NCERT पाठ्यपुस्तक पर प्रतिबंध और संवैधानिक संतुलन

5 Mar 2026

संदर्भ

‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद’ (NCERT) विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) के साथ संरेखित करने के लिए पुनः डिजाइन कर रहा है। हाल ही में, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कक्षा 8 की एक पाठ्यपुस्तक में संवेदनशील सामग्री को लेकर हस्तक्षेप किया गया, जिससे शैक्षणिक स्वतंत्रता बनाम संवैधानिक संस्थानों की गरिमा पर बहस आरंभ हो गई है।

हालिया मुद्दे के बारे में

  • भारतीय सर्वोच्च न्यायालय की कार्रवाई (स्वतः संज्ञान): वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा इस बात की पुष्टि किए जाने के बाद कि एक विशिष्ट पाठ्यपुस्तक में विधिक प्रणाली पर अनुचित रूप से टिप्पणी की (Unfairly attacking the legal system) गई थी, अत: भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान की कार्यवाही आरंभ की गई।
    • एक निर्णायक कदम में, न्यायालय ने प्रकाशन पर “पूर्ण प्रतिबंध” आरोपित किया, विशेष रूप से “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” का आरोप लगाने वाले अनुभागों पर आपत्ति व्यक्त की।
  • “रक्तस्राव” संबंधी रूपक का प्रयोग और न्यायिक आशय: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्थिति की गंभीरता को प्रभावशाली छवि के माध्यम से व्यक्त करते हुए कहा: “उन्होंने बंदूक का शॉट चलाया; आज न्यायपालिका खून बहा रही है (They fired a gunshot; the judiciary is bleeding today)।
    • न्यायालय ने इस अध्याय की व्याख्या एक “योजना बद्ध साजिश” (पूर्व-योजित कदम) के रूप में की, जिसका उद्देश्य छात्रों, शिक्षकों और माता-पिता द्वारा भारतीय न्यायालयों के प्रति विश्वास तथा सम्मान को व्यवस्थित रूप से क्षीण करना है।
  • जवाबदेही के लिए आदेश: शैक्षणिक सामग्री में उच्च मानक सुनिश्चित करने के लिए, न्यायालय ने निम्नलिखित कदम उठाए हैं:
    • प्रमाण-पत्रों की जाँच: पाठ्यपुस्तक विकास टीम के नामों और प्रमाण-पत्रों की विस्तृत सूची माँगी गई, ताकि संवेदनशील विषयों संबंधी उनकी विशेषज्ञता की पुष्टि की जा सके।
    • कानूनी परिणाम: उच्च शिक्षा अधिकारियों के लिए न्यायालय की अवमानना हेतु ‘शो कॉज नोटिस’ जारी किया गया है, जिसके लिए अब ऐसी सामग्री की अनुमति देने पर, जो न्यायपालिका की गरिमा को कम करती है, उनपर दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है।
  • अनुपालन और सरकारी प्रतिक्रिया
    • पूर्ण स्मरण: न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों में सभी भौतिक और डिजिटल प्रतियों को तुरंत जब्त करने और हटाने का आदेश दिया है।
    • आधिकारिक जाँच: केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने पुष्टि की कि केंद्र इस मामले को “गंभीरता से” ले रहा है, और यह जाँच शुरू की गई है कि इस प्रकार की किसी भी सामग्री को अनुमोदन प्रक्रिया द्वारा कैसे पारित किया गया।
  • संस्थागत सम्मान: कार्यवाही में एक निर्णायक क्षण तब आया, जब मंत्रालय के पक्ष में सॉलिसिटर जनरल ने बिना किसी शर्त और अपवाद के क्षमायाचना प्रस्तुत की।

न्यायालय की दलील – क्यों हस्तक्षेप किया?

न्यायालय ने पाठ्यपुस्तक की शिक्षण पद्धति में कई महत्त्वपूर्ण दोषों को उजागर किया:

  • अनुचित लक्ष्यकरण और पक्षपात: पुस्तक केवल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर केंद्रित थी, जबकि कार्यपालिका (सरकार) या पुलिस में से संबंधित समान मुद्दों को नजरअंदाज किया  गया, जिससे छात्रों के लिए पक्षपाती दृष्टिकोण विकसित हुआ।
  • “इतिहास का समाप्त करना”: केवल नकारात्मक पक्षों पर ध्यान केंद्रित करने से, न्यायालय ने उल्लेख किया कि पाठ्यपुस्तक ने मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और संविधान की रक्षा में 75 वर्षों की न्यायिक सफलता को नजरअंदाज किया है।
  • विकासात्मक उपयुक्तता: न्यायालय ने तर्क दिया कि 13 वर्षीय (कक्षा 8) छात्र व्यक्तिगत दुराचार और प्रणालीगत विफलता के मध्य भेद करने के लिए पर्याप्त परिपक्वता नहीं रखते हैं। केवल नकारात्मक पक्ष पढ़ाने से कानून में पूर्णतया विश्वास न होने का खतरा उत्पन्न हो सकता है।

न्यायालय की कार्रवाई के संवैधानिक और कानूनी आयाम

  • संस्थागत गरिमा: अनुच्छेद-129 के तहत, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय एक “कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड” है और इसे अपनी अवमानना पर दंड देने का अधिकार प्राप्त है।
    • न्यायालय का तर्क है कि न्यायपालिका को “बदनाम” करना विधि के शासन को कमजोर कर सकता है।
  • युक्तिसंगत प्रतिबंध: जबकि अनुच्छेद-19(1)(a) ‘भाषण की स्वतंत्रता’ प्रदान करता है, यह पूर्ण नहीं है।
    • प्रतिबंधों का आधार अनुच्छेद-19(2) होना चाहिए, जिसमें न्यायालय की अवमानना भी शामिल है।
    • न्यायालय का मानना है कि पाठ्यपुस्तकों में ऐसी जानकारी प्रस्तुत नहीं की जानी चाहिए, जो तथ्यात्मक रूप से “विकृत” हो या संवैधानिक स्तंभों में जनता के विश्वास को क्षीण करती हो।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्र पर महत्त्वपूर्ण पूर्वनिर्णय

