संदर्भ
हाल ही में नीति आयोग ने ‘सशक्त किसान: प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण उपकरण-पुस्तिका और सर्वोत्तम प्रथाएँ मार्गदर्शिका’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रस्तुत की।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
- प्राकृतिक खेती (नेचुरल फार्मिंग) की अवधारणा और कृषि-पारिस्थितिक ढाँचा: रिपोर्ट प्राकृतिक खेती को विज्ञान-आधारित, कृषि-पारिस्थितिकी-प्रेरित कृषि प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करती है, जो रसायन-मुक्त, जैव-विविधता उन्मुख और पशुधन-आधारित है।
- यह खेत-आधारित जैव-पदार्थ पुनर्चक्रण, मल्चिंग, मृदा वायुसंचार तथा कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों के उन्मूलन पर बल देती है, जिससे ध्यान “फसलों को पोषण देने” से हटकर “जीवित मृदा पारितंत्र का पोषण करने” पर केंद्रित होता है।

- ज्ञान की आधारशिला – पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक पारिस्थितिकी विचार
प्राकृतिक खेती प्राचीन भारतीय कृषि ज्ञान से प्रेरणा लेती है, जो कृषि-पाराशर, अर्थशास्त्र और वृक्षायुर्वेद जैसे ग्रंथों में वर्णित है।
- यह मसानोबु फुकुओका और सुभाष पालेकर से प्रभावित आधुनिक पारिस्थितिकी कृषि विचारों को भी समाहित करती है, जिससे पारंपरिक प्रथाओं और समकालीन कृषि-पारिस्थितिकी का समन्वय परिलक्षित होता है।

- मुख्य सिद्धांत और प्रमुख प्रथाएँ (“चार स्तंभ”): रिपोर्ट प्राकृतिक खेती की आधारभूत प्रथाओं का उल्लेख करती है—
- बीजामृत: गोबर और गोमूत्र का उपयोग करके सूक्ष्मजीवी बीज उपचार, जिससे पौधों की सुरक्षा होती है।
- जीवामृत और घनजीवामृत: सूक्ष्मजीवी मृदा संवर्द्धक, जो मृदा उर्वरता और सूक्ष्मजीवी गतिविधियों को बढ़ाते हैं।
- आच्छादन (मल्चिंग): फसल अवशेषों के माध्यम से निरंतर मृदा आवरण बनाए रखना, जिससे नमी संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण होता है।
- व्हापासा: पोषक तत्त्वों के अवशोषण के लिए मृदा में उपयुक्त वायुसंचार और नमी संतुलन बनाए रखना।
- इन प्रथाओं के साथ मिश्रित फसल प्रणाली, आवरण फसल, देशी बीजों का उपयोग, न्यूनतम जुताई और पौधा-आधारित कीट प्रबंधन को भी पूरक उपायों के रूप में अपनाया जाता है।

- पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु सहनशीलता: प्राकृतिक खेती मृदा के जैविक कार्बन, सूक्ष्मजीवी जैव-विविधता और पारिस्थितिकी संतुलन को मजबूत करती है, जिससे जल धारण क्षमता और मृदा संरचना में सुधार होता है।
- इस रिपोर्ट में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, सिंचाई की कम आवश्यकता तथा जलवायु झटकों के प्रति फसलों की बेहतर सहनशीलता का उल्लेख किया गया है, जिसमें चक्रवात मिचौंग के प्रभाव से जुड़े उदाहरण भी शामिल हैं।
- किसान अर्थशास्त्र और आत्मनिर्भरता (आत्म-निर्भरता): स्थानीय रूप से उपलब्ध और खेत से प्राप्त इनपुट्स पर निर्भर होने के कारण प्राकृतिक खेती महँगे बाहरी इनपुट्स पर निर्भरता को कम करती है।
- क्षेत्रीय साक्ष्य दर्शाते हैं कि कृषि की लागत में 5–10% तक कमी (कुछ मामलों में 20–55% तक) तथा लाभ–लागत अनुपात में वृद्धि होती है, जिससे कृषि की लाभप्रदता, आय स्थिरता और वित्तीय सहनशीलता में सुधार होता है।
- संस्थागत समर्थन और सरकारी नीतिगत ढाँचा: प्राकृतिक खेती के विस्तार को राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के माध्यम से समर्थन दिया जा रहा है, जिसका परिव्यय ₹2,481 करोड़ है और जिसका लक्ष्य 1 करोड़ किसानों को प्राकृतिक कृषि से जोड़ना है।
- मिशन के अंतर्गत 10,000 बायो-इनपुट संसाधन केंद्र (BRCs) स्थापित करने तथा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम एवं 10,000 किसान उत्पादक संगठन गठन एवं संवर्द्धन योजना जैसी योजनाओं के साथ अभिसरण का प्रस्ताव है।
