संदर्भ
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 85–86 (पूर्व में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A) के अंतर्गत घरेलू क्रूरता से संबंधित प्रावधान का विस्तार करते हुए यह निर्णय दिया कि अब यह प्रावधान उन लिव-इन संबंधों पर भी लागू होंगे, जो विवाह के समान प्रकृति के हैं ।
पृष्ठभूमि
- पूर्ववर्ती विधिक स्थितियाँ : भारतीय दंड संहिता की धारा 498क के तहत किसी विवाहित महिला के साथ उसके पति अथवा उसके नातेदारों द्वारा की गई किसी भी प्रकार की क्रूरता को अपराध माना गया है । चूँकि इस उपबंध में स्पष्ट रूप से “पति” शब्द का उल्लेख किया गया था, जिसकी वजह से यह सामान्यतः केवल विधिमान्य (legally valid) विवाहों तक ही सीमित था।
- न्यायिक विस्तार: उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले उन महिलाओं को भी इस प्रावधान के तहत संरक्षण प्रदान किया था, जिन्हें कपटपूर्वक शून्य (void) या शून्यकरणीय (voidable) विवाह में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया गया था| इस संदर्भ में न्यायालय ने यह कहा कि कोई पुरुष केवल इस आधार पर दांडिक कार्यवाही से नहीं बच सकता कि विवाह विधिक रूप से मान्य नहीं था।
- वर्तमान मामला: अभियुक्त ने तर्क दिया कि चूँकि वह पहले से ही विधिक रूप से विवाहित था, इसलिए वादिनी के साथ उसका संबंध शून्य था और धारा 498क उस पर लागू नहीं होती है ।
- हालाँकि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस याचिका को अस्वीकार कर दिया था, जिसके पश्चात उच्चतम न्यायालय इससे आगे बढ़ाकर इस वायापक प्रश्न पर विचार किया कि क्या अर्हक लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाएँ घरेलू क्रूरता के अपराध से संबंधित कानूनी संरक्षण का अवलंब ले सकती हैं।
निर्णय की मुख्य विशेषताएँ
- विस्तारित संरक्षण: लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाएँ भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 और 86 के अंतर्गत संरक्षण की अधिकारी होंगी, यदि वह संबंध “विवाह की प्रकृति का” हो और उसमें विवाह करने का अन्योन्य आशय परिलक्षित हो।
- धारा 85: पति या उसके नातेदारों द्वारा किसी महिला के साथ क्रूरता को दंड की श्रेणी में शामिल करती है।
- धारा 86: यह उपधारणा (presumption) स्थापित करती है कि यदि कोई विवाहित महिला पति या उसके नातेदारों द्वारा क्रूरता किए जाने के पश्चात आत्महत्या से मृत्यु को प्राप्त होती है, तो उसे आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (abetment of suicide) माना जाएगा।
- उद्देश्यपरक व्याख्या : न्यायालय ने उद्देश्यपरक व्याख्या को अंगीकार करते हुए यह प्रेक्षित किया कि विधि का उद्देश्य घरेलू क्रूरता को रोकना है, और विधिक संरक्षण को बदलती सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप विकसित होना चाहिए।
- संवैधानिक आधार: न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि केवल इस आधार पर किसी महिला को दांडिक संरक्षण से वंचित करना कि वह अविवाहित है, घरेलू क्रूरता की रोकथाम के उद्देश्य से कोई युक्तियुक्त संबंध (Rational Nexus) नहीं रखता और यह संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है।
- विवाह का आशय: केवल वे लिव-इन संबंध, जो “विवाह की प्रकृति के” हों और विवाह करने के वास्तविक आशय को प्रदर्शित करते हों, धारा 85, भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त करेंगे।
‘विवाह का आशय’ क्यों महत्वपूर्ण है?