स्वतंत्र अभिव्यक्ति की रक्षा के महत्त्व को मजबूत करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दो अत्यधिक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक निर्णय हैं:

  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि ऑनलाइन भाषण पर अस्पष्ट प्रतिबंध अनुच्छेद-19(1)(a) का उल्लंघन करते हैं और स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर कोई भी सीमा केवल अनुच्छेद-19(2) में सूचीबद्ध आधारों के भीतर ही हो सकती है।
  • एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम (1989): न्यायालय ने निर्णय दिया कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति को केवल इसलिए दबाया नहीं जा सकता कि समाज के किसी वर्ग को यह असहज लगे और यह रेखांकित किया कि खुली आलोचना तथा चर्चा एक लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक हैं।

  • वीरास्वामी मामला (1991): न्यायालय का हस्तक्षेप वीरास्वामी मामले (1991) के अनुरूप है, जिसने स्थापित किया कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध कोई प्राथमिकी बिना भारत के मुख्य न्यायाधीश की पूर्व अनुमति के दर्ज नहीं की जा सकती है।
    • इससे न्यायालय को “कलंकित” करने की सीमा निर्धारित होती है, क्योंकि न्यायिक आचरण को स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए इसे सामान्य आपराधिक जाँच से सुरक्षित रखा जाता है।
  • “मूलभूत संरचना” का सिद्धांत: न्यायपालिका इन पाठ्यपुस्तक आरोपों को केवल आलोचना के रूप में नहीं, बल्कि संविधान की मूलभूत संरचना पर हमला मानती है।
    • चूंकि केशवानंद भारती (1973) मामले में न्यायिक स्वतंत्रता को अपरिवर्तनीय विशेषता घोषित किया गया, इसलिए न्यायालयों को अवैध ठहराने के किसी भी “योजना बद्ध कदम” को संवैधानिक व्यवस्था के लिए खतरा माना जाता है।
  • प्रशासनिक पर्यवेक्षण (अनुच्छेद-227 और 235): अवमानना के अधिकार के अलावा, उच्च न्यायालय निचली न्यायपालिका पर प्रशासनिक पर्यवेक्षण का प्रयोग करती है।
    • यह शक्ति वर्ष 2025 के अनुशासनात्मक अभियान को उचित ठहराती है, जिसमें 12 अधिकारियों को हटाया गया, यह सिद्ध करता है कि प्रणाली आंतरिक “निरीक्षण” पर निर्भर करती है, न कि स्कूल की पुस्तकों में बाहरी “प्रकटीकरण” पर।
  • व्यक्तिगत जवाबदेही: व्यक्तिगत लेखकों के प्रमाण-पत्र माँगकर, न्यायालय यह उदाहरण स्थापित कर रहा है कि शैक्षणिक लेखक अपने द्वारा उत्पादित सामग्री के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराए जा सकते हैं।

न्यायालय के दृष्टिकोण की आलोचनाएँ

जहाँ सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप संस्थागत अखंडता के बचाव के रूप में प्रस्तुत किया गया, वहीं इसे कानूनी विद्वानों, शिक्षाविदों और नागरिक अधिकारों के समर्थकों द्वारा गंभीर जाँच का सामना करना पड़ा। आलोचनाएँ न्यायिक गरिमा और लोकतांत्रिक पारदर्शिता के बीच संतुलन पर केंद्रित हैं।

  • अत्यधिक हस्तक्षेप और “न्यायिक सेंसरशिप”: आलोचक तर्क करते हैं कि “पूर्ण प्रतिबंध” और पाठ्यपुस्तकों की भौतिक जब्ती का आदेश देकर न्यायालय ने पूर्व प्रतिबंध की चरम सीमा का प्रयोग किया। साथ ही, यह आनुपातिकता का सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

  • आनुपातिकता का सिद्धांत संवैधानिक कानून में एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि क्या किसी मौलिक अधिकार को सीमित करने वाली सरकारी या न्यायिक कार्रवाई उचित है या अत्यधिक।

