संदर्भ
पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक चिंता का विषय बनकर उभरा है, और सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों, प्रवासी सुरक्षा, उर्वरक आपूर्ति, मुद्रास्फीति और राष्ट्रीय सुरक्षा पर इसके प्रत्यक्ष प्रभावों को उजागर किया है।
पश्चिम एशियाई क्षेत्र के बारे में
- इस क्षेत्र में खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह सदस्य देश (बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात) के साथ-साथ ईरान, इराक, इजरायल, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और यमन जैसे देश शामिल हैं।
- यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और औद्योगिक कच्चे माल का एक रणनीतिक केंद्र है।
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भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्त्व क्यों है?
- ऊर्जा सुरक्षा का आधार: पश्चिम एशिया भारत के लिए ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत है, जो भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग आधा और प्राकृतिक गैस आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा है, जिससे भारत, संरचनात्मक रूप से इस क्षेत्र पर निर्भर है।
- रणनीतिक समुद्री व्यापार मार्ग: पश्चिम एशिया भारत की महत्त्वपूर्ण समुद्री संचार लाइनों (SLOCs) पर स्थित है, जो इसे यूरोप, अफ्रीका और उससे आगे जोड़ती हैं, जिससे यह भारत के बाहरी व्यापार के सुचारू संचालन के लिए अपरिहार्य है।
- प्रवासी सुरक्षा और प्रेषण अर्थव्यवस्था: यह क्षेत्र एक करोड़ से अधिक भारतीयों के लिए आय का स्त्रोत है, जो भारत की प्रवासी आबादी का एक महत्त्वपूर्ण घटक हैं, जिनकी सुरक्षा, कल्याण और संकट के दौरान निकासी विदेश नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है।

- उर्वरक, LNG और औद्योगिक आपूर्ति पर निर्भरता: हाइड्रोकार्बन के अलावा, पश्चिम एशिया LNG, उर्वरक और अमोनिया, यूरिया और पेट्रोकेमिकल्स जैसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक इनपुट का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, जो भारत के कृषि, विद्युत उत्पादन और विनिर्माण क्षेत्रों के लिए आवश्यक हैं।
- भू-राजनीतिक और रणनीतिक संतुलन का क्षेत्र: पश्चिम एशिया एक जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य प्रस्तुत करता है, जहाँ भारत ईरान, इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे विभिन्न देशों के साथ बहुआयामी राजनयिक संबंध बनाए रखता है, जिसके लिए अपने रणनीतिक हितों की रक्षा हेतु एक संवेदनशील संतुलन की आवश्यकता होती है।
- सुदृढ़ आर्थिक स्थिरता और मुद्रास्फीति संचरण चैनल: पश्चिम एशिया में अस्थिरता, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, रसद लागत में वृद्धि और उर्वरक आपूर्ति में व्यवधान के माध्यम से, भारत में आयातित मुद्रास्फीति के लिए एक प्रत्यक्ष संचरण चैनल का काम करती है।
भारत के लिए प्रत्यक्ष और तत्काल परिणाम
- ऊर्जा सुरक्षा और व्यापक आर्थिक तनाव
- आयातित मुद्रास्फीति का जाल: फारस की खाड़ी में भू-राजनीतिक तनाव तेजी से घरेलू अस्थिरता में परिवर्तित हो जाता है।
- ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बढ़ने से एक शृंखला प्रभाव शुरू हो जाता है:
- ईंधन की बढ़ती कीमतें, रसद लागत में वृद्धि और चालू खाता घाटे (CDA) पर तीव्र दबाव।

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- मौद्रिक नीति की जटिलताएँ: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि से CDA में उल्लेखनीय वृद्धि होती है और CPI मुद्रास्फीति ऊपर की ओर बढ़ती है, जिससे अक्सर कठोर मौद्रिक नीति अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो विकास को धीमा कर सकती है।
- बफर सीमाएँ: लगभग 41 देशों में स्रोतों का विविधीकरण करने और सामरिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) के चरण-II विस्तार की योजना बनाने के बावजूद, वर्तमान क्षमता एक अड़चन है।
