार्य है:
- अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST)
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
- धार्मिक अल्पसंख्यक
- महिलाएँ
- प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए।
- यह भारत के सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों पर लागू होता है।
- नियुक्तियों की समय सीमा
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- केंद्र सरकार को 90 दिनों के भीतर कॉलेजियम की सिफारिशें अधिसूचित करनी होंगी।
- क्षेत्रीय पीठों का प्रावधान
- नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में क्षेत्रीय पीठों की स्थापना की जाएगी।
- ये पीठें सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ण अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करेंगी।
- संवैधानिक महत्त्व के मामलों की सुनवाई दिल्ली स्थित संविधान पीठ द्वारा की जाएगी।
भारतीय न्यायपालिका में विविधता की आवश्यकता
- लोकतांत्रिक वैधता को बढ़ाना: भारत की सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करने वाली न्यायपालिका जनविश्वास और वैधता को बढ़ाती है, जबकि प्रमुख सामाजिक समूहों का अल्प प्रतिनिधित्व पूर्वाग्रह और अलगाव की भावना को बढ़ावा देता है।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 2018 से, उच्च न्यायालयों में नियुक्त न्यायाधीशों का एक बड़ा हिस्सा उच्च जातियों से है (लगभग 75-78%), जबकि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), ओबीसी और अल्पसंख्यकों की नियुक्ति कुल नियुक्तियों में 25% से भी कम है।
- लैंगिक प्रतिनिधित्व: उच्च न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कम है।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 1950 से, सर्वोच्च न्यायालय के 287 न्यायाधीशों में से केवल 11 महिलाएँ (3.8%) नियुक्त की गई हैं, जिनमें न्यायमूर्ति फातिमा बीवी, सुजाता वी. मनोहर और रूमा पाल शामिल हैं।
- विविधता में संरचनात्मक बाधाएँ: अस्पष्टता और समरूप नेटवर्क पर निर्भरता के लिए आलोचना झेल रही कॉलेजियम प्रणाली, साथ ही उच्च न्यायिक नियुक्तियों में आरक्षण का अभाव, विविधता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रगति को धीमा कर रहा है।
- उदाहरण के लिए: वर्ष 2018 से वर्ष 2024 के बीच के आँकड़े दर्शाते हैं कि उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाले व्यक्तियों में से केवल लगभग 20% ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
- व्यापक सामाजिक उद्देश्यों से संबंध: विविधता को बढ़ावा देना अनुच्छेद-14-15 के अंतर्गत समानता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक अधिदेश के अनुरूप है और संस्थानों में सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करके भारत की बहुलवादी संस्कृति को बनाए रखता है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति और सर्वोच्च न्यायालय के स्थान से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद-124: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से परामर्श के बाद की जाती है।
- अनुच्छेद-217: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति
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- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- इस नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और राज्य के राज्यपाल से परामर्श आवश्यक है।
- अनुच्छेद-130: सर्वोच्च न्यायालय का स्थान
- सर्वोच्च न्यायालय का मुख्यालय दिल्ली में होगा।
- केंद्र सरकार की स्वीकृति से मुख्य न्यायाधीश द्वारा निर्धारित अन्य स्थानों पर भी बैठ सकता है।
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चुनौतियाँ
- प्रतिभाओं की सीमित उपलब्धता का तर्क: अक्सर यह कहा जाता है कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के कम उम्मीदवार बार या न्यायपालिका में उच्च पदों तक पहुँच पाते हैं।
- कानूनी शिक्षा और कॅरियर में प्रगति में संरचनात्मक असमानताएँ प्रतिनिधित्व को प्रभावित करती हैं।
- संघीय और राजनीतिक चिंताएँ: आनुपातिक प्रतिनिधित्व अनिवार्य करने से निम्नलिखित मुद्दों पर चिंताएँ उठ सकती हैं:
- न्यायिक स्वतंत्रता
- कार्यकारी हस्तक्षेप
- नियुक्तियों में संघीय संतुलन
- संस्थागत प्रतिरोध: न्यायपालिका पारंपरिक रूप से बाहरी सुधार प्रयासों का विरोध करती है (उदाहरण के लिए, वर्ष 2015 में NJAC को रद्द कर दिया गया)।
- किसी भी संरचनात्मक सुधार को संवैधानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
- योग्यता बनाम प्रतिनिधित्व बहस का जोखिम: आलोचकों का तर्क है कि विविधता अनिवार्य करने से ‘योग्यता’ कम हो सकती है।
