“जस्ट डेजर्ट्स” का सिद्धांत
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हाल ही में “जस्ट डेजर्ट्स” के सिद्धांत के आधार पर आपराधिक न्याय नीति संबंधी बहसों और दंड निर्धारण सुधारों के संदर्भ में चर्चा की गई है।
“जस्ट डेजर्ट्स” के सिद्धांत के बारे में
- जस्ट डेजर्ट्स का सिद्धांत आपराधिक न्याय में दंड का एक सिद्धांत है, जिसके अनुसार अपराधियों को उनके अपराध की गंभीरता के अनुपात में दंडित किया जाना चाहिए।
- मुख्य विचार यह है कि दंड इसलिए उचित है क्योंकि अपराधी नैतिक रूप से उसका पात्र है।
प्रमुख विशेषताएँ
- प्रतिशोधात्मक सिद्धांत: यह प्रतिशोधात्मक न्याय में निहित है, जहाँ दंड इसलिए दिया जाता है क्योंकि एक गलत कार्य किया गया है, न कि मुख्यतः भय उत्पन्न करने या सुधार के लिए।
- अनुपातिकता: दंड की कठोरता अपराध की गंभीरता के अनुपात में होनी चाहिए (जैसे- छोटी चोरी बनाम हत्या)।
- नैतिक उत्तरदायित्व: यह मानता है कि व्यक्ति तर्कसंगत एजेंट हैं और अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं।
- पश्चदृष्टि दृष्टिकोण: यह अतीत के कृत्य (किए गए अपराध) पर केंद्रित होता है, जबकि निवारण (Deterrence) भविष्य की रोकथाम की ओर देखता है।
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ब्लॉकचेन इंडिया चैलेंज
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हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने ब्लॉकचेन-आधारित डिजिटल शासन समाधान को बढ़ावा देने हेतु ब्लॉकचेन इंडिया चैलेंज प्रारंभ किया।
ब्लॉकचेन इंडिया चैलेंज के बारे में
- ब्लॉकचेन इंडिया चैलेंज एक राष्ट्रीय पहल है, जिसे इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा प्रारंभ किया गया है तथा उन्नत संगणन विकास केंद्र (C-DAC) द्वारा क्रियान्वित किया जा रहा है।
- इसका उद्देश्य भारतीय स्टार्ट-अप्स को सरकारी विभागों के लिए ब्लॉकचेन-आधारित समाधानों का डिजाइन एवं पायलट परीक्षण करने हेतु प्रोत्साहित करना है।
- यह चुनौती नियामकीय नियंत्रण, सुरक्षा, ऑडिट-योग्यता तथा छेड़छाड़-रोधी अभिलेख सुनिश्चित करने वाले ‘परमिशन्ड ब्लॉकचेन’ तंत्रों के विकास पर केंद्रित है।
- उद्देश्य
- डिजिटल शासन को सुदृढ़ करने हेतु सार्वजनिक सेवा वितरण के लिए सुरक्षित और पारदर्शी ब्लॉकचेन समाधान विकसित करना।
- विभिन्न शासन क्षेत्रों में दस प्रभावशाली उपयोग मामलों का विकास करना।
- समर्थन तंत्र: यह उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) से मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप्स और सरकारी विभागों के बीच सहयोग को बढ़ावा देता है, ताकि नवोन्मेषी विचारों को क्रियान्वित करने योग्य, क्षेत्र-तैयार समाधानों में परिवर्तित किया जा सके।
- चयनित स्टार्ट-अप्स को वास्तविक प्रशासनिक संदर्भों में समाधान लागू करने हेतु चरणबद्ध वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।
ब्लॉकचेन प्रणाली के बारे में
- ब्लॉकचेन प्रणाली एक विकेंद्रीकृत और डिस्ट्रीब्युटेड डिजिटल लेखा-बही प्रौद्योगिकी है, जो लेन-देन को अनेक कंप्यूटरों में सुरक्षित, पारदर्शी और छेड़छाड़-रोधी तरीके से दर्ज करती है।
- परमिशन्ड ब्लॉकचेन प्रणालियाँ सामान्यतः सरकारी और उद्यम अनुप्रयोगों में नियामकीय नियंत्रण और डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उपयोग की जाती हैं।
- प्रमुख विशेषताएँ
- वितरित लेखा-बही: डेटा को किसी एक केंद्रीय प्राधिकरण में संगृहीत करने के बजाय नोड्स के नेटवर्क में साझा और समकालिक किया जाता है।
- अपरिवर्तनीयता: एक बार दर्ज किए जाने के बाद, नेटवर्क की सहमति के बिना लेन-देन में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।