- विवाह के सर्वाधिक निकट: न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि जिन संबंधों में विवाह के लक्षण और विवाह करने का आशय दोनों विद्यमान हों, वे विवाह के सर्वाधिक निकट या समतुल्य हैं।
- दांडिक परिणाम: चूँकि धारा 85, भारतीय न्याय संहिता का एक दंडात्मक उपबंध है, इसलिए इसे केवल उन्हीं संबंधों पर लागू होना चाहिए जो विवाह से घनिष्ठतः सादृश्य रखते हैं।
निर्णय का महत्त्व
- बदलती सामाजिक वास्तविकताओं की पहचान: लिव-इन संबंधों की बढ़ती व्यापकता को स्वीकार करता है और दांडिक विधि को उभरती पारिवारिक संरचनाओं के साथ जोड़ता है।
- महिलाओं के लिए संरक्षण को सशक्त करना: घरेलू हिंसा, आर्थिक शोषण, परित्याग और उत्पीड़न जैसी सुभेद्यताओं को ध्यान में रखते हुए वास्तविक लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं तक दांडिक विधि के संरक्षण का विस्तार करता है।
- लैंगिक न्याय को प्रोत्साहन: वैवाहिक स्थिति में तकनीकी दोषों या विधिमान्य विवाह के अभाव का लाभ उठाकर अपराधियों को दांडिक दायित्व से बचने से रोकता है।
- स्वायत्तता और विधिक संरक्षण में संतुलन: विवाह के आशय की अपेक्षा करके, यह निर्णय वास्तविक संबंधों को संरक्षण देता है, साथ ही दांडिक विधि के अविवेकपूर्ण प्रयोग को आकस्मिक संबंधों पर रोकता है।
घरेलू हिंसा और क्रूरता से संबंधित विधिक ढाँचे:
- दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961: दहेज देने, लेने और उसकी माँग करने को प्रतिषिद्ध करता है, जो घरेलू हिंसा और क्रूरता के एक प्रमुख कारण को शामिल करता है।
- परिवार न्यायालय अधिनियम, 1984: सुलह और न्यायनिर्णयन के माध्यम से वैवाहिक और पारिवारिक विवादों के शीघ्र निपटारे हेतु परिवार न्यायालयों की स्थापना करता है।
- भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 – धारा 498क (1983 में अंतःस्थापित): किसी विवाहित महिला के प्रति उसके पति या उसके नातेदारों द्वारा की गई क्रूरता को अपराध घोषित करती थी। (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 व 86 द्वारा प्रतिस्थापित।)
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण (PWDV) अधिनियम, 2005: एक सिविल विधि, जो संरक्षण आदेश, निवास का अधिकार, भरण-पोषण , अभिरक्षा और प्रतिकर का उपबंध करती है। इसमें विवाह में रहने वाली महिलाओं के साथ-साथ “विवाह की प्रकृति के संबंधों” (लिव-इन संबंध) में रहने वाली महिलाएँ भी शामिल हैं।
चुनौतियाँ
- विवाह के आशय का निर्धारण: निर्णय में अन्योन्य आशय को सिद्ध करने हेतु वस्तुनिष्ठ कसौटी निर्धारित नहीं की गई है, जिससे तथ्यात्मक निर्धारण का बड़ा भाग न्यायालयों पर छोड़ दिया गया है।
- साक्ष्य संबंधी चुनौतियाँ: विवाह-सदृश संबंध और अन्योन्य आशय को स्थापित करना अनेक मामलों में कठिन हो सकता है।
- न्यायिक अतिक्रमण पर विवाद: आलोचकों का तर्क है कि विधायी संशोधन के बिना किसी दंडात्मक उपबंध के विस्तार का दायरा न्यायिक विधि-निर्माण की सीमा को छूता है, जबकि समर्थक इसे संवैधानिक व्याख्या के विधिसम्मत प्रयोग के रूप में देखते हैं।
- दुरुपयोग की संभावना: अन्य वैवाहिक अपराधों की भाँति, वास्तविक पीड़िताओं को संरक्षण देते हुए दुरुपयोग रोकने के लिए सतर्क न्यायिक संवीक्षा और प्रक्रियात्मक सुरक्षोपाय आवश्यक बने रहते हैं।
आगे की राह
- विधायी स्पष्टता: अस्पष्टता कम करने और एकसमान क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए, अर्ह लिव-इन संबंधों के दायरे को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने हेतु धारा 85, भारतीय न्याय संहिता में संशोधन किया जाए।
- वस्तुनिष्ठ मार्गदर्शक सिद्धांत: दांडिक कार्यवाहियों में संगति सुनिश्चित करने के लिए “विवाह की प्रकृति का संबंध” और “विवाह का आशय” के निर्धारण हेतु स्पष्ट न्यायिक या विधायी मानदंड विकसित किए जाएँ।
- प्रक्रियात्मक सुरक्षोपायों को सशक्त करना: वास्तविक पीड़िताओं की रक्षा करते हुए स्वेच्छाचारी गिरफ्तारियों को रोकने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35 और अरनेश कुमार मार्गदर्शक सिद्धांतों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
- विधिक ढाँचे के साथ सामंजस्य: भारतीय न्याय संहिता, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (भरण-पोषण), तथा उत्तराखंड समान नागरिक संहिता अधिनियम, 2024 जैसे राज्य विधानों में सामंजस्य स्थापित किया जाए, ताकि गैर-पारंपरिक संबंधों में रहने वाली महिलाओं के लिए एक सुसंगत विधिक व्यवस्था सुनिश्चित की जा सके।
- क्षमता निर्माण एवं विधिक जागरूकता: ऐसे मामलों को संवेदनशीलता के साथ संभालने हेतु पुलिस, अभियोजकों और न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाए, साथ ही लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं के लिए विधिक जागरूकता और विधिक सहायता को सशक्त किया जाए।
- संरक्षण और सम्यक प्रक्रिया में संतुलन: भविष्य के सुधारों में लैंगिक न्याय, संवैधानिक समानता और सम्यक प्रक्रिया को कायम रखा जाए, ताकि दंडात्मक उपबंधों के दुरुपयोग को प्रोत्साहित किए बिना सुभेद्य महिलाओं को संरक्षण मिल सके।
निष्कर्ष
यह निर्णय लैंगिक न्याय, संवैधानिक समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और दांडिक विधि के दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षोपायों के मध्य संतुलन स्थापित करते हुए, वास्तविक लिव-इन संबंधों तक घरेलू क्रूरता के विरुद्ध संरक्षण का विस्तार करके भारत की दांडिक न्यायशास्त्र को आगे बढ़ाता है।