- आधिकारिक आँकड़ों से पता चलता है कि मौजूदा 5.33 मिलियन मीट्रिक टन में से केवल 3.372 मिलियन मीट्रिक टन (64%) ही भरा हुआ है, जो दीर्घकालिक व्यवधानों के विरुद्ध सीमित अल्पकालिक झटके को अवशोषित करने की क्षमता को दर्शाता है।
- LPG और LNG पर संरचनात्मक निर्भरता
- आपूर्ति शृंखला पर प्रभाव: भारत के स्वच्छ ईंधन की ओर संक्रमण ने आयात पर संरचनात्मक निर्भरता उत्पन्न कर दी है, जिसके चलते एलपीजी की 60% और प्राकृतिक गैस की लगभग 50% खपत बाहरी स्रोतों से पूर्ण होती है।
- क्षेत्रीय व्यवधान: पश्चिम एशियाई समुद्री मार्गों में अवरोध या मंदी से एक साथ निम्नलिखित को खतरा है:
- परिवार: खाना पकाने के ईंधन की वहनीयता और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की सफलता पर प्रभाव।
- शहरी अवसंरचना: शहरी गैस वितरण (CGD) नेटवर्क (PNG और CNG) को जोखिम।
- औद्योगिक उत्पादन: गैस आधारित उद्योगों और विद्युत संयंत्रों के लिए लागत में वृद्धि।
- समुद्री अवरोध: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) भारत को उच्च जोखिम वाला आयातक मानती है, क्योंकि यह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली लंबी दूरी की आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर है, जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% सँभालती है।
- ऊर्जा-कृषि-खाद्य सुरक्षा का संबंध
- उर्वरक संकट: गैस उर्वरकों का प्राथमिक कच्चा माल है। भारत के लगभग 71% यूरिया आयात और महत्त्वपूर्ण LNG आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है, इसलिए यह संकट सीधे तौर पर “यूरिया में आत्मनिर्भरता” को खतरे में डालता है।
- नीतिगत हस्तक्षेप: इस समस्या को कम करने के लिए, प्राकृतिक गैस (आपूर्ति विनियमन) आदेश, 2026 जारी किया गया, जिसमें उर्वरक संयंत्रों को उनकी औसत खपत का कम-से-कम 70% प्राप्त करना अनिवार्य किया गया ताकि कृषि उत्पादकता में गिरावट और परिणामस्वरूप खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि को रोका जा सके।
- बफर रणनीति: वर्तमान स्थिति में आवश्यक कृषि इनपुट के लिए “जस्ट-इन-टाइम” लॉजिस्टिक्स से “जस्ट-इन-केस” बफर की ओर परिवर्तन आवश्यक है।
- प्रवासी संरक्षण और समुद्री रणनीतिक हित
- मानवीय स्तंभ: प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा अब भारतीय विदेश नीति का एक प्रमुख स्तंभ है। खाड़ी देशों में 1 करोड़ (10 मिलियन) से अधिक भारतीयों की उपस्थिति में, भारत को त्वरित निकासी क्षमता और गहन राजनयिक समन्वय बनाए रखना आवश्यक है।
- आर्थिक योगदान: यह क्षेत्र प्रेषण के लिए महत्त्वपूर्ण है, जो वर्ष 2023 में रिकॉर्ड 125 अरब डॉलर से अधिक तक पहुँच गया, जिससे भारत की विदेशी मुद्रा स्थिरता को समर्थन मिलता है।
- समुद्री सुरक्षा
- ऑपरेशन संकल्प: भारतीय नौसेना समुद्री डकैती का मुकाबला करने और व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा के लिए ओमान की खाड़ी और अदन की खाड़ी में तैनात है।
- समुद्री यात्रियों का जोखिम: भारतीय समुद्री यात्री वैश्विक समुद्री कार्यबल का लगभग 10% हिस्सा हैं, जिससे वे वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों और बढ़ते बीमा प्रीमियम (जो क्षेत्रीय तनाव के दौरान 2-3 गुना तक बढ़ सकते हैं) के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हो जाते हैं।
- लचीलेपन के लिए रणनीतिक अनिवार्यताएँ
- वृद्धि की सीमाएँ: संकट ने यह प्रदर्शित किया है कि मजबूत जीडीपी वृद्धि और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार अकेले भारत को बाहरी झटकों से नहीं बचा सकते। रणनीतिक स्वायत्तता के लिए विकास के साथ-साथ लचीलापन निर्माण भी आवश्यक है।
- रणनीतिक विविधीकरण: नीति आयोग और आईईए दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि भारत को नवीकरणीय ऊर्जा की ओर अपने ऊर्जा परिवर्तन को गति देनी चाहिए और रणनीतिक जोखिम को कम करने के लिए अपने SPR विस्तार को पूरा करना चाहिए।

