संक्षिप्त समाचार

30 Mar 2026

2K22 तुंगुस्का वायु रक्षा प्रणाली

भारत ने ड्रोन, विमानों तथा निम्न-ऊँचाई वाले खतरों के विरुद्ध अपनी बहु-स्तरीय वायु रक्षा क्षमता को सुदृढ़ करने के लिए रूस से 2K22 तुंगुस्का (Tunguska) प्रणाली की खरीद को स्वीकृति दी है।

2K22 तुंगुस्का वायु रक्षा प्रणाली के बारे में

  • 2K22 तुंगुस्का एक सोवियत मूल की, स्व-चालित तथा छोटे रेंज (Short-range) की वायु रक्षा प्रणाली है, जिसे जमीनी बलों को निम्न-ऊँचाई वाले हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है।
  • नाटो नामकरण: इसे नाटो द्वारा SA-19 “ ग्राइसन (Grison)” नाम दिया गया है।
  • हाइब्रिड हथियार प्रणाली: यह एक ही प्लेटफॉर्म पर सतह-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों और दो 30 मिमी. स्वचालित तोपों को मिलाकर बहुस्तरीय मारक क्षमता प्रदान करता है।
  • लक्ष्य क्षमता: यह प्रणाली हेलीकॉप्टर, ड्रोन, निम्न-ऊँचाई वाले विमान तथा क्रूज मिसाइलों को निष्क्रिय करने में सक्षम है, जिससे यह आधुनिक खतरों के विरुद्ध अत्यंत प्रभावी बनती है।
  • मिसाइल रेंज: इसकी 9M311 शृंखला की मिसाइलें 8–10 किमी. की दूरी और लगभग 3,500 मीटर की ऊँचाई तक उच्च सटीकता के साथ लक्ष्यों को भेद सकती हैं।
  • मारक क्षमता: दोहरी स्वचालित तोपें 3,900-5,000 गोले प्रति मिनट की दर से दागती हैं, जिससे निकटवर्ती क्षेत्रों में तीव्र रक्षा संभव हो पाती है।
  • रडार एवं प्रौद्योगिकी: इसमें 360° अधिग्रहण रडार (acquisition radar), ट्रैकिंग रडार तथा डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम शामिल हैं, जो सटीक लक्ष्य निर्धारण में सहायक हैं।
  • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता: रडार जामिंग की स्थिति में भी यह प्रणाली ऑप्टिकल ट्रैकिंग सिस्टम के माध्यम से कार्य कर सकती है।
  • गतिशीलता: ट्रैक वाले बख्तरबंद चेसिस (chassis) पर लगी होने के कारण, यह विभिन्न भू-भागों में मशीनीकृत बलों के साथ-साथ चल सकती है।
  • रणनीतिक भूमिका: यह बहुस्तरीय वायु रक्षा नेटवर्क का एक प्रमुख घटक है, जो विशेष रूप से ड्रोन और सटीक निर्देशित हथियारों के विरुद्ध प्रभावी है।

जोजिला दर्रा

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जोजिला दर्रे पर हाल ही में आए एक घातक हिमस्खलन के कारण कई लोगों की मृत्यु हो गई और कई गंभीर रूप से घायल हुए।

जोजिला दर्रा (Zoji La Pass) के बारे में

  • जोजिला एक उच्च-ऊँचाई वाला पर्वतीय दर्रा (~3,580 मीटर) है, जो पश्चिमी हिमालय में स्थित है और कश्मीर घाटी को लद्दाख से जोड़ता है।
  • स्थान: यह जम्मू-कश्मीर के गांदरबल और लद्दाख के कारगिल के बीच स्थित है, जो सोनमर्ग को द्रास–सुरु घाटियों तथा आगे लेह से जोड़ता है।
  • रणनीतिक महत्त्व: यह राष्ट्रीय राजमार्ग-1 (NH-1) पर एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है, जो श्रीनगर को लेह से जोड़ते हुए लद्दाख तक सैन्य और नागरिक पहुँच सुनिश्चित करता है।
  • सैन्य महत्त्व: यह सियाचिन ग्लेशियर और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के निकट तैनात भारतीय सेना के लिए एक प्रमुख आपूर्ति मार्ग के रूप में कार्य करता है।
  • मौसम परिस्थितियाँ: भारी हिमपात के कारण यह दर्रा सर्दियों में बंद रहता है, जिससे संपर्क प्रभावित होता है।
  • अवसंरचना विकास: जोजिला सुरंग परियोजना का उद्देश्य कश्मीर और लद्दाख के बीच पूरे वर्ष संपर्क सुनिश्चित करना है।