- क्रियान्वयन टूलकिट, बाजार संपर्क और राज्य स्तरीय मॉडल: यह रिपोर्ट एक व्यवहार-उन्मुख प्रशिक्षण मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है, जिसमें बीज चयन, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, कीट नियंत्रण, जैव-इनपुट उत्पादन, प्रमाणन और विपणन रणनीतियों को शामिल किया गया है।
- यह सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India) प्रमाणन, किसान–उपभोक्ता प्रत्यक्ष बाजार और डिजिटल विपणन प्लेटफॉर्मों को बढ़ावा देती है। इस रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात के सफल क्रियान्वयन मॉडलों को भी रेखांकित किया गया है, जो प्राकृतिक खेती के लिए विस्तार योग्य संस्थागत ढाँचे को प्रदर्शित करते हैं।

प्राकृतिक खेती (नेचुरल फार्मिंग) के बारे में
- परिभाषा: नीति आयोग के अनुसार, प्राकृतिक खेती एक कृषि उत्पादन प्रणाली है, जो कृत्रिम रसायनों और उर्वरकों के उपयोग को समाप्त करती है और फसल उत्पादन प्रणाली में पशुधन के एकीकरण पर आधारित होती है।
- मुख्य विशेषताएँ
- समेकित खेती: फसलों, पेड़ों और पशुधन को मिलाकर जैव-विविधता को बढ़ावा दिया जाता है।
- पारिस्थितिकी संतुलन: यह कृषि प्रणाली खेत के पारिस्थितिकी तंत्र की प्राकृतिक प्रक्रियाओं के साथ सामंजस्य में कार्य करती है।
- आत्मनिर्भर प्रणाली: यह खेत से प्राप्त इनपुट्स पर आधारित होती है और कृत्रिम उर्वरकों व रसायनों पर निर्भरता समाप्त करती है।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य केवल रासायनिक इनपुट्स को जैविक विकल्पों से परिवर्तित करना नहीं है, बल्कि खेत को एक आत्मनिर्भर जैविक प्रणाली के रूप में पुनः डिजाइन करना है, जिसमें मृदा, फसलें, पशुधन, पेड़, सूक्ष्मजीव, नमी और जैव-पदार्थ एकीकृत और परस्पर सहयोगी रूप में कार्य करें।
प्राकृतिक कृषि के घटक
इस पारिस्थितिकी प्रणाली के संचालनात्मक आधार के रूप में मैनुअल में कई प्रमुख घटकों की पहचान की गई है—
- बीजामृत: गोबर, गोमूत्र, चूना और जल द्वारा निर्मित सूक्ष्मजीवी बीज उपचार घोल।
- इसे बीजों पर लेपित किया जाता है, जिससे लाभकारी सूक्ष्मजीव प्राप्त होते हैं, अंकुरण में सुधार होता है और पौधों को बीजजनित व मृदाजनित रोगों से सुरक्षा मिलती है।

- जीवामृत: गोबर, गोमूत्र, गुड़, दाल का आटा और मृदा से तैयार किया गया किण्वित सूक्ष्मजीवी घोल।
- यह जैविक प्रेरक (Biological Stimulant) के रूप में कार्य करता है, जो सूक्ष्मजीवी जीवन को समृद्ध करता है और मृदा खाद्य जाल को सक्रिय करके दीर्घकालिक उर्वरता को बढ़ावा देता है।
- घनजीवामृत: यह जीवामृत का ठोस रूप है, जिसका उपयोग , विशेषतः वर्षा-आधारित क्षेत्रों में मृदा में लंबे समय तक सूक्ष्मजीवी गतिविधियों और पोषक तत्त्वों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
- मल्चिंग (आच्छादन): मृदा को फसल अवशेषों या जीवित मल्च से ढककर रखने की प्रक्रिया। यह वाष्पीकरण को कम, मृदा तापमान को संतुलित, खरपतवारों को नियंत्रित और धीरे-धीरे मृदा जैविक पदार्थ को समृद्ध करती है।
- व्हापासा: मृदा में वायु और नमी के आदर्श संतुलन को बनाए रखना। प्राकृतिक खेती अधिक सिंचाई को हतोत्साहित करती है और जैविक रूप से सक्रिय तथा अच्छी तरह वायु संचारित मृदा को बढ़ावा देती है, जिससे पोषक तत्त्वों के अवशोषण में वृद्धि होती है।
- पौध संरक्षण (वनस्पति-आधारित तैयारी): कीट प्रबंधन के लिए नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और अग्नास्त्र जैसे प्राकृतिक घोलों का उपयोग किया जाता है। ये स्थानीय रूप से उपलब्ध जैविक पदार्थों पर आधारित होते हैं और कृत्रिम विषैले रसायनों की आवश्यकता को समाप्त करते हैं।
- फसल विविधता और एकीकरण: अंतर-फसलीकरण, मिश्रित खेती और पशुधन एकीकरण पर आधारित प्रणाली अपनाई जाती है, जिससे खेत की सहनशीलता बढ़ती है, उत्पादन विविध होता है और पारिस्थितिकी जोखिम कम होते हैं।
प्राकृतिक कृषि के सिद्धांत