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- प्रणालीगत लचीलापन: भारत को वैश्विक मूल्य झटकों के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता से लचीली आपूर्ति शृंखलाओं के सक्रिय निर्माता के रूप में विकसित होना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि दूरस्थ व्यवधान तत्काल घरेलू गतिरोध का कारण न बनें।
भारत के लिए मुख्य सबक
- आयात पर निर्भरता से ऊर्जा आत्मनिर्भरता की ओर: पश्चिम एशिया में चल रहे संकट ने इस बात को पुष्टि की है कि ऊर्जा सुरक्षा आयातित हाइड्रोकार्बन पर संरचनात्मक निर्भरता को कम करने में निहित है, न कि केवल आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाने में।
- लगभग 85% कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता (पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय) के साथ, भारत बाहरी झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है।
- एक स्थायी मार्ग नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार द्वारा समर्थित बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण में निहित है, जिसमें इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, विद्युतीकृत सार्वजनिक परिवहन, रेल विद्युतीकरण और इलेक्ट्रिक कुकिंग शामिल हैं।

- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को मजबूत करना और अनुकूलित करना: इस संकट ने आपूर्ति व्यवधानों के विरुद्ध एक प्रमुख सुरक्षा कवच के रूप में भारत के एसपीआर पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है।
- जबकि भारत का कुल कच्चा तेल और उत्पाद भंडार लगभग 70-75 दिनों की माँग को पूरा करता है, इसकी समर्पित SPR क्षमता (5.33 मिलियन मीट्रिक टन, लगभग 9-10 दिन) प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सीमित है (आईईए बेंचमार्क: 90 दिनों का शुद्ध आयात)।
- समग्र ऊर्जा विविधीकरण: हालाँकि भारत ने कच्चे तेल की आपूर्ति को लगभग 41 देशों तक विस्तारित किया है, लेकिन संकट से पता चलता है कि केवल आपूर्तिकर्ता विविधीकरण ही पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लचीलेपन के लिए आवश्यक है:
- मार्ग विविधीकरण: होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अवरोधी बिंदुओं पर अत्यधिक निर्भरता कम करना।
- उत्पाद विविधीकरण: जैव ईंधन, गैस, हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे विकल्पों का विस्तार करना।
- तकनीकी विविधीकरण: शोधन, भंडारण और ईंधन-परिवर्तन क्षमताओं को मजबूत करना।
- नीति आयोग द्वारा तैयार किए गए नीतिगत ढाँचे आपूर्ति, रसद और प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र को शामिल करते हुए एक समग्र विविधीकरण रणनीति की आवश्यकता पर जोर देते हैं।
- रणनीतिक ऊर्जा साधन के रूप में एथेनॉल मिश्रण: भारत का एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम केवल एक पर्यावरणीय पहल नहीं, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण भू-राजनीतिक लचीलापन उपकरण के रूप में उभरा है।
- एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के तहत एथेनॉल ब्लेंडिंग लगभग 1.5% (2013-14) से बढ़कर लगभग 18-20% (2024-25) हो गई है, जिससे कच्चे तेल के आयात की आवश्यकता में उल्लेखनीय कमी आई है।
- वैश्विक अनुभव, विशेष रूप से ब्राजील का अनुभव, यह दर्शाता है कि उच्च ब्लेंडिंग अनिवार्यताओं (E27-E30) और फ्लेक्स-फ्यूल वाहन पारिस्थितिकी तंत्र से ईंधन आयात पर निर्भरता को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है।
- स्वदेशी ऊर्जा अनुसंधान एवं विकास और औद्योगिक क्षमता का निर्माण: वर्ष 1973 के तेल संकट के बाद से एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक सबक यह है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल आयात रणनीतियों की नहीं, बल्कि स्वदेशी तकनीकी क्षमता की आवश्यकता है।