शिगेलोसिस 

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केरल में शिगेलोसिस (Shigellosis) के प्रकोप की सूचना मिली है। इसमें कई मौतें और अनेक संक्रमण सामने आए हैं, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ गई है।

शिगेलोसिस (Shigellosis) के बारे में

  • शिगेलोसिस एक अत्यधिक संक्रामक बैक्टीरियल संक्रमण है, जो शिगेला (Shigella) जीवाणु के कारण होता है और विशेषकर पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में तीव्र दस्त (Acute diarrhoea) उत्पन्न करता है।
  • संक्रमण: यह मल-मुख मार्ग (faecal-oral route) से फैलता है, जिसमें दूषित भोजन और पानी प्रमुख माध्यम होते हैं।
  • लक्षण: सामान्य लक्षणों में दस्त (अक्सर रक्तयुक्त), पेट में ऐंठन, बुखार, उल्टी तथा बार-बार शौच की इच्छा शामिल हैं।
  • जोखिम कारक: छोटे बच्चों, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले व्यक्तियों, खराब परिस्थितियों में रहने वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक होता है।
  • उपचार: अधिकांश मामलों में यह स्वतः सीमित होता है और केवल पर्याप्त जलयोजन (Hydration) तथा आराम की आवश्यकता होती है, जबकि गंभीर मामलों में एंटीबायोटिक्स और चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है।
  • वैश्विक भार: विश्वभर में प्रतिवर्ष लगभग 188 मिलियन मामले दर्ज होते हैं, जिनमें पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में मृत्यु दर उल्लेखनीय है।
  • एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) की चिंता: बढ़ता हुआ एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR) उपचार को कठिन बना रहा है, जिससे बेहतर स्वच्छता और नए उपचार विकल्पों की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

सतही जल और महासागरीय स्थलाकृति (SWOT) उपग्रह

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नासा ने सतही जल और महासागरीय स्थलाकृति उपग्रह से प्राप्त गुरुत्वाकर्षण आधारित आँकड़ों का उपयोग करके समुद्र तल का नया मानचित्र तैयार किया है।

सतही जल और महासागरीय स्थलाकृति (SWOT) उपग्रह के बारे में

  • यह एक संयुक्त पृथ्वी अवलोकन मिशन है, जिसे नासा और फ्राँस की अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा संचालित किया जा रहा है।
  • प्रक्षेपण: इसे दिसंबर 2022 में वैश्विक सतही जल के मानचित्रण के लिए प्रक्षेपित किया गया था।
  • उद्देश्य: महासागरों, नदियों और झीलों में जल की ऊँचाई तथा वितरण का मापन कर पृथ्वी के जल चक्र को समझना।
  • प्रौद्योगिकी: यह उपग्रह उन्नत ‘Ka-बैंड रडार इंटरफेरोमीटर’ का उपयोग करता है, जो जल सतह की ऊँचाई में सेंटीमीटर स्तर तक के सूक्ष्म परिवर्तनों का पता लगाने में सक्षम है।
  • कवरेज: यह प्रत्येक 21 दिनों में पृथ्वी की लगभग 90% सतह का अवलोकन कर उच्च-रिजॉल्यूशन और विस्तृत आँकड़े प्रदान करता है।
  • महासागरीय उपयोग: यह महासागरीय धाराओं, भँवरों तथा समुद्र-स्तर में वृद्धि का अध्ययन करने में सहायक है और गुरुत्वाकर्षण से उत्पन्न सतही परिवर्तनों के माध्यम से समुद्र तल की संरचना का अप्रत्यक्ष मानचित्रण करता है।
  • आंतरिक जल निकायों की निगरानी: यह झीलों, जलाशयों और नदियों सहित छोटे जल निकायों का भी विस्तृत अवलोकन संभव बनाता है, जिन्हें पहले दर्ज नहीं किया जा सका था।
  • महत्त्व: यह उपग्रह जलवायु परिवर्तन, जल विज्ञान तथा महासागर-वायुमंडल अंतःक्रियाओं की समझ को और अधिक सुदृढ़ करता है।

