संदर्भ
हाल ही में, अमेरिका के ऊर्जा विभाग ने अपने विकिरण संरक्षण निर्देशों से ‘ऐज लो ऐज रीजनेबली अचीवेबल’ (ALARA) सिद्धांत को हटा दिया।
लीनियर नो-थ्रेशहोल्ड (LNT) मॉडल के बारे में
- यह विकिरण संरक्षण में प्रयुक्त एक व्यापक रूप से स्वीकृत जोखिम मूल्यांकन रूपरेखा है। यह मानता है कि आयनकारी विकिरण के किसी भी स्तर का संपर्क, चाहे वह कितना भी कम क्यों न हो, हानिकारक प्रभावों, विशेषकर कैंसर, का कुछ जोखिम उत्पन्न करता है।
- इस मॉडल के अनुसार, ऐसा कोई सुरक्षित न्यूनतम स्तर नहीं है, जिसके नीचे विकिरण को पूर्णतः जोखिम-मुक्त माना जा सके।
- मुख्य सिद्धांत: LNT मॉडल की केंद्रीय धारणा यह है कि विकिरण जोखिम सीमा के साथ रेखीय रूप से बढ़ता है। इसका अर्थ है:
- सबसे कम सीमा भी कोशिकीय क्षति उत्पन्न करने की क्षमता रखती है।
- संचयी विकिरण संपर्क के साथ कैंसर की संभावना आनुपातिक रूप से बढ़ती है।
- समर्थन: इसे अंतरराष्ट्रीय विकिरण सुरक्षा निकायों जैसे इंटरनेशनल कमीशन ऑन रेडियोलॉजिकल प्रोटेक्शन (ICRP), इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) तथा वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) द्वारा समर्थन प्राप्त है।
- यह मुख्यतः परमाणु बम हमले में बचे हुए व्यक्तियों पर किए गए महामारी विज्ञान संबंधी अध्ययनों तथा व्यावसायिक विकिरण संपर्क के आँकड़ों पर आधारित है।
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संबंधित तथ्य
- यह निर्णय वैश्विक विकिरण सुरक्षा मानकों से विचलन को दर्शाता है, विशेषकर ऐसे समय में जब इंटरनेशनल कमीशन ऑन रेडियोलॉजिकल प्रोटेक्शन द्वारा मानकों की समीक्षा की जा रही है, जिससे परमाणु सुरक्षा विनियमन पर बहस प्रारंभ हो गई है।
- वैश्विक विकिरण संरक्षण की आधारशिला: लीनियर नो-थ्रेशहोल्ड (LNT) मॉडल ‘ऐज लो ऐज रीजनेबली अचीवेबल’ (ALARA) सिद्धांत वैश्विक विकिरण संरक्षण की आधारशिला निर्मित करते हैं।
‘ऐज लो ऐज रीजनेबली अचीवेबल’ (ALARA) सिद्धांत के बारे में
- ALARA विकिरण संरक्षण का एक मूलभूत सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य आयनकारी विकिरण के प्रति मानव संपर्क को न्यूनतम करना है।
- यह लीनियर नो-थ्रेशहोल्ड (LNT) मॉडल की व्यापक रूपरेखा के अंतर्गत कार्य करता है।
- मुख्य विचार: ALARA में “Reasonably” शब्द प्रमुख है। यह सिद्धांत स्वीकार करता है कि शून्य संपर्क प्रायः परमाणु, चिकित्सा, औद्योगिक तथा अनुसंधान क्षेत्रों में व्यावहारिक नहीं होता। अतः यह निम्नलिखित के बीच संतुलन स्थापित करता है:
- सुरक्षा और स्वास्थ्य संरक्षण
- प्रौद्योगिकीय व्यवहार्यता
- आर्थिक लागत
- सामाजिक और परिचालन आवश्यकताएँ
- यह बेहतर परिरक्षण, प्रशासनिक नियंत्रण, प्रशिक्षण तथा अभियांत्रिकीय उपायों के माध्यम से निरंतर सुधार पर बल देता है, जिससे सुदृढ़ सुरक्षा संस्कृति को बढ़ावा मिले और अनावश्यक विकिरण संपर्क में कमी लाई जा सके।
‘इंटरनेशनल कमीशन ऑन रेडियोलॉजिकल प्रोटेक्शन’ (ICRP) के बारे में
- स्थापना: वर्ष 1928 में (प्रारंभिक नाम- इंटरनेशनल एक्स-रे एंड रेडियम प्रोटेक्शन कमेटी)।
- उद्देश्य:
- आयनकारी विकिरण के हानिकारक प्रभावों से लोगों और पर्यावरण की सुरक्षा करना।
- वैश्विक स्तर पर विकिरण सुरक्षा के सिद्धांतों और मानकों का विकास करना।
- मुख्यालय: ओटावा, कनाडा।
- ICRP की रूपरेखा तीन मौलिक सिद्धांतों पर आधारित है:
- औचित्य: कोई भी विकिरण संपर्क हानि से अधिक लाभकारी होना चाहिए।
- सर्वोत्तमीकरण: संपर्क को यथासंभव न्यूनतम रखा जाना चाहिए।
- सीमा: व्यक्तिगत संपर्क निर्धारित सीमाओं से अधिक नहीं होना चाहिए।
- सलाहकारी प्रकृति: इसकी सिफारिशें निम्नलिखित संस्थाओं द्वारा बनाए जाने वाले विनियमों के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करती हैं:
- इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA)
- वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO)
- यूनाइटेड नेशंस साइंटिफिक कमेटी ऑन द इफेक्ट्स ऑफ एटॉमिक रेडिएशन (UNSCEAR)।
ICRP की वर्तमान स्थिति
- ICRP ने श्रमिकों या सामान्य जनता के लिए सीमाओं में किसी संशोधन का संकेत नहीं दिया है।
- तथापि, अत्यंत निम्न-खुराक सीमा को परिभाषित करने पर विचार किया जा सकता है, जिसके नीचे नियामक नियंत्रण आवश्यक न हो।
- यह वर्तमान रूपरेखा के परित्याग का नहीं, बल्कि संभावित परिष्कार का संकेत देता है।
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भारत का दृष्टिकोण
- यह इंटरनेशनल कमीशन ऑन रेडियोलॉजिकल प्रोटेक्शन तथा इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी द्वारा अनुशंसित अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित है।
- भारत का ध्यान निम्नलिखित पर है:
- औचित्य
- सर्वोत्तमीकरण (ALARA सिद्धांत)
- सीमा।
भारत में विकिरण जोखिम से संबंधित कानून
- सिविल दायित्व परमाणु क्षति अधिनियम (CLNDA), 2010
- सिविल दायित्व परमाणु क्षति अधिनियम (CLND अधिनियम) भारत में वर्ष 2010 में अधिनियमित किया गया।
- यह परमाणु दुर्घटनाओं के लिए दायित्व निर्धारित करता है तथा पीड़ितों को क्षतिपूर्ति सुनिश्चित करता है।
- संचालक दायित्व: CLNDA परमाणु संयंत्र के संचालक पर कठोर और बिना-दोष दायित्व निर्धारित करता है, जिसके अंतर्गत उसकी किसी भी त्रुटि के बिना भी उसे क्षति के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा।
- संचालक ₹1,500 करोड़ तक परमाणु दुर्घटनाओं के लिए उत्तरदायी है, जिसके लिए बीमा या वित्तीय सुरक्षा आवश्यक है।
- यदि क्षति दावे ₹1,500 करोड़ से अधिक हो जाते हैं, तो सरकार को हस्तक्षेप करना होता है।
- आपूर्तिकर्ता दायित्व: अंतरराष्ट्रीय मानकों के विपरीत, जहाँ केवल संचालक को उत्तरदायी ठहराया जाता है, CLNDA ने संचालक के दायित्व के अतिरिक्त आपूर्तिकर्ता दायित्व की अवधारणा भी प्रस्तुत की।
- समय सीमा: CLNDA 2010 ने संपत्ति क्षति के लिए 10 वर्ष तथा व्यक्तिगत क्षति के लिए 20 वर्ष की समय-सीमा निर्धारित की है, जिसके भीतर क्षतिपूर्ति दावा दायर किया जा सकता है।
- इसे वर्ष 1984 की भोपाल गैस त्रासदी पर संसद में उठाई गई चिंताओं के पश्चात् अधिनियमित किया गया।
- दायित्व प्रावधानों को लेकर कुछ परमाणु आपूर्तिकर्ताओं द्वारा इसकी आलोचना भी की गई।
- प्रस्तावित संशोधन: आपूर्तिकर्ताओं के विरुद्ध क्षतिपूर्ति दावों को अनुबंध मूल्य तक सीमित करना (असीमित दायित्व के स्थान पर)।
- परमाणु ऊर्जा अधिनियम (AEA), 1962
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- परमाणु ऊर्जा अधिनियम भारत में परमाणु ऊर्जा विकास को विनियमित करता है तथा केवल सरकार-नियंत्रित परिचालन की अनुमति देता है, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित है।
- वर्ष 2019 में ₹1,500 करोड़ का एक बीमा पूल स्थापित किया गया, ताकि दायित्व जोखिम को शामिल किया जा सके, किंतु यह विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने में असफल रहा।
- प्रस्तावित संशोधन
- निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति: निजी कंपनियों को परमाणु रिएक्टरों का निर्माण, स्वामित्व तथा संचालन करने की अनुमति दी जा सकती है (वर्तमान में यह केवल NPCIL/BHAVINI तक सीमित है)।
- स्वतंत्र नियामक: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) से पृथक कर उसकी स्वायत्तता सुनिश्चित करना।
- राज्य एकाधिकार: केवल सरकारी स्वामित्व वाली NPCIL (न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड) को परमाणु संयंत्र संचालित करने की अनुमति है।