प्रशिक्षण मैनुअल प्राकृतिक कृषि को कृषि-पारिस्थितिकी आधारित प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करता है, जो कई पारिस्थितिकी सिद्धांतों पर आधारित है:
- न्यूनतम मृदा व्यवधान: कम जुताई को बढ़ावा दिया जाता है, क्योंकि अत्यधिक जुताई मृदा कण संरचना को बाधित करती है, सूक्ष्मजीवों के आवास को नष्ट करती है और आर्द्रता संबंधी क्षरण को तेज करती है।
- कृत्रिम इनपुट्स का पूर्ण निष्कासन: कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों को पूरी तरह हटाने पर बल दिया जाता है, क्योंकि ये अल्पकालिक लाभ तो देते हैं, परंतु दीर्घकालिक पारिस्थितिकी स्थिरता को कमजोर करते हैं।
- खेत आधारित संसाधनों का उपयोग: जैव-पदार्थ के पुनर्चक्रण को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे खेत एक स्वायत्त इकाई बन जाता है और बाहरी बाजारों पर निर्भरता कम होती है।
- जैव-विविधता और बहु-फसली प्रणाली (पॉलीकल्चर): पारिस्थितिकी विविधता को कीटों, पोषक तत्त्वों की कमी और जलवायु झटकों के विरुद्ध सहनशीलता का आधार माना जाता है।
- पॉलीकल्चर का अर्थ है एक ही खेत में एक फसल के बजाय अनेक फसलों को साथ उगाना।
- देशी बीजों का उपयोग: स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप देशी बीजों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाता है, जो स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों में बेहतर अनुकूलित होते हैं और कम बाहरी संसाधनों की आवश्यकता होती है।
- जीव रूपों का एकीकरण: खेत की अर्थव्यवस्था में पशुधन, कृषि वानिकी और परागणकर्ताओं (जैसे मधुमक्खियाँ) के एकीकरण के महत्त्व पर बल दिया जाता है, जिससे एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।

भारत में प्राकृतिक कृषि का विकास
- आधार – प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथ: भारत के पास विश्व के सबसे प्राचीन व्यवस्थित कृषि अभिलेख उपलब्ध हैं। ये ग्रंथ दर्शाते हैं कि “प्राकृतिक खेती” कोई नई अवधारणा नहीं है, बल्कि पारंपरिक वैज्ञानिक ज्ञान का पुनरुत्थान है।
- कृषि-पाराशर (लगभग 400 ईसा पूर्व): महर्षि पाराशर द्वारा रचित यह ग्रंथ विश्व की पहली व्यवस्थित कृषि पाठ्यपुस्तक माना जाता है।
- इसमें ग्रहों की गति के आधार पर वर्षा का पूर्वानुमान, हल की संरचना और पोषक तत्त्व प्रबंधन जैसे विषयों का वर्णन मिलता है।
- कौटिल्य का अर्थशास्त्र (लगभग 321 ईसा पूर्व): इसमें ‘सीताध्यक्ष’ नामक अध्याय है, जिसमें पशुपालन, बीज उपचार और फसल चक्र के महत्त्व का उल्लेख किया गया है।
- वृक्षायुर्वेद (लगभग 1000 ईस्वी): सुरपाल द्वारा रचित यह ग्रंथ ‘कुणपाला’ का वर्णन करता है, जिसे विश्व का पहला किण्वित प्राकृतिक द्रव उर्वरक माना जाता है।
- उपवन विनोद (लगभग 1283–1301 ईसवी): यह वृक्षारोपण और बागवानी पर आधारित एक विशिष्ट ग्रंथ है, जिसमें मृदा चयन, बीज बोने की विधि और फसल वृद्धि के प्राकृतिक संकेतकों का वर्णन किया गया है।
- विश्ववल्लभ (लगभग 1577 ईस्वी): मेवाड़ क्षेत्र के लिए तैयार यह कृषि मार्गदर्शिका भूजल की पहचान तथा शुष्क और पहाड़ी क्षेत्रों में कृषि पर केंद्रित है।
- पारंपरिक सामाजिक-आर्थिक संदर्भ: ऐतिहासिक रूप से भारतीय कृषि समुदाय-आधारित परंपरा थी, जहाँ संपत्ति का मूल्यांकन मुद्रा के बजाय प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर किया जाता था।
- संपत्ति के रूप: समाज में ‘गौ-धन’ (गायें), ‘अश्व-धन’ (घोड़े) और ‘गज-धन’ (हाथी) को संपत्ति के रूप में महत्त्व दिया जाता था।
- ‘धान्य’ की सर्वोच्चता: सभी प्रकार की संपत्तियों में धान्य (फसल/चावल) को सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता था, क्योंकि यह सामाजिक और आर्थिक लेन-देन का प्रमुख माध्यम था।
- सांस्कृतिक स्थिति: तिरुक्कुरल (लगभग 70 ईसा पूर्व) में उल्लेख है कि कृषि को सबसे श्रेष्ठ पेशा माना जाता था, और इसका सम्मान इतना अधिक था कि राजा भी कृषक के समक्ष नतमस्तक होते थे।