    • विचार-विमर्श को दबाना: चिंता व्यक्त की जा रही है कि न्यायालय अपनी अवमानना शक्ति का प्रयोग प्रणालीगत मुद्दों की असुविधाजनक सच्चाइयों को दबाने के लिए कर रहा है, जो पहले से ही सार्वजनिक डोमेन में हैं (जैसे कि विधि आयोग की रिपोर्टों में उल्लिखित)।
    • खतरनाक उदाहरण स्थापित करना: यदि न्यायपालिका अपनी छवि को स्कूल की पुस्तकों में स्वयं जाँच सकती है, तो अन्य संवैधानिक संस्थाएँ (जैसे- निर्वाचन आयोग या संसद) समान “संपादन” अधिकार की माँग कर सकती हैं, जिससे पाठ्यक्रम संतुलित और वास्तविक नहीं रह जाएगा।
  • शैक्षणिक स्वायत्तता पर प्रभाव: पाठ्यपुस्तक लेखन टीम के नाम और प्रमाण-पत्र की माँग को कई लोग एक भयपूर्ण कदम मानते हैं।
    • “डर का प्रभाव”: यह दृष्टिकोण व्यक्तिगत जिम्मेदारी या कानूनी उत्पीड़न के डर से शीर्ष शिक्षाविदों को शैक्षणिक परियोजनाओं में भाग लेने से हतोत्साहित कर सकता है।
    • स्वतंत्रता का क्षरण: शैक्षणिक संस्थाएँ स्वायत्त होती हैं। पाठ्यपुस्तक अध्याय को “योजना बद्ध साजिश” मानकर, न्यायालय शैक्षणिक लेखन को एक संभावित अपराध में परिवर्तित कर देता है।
  • छात्रों का “बालकृत” करना: न्यायालय का तर्क कि 13 वर्षीय (कक्षा 8) छात्र न्यायिक भ्रष्टाचार को समझने के लिए बहुत छोटे हैं, इसका विरोध शिक्षाशास्त्रियों ने किया है।
    • समीक्षात्मक चिंतन: शिक्षा विशेषज्ञ तर्क करते हैं कि माध्यमिक विद्यालय के छात्र जाँच और संतुलन (Checks and balances) सीखने की आदर्श आयु में हैं, जिसमें यह भी शामिल है कि प्रणाली कहाँ विफल होती है।
    • संदेहवाद बनाम जागरूकता: आलोचक सुझाव देते हैं कि प्रणालीगत दोषों को छुपाने से “गलत चेतना” उत्पन्न होती है, जो छात्रों के लिए बाद में वास्तविक कानूनी देरी या भ्रष्टाचार का सामना करने पर गहरी निराशा उत्पन्न कर सकती है।
  • गरिमा की चयनात्मक रक्षा: कुछ पर्यवेक्षक यह बताते हैं कि न्यायालय अनुच्छेद-19 (भाषण की स्वतंत्रता) को देखते समय असंगति दर्शाता है।
    • सार्वजनिक हित बनाम संस्थागत गौरव: जहाँ न्यायालय अपनी “गरिमा” की रक्षा करता है, आलोचक तर्क करते हैं कि यह पत्रकारों या कार्यकर्ताओं के भाषण अधिकारों की रक्षा में उतना सक्रिय नहीं रहा, जो समान मुद्दों को उजागर करते हैं।
    • पारदर्शिता के रूप में गरिमा: एक विरोधी तर्क यह सुझाव देता है कि न्यायपालिका की गरिमा, भ्रष्टाचार को खुलकर संबोधित करने से बेहतर होती है, न कि स्कूलों में इसके उल्लेख को प्रतिबंधित करने से।

नई पुस्तकों के लेखन के लिए आधिकारिक व्यवस्था

वर्तमान प्रक्रिया नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन 2023 (NCF-SE 2023) द्वारा नियंत्रित है। यह सुनिश्चित करने के लिए उच्च-स्तरीय, बहु-स्तरीय समिति संरचना पर निर्भर करता है कि सभी शैक्षणिक सामग्री आधुनिक और सटीक हो।

  • राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शिक्षण-सामग्री समिति (NSTC): यह शीर्ष-स्तरीय 19-सदस्यीय संस्था है, जिसका नेतृत्व एम.सी. पंत करते हैं।
    • यह पाठ्यक्रम के समग्र दृष्टिकोण के लिए जिम्मेदार है और इसमें गणितज्ञों, कलाकारों और नीति सलाहकारों सहित विशेषज्ञों का विविध मिश्रण शामिल है, ताकि सीखने के लिए समग्र दृष्टिकोण सुनिश्चित किया जा सके।
  • पाठ्यक्रम क्षेत्र समूह (CAGs): ये विभिन्न विषयों के लिए विशेषज्ञों की विशेष टीम हैं।
    • उदाहरण के लिए, 35-सदस्यीय सामाजिक विज्ञान CAG, अकादमिक ढाँचा और विस्तृत दिशा-निर्देश प्रदान करती है, जिनका लेखक इतिहास, भूगोल और राजनीति विज्ञान के संबंध में पालन करते हैं।
  • पाठ्यपुस्तक विकास टीम: इसमें वास्तविक लेखक शामिल हैं, जिनमें विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और स्कूल शिक्षक शामिल हैं, जो अध्याय लिखते हैं।
  • राष्ट्रीय पाठ्यक्रम फ्रेमवर्क निगरानी समिति (NOC): यह संस्था अंतिम “अनुपालन परीक्षक” के रूप में कार्य करती है।
    • इसका मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पाठ्यपुस्तक पूर्ण रूप से NEP द्वारा निर्धारित लक्ष्यों और मूल्यों के अनुरूप हो।