- पारदर्शिता और ऑडिट-योग्यता: सभी अधिकृत प्रतिभागी लेन-देन का सत्यापन कर सकते हैं, जिससे विश्वास सुनिश्चित होता है।
- क्रिप्टोग्राफिक सुरक्षा: लेन-देन को एन्क्रिप्शन और सहमति तंत्र के माध्यम से सुरक्षित किया जाता है।
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एप्स्टीन–बार वायरस (Epstein-Barr virus)

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वैज्ञानिकों ने चूहों में आशाजनक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी की सूचना दी है, जो एप्स्टीन–बार वायरस (Epstein-Barr virus) संक्रमण को रोक सकती हैं, जिससे एक प्रभावी टीके की संभावनाएँ आगे बढ़ी हैं।
एप्स्टीन–बार वायरस (EBV) के बारे में
- एप्स्टीन–बार वायरस (EBV) एक सामान्य हर्पीज वायरस है, जो मनुष्यों को संक्रमित करता है और प्रारंभिक संक्रमण के बाद जीवनभर सुप्त अवस्था (latency) में बना रहता है।
- यह संक्रामक मोनोन्यूक्लिओसिस का प्रमुख कारण है तथा कई दीर्घकालिक और घातक स्थितियों से संबंधित है।
- प्रभावित जनसंख्या: वैश्विक जनसंख्या का लगभग 95% जीवन के किसी-न-किसी चरण में EBV से संक्रमित होता है।
- अधिकांश संक्रमण लक्षणरहित या हल्के होते हैं, किंतु अंग प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं सहित इम्यूनोकॉम्प्रोमाइज्ड (immunocompromised) व्यक्तियों में गंभीर जटिलताओं का जोखिम अधिक होता है।
- स्वास्थ्य पर प्रभाव
- EBV का संबंध संक्रामक मोनोन्यूक्लिओसिस, मल्टीपल स्क्लेरोसिस तथा कई प्रकार के कैंसर, जिनमें EBV-संबद्ध लिंफोमा शामिल हैं, से है।
- प्रत्यारोपण रोगियों में वायरस का पुनःसक्रिय होना जीवन-घातक जटिलताओं का कारण बन सकता है, जिससे प्रभावी निवारक रणनीतियों की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
एप्स्टीन–बार एंटीबॉडी के बारे में
- शोधकर्ताओं ने दो वायरल सतही प्रोटीन — gp350, जो वायरस को कोशिकाओं से जुड़ने में सहायता करता है, तथा gp42, जो वायरल प्रवेश को सुगम बनाता है, को लक्षित करने वाली मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित की।
- मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (mAbs) प्रयोगशाला में निर्मित प्रोटीन होते हैं, जो प्राकृतिक एंटीबॉडी की तरह कार्य करते हैं और प्रतिरक्षा तंत्र को सुदृढ़ कर विशिष्ट रोगग्रस्त कोशिकाओं, जैसे कैंसर या वायरस को लक्षित करते हैं।
- विकसित द्वारा: यह अध्ययन संयुक्त राज्य अमेरिका के सिएटल स्थित फ्रेड हच कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया तथा सेल रिपोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित हुआ।
महत्त्व
- संक्रमण की रोकथाम: gp42 को लक्षित करने वाली एक एंटीबॉडी ने मानव प्रतिरक्षा तंत्र वाले चूहों में EBV संक्रमण को सफलतापूर्वक रोका।
- आंशिक सुरक्षात्मक प्रभाव: gp350 को लक्षित करने वाली एंटीबॉडी ने आंशिक सुरक्षा प्रदान की, जिससे संकेत मिलता है कि मल्टीपल टार्गेट्स एप्रोच वैक्सीन डिजाइन को सुदृढ़ कर सकता है।
- भविष्य के टीके की संभावना: ये निष्कर्ष EBV संक्रमण और उससे संबंधित जटिलताओं की रोकथाम हेतु एंटीबॉडी-आधारित उपचारों या टीकों के विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं।
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काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में प्रतिवर्ष जलपक्षी गणना

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7वीं जलपक्षी जनगणना के दौरान एक दुर्लभ यूरेशियन गोताखोर बतख स्म्यू (Smew) को पहली बार काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में देखा गया, जिससे जलवायु संबंधी चिंताएँ उभरकर सामने आई हैं।
जलपक्षी गणना (2026) के प्रमुख निष्कर्ष(2026)