- समकालीन आंदोलन: प्राकृतिक खेती का आधुनिक पुनरुत्थान हरित क्रांति की रसायन-आधारित कृषि पद्धतियों की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ है।
- शून्य बजट प्राकृतिक कृषि (ZBNF): 1980 के दशक में श्री सुभाष पालेकर द्वारा विकसित इस प्रणाली का उद्देश्य खेत में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करके कृषि की लागत को समाप्त करना है। यह पद्धति वेदों और पारंपरिक वैज्ञानिक ज्ञान के अध्ययन से प्रेरित है।
- आचार्य देवव्रत की भूमिका: हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल और बाद में गुजरात के राज्यपाल के रूप में उनके प्रयासों ने प्राकृतिक खेती को राज्यव्यापी आंदोलन का रूप दिया, जो केवल तीन वर्षों में हजारों पंचायतों तक पहुँच गया।
- भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP): भारत सरकार ने प्राकृतिक खेती को औपचारिक रूप से इसी नाम से मान्यता दी और इसकी जड़ों को वृक्षायुर्वेद के प्राचीन ज्ञान से जोड़ा।
- राष्ट्रीय आह्वान: 16 दिसंबर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से आह्वान किया कि कृषि को “रसायनशाला से निकालकर प्रकृति की प्रयोगशाला से जोड़ा जाए।” इसका उद्देश्य आजादी के अमृत महोत्सव के दौरान प्रत्येक पंचायत के न्यूनतम एक गाँव को प्राकृतिक खेती से जोड़ना था।
प्राकृतिक कृषि के लाभ
- कृषि की लागत में भारी कमी: प्राकृतिक खेती का उद्देश्य महँगे व्यावसायिक उत्पादों की आवश्यकता को समाप्त करके किसानों के ऋण चक्र को तोड़ना है।
- खरीदे जाने वाले इनपुट्स से बचाव: किसान यूरिया या डीएपी जैसे रासायनिक उर्वरकों और कृत्रिम कीटनाशकों के स्थान पर जीवामृत और नीमास्त्र जैसे खेत-आधारित घोलों का उपयोग करते हैं, जिससे दैनिक खर्चों में अत्यधिक कमी आती है।
- सिद्ध बचत: मैनुअल में दिए गए क्षेत्रीय साक्ष्य बताते हैं कि प्रमुख फसलों में भुगतान की जाने वाली लागत में 5–10% तक कमी दर्ज की गई है।
- उदाहरण: रिपोर्ट में उल्लेख है कि आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में प्राकृतिक कृषि अपनाने वाले किसानों ने रासायनिक छिड़काव की उच्च लागत को समाप्त कर दिया, जो पहले उनके कुल निवेश का लगभग 25% होती थी।
- किसानों की आय में महत्त्वपूर्ण वृद्धि: जब खाद्य उत्पादन की लागत कम हो जाती है और उपज स्थिर रहती है, तो किसान की शुद्ध आय बढ़ जाती है।
- लाभ–लागत (B:C) अनुपात का अनुकूलन: प्राकृतिक खेती में निवेश पर प्रतिफल अधिक प्राप्त होता है।
- भले ही उत्पादन पारंपरिक खेती के समान रहे, लेकिन इनपुट लागत लगभग शून्य होने के कारण शुद्ध आय अधिक होती है।
- प्रीमियम बाजार तक पहुँच: सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India) के माध्यम से किसान अपने उत्पाद को “प्राकृतिक” के रूप में प्रमाणित कर सकते हैं, जिससे उन्हें शहरी बाजारों में अधिक कीमत मिलती है।
- उदाहरण: हिमाचल प्रदेश में किए गए क्षेत्रीय अध्ययनों से पता चला कि प्राकृतिक कृषि अपनाने वाले सेब उत्पादकों को रासायनिक कृषि करने वाले किसानों की तुलना में अधिक शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ, मुख्यतः महँगे आयातित उर्वरकों की आवश्यकता समाप्त होने के कारण।

- पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और संसाधन संरक्षण: प्राकृतिक कृषि भूमि के लिए एक “उपचार प्रक्रिया” के रूप में कार्य करती है, जो दशकों तक रासायनिक उपयोग से हुए नुकसान को उलटने में सहायता करती है।
- मृदा जैविक कार्बन (SOC) में वृद्धि: सूक्ष्मजीवी संवर्द्धकों के उपयोग और जुताई से बचाव के माध्यम से यह प्रणाली मृदा जैविक कार्बन को मजबूत करती है, जो उपजाऊ और जीवित मृदा का प्रमुख संकेतक है।
