संदर्भ
वर्ष 2026 को खाद्य और कृषि संगठन द्वारा “अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष” घोषित किया गया है, ताकि वैश्विक खाद्य प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका को मान्यता प्रदान की जा सके।
- इस पहल का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में लैंगिक असमानता को दूर करना और महिलाओं के सशक्तीकरण को बढ़ावा देना है।
भारतीय कृषि में महिलाओं की भूमिका
- कार्यबल में हिस्सेदारी: भारतीय कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 64% हैं, जिससे वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन जाती हैं।
- कृषि कार्यों में भागीदारी: महिलाएँ बुवाई, रोपाई, निराई, कटाई तथा फसल कटाई के बाद के कार्यों सहित लगभग 70% कृषि कार्य करती हैं।
- सहायक गतिविधियों में भागीदारी: पशुपालन, मत्स्यपालन, बागवानी और डेयरी जैसी गतिविधियों में उनकी भागीदारी काफी अधिक है, जहाँ पशुधन संबंधी गतिविधियों में लगभग 95% सहभागिता देखी जाती है।
- कृषि का स्त्रीकरण: गैर-कृषि रोजगारों की ओर पुरुषों के पलायन के कारण खेतों और कृषि परिवारों के प्रबंधन की जिम्मेदारी महिलाओं पर अधिक बढ़ गई है।
- सतत् कृषि में भूमिका: महिलाएँ प्रायः पारंपरिक ज्ञान, जैव-विविधता संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देती हैं।
महिला किसानों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ
- भूमि स्वामित्व: केवल 13.9% कृषि भूमि जोतें महिलाओं के नाम पर हैं, जिससे निम्न योजनाओं तक उनकी पहुँच सीमित हो जाती है:
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-किसान)
- किसान क्रेडिट कार्ड (KCC)
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
- निर्णय-निर्माण: निर्णय-निर्माण प्रायः पुरुष-प्रधान रहता है (जैसे- फसल चयन, बीज खरीद, बिक्री), जबकि महिलाएँ श्रम-प्रधान कार्य (बुवाई, निराई, कटाई) करती हैं।
- ऋण तक सीमित पहुँच: महिला किसानों को ऋण, गुणवत्तापूर्ण बीज, उर्वरक और आधुनिक कृषि मशीनरी प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
- प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी तक सीमित पहुँच: महिलाओं को प्रायः कृषि विस्तार सेवाओं, डिजिटल उपकरणों और जलवायु संबंधी जानकारी तक कम पहुँच मिलती है।
जलवायु परिवर्तन और महिला किसान
- अधिक संवेदनशीलता: भूमि, ऋण, प्रौद्योगिकी और जलवायु संबंधी जानकारी तक सीमित पहुँच के कारण महिला किसान जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं।
- कार्यभार में वृद्धि: विशेषकर जल और चारा एकत्र करने तथा खेतों के प्रबंधन मेंजलवायु तनाव के कारण महिलाओं के कार्य घंटे बढ़ जाते हैं।
- अनुकूलन क्षमता की कमी: महिलाओं की पहुँच प्रायः कृषि विस्तार सेवाओं, जलवायु-अनुकूल बीजों और वित्तीय संसाधनों तक कम है, जिससे उनकी अनुकूलन क्षमता कम हो जाती है।
महिला किसानों को सशक्त बनाने के उपाय
- भूमि अधिकारों को सुदृढ़ करना: महिलाओं की ऋण, बीमा और सरकारी योजनाओं तक पहुँच बेहतर बनाने के लिए संयुक्त भूमि स्वामित्व (जॉइंट लैंड टाइटल) और उत्तराधिकार अधिकारों को बढ़ावा देना।
- वित्त तक पहुँच में सुधार: स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और ग्रामीण बैंकिंग प्रणालियों के माध्यम से महिला-अनुकूल ऋण उत्पाद, फसल बीमा तथा वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना।
- जलवायु-अनुकूल कृषि: फसल विविधीकरण, जलवायु-अनुकूल बीज किस्मों, जल संरक्षण और सतत् कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करना।
- जलवायु जागरूकता: स्थानीय भाषाओं में रियल-टाइम मौसम पूर्वानुमान, जलवायु संबंधी जानकारी और बीमा संबंधी जागरूकता उपलब्ध कराना।
- ग्रामीण आजीविका का विविधीकरण: जलवायु जोखिम को न्यूनतम करने के लिए मधुमक्खी पालन, पुष्पकृषि, औषधीय पौधे और कृषि-प्रसंस्करण जैसे वैकल्पिक आय स्रोतों को बढ़ावा देना।
महिला किसानों के लिए सरकारी पहलें
- दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM): ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में संगठित करता है, जिससे वित्तीय समावेशन, आजीविका को बढ़ावा और कृषि मूल्य शृंखलाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होती है।
- महिला किसान सशक्तिकरण परियोजना (MKSP): यह डीएवाई-एनआरएलएम (DAY-NRLM) की एक उप-योजना है, जो प्रशिक्षण, सतत् कृषि पद्धतियों और क्षमता निर्माण के माध्यम से कृषि में महिलाओं के सशक्तीकरण को बढ़ावा देती है।
- नमो ड्रोन दीदी योजना: इस योजना द्वारा स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को कृषि ड्रोन संचालित करने का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है, जिससे फसल निगरानी, उर्वरक और कीटनाशक छिड़काव में सहायता मिलती है तथा आय के अवसर बढ़ते हैं।
- स्टाम्प शुल्क में कमी: कई राज्य महिलाओं के नाम पर भूमि पंजीकरण के लिए कम स्टाम्प शुल्क लेते हैं, जिससे भूमि स्वामित्व और आर्थिक सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है।
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