न्यायिक भ्रष्टाचार के बारे में

  • मुख्य परिभाषा और दायरा: न्यायिक भ्रष्टाचार में रिश्वत, भाई-भतीजावाद, या राजनीतिक दबाव का उपयोग शामिल होता है, जिससे विधिक प्रणाली की स्वतंत्रता और अखंडता से समझौता किया जाता है। यह मुख्य रूप से दो तरीकों से प्रकट होता है:
    • निर्णयात्मक भ्रष्टाचार: जब मामलों के परिणाम कानून के बजाय बाहरी कारकों या रिश्वत से निर्धारित किए जाते हैं।
      • प्रणाली में हेर-फेर (बेंच हंटिंग): वर्ष 2025 के अंत में उत्तर भारत के एक उच्च न्यायालय में एक बड़ा “बेंच हंटिंग” घोटाला उजागर हुआ।
        • वकील और न्यायालय कर्मचारी मिलकर विशिष्ट मामलों को “अनुकूल” न्यायाधीशों के पास भेजने के लिए कार्य करते हुए पकड़े गए ताकि वांछित परिणाम प्राप्त किया जा सके।
    • प्रशासनिक भ्रष्टाचार: न्यायालय प्रक्रियाओं में हेर-फेर, जैसे अभिलेखों में छेड़छाड़ या न्यायालय कर्मचारियों द्वारा चयनात्मक सूचीकरण।
  • वैधानिक अंतराल: जबकि न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 “सिद्ध दुराचार” की जाँच के लिए एक रूपरेखा प्रदान करता है, इसे अक्सर अत्यधिक जटिल होने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ता है।
    • इससे आंतरिक चेतावनी और संसद द्वारा महाभियोग की अत्यंत कठोर और विरल रूप से सफल प्रक्रिया के बीच एक “कानूनी शून्य” उत्पन्न हो जाता है, जिससे कभी-कभी “छोटे स्तर के भ्रष्टाचार” के मामले अनदेखे रह जाते हैं।
  • संरचनात्मक और प्रणालीगत कमजोरियाँ: भारतीय न्यायपालिका के आंतरिक संचालन को पारदर्शिता के संबंध में विशिष्ट आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है:
    • कोलेजियम प्रणाली: नियुक्तियों में वस्तुनिष्ठ मानदंडों की कमी को अक्सर पक्षपात और परस्पर लाभ के समझौतों के लिए अनुकूल वातावरण माना जाता है।
    • सेवानिवृत्ति के बाद लाभ: न्यायाधीशों द्वारा सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद न्यायाधिकरणों या आयोगों में लाभकारी पद स्वीकार करना इस चिंता को जन्म देता है कि भविष्य के रोजगार को सुरक्षित करने के लिए सेवानिवृत्ति-पूर्व निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
    • “अंकल जज सिंड्रोम”: जैसा कि विधि आयोग की 230वीं रिपोर्ट (2009) में उल्लेख किया गया है, जब किसी न्यायाधीश के रिश्तेदार उसी न्यायालय में वकालत करते हैं तो हितों का टकराव उत्पन्न होता है, जिससे पारस्परिक पक्षपात के नेटवर्क बन जाते हैं।
  • बाहरी दबाव और प्रभाव
    • कार्यपालिका का हस्तक्षेप: न्यायाधीशों को राजनीतिक अभिकर्ताओं से दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिसे प्रतिकूल निर्णयों के लिए दंडात्मक स्थानांतरण या पदोन्नति से वंचित करने की धमकी के माध्यम से लागू किया जाता है।
    • राजनीतिक दबाव: हाई-प्रोफाइल मामले विशेष रूप से प्रभाव के प्रति संवेदनशील होते हैं, जो सत्तारूढ़ प्रशासन के हितों के विरुद्ध पीठ की स्वतंत्रता की परीक्षा लेते हैं।
  • जवाबदेही और निगरानी की कमियाँ: दुराचार को रोकने के लिए बनाए गए तंत्रों को अक्सर आंतरिक और अपारदर्शी होने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ता है:
    • अप्रभावी अनुशासनात्मक तंत्र: वर्तमान “इन-हाउस मैकेनिज्म” में बाहरी निगरानी का अभाव है। वर्ष 2017 से 2021 के बीच 1,600 से अधिक शिकायतें दर्ज की गईं, फिर भी बहुत कम मामलों में स्पष्ट अनुशासनात्मक कार्रवाई दिखाई दी।
    • जमीनी स्तर पर रिश्वत: वर्ष 2025 के ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल सर्वेक्षण में पाया गया कि स्थानीय (जिला) न्यायालयों से जुड़े प्रत्येक 4 लोगों में से 1 ने केवल बुनियादी कागजी कार्यवाही करवाने के लिए रिश्वत दी या “संपर्क” का उपयोग किया।
    • शिकायतों में वृद्धि: वर्ष 2025 की केंद्रीय सतर्कता आयोग की रिपोर्ट में न्यायालय कर्मचारियों (क्लर्क और रजिस्ट्री अधिकारियों) के विरुद्ध शिकायतों में 15% की वृद्धि दर्ज की गई। अधिकांश शिकायतें “अवैध पारिश्रमिक” (अतिरिक्त धन लेना) से संबंधित थीं, ताकि मामलों को क्रमांकित किया जा सके या दस्तावेज दाखिल किए जा सकें।
    • व्हिसलब्लोअर संरक्षण: आंतरिक भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले न्यायाधीशों या अधिकारियों की सुरक्षा के लिए कोई औपचारिक तंत्र मौजूद नहीं है, जिससे वे पेशेवर प्रतिशोध के प्रति संवेदनशील रहते हैं।
    • गोपनीयता: अनुशासनात्मक कार्यवाहियों के आस-पास अत्यधिक गोपनीयता सार्वजनिक जवाबदेही को कम करती है और उच्च न्यायपालिका को जाँच से बचाती है।

