संदर्भ
भारत ने लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (Lysosomal Storage Disorders) के लिए अपना पहला सरकारी सहायता प्राप्त राष्ट्रीय बायोबैंक लॉन्च किया है, जिसमें 15 राज्यों के 530 रोगियों के डेटा और नमूनों को एकीकृत किया गया है।
लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) के लिए राष्ट्रीय बायोबैंक
- भारत ने लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSDs) के लिए समर्पित एक अग्रणी राष्ट्रीय बायोबैंक की स्थापना की है, जिसका उद्देश्य दुर्लभ आनुवंशिक रोगों के अनुसंधान, निदान और किफायती उपचार विकास को बढ़ावा देना है।
- बायोबैंक एक संगठित भंडार है, जो चिकित्सा अनुसंधान में उपयोग के लिए रक्त, DNA, ऊतक और मूत्र जैसे जैविक नमूनों के साथ-साथ संबंधित नैदानिक और जनसांख्यिकीय डेटा का संग्रह, प्रसंस्करण, भंडारण एवं प्रबंधन करता है।
- नोडल निकाय: बायोबैंक का नेतृत्व फाउंडेशन फॉर रिसर्च इन जेनेटिक्स एंड एंडोक्रिनोलॉजी (FRIGE), अहमदाबाद कर रहा है और इसे भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा वित्त पोषित किया जाता है।
- मुख्य विशेषताएँ
- एकीकृत रोगी भंडार: बायोबैंक में 17 वर्षों में कई राज्यों के 28 संस्थानों से एकत्रित 530 रोगियों के जैविक नमूने और विस्तृत नैदानिक, जैव रासायनिक और आनुवंशिक डेटा संकलित हैं।
- विविध रोग कवरेज: यह भंडार गौचर रोग, टे-सैक्स (Tay-Sachs) रोग, म्यूकोलिपिडोसिस II/III और मोरक्वियो ए (Morquio A) सिंड्रोम सहित 8 LSD उपसमूहों के अंतर्गत 27 विकारों को कवर करता है।
- डिजिटल एक्सेस सिस्टम: एक केंद्रीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म जीनोमिक DNA, प्लाज्मा, मूत्र के नमूने, एंजाइम गतिविधि विवरण और आनुवंशिक जानकारी का प्रबंधन करता है ताकि सतत, अनुसंधान-उन्मुख पहुंच सुनिश्चित हो सके।
लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSD) के बारे में
- लाइसोसोमल स्टोरेज डिसऑर्डर (LSD) 70 से अधिक दुर्लभ आनुवंशिक चयापचय संबंधी स्थितियों का एक समूह है, जो एंजाइमों की कमी के कारण होता है और कोशिकाओं में अपशिष्ट पदार्थों के विघटन को बाधित करता है।
- स्वास्थ्य पर प्रभाव: विशिष्ट एंजाइमों की अनुपस्थिति से कोशिकाओं में वसा और शर्करा का विषाक्त संचय होता है, जिससे अंगों को धीरे-धीरे क्षति पहुँचती है, विकलांगता होती है और बच्चों में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है।
- उपचार संबंधी चुनौतियाँ: दुर्लभ बीमारियों में से केवल लगभग 7% के लिए ही स्वीकृत उपचार उपलब्ध हैं, और एलएसडी के लिए उपलब्ध उपचारों की लागत अक्सर प्रति वर्ष ₹1 करोड़ से अधिक होती है, जिससे रोगियों की पहुँच सीमित हो जाती है।
बायोबैंक का महत्त्व
- उपचार विकास में तेजी लाना: केंद्रीकृत भंडार शोधकर्ताओं को स्टेम सेल-आधारित रोग मॉडल विकसित करने और जीन एवं एंजाइम प्रतिस्थापन उपचारों का पता लगाने में सक्षम बनाता है।
- प्रारंभिक स्क्रीनिंग में सुधार: इनस्टेम और सीडीएफडी जैसे संस्थान प्रारंभिक पहचान के लिए उन्नत स्पेक्ट्रोमेट्री-आधारित स्क्रीनिंग उपकरण डिजाइन करने के लिए बायोबैंक डेटा का उपयोग कर रहे हैं।
- उपचार लागत में कमी: भारतीय जीनोमिक विविधता पर आधारित घरेलू अनुसंधान किफायती, स्थानीय स्तर पर विकसित चिकित्सीय समाधानों को बढ़ावा दे सकता है।
- दुर्लभ रोग नीति ढाँचे को मजबूत करना: बायोबैंक राष्ट्रीय नैदानिक-जीनोमिक रजिस्ट्री की रही कमी को दूर करता है, जिससे भारत में साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण और दुर्लभ रोग प्रबंधन को समर्थन मिलता है।
निष्कर्ष
भारत का राष्ट्रीय LSD बायोबैंक, स्वदेशी अनुसंधान को सक्षम बनाकर, निदान में सुधार करके और कमजोर रोगियों के लिए किफायती, जीवन रक्षक उपचारों का मार्ग प्रशस्त करके दुर्लभ बीमारियों के प्रबंधन में एक परिवर्तनकारी कदम है।