- विशाल संसाधन बचत: मल्चिंग (फसल अवशेषों से मृदा को ढकना) की प्रक्रिया नमी संरक्षण को इतना प्रभावी बनाती है कि इससे जल और बिजली की खपत में 50–60% तक बचत होती है।
- उदाहरण: राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में व्हापासा (मृदा वायु संचार) और मल्चिंग के उपयोग से किसानों ने काफी कम सिंचाई चक्रों के साथ फसलें उगाईं, जो जल-अभाव वाले क्षेत्रों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
- बेहतर जलवायु सहनशीलता: अनिश्चित मौसम की परिस्थितियों के युग में प्राकृतिक कृषि फसलों के लिए जैविक बीमा के रूप में कार्य करती है।
- जैविक सहनशीलता और जड़ प्रणाली की मजबूती: प्राकृतिक तरीके से उगाई गई फसलों में गहरी और मजबूत जड़ प्रणाली विकसित होती है तथा कीटों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है।
- चरम मौसम में जीवित रहने की क्षमता: तुलनात्मक क्षेत्रीय अवलोकनों से पता चलता है कि प्राकृतिक कृषि की फसलों को चक्रवात, लू या असमय वर्षा जैसी आपदाओं के दौरान अपेक्षाकृत कम नुकसान होता है।
- उदाहरण: मैनुअल में ओडिशा से किए गए अवलोकनों का उल्लेख है, जहाँ प्राकृतिक खेती से उगाई गई धान की फसलें तेज चक्रवाती पवनों के बाद भी खड़ी रहीं, जबकि रसायन-आधारित खेती वाली पड़ोसी फसलें “लॉजिंग” (गिर जाना) की समस्या से प्रभावित हुईं, क्योंकि उनकी जड़ें उथली और कमजोर थीं।
- स्वास्थ्य और सामाजिक लाभ
- रसायन-मुक्त पोषण: प्राकृतिक खेती से प्राप्त उत्पाद विषैले अवशेषों से मुक्त होते हैं, जिससे वे किसान के परिवार के लिए अधिक सुरक्षित तथा उपभोक्ताओं के लिए अधिक पौष्टिक होते हैं।
- आत्मनिर्भरता (आत्म-निर्भरता): खेत पर ही सभी इनपुट्स का उत्पादन करने से समुदाय स्वावलंबी बनता है और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों तथा आपूर्ति शृंखला में व्यवधान से उत्पन्न सामाजिक तनाव कम होता है।
तुलना – पारंपरिक बनाम जैविक बनाम प्राकृतिक खेती
- पारंपरिक खेती: यह एक इनपुट-गहन प्रणाली है, जो कृत्रिम रसायनों पर अत्यधिक निर्भर करती है और अक्सर एकल फसल प्रणाली (मोनोकल्चर) को बढ़ावा देती है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च पारिस्थितिकी लागत उत्पन्न होती है।
- जैविक खेती: यह कृत्रिम रसायनों से बचती है, लेकिन बाहरी स्रोतों से खरीदे गए जैविक खाद और प्रमाणित इनपुट्स के उपयोग की अनुमति देती है, जो अपेक्षाकृत महँगे और बाजार-निर्भर हो सकते हैं।
- प्राकृतिक खेती: यह मुख्य रूप से खेत-आधारित जैविक इनपुट्स और जैव-पदार्थ पुनर्चक्रण पर आधारित होती है। इसका उद्देश्य केवल इनपुट प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी पुनर्जनन और किसान आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है, जिससे यह तीनों में सबसे अधिक आत्मनिर्भर प्रणाली बनती है।

प्राकृतिक खेती की चुनौतियाँ
- संक्रमण की समस्या (मृदा का पुनर्स्थापन): रसायन-आधारित कृषि से प्राकृतिक पद्धतियों की ओर परिवर्तन तुरंत संभव नहीं होता; इसके लिए पारिस्थितिकी “डिटॉक्स” की अवधि आवश्यक होती है।
- प्रारंभिक समायोजन अवधि: कृत्रिम उर्वरकों को छोड़ने वाले किसानों को प्रारंभिक चरण में उपज या आत्मविश्वास में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि मृदा को रासायनिक उत्तेजकों के बिना कार्य करना फिर से सीखने में समय लगता है।
- मृदा पुनर्प्राप्ति का समय: मैनुअल के अनुसार, मृदा जैविक कार्बन (SOC) और लाभकारी केंचुओं की आबादी को स्वस्थ स्तर पर लौटने में कुछ मौसम लग सकते हैं।
- उदाहरण: पंजाब और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में किसानों को प्रारंभ में गेहूँ उत्पादन में गिरावट का डर था; हालाँकि जो किसान इस पद्धति पर टिके रहे, उन्होंने तीसरे वर्ष तक मृदा की जल धारण क्षमता में सुधार देखा, जिससे उपज स्थिर हो गई।
- ज्ञान-गहनता (रासायनिक शक्ति के बजाय बौद्धिक शक्ति): पारंपरिक कृषि जहाँ इनपुट-गहन होती है (तैयार उत्पाद खरीदने पर आधारित), वहीं प्राकृतिक खेती ज्ञान-गहन प्रणाली है।