न्यायपालिका में संस्थागत ढाँचा एवं जवाबदेही तंत्र

  • आंतरिक शासन एवं नियुक्ति प्रणालियाँ: न्यायपालिका मुख्यतः न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए निर्मित आंतरिक तंत्रों के माध्यम से स्वयं को विनियमित करती है।
    • कोलेजियम प्रणाली: नियुक्तियों और स्थानांतरण के लिए एक गैर-संवैधानिक निकाय।
      • सर्वोच्च न्यायालय कोलेजियम: इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
      • उच्च न्यायालय कोलेजियम: इसमें उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
    • राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC): कोलेजियम को एक अधिक पारदर्शी और विविध निकाय से प्रतिस्थापित करने का वर्ष 2015 का प्रयास; तथापि, कार्यपालिका के हस्तक्षेप को रोकने के लिए इसे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया गया।
    • आंतरिक तंत्र (1997): एक प्रणाली जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश, न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों की समीक्षा करते हैं। यह न्यायिक मानकों के उल्लंघन के लिए सुधारात्मक कार्रवाई पर केंद्रित है।
  • विधिक संरक्षण एवं नैतिक संहिताएँ: यह सुनिश्चित करने के लिए कि न्यायाधीश बिना भय या पक्षपात के निर्णय दे सकें, विशिष्ट संरक्षण और संहिताएँ लागू हैं:
    • न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985: न्यायिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी भी कार्य के लिए न्यायाधीशों को दीवानी और आपराधिक प्रतिरक्षा प्रदान करता है।
    • न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्वक्तव्य (1997): नैतिक मानकों को रेखांकित करने वाली एक स्वीकृत आचार संहिता। यद्यपि प्रामाणिक है, परंतु कानूनी प्रवर्तनीयता के अभाव के कारण इसकी प्रायः आलोचना की जाती है।
  • न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971: यदि किसी व्यक्ति की कार्रवाई न्यायालय को कलंकित करती है या उसकी प्राधिकारिता को कम करती है, तो आपराधिक अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्रदान करता है।

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  • पर्यवेक्षण एवं पद से हटाना (बाह्य नियंत्रण): उच्च-स्तरीय जवाबदेही में कार्यपालिका और विधायिका की सीमित किंतु महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ होती हैं:
    • महाभियोग (अनुच्छेद-124 एवं 217): उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीश को हटाने का एकमात्र उपाय। इसके लिए “सिद्ध कदाचार या अक्षमता” के आधार पर संसद में विशेष बहुमत आवश्यक होता है।
    • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013: यद्यपि यह सरकार में भ्रष्टाचार को लक्षित करता है, परंतु सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को शक्तियों के पृथक्करण को बनाए रखने के लिए इसके दायरे से बाहर रखा गया है।
    • कार्यपालिका की भूमिका: कार्यपालिका नियुक्ति के लिए प्रस्तावित व्यक्तियों पर इंटेंलिजेंस ब्यूरो से जाँच कराती है, किंतु न्यायिक निर्णयों को कानूनी रूप से प्रभावित नहीं कर सकती है।
  • वैश्विक रैंकिंग: रुल ऑफ लॉ इंडेक्स 2025 (वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट द्वारा) में भारत 143 देशों में 86वें स्थान पर है।
    • विशेष रूप से, भारत “भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति” श्रेणी में कम अंक प्राप्त करता है, जो दर्शाता है कि विश्व यह मानता है कि हमारी न्यायालय व्यवस्था अभी भी सत्यनिष्ठा संबंधी समस्याओं से जूझ रही है।
  • प्रस्तावित सुधार एवं डिजिटल पारदर्शिता: आधुनिक पहलें न्यायपालिका को अधिक पारदर्शिता और दक्षता की ओर ले जाने का प्रयास करती हैं:
    • विधि आयोग की 230वीं रिपोर्ट (2009): इस रिपोर्ट ने पक्षपात (“अंकल जज सिंड्रोम”) को समाप्त करने के लिए न्यायाधीशों को उनके मूल उच्च न्यायालयों से स्थानांतरित करने की सिफारिश की है।
      • 214वीं रिपोर्ट (2008): कोलेजियम सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।
    • प्रौद्योगिकीय निगरानी: विधिक सूचना प्रबंधन एवं संक्षिप्त विवरण प्रणाली: एक नेटवर्क-आधारित उपकरण, जिसका उपयोग उन मामलों की निगरानी के लिए किया जाता है, जिनमें केंद्र सरकार एक पक्ष होती है
    • ओडिशा उच्च न्यायालय से प्रेरित होकर, जन-विश्वास को सुदृढ़ करने के लिए सभी न्यायालयों द्वारा वार्षिक कार्य-निष्पादन रिपोर्ट प्रकाशित करने की माँग में वृद्धि हुई है।

भारत में भ्रष्टाचार से निपटने हेतु विधिक एवं संस्थागत ढाँचा

  • संवैधानिक प्रावधान
    • अनुच्छेद-124(4) एवं 218: “सिद्ध कदाचार या अक्षमता” के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय/उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर महाभियोग का प्रावधान।
    • अनुच्छेद-311: भ्रष्ट लोक सेवकों की सेवा से बर्खास्तगी (न्यायाधीशों को छोड़कर)।
  • मुख्य विधायन
    • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988: लोक सेवकों द्वारा रिश्वत, अनुचित प्रभाव और अवैध संपत्ति अर्जन को अपराध घोषित करता है।
      • वर्ष 2018 का संशोधन: रिश्वत देने को अपराध घोषित करता है तथा त्वरित सुनवाई को अनिवार्य बनाता है।
    • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013: लोकपाल (केंद्र) और लोकायुक्त (राज्य) की स्थापना करता है, जो प्रधानमंत्री, मंत्रियों, सांसदों और नौकरशाहों के विरुद्ध भ्रष्टाचार की जाँच करते हैं।
      • बहिष्करण: न्यायाधीश (वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों पर लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र को स्थगित किया)।
    • बेनामी लेन-देन अधिनियम, 1988: अघोषित संपत्तियों को लक्षित करता है; प्रवर्तन निदेशालय जाँच करता है।
    • धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002: प्रवर्तन निदेशालय भ्रष्टाचार से संबंधित धन शोधन के मामलों का अभियोजन करता है।
    • केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), 2003: सतर्कता प्रशासन की निगरानी तथा लोक प्रशासन में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए।
      • CVC भ्रष्टाचार के मामलों की निगरानी करता है तथा केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो के कार्य-निष्पादन का पर्यवेक्षण करता है

न्यायिक भ्रष्टाचार के जोखिम और परिणाम

  • सार्वजनिक विश्वास और विधि के शासन का क्षरण: भ्रष्टाचार लोकतांत्रिक वैधता के लिए ‘स्लो पॉइजन’ के समान कार्य करता है। जब न्यायपालिका जो कि “अंतिम आश्रय” है, को समझौता आधारित माना जाता है, तो नागरिकों का विधि के शासन में विश्वास समाप्त हो जाता है।
    • इसके परिणामस्वरूप न्याय का चयनात्मक अनुप्रयोग होने लगता है, जहाँ प्रभावशाली पक्षों को प्राथमिकता दी जाती है और अपराधी दंडमुक्ति के साथ कार्य करते हैं।
    • अंततः, यह अराजकता को प्रोत्साहित करता है और राज्य की मूल आधारशिलाओं को कमजोर करता है।
  • सामाजिक-आर्थिक हाशियाकरण: न्यायिक भ्रष्टाचार उन लोगों को असमान रूप से प्रभावित करता है, जिनके पास न्याय प्राप्त करने के संसाधन नहीं होते हैं।
    • यह ऐसी व्यवस्था का निर्माण करता है, जहाँ धनवान और प्रभावशाली लोग परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि हाशिए पर स्थित समुदायों को निष्पक्ष सुनवाई से वंचित कर दिया जाता है।
    • आर्थिक रूप से, विधिक विश्वसनीयता के इस अभाव से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हतोत्साहित होता है, क्योंकि निवेशकों को अनुचित वाणिज्यिक मुकदमों का भय रहता है, जिससे राष्ट्रीय विकास बाधित होता है।
  • प्रणालीगत अक्षमता और लंबित मामलों का बोझ: भ्रष्ट आचरण प्रायः न्यायिक विलंब के केंद्र में होते हैं।
    • जानबूझकर अभिलेखों में छेड़छाड़, विशिष्ट मामलों को प्राथमिकता देना तथा जानबूझकर प्रक्रियात्मक अवरोध उत्पन्न करना न्यायिक लंबित मामलों के बोझ को और बढ़ा देता है।
    • ये दीर्घ विलंब सामान्य नागरिकों को समयबद्ध न्याय से वंचित करते हैं, जिससे “विलंबित न्याय” वास्तव में “न्याय से वंचना” में परिवर्तित हो जाता है।
    • मार्च 2026 तक, राष्ट्रीय न्यायिक आँकड़ों के अनुसार, 5.2 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
  • शैक्षणिक स्वायत्तता पर “शीतलन प्रभाव”: एक प्रमुख द्वितीयक जोखिम, शिक्षा प्रणाली से संबंधित है।
    • यदि प्रत्येक पाठ्यपुस्तक अध्याय को संवैधानिक संस्थाओं को आहत करने से बचने के लिए जाँचना अनिवार्य हो जाए, तो इससे लेखकों में आत्म-संयम या आत्म-नियंत्रण की प्रवृत्ति उत्पन्न हो सकती है।
    • यह शैक्षणिक स्वायत्तता से समझौता करता है और छात्रों को अपने देश की आधारशिलाओं के प्रति निराशावादी बनाए बिना उन्हें समालोचनात्मक रूप से जागरूक नागरिक के रूप में शिक्षित करना कठिन बना देता है।
  • नियंत्रण और संतुलन के लिए खतरा: जब न्यायाधीश राजनीतिक या कार्यपालिका के दबाव के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं, तो शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर हो जाता है।
    • भ्रष्टाचार राजनीतिक अभिकर्ताओं को न्यायिक निर्णयों पर प्रभाव डालने का अवसर देता है, जिससे न्यायपालिका की अन्य शासन शाखाओं पर नियंत्रण रखने की क्षमता प्रभावी रूप से समाप्त हो जाती है।

न्यायिक दुराचार से संबंधित उच्च-स्तरीय मामले

  • न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (सर्वोच्च न्यायालय): पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने आधिकारिक आवास के नवीनीकरण हेतु सार्वजनिक धन का दुरुपयोग किया।
    • प्रथम महाभियोग प्रस्ताव (1993) लोकसभा में विफल हो गया, जबकि समिति ने उन्हें दोषी पाया था।
  • न्यायमूर्ति पी. डी. दिनाकरन (मुख्य न्यायाधीश, सिक्किम उच्च न्यायालय; पूर्व में कर्नाटक उच्च न्यायालय): अनुपातहीन संपत्तियों के स्वामी थे।
    •  महाभियोग प्रस्ताव राज्यसभा द्वारा पारित किए जाने के बाद (वर्ष 2011) उन्होंने त्याग-पत्र दे दिया।
  • न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (कलकत्ता उच्च न्यायालय): न्यायालय द्वारा नियुक्त अभिरक्षक के रूप में बड़ी धनराशि का दुरुपयोग किया।
    • लोकसभा द्वारा महाभियोग पर मतदान किए जाने से पूर्व (वर्ष 2011) उन्होंने त्याग-पत्र दे दिया।
  • न्यायमूर्ति एस. एन. शुक्ला (इलाहाबाद उच्च न्यायालय): चिकित्सकीय महाविद्यालय प्रकरण (वर्ष 2017) को प्रभावित करने के लिए रिश्वत ली।
    • न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया, परंतु वे सेवानिवृत्ति (वर्ष 2020) तक न्यायाधीश बने रहे। बाद में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने उनके विरुद्ध आरोप-पत्र दायर किया।
  • न्यायमूर्ति आई. एम. कुद्दूसी (ओडिशा उच्च न्यायालय): सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से जुड़े चिकित्सकीय महाविद्यालय रिश्वत कांड (2017) में मध्यस्थ के रूप में शामिल थे।
    •  कार्यवाही: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा गिरफ्तार किए गए, बाद में जमानत प्राप्त हुई। प्रकरण लंबित है।

