संदर्भ:
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए संबंधित न्यायालय प्राधिकारियों की पूर्व अनुमति के बिना सीधे प्रसारित की गई न्यायालयी कार्यवाहियों की ध्वनि-चित्र अभिलेखों (रिकॉर्डिंग) के अनधिकृत निष्कर्षण, संपादन, प्रसार, पुनः-प्रकाशन, अद्यतन (अपलोडिंग) और मुद्रीकरण पर रोक लगा दी है।
पृष्ठभूमि
- न्यायालयी कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण: सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत संघ (2018) के निर्णय के पश्चात सितंबर 2022 में संविधान पीठ की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण आरंभ किया।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायता प्राप्त प्रतिलेखन: फरवरी 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायालयी कार्यवाहियों का प्रामाणिक अंकीय (डिजिटल) अभिलेख तैयार करने हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायता प्राप्त सीधा प्रतिलेखन आरंभ किया।
अंतरिम आदेश की आवश्यकता क्यों?
- चयनात्मक संपादन: प्रायः लघु एवं संदर्भ से काटे गए चलचित्र अंश प्रसारित किए जाते हैं, जिससे न्यायिक टिप्पणियों और कार्यवाहियों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाता है।
- वाणिज्यिक दोहन: न्यायालय कक्ष की कार्यवाहियों का सामाजिक माध्यम मंचों पर व्यावसायिक लाभ हेतु मुद्रीकरण बढ़ता जा रहा है।
- दुष्प्रचार: संपादित अभिलेख न्यायिक कार्यवाहियों को विकृत कर सकते हैं, जिससे भ्रामक सार्वजनिक विमर्श उत्पन्न होते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़े जोखिम: कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित उपकरण ध्वनि-चित्र अभिलेखों में हेरफेर कर भ्रामक अथवा मनगढ़ंत सामग्री बना सकते हैं।
- न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा: न्यायालय कक्ष की बातचीत के चयनात्मक प्रसार से न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को कुत्सा-प्रचार, उत्पीड़न और अनुचित सार्वजनिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है, जिससे न्याय प्रशासन प्रभावित होता है।
संबंधित संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा
- अनुच्छेद 21: न्याय तक पहुँच के अधिकार की व्याख्या में न्यायालयी कार्यवाहियों तक युक्तियुक्त सार्वजनिक पहुँच को शामिल माना गया है।
- अनुच्छेद 19(1)(क): भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है, किंतु यह अनुच्छेद 19(2) के तहत युक्तियुक्त निर्बंधनों के अधीन है।
- अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है, जिससे उसे अभिलेखों के संरक्षण एवं अवमानना हेतु दंडित करने की शक्ति प्राप्त होती है।
- अनुच्छेद 215: प्रत्येक उच्च न्यायालय को समान शक्तियों सहित अभिलेख न्यायालय घोषित करता है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी प्रमुख निर्देश
- पूर्व अनुमति अनिवार्य: सर्वोच्च न्यायालय के महासचिव अथवा संबंधित उच्च न्यायालय के महापंजीयक की अनुमति के बिना न्यायिक कार्यवाहियों के ध्वनि-चित्र अभिलेखों का निष्कर्षण, संपादन, अद्यतन, पुनः-प्रकाशन, प्रसार अथवा मुद्रीकरण नहीं किया जा सकता।
- समाचार प्रतिवेदन को छूट: आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह माध्यम-कर्मियों द्वारा न्यायालयी कार्यवाहियों की सद्भावनापूर्ण रिपोर्टिंग को प्रतिबंधित नहीं करता।
- न्यायालयों द्वारा क्रियान्वयन: सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं तथा सभी उच्च न्यायालयों को इस अंतरिम आदेश को अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर अद्यतित करने का निर्देश दिया।
- उच्च न्यायालयों से प्रतिवेदन: सभी उच्च न्यायालयों को न्यायालयी कार्यवाहियों के सीधे प्रसारण व अभिलेखन हेतु आदर्श नियम, 2022 के क्रियान्वयन संबंधी प्रतिवेदन प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।
- केंद्र सरकार से परामर्श: केंद्र सरकार से प्रभावी नियामक ढाँचा तैयार करने हेतु नोडल मंत्रालयों तथा संबंधित अंकीय मध्यवर्तियों की पहचान करने का आग्रह किया गया है।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ
- सुरक्षा उपायों सहित खुला न्याय: पारदर्शिता, न्यायिक कार्यवाहियों की सत्यनिष्ठा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
- अंकीय अभिलेखों को संरक्षण की आवश्यकता: न्यायालयी अभिलेखों की सहज उपलब्धता, दुरुपयोग होने पर न्याय प्रशासन के लिए संभावित समस्या बन गई है।
- न्यायालय अभिलेखागार: न्यायालय ने प्राधिकृत व्यक्तियों के लिए नियंत्रित पहुँच सहित कार्यवाहियों का आधिकारिक अंकीय अभिलेखागार बनाए रखने का सुझाव दिया है।
- आभासी सुनवाई लिंक: आभासी सुनवाई संबंधी लिंक का अंधाधुंध साझाकरण भी दुरुपयोग को बढ़ावा देता है और इसके लिए अधिक नियमन की आवश्यकता है।