- कोयला गैसीकरण जैसे पूर्व प्रयासों को निरंतर नीतिगत और औद्योगिक समर्थन का अभाव था।
- राष्ट्रीय कोयला गैसीकरण मिशन (लक्ष्य: 2030 तक 100 मीट्रिक टन) जैसी पहलों के तहत नए सिरे से किए जा रहे प्रयास ईंधन, रसायन और उर्वरकों के घरेलू उत्पादन की ओर एक रणनीतिक परिवर्तन को दर्शाते हैं। इससे निम्नलिखित की आवश्यकता उजागर होती है:
- स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान एवं विकास में दीर्घकालिक निवेश
- पायलट परियोजनाएँ और व्यावसायीकरण के मार्ग
- उद्योग, शिक्षा जगत और नीतिगत प्रणालियों का एकीकरण।
ऐतिहासिक केस स्टडी – वर्ष 1973 का तेल संकट और कोयले का गैसीकरण
- संदर्भ और संकट का कारण: ओपेक (OPEC) के तेल प्रतिबंध से उत्पन्न वर्ष 1973 के तेल संकट ने आयातित तेल पर भारत की अत्यधिक निर्भरता को उजागर किया, जिससे गंभीर आर्थिक तनाव, मुद्रास्फीति और ऊर्जा असुरक्षा उत्पन्न हुई।
- इस घटना ने ऊर्जा को एक रणनीतिक कमजोरी के रूप में पहचानने में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ का काम किया।
- भारत की नीतिगत प्रतिक्रिया: इसके जवाब में, भारत ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, विशेष रूप से कोयला गैसीकरण, की खोज की, जिसका पहला प्रस्ताव वैज्ञानिक सैयद हुसैन जहीर ने दिया था।
- हालाँकि, नीतिगत निष्क्रियता, कमजोर संस्थागत समर्थन और सीमित उद्योग एकीकरण के कारण, यह तकनीक संकट के प्रभाव को कम करने के लिए समय पर बड़े पैमाने पर लागू नहीं हो सकी।
- अवसर का खोना: देरी से अपनाने का मतलब था कि भारत तेल संकटों के प्रति संवेदनशील बना रहा और कोयला आधारित विकल्पों के संभावित लाभों का एहसास बहुत बाद में हुआ।
- जैसा कि बाद में इंदिरा गांधी ने स्वीकार किया, प्रारंभिक तकनीकी अपनाने से संकट के प्रभाव की गंभीरता को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
- समकालीन नीति के लिए महत्त्वपूर्ण सबक: ऊर्जा सुरक्षा केवल तात्कालिक संकट प्रबंधन पर निर्भर नहीं रह सकती; इसके लिए आवश्यक है:
- दीर्घकालिक नीतिगत दृष्टिकोण और रणनीतिक दूरदर्शिता
- वैकल्पिक प्रौद्योगिकियों को समय पर अपनाना और उनका विस्तार करना
- उद्योग-अनुसंधान-सरकार के बीच मजबूत संबंध
- वर्तमान में प्रासंगिकता: पश्चिम एशिया में चल रहा संकट इसी तरह की कमजोरियों को दर्शाता है, जो स्वदेशी प्रौद्योगिकियों (जैसे- हरित हाइड्रोजन, कोयला गैसीकरण) में सक्रिय निवेश और आयात पर निर्भरता में संरचनात्मक कमी की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
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आगे की राह
- अल्पकालिक स्थिरीकरण और संकट प्रबंधन
- महत्त्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं और समुद्री मार्गों की सुरक्षा: भारत को पश्चिम एशिया में संकट से उत्पन्न झटकों को सीमित करने और आवश्यक आपूर्ति शृंखलाओं को स्थिर करने को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- इसके लिए समुद्री व्यापार मार्गों, विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आस-पास, को नौसैनिक सतर्कता बढ़ाने, और अंतरराष्ट्रीय समुद्री समन्वय के माध्यम से सुरक्षित करना आवश्यक है, जिससे निर्बाध व्यापार और ऊर्जा प्रवाह सुनिश्चित हो सके।
- ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करना: सरकार को आकस्मिक खरीद अनुबंधों को सक्रिय करके और बाजार विविधीकरण पर निर्भरता बढ़ाकर कच्चे तेल, LPG, LNG और उर्वरकों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।
- इससे ऊर्जा, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में आपूर्ति की कमी और कीमतों में अचानक वृद्धि का जोखिम कम होता है।
- घरेलू बाजार विकृतियों को रोकना: जमाखोरी, सट्टेबाजी और कृत्रिम मूल्य वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए कठोर नियामक निरीक्षण, बाजार खुफिया जानकारी और वास्तविक समय निगरानी तंत्र की आवश्यकता है।