न्यायिक जवाबदेही की अनिवार्यता

  • संवैधानिक अखंडता का संरक्षण: जवाबदेही तंत्र का उद्देश्य न्यायालयों को कमजोर करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वे कठोर रूप से संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत कार्य करें।
    • यह सुनिश्चित करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता का उपयोग मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए किया जाए, न कि व्यक्तिगत दुराचार या भाई-भतीजावाद के लिए एक ढाल के रूप में कार्य करे।
  • निष्पक्षता और न्यायसंगतता का संरक्षण: न्यायिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ करती है। जब एक स्पष्ट आचार संहिता लागू करने योग्य होती है, तो नागरिक न्यायपालिका को वास्तव में निष्पक्ष और न्यायसंगत मानते हैं।
    •  मजबूत जवाबदेही रिश्वतखोरी और “लेन-देन आधारित” व्यवस्थाओं के विरुद्ध एक निवारक के रूप में कार्य करती है।
  • जवाबदेही के अभाव का समाधान: दशकों से अनेक आरोपों के बावजूद यह तथ्य कि किसी भी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को कभी दोषसिद्ध नहीं किया गया है, एक महत्त्वपूर्ण जवाबदेही अभाव को दर्शाता है।
    •  प्रभावी अनुशासनात्मक तंत्र की स्थापना यह सुनिश्चित करती है कि दुराचार की घटनाओं का शीघ्र और स्पष्ट रूप से समाधान किया जाए, न कि उन्हें गोपनीयता के आवरण के पीछे छिपाया जाए।
  • शक्ति के दुरुपयोग की रोकथाम: उचित जवाबदेही यह सुनिश्चित करती है कि न्यायपालिका अपने अधिकार-क्षेत्र से आगे न बढ़े या वैध एवं रचनात्मक आलोचना को दबाने के लिए अवमानना शक्तियों का दुरुपयोग न करे।
    •  यह न्यायालय के प्रति सम्मान की आवश्यकता और एक कुशल, ईमानदार एवं पारदर्शी विधिक व्यवस्था की माँग करने के जनता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करता है।

न्यायिक भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रथाएँ

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: न्यायिक आचरण और अनुशासनात्मक ढाँचा
    •  न्यायिक आचरण प्रणाली: न्यायाधीशों की जाँच उनके संबंधित परिपथों में न्यायिक परिषदों द्वारा की जाती है।
    • बाह्य समीक्षा निकायों की उपस्थिति निष्पक्ष जाँच और निगरानी सुनिश्चित करती है।
  • यूनाइटेड किंगडम: न्यायिक नियुक्ति आयोग
    •  योग्यता-आधारित नियुक्तियाँ: न्यायिक नियुक्ति आयोग न्यायाधीशों की नियुक्ति योग्यता, पारदर्शिता और विविधता के आधार पर करता है।
    • चयन प्रक्रिया राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र होती है।
  • ऑस्ट्रेलिया: न्यू साउथ वेल्स का न्यायिक आयोग
    • स्वतंत्र निगरानी निकाय: न्यू साउथ वेल्स का न्यायिक आयोग न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतों की जाँच करता है और न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
    • आवधिक निगरानी तथा निरंतर प्रशिक्षण ईमानदारी की संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं।
  • सिंगापुर: ईमानदारी और कठोर अनुशासनात्मक उपाय
    • न्यायिक ईमानदारी मानक: न्यायाधीश ईमानदारी बनाए रखने के लिए कठोर आचार संहिता और वित्तीय प्रकटीकरण मानकों का पालन करते हैं।
    • एक सक्रिय दृष्टिकोण त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करता है और भ्रष्टाचार को हतोत्साहित करता है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानक: न्यायिक आचरण के बैंगलोर सिद्धांत (2002)
    • मुख्य सिद्धांत: 2002 में अंगीकृत ये सिद्धांत (स्वतंत्रता, निष्पक्षता, ईमानदारी, शिष्टता, समानता, दक्षता) न्यायिक आचरण के लिए एक वैश्विक मानक निर्धारित करते हैं।
    • यह नैतिक मानकों और अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के पालन को प्रोत्साहित करता है।