- हल्की गिरावट: गणना में 107 प्रजातियों के 1,05,540 जलपक्षी दर्ज किए गए, जो वर्ष 2025 की तुलना में 6,522 जलपक्षी और 17 प्रजातियाँ कम हैं।
- पहली बार स्म्यू की उपस्थिति दर्ज: दुर्लभ स्म्यू (Mergellus albellus) को रोमारी–डोंडुवा बील में देखा गया, जो काजीरंगा परिदृश्य में इसका प्रथम रिकॉर्ड है।
- महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि ‘हॉटस्पॉट’: रोमारी बील में सर्वाधिक संख्या (15,661 पक्षी) और सर्वाधिक विविधता (77 प्रजातियाँ) दर्ज की गई, जिससे बाढ़भूमि की सहनशीलता पुनः प्रमाणित हुई।
- संकटग्रस्त प्रजातियों की उपस्थिति: इस गणना में 18 प्रजातियाँ दर्ज की गईं, जिन्हें इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा अत्यंत संकटग्रस्त, संकटग्रस्त, असुरक्षित या निकट संकटग्रस्त के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
प्रमुख चिंताएँ
- जलवायु-प्रेरित वितरण परिवर्तन: स्म्यू की अनियमित उपस्थिति संभावित प्रवासन परिवर्तन का संकेत देती है, जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हो सकता है।
- आवास और प्रदूषण संबंधी खतरे: आर्द्रभूमियाँ अतिक्रमण, शिकार, तेल प्रदूषण तथा जल-प्रवाह में व्यवधान जैसे जोखिमों का सामना कर रही हैं, जो प्रवासी पक्षियों के पुनः ईंधन भरने वाले स्थलों को प्रभावित करते हैं।
- जलपक्षियों की घटती संख्या: कुल संख्या में कमी से आर्द्रभूमि संरक्षण उपायों को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
स्म्यू (Mergellus albellus) के बारे में
- विशेषता: नर स्म्यू का शरीर काला एवं सफेद होता है, जबकि मादा का शरीर धब्बेदार भूरा होता है।
- आवास: यह सर्दियों में सुरक्षित, मछली-समृद्ध मीठे जल की झीलों और आर्द्रभूमियों को पसंद करता है।
- वितरण: यह उत्तरी यूरोप और साइबेरिया में प्रजनन करता है तथा यूरोप और एशिया के कुछ भागों में शीतकाल व्यतीत करता है।
- यह भारत में एक दुर्लभ शीतकालीन आगंतुक है।
- इसकी उपस्थिति अनियमित और स्थानीयकृत होती है, मुख्यतः उत्तर या मध्य भारत की आर्द्रभूमियों में, जिनमें उत्तर प्रदेश का हैदरपुर भी शामिल है।
- IUCN स्थिति: कम चिंताग्रस्त
- यद्यपि आवास ह्रास और मानवीय दबावों के कारण वैश्विक स्तर पर इनकी संख्या में गिरावट देखी जा रही है।
- वैश्विक स्तर पर लगभग 1,30,000 स्म्यू होने का अनुमान है।
- भारत में संरक्षण: इसे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है, जो प्रवासी पक्षियों और उनके आवासों की रक्षा करता है।
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समुद्री अभ्यास मिलन 2026
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हाल ही में भारतीय नौसेना का प्रमुख बहुपक्षीय समुद्री अभ्यास मिलन 2026 विशाखापत्तनम तट के पास आयोजित किया गया।
अभ्यास मिलन 2026
- उद्गम: इसे वर्ष 1995 में अंडमान एवं निकोबार कमान के तहत प्रारंभ किया गया था।
- प्रारंभिक प्रतिभागी: इंडोनेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका और थाईलैंड (4 नौसेनाएँ) शामिल थे और अब यह दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका, यूरोप तथा अमेरिका के 50 से अधिक देशों तक विस्तारित हो चुका है।
मिलन-2026 के बारे में
- अभ्यास मिलन 2026 भारत के प्रमुख द्विवार्षिक बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास का 13वाँ संस्करण है।
- आयोजन स्थल: 15 से 25 फरवरी, 2026 तक विशाखापत्तनम में आयोजित किया गया।
- भागीदारी: 70 से अधिक मित्र विदेशी देश (FFCs) शामिल हुए, जिनमें जर्मनी, फिलीपींस और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रथम-बार प्रतिभागी भी सम्मिलित थे।