वैश्विक हीलियम की कमी तथा प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखला

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मध्य पूर्व संघर्ष के कारण उत्पन्न वैश्विक हीलियम की कमी अब प्रौद्योगिकी आपूर्ति शृंखलाओं, विशेषकर अर्द्धचालक (सेमीकंडक्टर) उत्पादन, को प्रभावित करने लगी है।

प्रौद्योगिकी उद्योग में हीलियम का महत्त्व

  • हीलियम चिप निर्माण में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, जिसका उपयोग शीतलन, रिसाव का पता लगाने तथा सूक्ष्म एवं सटीक प्रक्रियाओं में किया जाता है।
  • आपूर्ति संबंधी बाधाएँ: हीलियम की आपूर्ति भौगोलिक रूप से सीमित है, जिसमें कतर वैश्विक उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा प्रदान करता है।
  • उत्पादक देश: हीलियम का उत्पादन कुछ ही देशों में केंद्रित है, क्योंकि यह मुख्यतः प्राकृतिक गैस के प्रसंस्करण के उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होता है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका और कतर इसके प्रमुख उत्पादक हैं।
  • बाजार प्रभाव: आपूर्ति में बाधा और परिवहन संबंधी चुनौतियों के कारण हीलियम की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • अर्द्धचालक उद्योग पर प्रभाव: चिप निर्माण करने वाली कंपनियाँ उत्पादन में मंदी का सामना कर रही हैं और उन्हें आवश्यक उत्पादन को प्राथमिकता देनी पड़ सकती है।
  • आपूर्ति शृंखला पर प्रभाव: इस कमी के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और स्मार्टफोन जैसे उद्योगों पर व्यापक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
  • विकल्प: कंपनियाँ हीलियम के वैकल्पिक स्रोतों की खोज कर रही हैं, जिनमें संयुक्त राज्य अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता भी शामिल है।

हीलियम के बारे में

  • हीलियम एक रंगहीन, गंधहीन तथा निष्क्रिय उत्कृष्ट गैस है, जिसका परमाणु क्रमांक 2 है।
  • आवर्त सारणी में स्थिति: यह उत्कृष्ट गैसों के समूह (समूह 18) में आता है और इसकी बाह्य इलेक्ट्रॉन परत पूर्ण होने के कारण यह रासायनिक रूप से अभिक्रियाशील नहीं होता है।
  • उपस्थिति: हीलियम ब्रह्मांड में दूसरा सबसे प्रचुर तत्त्व है, किंतु पृथ्वी पर यह दुर्लभ है और मुख्यतः प्राकृतिक गैस भंडारों से प्राप्त किया जाता है।
  • भौतिक गुण: इसका क्वथनांक अत्यंत निम्न (-269°C) होता है, जिससे यह अति-निम्न तापमान वाले अनुप्रयोगों के लिए उपयोगी बनता है।
  • प्रमुख उपयोग: हीलियम का उपयोग क्रायोजेनिक्स (अत्यल्प ताप तकनीक), अर्द्धचालक निर्माण, एमआरआई मशीनों, रिसाव पहचान तथा अंतरिक्ष अनुप्रयोगों में व्यापक रूप से किया जाता है।

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