विधिक ढाँचा
- स्वप्निल त्रिपाठी बनाम भारत का सर्वोच्च न्यायालय (2018): सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस बात का जिक्र किया गया था कि न्यायालयी कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण, खुले न्याय के संवैधानिक सिद्धांत का विस्तार है तथा यह अनुच्छेद 21 के तहत न्याय तक पहुँच के अधिकार को आगे बढ़ाता है।
- संविधान पीठ से कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2022 में संविधान पीठ की कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण आरंभ किया।
- न्यायालयी कार्यवाहियों के सीधे प्रसारण व अभिलेखन हेतु आदर्श नियम (2022): सर्वोच्च न्यायालय की ई-समिति द्वारा तैयार ये नियम सीधे प्रसारित कार्यवाहियों के अनधिकृत अभिलेखन, पुनरुत्पादन, साझाकरण अथवा प्रसार को प्रतिबंधित करते हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायता प्राप्त सीधा प्रतिलेखन (2023): सर्वोच्च न्यायालय, न्यायालयी कार्यवाहियों का सटीक अंकीय अभिलेखागार तैयार करने हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायता प्राप्त सीधा प्रतिलेखन आरंभ करने वाला भारत का पहला न्यायालय बन गया है ।
निर्णय का महत्त्व
- पारदर्शिता को बढ़ावा देना : न्यायिक प्रक्रिया में खुलापन और जावबदेहिता को मज़बूत करता है।
- न्याय तक पहुँच में वृद्धि: नागरिकों, अधिवक्ताओं, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को दूर से न्यायालयी कार्यवाहियों का अवलोकन करने में सक्षम बनाता है।
- सार्वजनिक जागरूकता में सुधार: विधिक साक्षरता तथा संवैधानिक व कानूनी मुद्दों की सार्वजनिक समझ को बढ़ाता है।
- आधिकारिक अभिलेखों का निर्माण: अंकीय अभिलेख तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सहायता प्राप्त प्रतिलेख प्रामाणिक न्यायिक अभिलेखों के संरक्षण में सहायक हैं।
- न्यायिक जवाबदेही को सुदृढ़ करना: सार्वजनिक दृश्यता, न्याय व्यवस्था में विश्वास को बढ़ाती है।
चुनौतियाँ
- चयनात्मक प्रस्तुतीकरण: आंशिक चलचित्र अंश न्यायिक तर्क को गलत ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं और सार्वजनिक धारणा को प्रभावित कर सकते हैं।
- सामाजिक माध्यम पर मुकदमेबाज़ी: संपादित सामग्री के तीव्र प्रसार से न्यायिक निर्णय आने से पूर्व ही सार्वजनिक राय बन सकती है।
- न्यायिक स्वतंत्रता को खतरा: विकृत वेबसाइट के कंटेन्ट के कारण न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को ट्रोलिंग, धमकी अथवा प्रतिष्ठा को क्षति का सामना करना पड़ सकता है।
- गोपनीयता संबंधी चिंताएँ: पीड़ितों, बच्चों अथवा गोपनीय मामलों से जुड़ी संवेदनशील कार्यवाहियों हेतु अधिक सुरक्षा की आवश्यकता है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम हेरफेर: फर्जी चलचित्र (डीपफेक) एवं कृत्रिम रूप से तैयार कंटेन्ट न्यायालय कक्ष के अभिलेखों को बदल सकते हैं, जिससे न्यायिक कार्यवाहियों की प्रामाणिकता कमज़ोर हो सकती है।
आगे की राह
- नियामक ढाँचे को सुदृढ़ करना: न्यायिक अभिलेखों के उपयोग, भंडारण एवं प्रसार को नियंत्रित करने वाले व्यापक दिशानिर्देश विकसित करने की आवश्यकता है ।
- आधिकारिक डिजिटल भंडार: नियंत्रित सार्वजनिक पहुँच सहित न्यायालयी कार्यवाहियों के प्रामाणीकृत अभिलेखागार बनाए रखना।
- जवाबदेहिता : डिजिटल मध्यवर्तियों के लिए यह अनिवार्य करना कि सूचना मिलने पर वे हेरफेर की गई अथवा अनधिकृत न्यायिक कंटेन्ट को तुरंत हटाएँ।
- वाटरमार्किंग (Watermarking) एवं प्रामाणीकरण का उपयोग: नयायिक कंटेन्ट में किसी भी प्रकार के छेड़छाड़ को रोकने हेतु डिजिटल वाटरमार्किंग तथा प्रमाणीकृत प्रणाली को विकसित करना अनिवार्य है ।
- संतुलित दृष्टिकोण: न्यायपालिका की गरिमा, स्वतंत्रता और सत्यनिष्ठा की रक्षा करते हुए न्यायिक पारदर्शिता को बनाए रखना आवश्यक है ।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः सर्वोच्च न्यायालय का यह अंतरिम आदेश खुली न्यायिक अवसंरचना को न्यायिक कार्यवाहियों की सत्यनिष्ठा एवं निष्पक्षता के साथ संतुलित करता है। जैसे-जैसे न्यायालय अधिकाधिक डिजिटल होते जा रहे हैं, वैसे – वैसे इसके द्वारा प्रदान की गए निर्णयों के दुरुपयोग व दुष्प्रचार को रोकने के लिए किए गए सुदृढ़ सुरक्षा उपाय न्यायपालिका में जनविश्वास को बनाए रखने हेतु महत्त्वपूर्ण हैं।
सिविल सेवा मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उपलब्ध संवैधानिक प्रावधानों का परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारतीय संविधान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए—
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है।
- सर्वोच्च न्यायालय को अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्राप्त है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों |