संदर्भ:
दक्षिण-पश्चिम मानसून के पहले भाग के दौरान अपर्याप्त वर्षा ने कर्नाटक और तमिलनाडु के मध्य कावेरी जल विवाद को पुनर्जीवित कर दिया है, जिससे अंतर-राज्यीय नदियों के प्रबंधन में वैज्ञानिक संकट-साझाकरण सूत्र और सहकारी संघवाद की तत्काल आवश्यकता उजागर हुई है।
पृष्ठभूमि
- कावेरी नदी: कावेरी एक अंतर-राज्यीय नदी है जो कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी से होकर प्रवाहित होती है, तथा कृषि, पेयजल और पारिस्थितिकी तंत्र को सहयोग प्रदान करती है।
- न्यायाधिकरण और सुप्रीम कोर्ट: जल बंटवारा कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण पुरस्कार (2007) द्वारा शासित होता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय (2018) द्वारा संशोधित किया गया है।
वर्तमान घटनाक्रम
- मानसून में अनियमितता: प्रारंभिक मानसून महीनों के दौरान खराब वर्षा के कारण जलाशयों में भंडारण कम रहा और जल उपलब्धता घटी है।
- जल छोड़ने में कमी: कर्नाटक ने भविष्य की पेयजल आवश्यकताओं की चिंताओं का हवाला देते हुए, न्यायाधिकरण पुरस्कार के तहत निर्धारित मासिक आवंटन से अत्यधिक कम जल छोड़ा।
- नियामक निर्देश: कावेरी जल नियमन समिति (CWRC) ने कर्नाटक को जल छोड़ने का निर्देश दिया, और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने इस सिफारिश का समर्थन किया।
- राजनीतिक तनाव: इस मुद्दे ने कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों में विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक लामबंदी को जन्म दिया है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- संकट-साझाकरण सूत्र का अभाव: कमी वाले वर्षा वर्षों में जल के आनुपातिक बंटवारे के लिए कोई आपसी रूप से स्वीकृत तंत्र मौजूद नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप विवाद बार-बार उत्पन्न होते हैं।
- प्रतिस्पर्धी जल आवश्यकताएँ: कम जल उपलब्धता की अवधि के दौरान पेयजल, सिंचाई और पारिस्थितिक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाता है।
- विश्वास की कमी: जल छोड़ने को लेकर बार-बार होने वाले मतभेद अंतर-राज्यीय सहयोग को कमजोर करते हैं और सहमति-आधारित समाधानों में देरी करते हैं।
- जलवायु परिवर्तनशीलता: मानसून पैटर्न में बढ़ती अनिश्चितता ने नदी जल प्रबंधन को अधिक जटिल बना दिया है।
संस्थागत ढाँचा :
- कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA): न्यायाधिकरण पुरस्कार और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को लागू करने, जलाशय स्तरों की निगरानी करने और जल छोड़े जाने की देखरेख के लिए स्थापित।
- कावेरी जल नियमन समिति (CWRC): अंतर्वाह, जलाशय भंडारण की निगरानी करके और जल छोड़ने की सिफारिश करके CWMA की सहायता करती है।
आगे की राह
- संकट-साझाकरण तंत्र विकसित करना: सूखे वाले वर्षों में समान जल बंटवारे के लिए एक वैज्ञानिक, पारदर्शी और आपसी सहमति से स्वीकृत तंत्र स्थापित करना।
- सहकारी संघवाद को मजबूत करना: संघर्ष को कम करने के लिए तटवर्ती (Riparian) राज्यों के मध्य नियमित संवाद और राजनीतिक सहमति को बढ़ावा देना।
- बेसिन-स्तरीय जल प्रबंधन को अपनाना: वास्तविक समय में डेटा साझाकरण, जलाशय समन्वय और एकीकृत नदी बेसिन योजना में सुधार करना।
- जल उपयोग दक्षता को बढ़ाना: नदी जल पर दबाव कम करने के लिए सूक्ष्म सिंचाई, फसल विविधीकरण और जल संरक्षण उपायों को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
बार-बार उभरने वाला कावेरी विवाद यह दर्शाता है कि मुकदमेबाजी से आगे बढ़कर सहकारी, विज्ञान-आधारित और पूर्वानुमेय जल शासन की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। सुदृढ़ संस्थाओं और आपसी विश्वास द्वारा समर्थित एक सहमति-संचालित संकट-साझाकरण तंत्र, समान जल वितरण, कृषि स्थिरता और सहकारी संघवाद सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।