- कौशल की आवश्यकता: किसानों को जटिल जैविक प्रक्रियाओं को समझना होता है, जैसे जीवामृत के प्रयोग का सही समय या व्हापासा (मृदा वायुसंचार) का संतुलन बनाए रखना।
- विस्तार सेवाओं की आवश्यकता: किसानों को डेमो प्लॉट्स की आवश्यकता होती है, जहाँ वे इस प्रणाली की व्यावहारिक सफलता देख सकें। निरंतर तकनीकी मार्गदर्शन के बिना, यदि किसी छोटे कीट प्रकोप की समस्या का प्राकृतिक समाधान ज्ञात न हो, तो किसान फिर से रसायनों की ओर लौट सकते हैं।
- उदाहरण: राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF) इस समस्या का समाधान करने के लिए कृतिशील किसान (विशेषज्ञ सक्रिय किसान) तैनात कर रहा है, जो अन्य ग्रामीणों के लिए स्थानीय मार्गदर्शक के रूप में कार्य करते हैं और खेत को ही प्रशिक्षण कक्ष में परिवर्तित कर देते हैं।
- बाजार आधारित भेदभाव और प्रमाणन: स्वस्थ और रसायन-मुक्त खाद्य उत्पादन तभी लाभदायक होता है, जब उपभोक्ता यह पहचान सके कि यह अन्य उत्पादों से अलग है।
- मूल्य प्रीमियम का अभाव: वर्तमान में प्राकृतिक उत्पाद अक्सर रासायनिक उत्पादों के समान मूल्य पर बिकते हैं, क्योंकि कई क्षेत्रों में अभी प्रमाणन और ब्रांडिंग उपलब्ध नहीं है।
- उपभोक्ता जागरूकता: अनेक क्षेत्रों में प्राकृतिक उत्पादों की पर्याप्त माँग नहीं है, क्योंकि लोग अभी इनके स्वास्थ्य लाभों के प्रति पूरी तरह जागरूक नहीं हैं।
- उदाहरण: मैनुअल के अनुसार, सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India) का विस्तार किया जा रहा है, ताकि कम लागत वाला प्रमाणन उपलब्ध हो सके और गुजरात जैसे राज्यों के छोटे किसानों को शहरों के सुपरमार्केट में विशेष “नेचुरल ऑर्गेनिक” खंडों तक पहुँच मिल सके।

- श्रम और इनपुट प्रबंधन
- तैयारी में अधिक समय: घनजीवामृत या दशपर्णी अर्क जैसे प्राकृतिक इनपुट तैयार करने में रासायनिक उर्वरक की एक बोरी खरीदने की तुलना में अधिक श्रम और समय लगता है।
- पशुधन पर निर्भरता: प्राकृतिक खेती मुख्य रूप से देशी गाय के गोबर और गोमूत्र पर आधारित होती है। कुछ क्षेत्रों में देशी पशुधन की घटती संख्या के कारण किसानों के लिए आवश्यक कच्चा माल प्राप्त करना कठिन हो जाता है।
- उदाहरण: इस समस्या के समाधान के लिए सरकार 10,000 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRCs) स्थापित करने को प्रोत्साहित कर रही है। ये केंद्र स्थानीय हब के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ किसान तैयार प्राकृतिक इनपुट खरीद सकते हैं, जिससे उन्हें स्वयं तैयार करने के श्रम से राहत मिलती है।
- खरपतवार और कीट प्रबंधन
- मैनुअल खरपतवार नियंत्रण: रासायनिक खरपतवारनाशकों के बिना किसानों को मल्चिंग (आच्छादन) और हाथ से खरपतवार हटाने पर निर्भर रहना पड़ता है, जो व्यस्त कृषि मौसम में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- प्राकृतिक कीट चक्र: किसानों को खेत में कुछ कीटों की उपस्थिति को सहन करना सीखना पड़ता है, ताकि लेडीबर्ड जैसे लाभकारी कीट जीवित रह सकें। इसके लिए “कीटों के प्रति शून्य सहनशीलता” वाली सोच में परिवर्तन आवश्यक होता है।
भारत में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी पहल
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF): यह देशभर में रसायन-मुक्त कृषि को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए समर्पित प्रमुख फ्लैगशिप मिशन है।
- व्यापक विस्तार: इस मिशन का लक्ष्य आने वाले वर्षों में 1 करोड़ (10 मिलियन) किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ना है, ताकि रसायनों के बिना खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
- वित्तीय प्रावधान: किसानों के प्रशिक्षण, अवसंरचना और वित्तीय प्रोत्साहनों के लिए सरकार ने ₹2,481 करोड़ का महत्त्वपूर्ण बजट आवंटित किया है।