- इससे उपभोक्ताओं और उद्योगों के लिए आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में स्थिरता और समान पहुँच सुनिश्चित होती है।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का सुदृढ़ीकरण: भारत को वैश्विक कीमतों में नरमी के समय अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को समय रहते भरना चाहिए ताकि आपातकालीन ऊर्जा भंडार को बढ़ाया जा सके।
- कुशल भंडार प्रबंधन से दीर्घकालिक व्यवधानों के दौरान झटके सहने की क्षमता में सुधार होगा।
- प्रवासी भारतीयों की मजबूत सुरक्षा और संकटकालीन तैयारी: क्षेत्र में बड़ी भारतीय आबादी को देखते हुए, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा, सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए।
- इसके लिए निकासी की तैयारी, दूतावासों के साथ मजबूत समन्वय, वास्तविक समय में सलाह और संकटकालीन हेल्पलाइन की आवश्यकता है, जिससे त्वरित और समन्वित मानवीय सहायता सुनिश्चित हो सके।
- मध्यम अवधि – लचीलापन और अनुकूलन क्षमता का निर्माण
- ऊर्जा, व्यापार और रसद की मजबूती को संस्थागत रूप देना: भारत को महत्त्वपूर्ण प्रणालियों में मजबूती लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि ऊर्जा, व्यापार और रसद नेटवर्क पश्चिम एशिया जैसे क्षेत्रों के बाह्य तनावों का सामना कर सकें।
- इसमें सभी क्षेत्रों में संस्थागत ढाँचों, समन्वय तंत्रों और संकट-प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल को मजबूत करना शामिल है।
- रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) का विस्तार और अनुकूलन: भारत को SPR क्षमता का विस्तार करना चाहिए और भंडार प्रबंधन प्रथाओं में सुधार करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि भंडार एक निष्क्रिय भंडार के बजाय एक गतिशील शॉक एब्जॉर्बर के रूप में कार्य करें।
- समय पर भरना, रणनीतिक निकासी तंत्र और वाणिज्यिक भंडारण के साथ एकीकरण से ऊर्जा सुरक्षा और मूल्य स्थिरीकरण क्षमता में वृद्धि होगी।
- ऊर्जा स्रोत लचीलेपन को बढ़ाना: मूल्य दक्षता और आपूर्ति विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक आपूर्ति अनुबंधों और स्पॉट मार्केट खरीद को मिलाकर एक संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।
- भारत को आपूर्तिकर्ता विविधीकरण और मार्ग विविधीकरण का भी विस्तार करना चाहिए, जिससे विशिष्ट क्षेत्रों या चोकपॉइंट्स पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके।
- ईंधन विविधीकरण और गैस-आधारित अर्थव्यवस्था को गति देना: भारत को एथेनॉल मिश्रण, संपीडित बायोगैस (CBG) और प्राकृतिक गैस जैसे वैकल्पिक ईंधनों का विस्तार करने की आवश्यकता है, जिससे कच्चे तेल पर निर्भरता कम हो सके।
- शहरी गैस वितरण (CGD) नेटवर्क का विस्तार शहरी ऊर्जा पहुँच और स्वच्छ ईंधन अपनाने को मजबूत करेगा, जिससे ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय लक्ष्यों दोनों को समर्थन मिलेगा।
- परिवहन विद्युतीकरण को बढ़ावा देना: परिवहन क्षेत्र में तेल की खपत को कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों, जिनमें इलेक्ट्रिक बसें और रेलवे विद्युतीकरण शामिल हैं, के विद्युतीकरण को तीव्र करना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कच्चे तेल की माँग का एक बड़ा हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है।
- यह परिवर्तन उत्सर्जन को कम करने और दीर्घकालिक लागत दक्षता में भी योगदान देगा।
- समुद्री और व्यापार सुरक्षा को मजबूत करना: भारत को जोखिम-साझाकरण तंत्र, जहाजरानी बीमा ढाँचे और प्रमुख समुद्री देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी के माध्यम से समुद्री आकस्मिकता योजना को मजबूत करना चाहिए।
- इससे व्यापार प्रवाह की निरंतरता, जहाजरानी संपत्तियों की सुरक्षा और वैश्विक समुद्री मार्गों को प्रभावित करने वाले भू-राजनीतिक व्यवधानों के विरुद्ध लचीलापन सुनिश्चित होगा।