- योग्यता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए वस्तुनिष्ठ मापदंडों का अभाव।
आगे की राह
- संवैधानिक निर्देश के रूप में निजी सदस्य विधेयक: न्यायिक नियुक्तियों में सामाजिक विविधता सुनिश्चित करने की मुख्य जिम्मेदारी कॉलेजियम की होती है। निजी सदस्य विधेयक का उद्देश्य इस लक्ष्य को संवैधानिक अनिवार्यता के माध्यम से और अधिक सुदृढ़ करना है।
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का पुनरुद्धार: दीर्घकालिक सुधार के रूप में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को उसकी संरचना का व्यापक आधार देकर पुनः स्थापित किया जा सकता है।
- इसमें विधायिका, बार काउंसिल तथा शैक्षणिक जगत के प्रतिनिधियों को शामिल किया जा सकता है, जैसा कि कुछ अन्य देशों की व्यवस्थाओं में देखा जाता है।
- मार्गदर्शन (मेंटॉरशिप) और प्रतिभा-विकास कार्यक्रमों को सुदृढ़ करना: न्यायिक सेवाओं के लिए प्रशिक्षण, छात्रवृत्तियों और प्रारंभिक तैयारी सहायता के माध्यम से वंचित एवं हाशिये पर पड़े समुदायों से आने वाले उम्मीदवारों को प्रोत्साहित करना।
- आवधिक समीक्षा और जवाबदेही: जाति, लैंगिक तथा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर स्थिति की निगरानी करना तथा वार्षिक रिपोर्टिंग को संसद या किसी वैधानिक निकाय के समक्ष प्रस्तुत करना।
कॉलेजियम प्रणाली के बारे में
- सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम: यह भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) तथा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से मिलकर गठित होता है।
- सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम 25 उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदोन्नति (उन्नयन) की सिफारिश करने के लिए उत्तरदायी होता है।
- इन सिफारिशों के केंद्र सरकार द्वारा प्रसंस्करण के बाद, राष्ट्रपति उनके क्रियान्वयन के लिए अंतिम आदेश जारी करते हैं।
- उच्च न्यायालय कॉलेजियम: यह उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा उसके दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से मिलकर बना होता है।
- यह उच्च न्यायालयों से संबंधित न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदोन्नति (उन्नयन) की सिफारिश करता है।
कॉलेजियम प्रणाली का विकास
- प्रथम न्यायाधीश प्रकरण (1981): इसमें यह निर्णय दिया गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की सिफारिश को कार्यपालिका द्वारा ‘ठोस कारणों’ के आधार पर अस्वीकार किया जा सकता है।
- न्यायिक नियुक्तियों के मामलों में कार्यपालिका (कार्यकारी सत्ता) की न्यायपालिका पर प्रधानता स्थापित की गई।
- द्वितीय न्यायाधीश प्रकरण (1993): “परामर्श” की व्याख्या “सहमति” के रूप में करते हुए कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत की गई।
- यह निर्धारित किया गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय व्यक्तिगत न होकर संस्थागत सहमति को दर्शाने वाली होनी चाहिए, जो सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श के बाद बनाई जाए।
- तृतीय न्यायाधीश प्रकरण (1998): इस निर्णय में कॉलेजियम प्रणाली का विस्तार करते हुए इसे पाँच सदस्यीय निकाय बनाया गया, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल किए गए।
- चतुर्थ न्यायाधीश प्रकरण (2015): इस निर्णय में NJAC अधिनियम, 2014 तथा उससे संबंधित संविधान संशोधन को निरस्त कर दिया गया और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखा गया।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judicial Appointments Commission- NJAC)
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का गठन 99वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 के अंतर्गत किया गया था, जिसका उद्देश्य न्यायिक नियुक्तियों को विनियमित करना तथा आयोग को सशक्त बनाना था।
- संरचना: इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (अध्यक्ष के रूप में), सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री तथा दो प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल थे।
- निरस्त किया जाना: वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय की एक संवैधानिक पीठ ने NJAC को असंवैधानिक घोषित कर दिया। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि NJAC संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन करता है, क्योंकि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा पहुँचता है।
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