- रणनीतिक दृष्टि: यह ‘महासागर’ (मैरीटाइम एसोसिएशन फॉर होलिस्टिक एडवांसमेंट एंड सिक्योरिटी फॉर ऑल इन द रीजन) तथा ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) की परिकल्पना के अनुरूप है।
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लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO)
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हाल ही में लार्सन एंड टूब्रो (L&T) को परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) द्वारा महाराष्ट्र के हिंगोली में लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) के निर्माण का अनुबंध प्रदान किया गया है।
लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) के बारे में
- लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल-वेव ऑब्जर्वेटरी (LIGO) एक इंटरफेरोमीटर-आधारित वेधशाला है, जिसे गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने के लिए डिजाइन किया गया है।
- वैज्ञानिक सहयोग: यह एक वैज्ञानिक सहयोग और इंजीनियरिंग का चमत्कार है, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका में दो सुविधाएँ शामिल हैं:- एक प्रशांत उत्तर पश्चिम में हैनफोर्ड, वाशिंगटन में और दूसरी मैक्सिको की खाड़ी के पास लिविंगस्टन, लुइसियाना में।
- कार्य सिद्धांत
- यह लेजर इंटरफेरोमेट्री तकनीक का उपयोग करता है।
- इसमें 4-4 किलोमीटर लंबी L-आकार की निर्वात सुरंगें होती हैं।
- एक लेजर किरण को दो भागों में विभाजित कर दर्पणों से परावर्तित किया जाता है।
- पुनः संयोजित किरणें, एक इंटरफेरेंस पैटर्न (हस्तक्षेप प्रतिरूप) बनाती हैं।
- अंतरिक्ष में अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर होने वाले खिंचाव या संकुचन का भी इससे पता लगाया जा सकता है।
LIGO-India क्या है?
- LIGO-India भारत में स्थापित की जाने वाली एक उन्नत गुरुत्वाकर्षण-तरंग वेधशाला है।
- इस परियोजना को वर्ष 2016 में भारत सरकार से सैद्धांतिक स्वीकृति प्राप्त हुई थी।
- स्थान: औंढा, हिंगोली जिला (महाराष्ट्र)।
- लागत: लगभग ₹2,600 करोड़
- संचालन संबंधी लक्ष्य: परियोजना को 48 महीनों के भीतर (वर्ष 2030 तक) पूर्ण किए जाने की अपेक्षा है।
- एक बार संचालन प्रारंभ हो जाने पर, LIGO-India गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने वाले यंत्रों के एक नेटवर्क में शामिल हो जाएगा, जिसमें अमेरिका में मौजूदा LIGO डिटेक्टर, इटली में VIRGO और जापान में KAGRA डिटेक्टर शामिल हैं, जिससे एक वैश्विक वेधशाला नेटवर्क बनेगा।
- उद्देश्य: ब्रह्मांड से उत्पन्न गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाना।
- कार्यान्वयनकर्ता
- परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE)
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST)
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: राष्ट्रीय विज्ञान फाउंडेशन (USA) के साथ एक समझौता ज्ञापन के अंतर्गत।
- भारत के लिए महत्त्व
- भारत की खगोलभौतिकी एवं अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नेतृत्व क्षमता को सुदृढ़ करेगा।
- अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों (लेजर, ऑप्टिक्स, निर्वात प्रणालियाँ आदि) के विकास को प्रोत्साहन देगा।
- ‘मेक इन इंडिया’ पहल तथा औद्योगिक भागीदारी (जैसे- L&T) को बढ़ावा देगा।
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गंगा में साइंटिफिक रिवर रैंचिंग
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नमामि गंगा के अंतर्गत ‘साइंटिफिक रिवर रैंचिंग’ पद्धति ने एक दशक से अधिक समय तक देशज मछलियों को नदियों में छोड़कर गंगा की देशज मछली प्रजातियों को पुनर्जीवित किया है।
साइंटिफिक रिवर रैंचिंग क्या है?