- राष्ट्रीय कॉरिडोर: राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन का एक प्रमुख उद्देश्य गंगा नदी के किनारे “प्राकृतिक खेती कॉरिडोर” बनाना है, ताकि स्वच्छ नदी में रासायनिक अपवाह (Chemical runoff) को रोका जा सके।
- भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP): यह परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के अंतर्गत शुरू की गई एक विशेष उप-योजना है, जिसका उद्देश्य पारंपरिक और स्वदेशी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना है।
- ऑन-फार्म इनपुट्स: यह योजना खेत पर उपलब्ध जैविक संसाधनों, गोबर-गोमूत्र आधारित तैयारियों जैसे जीवामृत और बीजामृत के उपयोग को प्रोत्साहित करती है और सभी कृत्रिम रसायनों को पूरी तरह से निषिद्ध करती है।
- क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण: प्राकृतिक कृषि को 500 हेक्टेयर के क्लस्टर में बढ़ावा दिया जाता है, जिससे किसानों के समूह को सामूहिक प्रशिक्षण और साझा विपणन सुविधाएँ प्राप्त करना सरल हो जाता है।
- बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRCs): जिन किसानों के पास पशुधन नहीं है, उनके लिए इनपुट उपलब्धता की समस्या को हल करने के लिए सरकार, स्थानीय आपूर्ति शृंखला विकसित कर रही है।
- 10,000 केंद्र: सरकार, पूरे भारत में 10,000 बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर स्थापित कर रही है।
- स्थानीय आपूर्ति केंद्र: ये केंद्र ऐसे विशेष हब के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ किसान आसानी से कच्चा माल या तैयार प्राकृतिक तैयारियाँ जैसे नीमास्त्र (नीम आधारित कीटनाशक) या दशपर्णी अर्क (दस पत्तियों का अर्क) प्राप्त कर सकते हैं।
- सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India) के माध्यम से प्रमाणन: किसानों के लिए अपने उत्पाद को “प्राकृतिक” सिद्ध करना एक बड़ी चुनौती होती है, जिसके समाधान के रूप में सरकार एक सरल और कम लागत वाला प्रमाणन तंत्र उपलब्ध कराती है।
- सहभागी गारंटी प्रणाली: यह एक कम लागत वाली और विकेंद्रीकृत प्रमाणन प्रक्रिया है, जिसमें किसानों का समूह एक-दूसरे की खेती की पद्धतियों की निगरानी और सत्यापन करता है, जिससे महँगे तृतीय-पक्ष निरीक्षकों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
- बाजार तक पहुँच: PGS-India के तहत प्रमाणित होने के बाद किसान अपने उत्पादों की पैकेजिंग पर आधिकारिक लोगो का उपयोग कर सकते हैं, जिससे उपभोक्ताओं का विश्वास बढ़ता है और उन्हें मूल्य प्रीमियम (Price Premium) प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

- प्रसार और प्रशिक्षण ढाँचा: सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए “ट्रेन-द-ट्रेनर” मॉडल का उपयोग कर रही है, ताकि वैज्ञानिक ज्ञान हर गाँव तक पहुँच सके।
- कृतिशील किसान (मास्टर ट्रेनर्स): रिपोर्ट में ऐसे अनुभवी किसानों की भूमिका को रेखांकित किया गया है, जो अपने गाँव के अन्य किसानों के लिए मार्गदर्शक और सहकर्मी-शिक्षक के रूप में कार्य करते हैं।
- कृषि विज्ञान केंद्र: देशभर में 700 से अधिक कृषि विज्ञान केंद्रों को प्रदर्शन प्लॉट (Demonstration Plots) स्थापित करने का दायित्व दिया गया है। ये प्लॉट जीवंत प्रयोगशालाओं के रूप में कार्य करते हैं, जहाँ किसान प्राकृतिक कृषि की सफलता को प्रत्यक्ष रूप से देख सकते हैं।
- परामर्श और बाजार समर्थन उपकरण
- एम-किसान पोर्टल: यह पोर्टल किसानों को व्यक्तिगत लघु संदेश सेवा (एसएमएस) और वॉइस परामर्श प्रदान करता है।
- यह किसानों के मोबाइल फोन पर सीधे फसल प्रबंधन, मौसम अपडेट और प्राकृतिक खेती की सर्वोत्तम पद्धतियों से संबंधित अलर्ट भेजता है।
- राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम): यह डिजिटल मंच किसानों को देशभर में खरीदारों से जोड़ने में सहायता करता है।