- प्रत्यास्थता बढ़ाना: पश्चिमी एशिया में जारी संघर्ष के कारण भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEEC) में देरी हो रही है, ऐसे में भारत को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक पूर्वी समुद्री गलियारे को रणनीतिक विकल्पों के रूप में उपयोग करना चाहिए, जिससे रसद विविधीकरण सुनिश्चित हो सके और उभरते “गलियारा संघर्षों” के विरुद्ध लचीलापन बना रहे।
- दीर्घकालिक – संरचनात्मक ऊर्जा संप्रभुता प्राप्त करना
- ऊर्जा संप्रभुता की ओर संक्रमण: भारत को आयात पर निर्भरता को प्रबंधित करने से हटकर इसे संरचनात्मक रूप से कम करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा, जिसका लक्ष्य वास्तविक ऊर्जा संप्रभुता प्राप्त करना है।
- इसके लिए ऊर्जा मिश्रण में एक व्यवस्थित परिवर्तन की आवश्यकता है, जिससे पश्चिम एशिया जैसे बाहरी भू-राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशीलता कम हो सके।
- नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार और ग्रिड आधुनिकीकरण में तेजी लाना: नवीकरणीय ऊर्जा (सौर, पवन, हाइब्रिड सिस्टम) की ओर बड़े पैमाने पर किए जा रहे प्रयासों को विश्वसनीयता, स्थिरता और विस्तारशीलता सुनिश्चित करने के लिए उन्नत बैटरी भंडारण समाधानों तथा ग्रिड आधुनिकीकरण द्वारा पूरक बनाया जाना चाहिए।
- पारगमन अवसंरचना और स्मार्ट ग्रिड को मजबूत करने से अस्थायी नवीकरणीय स्रोतों का कुशल एकीकरण संभव होगा।
- घरेलू स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण: भारत को वैश्विक ऊर्जा संक्रमण के रुझानों के अनुरूप इलेक्ट्रिक वाहनों (EV), बैटरी प्रौद्योगिकियों और हरित हाइड्रोजन में स्वदेशी विनिर्माण क्षमता विकसित करनी चाहिए।
- इससे न केवल ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी बल्कि औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और तकनीकी नेतृत्व को भी बढ़ावा मिलेगा।
- माँग-आधारित विद्युतीकरण और ऊर्जा प्रतिस्थापन को बढ़ावा देना: इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, इलेक्ट्रिक कुकिंग और समग्र माँग-आधारित विद्युतीकरण का विस्तार आयातित कच्चे तेल और LPG पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है।
- यह परिवर्तन उत्सर्जन में कमी, वायु गुणवत्ता में सुधार और दीर्घकालिक लागत दक्षता में भी योगदान देगा।
- रणनीतिक अनुसंधान एवं विकास और स्वदेशी प्रौद्योगिकियों में निवेश: दीर्घकालिक लचीलापन बनाने के लिए अनुसंधान एवं विकास (R&D), पायलट परियोजनाओं और नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र में निरंतर निवेश महत्त्वपूर्ण है।
- फोकस क्षेत्रों में हरित हाइड्रोजन, उन्नत जैव ईंधन और रसायनों तथा उर्वरकों के उत्पादन के लिए कोयला गैसीकरण प्रक्रिया शामिल होना चाहिए, जिससे विविध और आत्मनिर्भर ऊर्जा मार्ग सक्षम हो सकें।
- संस्थागत ढाँचे और नीति पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करना: ऊर्जा संप्रभुता प्राप्त करने के लिए मजबूत संस्थागत तंत्र, नीति निरंतरता और प्रभावी शासन संरचनाओं की आवश्यकता है।
- उन्नत उद्योग-अकादमिक सहयोग, निजी क्षेत्र की भागीदारी और नियामक स्थिरता नवाचारों को बढ़ावा देने तथा सतत् परिवर्तन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होगी।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया का संकट केवल विदेश नीति की चुनौती नहीं है, बल्कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता की एक व्यापक परीक्षा है, जो ऊर्जा, खाद्य, समुद्री क्षेत्र, प्रवासी समुदाय और आर्थिक सुरक्षा के बीच गहरे अंतर्संबंधों को उजागर करती है। इससे मिलने वाला स्थायी सबक यह है कि लचीलापन बार-बार आने वाले झटकों से निपटने में नहीं, बल्कि विद्युतीकरण, विविधीकरण, घरेलू क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक रणनीतिक दूरदर्शिता के माध्यम से बाहरी निर्भरता को व्यवस्थित रूप से कम करने में निहित है।