- परिभाषा: यह एक वैज्ञानिक तरीके से किसी प्रजाति की संवर्द्धन विधि है, जिसमें हैचरी में पाली गई देशज मछलियों को प्राकृतिक नदियों में छोड़ा जाता है।
- उद्देश्य: घटती मछली प्रजातियों का पुनर्स्थापित करना, जलीय जैव विविधता का संरक्षण करना और नदी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य में सुधार करना।
- वैज्ञानिक आधार
- आनुवंशिक शुद्धता बनाए रखने के लिए पारंपरिक प्रजनन अनुकूल सहायता का उपयोग करना।
- वैज्ञानिक रूप से निर्धारित क्षेत्रों में छोड़ना।
- जीवित रहने की दर बढ़ाने के लिए मछलियों को इष्टतम आकार तक पालना।
- मत्स्यपालन से अंतर: मत्स्यपालन में मछलियों को नियंत्रित तालाबों/टैंकों में उपभोग के लिए पाला जाता है, जबकि नदीय पालन में मछलियों को देशज आबादी को स्थायित्व प्रदान करने के लिए प्राकृतिक नदियों में छोड़ा जाता है।
गंगा में ‘साइंटिफिक रिवर रैंचिंग’
- गंगा में देशज मछली प्रजातियों की घटती संख्या को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत वैज्ञानिक रिवर रैंचिंग एक प्रमुख हस्तक्षेप है।
- मछली आबादी में गिरावट के कारण: आवासीय क्षरण, प्रदूषण, प्रवाह में परिवर्तन तथा अनियंत्रित मत्स्यन।
- कार्यान्वयन एजेंसी: आईसीएआर–केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIFRI)।
- मानक (2017–2025): गंगा एवं उसकी सहायक नदियों के पारिस्थितिकी रूप से महत्त्वपूर्ण खंडों में 169 रिवर रैंचिंग कार्यक्रम संचालित किए गए।
- 205.5 लाख (20.55 मिलियन) छोटी स्वदेशी मछलियों को नदियों में छोड़ा गया।
- प्रजाति-केंद्रित दृष्टिकोण: इस पहल के अंतर्गत देशज प्रजातियों पर विशेष बल दिया गया है, ताकि जैव विविधता का संरक्षण, आनुवंशिक शुद्धता का संरक्षण तथा सतत् नदीय मत्स्य संसाधनों को समर्थन सुनिश्चित किया जा सके।
- प्रमुख प्रजातियाँ निम्नलिखित हैं:
- इंडियन मेजर कार्प्स
- महशीर
- देशज कैटफिश
- चितला
- मीठे जल की स्कैंपी
- हिल्सा।
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स्पीकर ऑफ द केनेसट मेडल
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘स्पीकर ऑफ द केनेसट मेडल’ से सम्मानित किया गया।
- वह इस सम्मान को प्राप्त करने वाले प्रथम अंतरराष्ट्रीय नेता बने, जिससे एक ऐतिहासिक कूटनीतिक उपलब्धि स्थापित हुई।
केनेसट सम्मान के बारे में
- ‘स्पीकर ऑफ द केनेसट मेडल’ इजरायल की संसद, केनेसट (Knesset), द्वारा प्रदान किया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।
- यह सम्मान उन विशिष्ट वैश्विक नेताओं को प्रदान किया जाता है, जिन्होंने इजरायल के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने में असाधारण योगदान दिया हो।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रतिष्ठित पदक को प्राप्त करने वाले प्रथम विदेशी नेता हैं।
- महत्त्व
- यह सम्मान भारत–इजरायल के मध्य रणनीतिक संबंधों की गहराई को दर्शाता है, विशेषकर रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन तथा प्रौद्योगिकी सहयोग के क्षेत्रों में।
- यह पश्चिम एशिया में बढ़ते द्विपक्षीय विश्वास और साझा भू-राजनीतिक हितों को भी प्रतिबिंबित करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रदत्त अन्य सर्वोच्च नागरिक सम्मान
- ‘ऑर्डर ऑफ जायेद’ (संयुक्त अरब अमीरात, 2019)
- ‘ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल’ (रूस, 2019)
- ‘किंग अब्दुलअजीज सैश’ (सऊदी अरब, 2016)
- ‘ऑर्डर ऑफ द नाइल’ (मिस्र, 2023)
- ‘लीजन ऑफ मेरिट’ (संयुक्त राज्य अमेरिका, 2020)
- ‘ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर’ (फ्राँस, 2023)
- ‘ऑर्डर ऑफ फिजी’ (फिजी, 2014)
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TERI का विश्व सतत् विकास शिखर सम्मेलन 2026
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हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने TERI के विश्व सतत् विकास शिखर सम्मेलन (WSDS) के रजत जयंती (25वें) संस्करण का उद्घाटन किया।
विश्व सतत् विकास शिखर सम्मेलन (WSDS) 2026
- यह ‘द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट’ (TERI) द्वारा आयोजित एक वार्षिक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन है।
- इसकी स्थापना वर्ष 2001 में ‘दिल्ली सतत् विकास शिखर सम्मेलन’ के रूप में की गई थी।
- वर्ष 2026 का संस्करण इस शिखर सम्मेलन का रजत जयंती (25वाँ संस्करण) होगा।
- 25वाँ संस्करण थीम: परिवर्तन: सतत विकास के लिए दृष्टि, आवाज और मूल्य
- महत्त्व: यह ‘ग्लोबल साउथ’ में आयोजित सतत् विकास पर केंद्रित एकमात्र स्वतंत्र रूप से आयोजित अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन है।
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