- यह मूल्य खोज और पारदर्शी व्यापार को सुविधाजनक बनाता है, जिससे प्राकृतिक कृषि करने वाले किसानों को अपनी उपज प्रतिस्पर्द्धी कीमतों पर बेचने में सहायता मिलती है।

आगे की राह
- संस्थागत सुदृढ़ीकरण और विस्तार
- राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (NMNF): आने वाले दो वर्षों में 1 करोड़ (10 मिलियन) किसानों को प्राकृतिक कृषि से जोड़ने के लिए मिशन का विस्तार किया जा रहा है।
- क्लस्टर विकास: ग्राम पंचायतों में 15,000 क्लस्टरों की स्थापना की जा रही है, ताकि प्राकृतिक खेती को एक योजनाबद्ध तरीके से जन-आंदोलन में परिवर्तित किया जा सके।
- बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर (BRCs): 10,000 स्थानीय केंद्रों की स्थापना की जा रही है, जिससे किसानों को आवश्यक कच्चे पदार्थ और तैयार प्राकृतिक तैयारियाँ स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध हो सकें।
- ज्ञान और क्षमता निर्माण
- विस्तार तंत्र: स्वयं सहायता समूह (SHGs), किसान उत्पादक संगठन (FPOs) और प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) को शामिल करते हुए एक मजबूत ज्ञान नेटवर्क विकसित किया जा रहा है।
- “ट्रेन-द-ट्रेनर” मॉडल: मास्टर प्रशिक्षकों और कृतिशील किसानों (प्रगतिशील विशेषज्ञ किसानों) को स्थानीय मार्गदर्शक के रूप में उपयोग किया जा रहा है, ताकि प्रत्येक गाँव में व्यावहारिक और सहकर्मी-आधारित सीखने की व्यवस्था विकसित हो सके।
- शिक्षा और अनुसंधान: कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में प्राकृतिक खेती को शामिल किया जा रहा है, ताकि भविष्य के कृषि वैज्ञानिक और विस्तार अधिकारी कृषि-पारिस्थितिकी सिद्धांतों में प्रशिक्षित हो सकें।
- बाजार विकास और वित्तीय स्थिरता
- प्रमाणन और ब्रांडिंग: सहभागी गारंटी प्रणाली (PGS-India) को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि छोटे किसानों को अपने उत्पाद को “प्राकृतिक” के रूप में प्रमाणित करने का कम लागत वाला और विश्वसनीय माध्यम मिल सके।
- मूल्य शृंखला एकीकरण: राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से बाजार संपर्क मजबूत किए जा रहे हैं, ताकि किसानों को रसायन-मुक्त उत्पादों के लिए मूल्य प्रीमियम मिल सके।
- कार्बन क्रेडिट तंत्र: मृदा में कार्बन संचयन के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने वाले ढाँचों का विकास किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों के लिए अतिरिक्त हरित आय का स्रोत भी उत्पन्न हो सके।
- नीतिगत और सामाजिक परिवर्तन
- आत्मनिर्भरता: आयातित कृत्रिम इनपुट्स पर राष्ट्रीय और खेत-स्तरीय निर्भरता को कम करना, जिससे भारत की उर्वरक सुरक्षा में सुधार होगा और किसानों के ऋण में कमी आएगी।
- जलवायु कार्रवाई: प्राकृतिक खेती को पेरिस समझौते के तहत भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) के प्रमुख आधार के रूप में स्थापित करना, ताकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाई जा सके।
- सामूहिक प्रयास: व्यक्तिगत अपनाने की प्रक्रिया से आगे बढ़कर एक सहयोगात्मक मॉडल विकसित करना, जिसमें नीति-निर्माता, शोधकर्ता और नागरिक समाज मिलकर उत्पादक और लचीला कृषि पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करें।
निष्कर्ष
प्राकृतिक खेती इनपुट-गहन कृषि से पारिस्थितिकी-गहन कृषि की ओर एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। यह अतीत की ओर लौटने का भावनात्मक प्रयास नहीं है, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक कृषि-पारिस्थितिकी विचारों के वैज्ञानिक समन्वय का प्रयास है। यदि इसे उचित प्रशिक्षण और संस्थागत नवाचार का समर्थन प्राप्त हो, तो यह विकसित भारत@2047 के लिए एक मजबूत आधार बनेगी और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखते हुए उत्पादक और सतत् भविष्य सुनिश्चित करेगी।