आगे की राह

  • नियुक्तियों और स्थानांतरण संबंधी संरचनात्मक सुधार: वर्तमान प्रणाली को पूर्ण आंतरिक नियंत्रण से हटाकर एक संतुलित और पारदर्शी ढाँचे की ओर स्थानांतरित करने की आवश्यकता है।
    • कोलेजियम का सुधार: राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के एक संशोधित रूप को पुनर्जीवित करने की माँग बढ़ रही है।
      • एक हाइब्रिड मॉडल न्यायिक प्रधानता को बनाए रखते हुए बाहरी निगरानी को सम्मिलित कर सकता है, ताकि स्वतंत्रता का उपयोग पक्षपात के संरक्षण के रूप में न हो।
    • अखिल भारतीय न्यायिक सेवा का कार्यान्वयन: देशभर में भर्ती को मानकीकृत करने के लिए अखिल भारतीय न्यायिक सेवा को लागू किया जाना चाहिए, जिससे अधीनस्थ न्यायपालिका स्तर पर भाई-भतीजावाद की प्रवृत्ति में उल्लेखनीय कमी आएगी।
    • शीतलन अवधि: प्रतिफल आधारित व्यवस्थाओं को रोकने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए सरकारी नियुक्त पदों या लाभों को स्वीकार करने से पूर्व अनिवार्य दो वर्ष का ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ को लागू किया जाना चाहिए।
    • विधायी पूर्ति: स्वैच्छिक संहिताओं और महाभियोग के बीच के अंतराल को पाटने के लिए न्यायिक मानक एवं जवाबदेही विधेयक को पुनर्जीवित कर पारित करने की तात्कालिक आवश्यकता है।
      • यह नागरिकों को शिकायत दर्ज करने के लिए एक वैधानिक ढाँचा प्रदान करेगा और वर्तमान “अस्पष्ट” आंतरिक तंत्र को एक पारदर्शी तथा विधिक रूप से समर्थित प्रक्रिया से प्रतिस्थापित करेगा।
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सूचीकरण की ओर परिवर्तन: “रजिस्ट्री-अधिवक्ता” गठजोड़ से निपटने के लिए ई-न्यायालय परियोजना के तृतीय चरण में मामलों के आवंटन को पूर्णतः स्वचालित किया जाना चाहिए।
      • मामला क्रमांकन और पीठ आवंटन की प्रक्रिया से “मानवीय हस्तक्षेप” को हटाकर प्रणाली “त्वरित धन” के प्रोत्साहनों को व्यवस्थित रूप से समाप्त कर सकती है।
  • निगरानी और अनुशासनात्मक कार्रवाई को सुदृढ़ करना: जवाबदेही को अस्पष्ट “आंतरिक” चर्चाओं से हटाकर लागू किए जा सकने वाले विधिक मानकों की ओर ले जाना आवश्यक है।
    • न्यायिक आचार आयोग: एक स्वतंत्र निकाय को शिकायतों की जाँच करने का अधिकार दिया जाना चाहिए, जिससे जाँच प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध बन सके।
    • अनिवार्य परिसंपत्ति घोषणा: न्यायाधीशों द्वारा परिसंपत्तियों की वार्षिक घोषणा अनिवार्य की जानी चाहिए तथा स्वतंत्र सत्यापन के लिए इन्हें आधिकारिक वेबसाइटों पर प्रकाशित किया जाना चाहिए।
    • लोकपाल का विस्तार: लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 में संशोधन कर उच्च न्यायपालिका को (आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ) सम्मिलित करने से यह सुनिश्चित होगा कि शासन की कोई भी शाखा, भ्रष्टाचार निगरानी से ऊपर न हो।
    • हालिया प्रवर्तन: वर्ष 2025 में देखा गया कि न्यायपालिका ने प्रणाली की “आंतरिक स्वच्छता” आरंभ कर दी है, जहाँ 12 निम्न न्यायालय के न्यायाधीशों को अनुपातहीन परिसंपत्तियाँ रखने या संदिग्ध जमानत आदेश जारी करने के कारण पद से हटाया गया या सेवानिवृत्ति के लिए बाध्य किया गया।
  • प्रौद्योगिकीय और विधायी आधुनिकीकरण: न्याय व्यवस्था की “यांत्रिकी” का आधुनिकीकरण, भ्रष्टाचार के प्रति संवेदनशील मानवीय तत्त्व को कम करता है।
    • डिजिटलीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना का विस्तार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मामला प्रबंधन के एकीकरण से प्रक्रियात्मक अवरोधों की पहचान की जा सकती है तथा न्यायालय अभिलेखों में मैनुअल छेड़छाड़ को रोका जा सकता है।
    • न्यायालय की अवमानना विधि का सुधार: न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 में संशोधन कर “अवमानना” को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक है, ताकि इस शक्ति का उपयोग न्यायालय की गरिमा की रक्षा के लिए हो, न कि वैध और रचनात्मक आलोचना को दबाने के लिए।
  • शैक्षणिक और अकादमिक शुद्धता के लिए दिशा-निर्देश: पाठ्यपुस्तकों में “विकृत” कथनों के विशेष मुद्दे को हल करने के लिए अकादमिक सामग्री के लिए एक नया मानक आवश्यक है।
    • तकनीकी परीक्षण: न्यायपालिका पर लिखते समय पाठ्यचर्या क्षेत्र समूहों में विधिक विशेषज्ञों या सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को सम्मिलित किया जाना चाहिए, ताकि तकनीकी और संवैधानिक शुद्धता सुनिश्चित की जा सके।
    • तथ्य-आधारित आलोचना: न्यायिक त्रुटियों पर कोई भी चर्चा सामान्यीकृत या पक्षपातपूर्ण कथनों के स्थान पर आधिकारिक दस्तावेजों (जैसे विधि आयोग की रिपोर्टों) पर आधारित होनी चाहिए।
    • “संवैधानिक नैतिकता” का ढाँचा: पाठ्यपुस्तकों को एक संतुलित कथन अपनाना चाहिए, अधिकारों की रक्षा में न्यायालयों की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए साथ ही प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक सतत् सुधारों को स्वीकार करना चाहिए।

निष्कर्ष

शिक्षा का उद्देश्य समालोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करना है और पाठ्यपुस्तकों को एक कार्यशील लोकतंत्र की जटिलताओं को प्रतिबिंबित करना चाहिए। हालाँकि, इसे संवैधानिक नैतिकता के साथ संतुलित किया जाना आवश्यक है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्यार्थियों को प्रणालीगत मुद्दों के प्रति जागरूक बनाने के साथ-साथ उन्हें उन संस्थाओं की अखंडता का सम्मान करना भी सिखाया जाए, जो राष्ट्र को एकजुट बनाए रखती हैं।

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