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भारतीय राजनीति में युवा: भविष्य के नेताओं से वर्तमान के भागीदार तक

भारतीय राजनीति में युवा: भविष्य के नेताओं से वर्तमान के भागीदार तक 15 Jul 2026

संदर्भ:

हाल के वर्षों में भारत की राजनीति में युवाओं की भागीदारी में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिल रहा है। अब युवाओं को केवल भविष्य के नेता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि वे डिजिटल प्लेटफॉर्मों और जमीनी स्तर की सक्रियता (ग्रासरूट एंगेजमेंट) के माध्यम से चुनावी परिणामों, जन-विमर्श तथा नीतिगत बहसों को सक्रिय रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

युवाओं की राजनीतिक भागीदारी क्यों महत्वपूर्ण है?

  • भारत एक युवा राष्ट्र है, जहाँ मध्य आयु (Median Age) वर्ग लगभग 28 वर्ष है। इससे युवा देश की जनसांख्यिकीय एवं चुनावी शक्ति का प्रमुख आधार निर्मित होता है।
  • भारत की लगभग 65% जनसंख्या 15–64 वर्ष के आयु वर्ग में आती है, जो देश को एक महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान करती है।
  • युवाओं में सुशासन, नवाचार, लोकतांत्रिक जवाबदेही तथा राष्ट्र-निर्माण को दिशा देने और उसे सुदृढ़ करने की अपार क्षमता है।

राजनीति में युवाओं की भागीदारी का बदलता स्वरूप

  1. निष्क्रिय से सक्रिय राजनीतिक भागीदारी की ओर बदलाव
    • पहले युवाओं को भविष्य के नेतृत्व के रूप में देखा जाता था, जबकि आज वे वर्तमान राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने की आकांक्षा रखते हैं।
    • युवा नागरिक अब भविष्य में नेतृत्व की प्रतीक्षा करने के बजाय चुनाव अभियानों, चुनाव, मुद्दा-आधारित आंदोलनों तथा नीतिगत चर्चाओं में सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं।
  2. डिजिटल प्लेटफॉर्म ने राजनीतिक भागीदारी का लोकतंत्रीकरण किया
    • सोशल मीडिया ने युवाओं को पारंपरिक राजनीतिक दलों की संरचनाओं पर निर्भर हुए बिना सीधे राजनीतिक नेताओं से जुड़ने का अवसर प्रदान किया है।
    • डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीतिक जागरूकता, जन-संगठन (मोबिलाइजेशन), जन-समर्थन (एडवोकेसी) तथा सार्वजनिक विमर्श के लिए एक अहम मंच बन गया है ।
  3. प्रामाणिक नेतृत्व की बढ़ती माँग
    • युवा मतदाता ऐसे नेताओं को प्राथमिकता देते हैं जो सुलभ, पारदर्शी और प्रामाणिक हों, न कि केवल पूर्व-निर्धारित (स्क्रिप्टेड) भाषण देने वाले।
    • वे प्रतीकात्मक राजनीतिक प्रदर्शन की अपेक्षा खुला संवाद, जवाबदेही और वास्तविक जन-संपर्क को अधिक महत्त्व देते हैं।
  4. मीम संस्कृति और डिजिटल राजनीतिक संचार का उदय
    • हास्य, व्यंग्य, मीम्स तथा लघु डिजिटल सामग्री (शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट) राजनीतिक संदेशों के प्रभावी माध्यम बन गए हैं।
    • राजनीतिक कथानक (नैरेटिव) अब तेजी से वायरल डिजिटल सामग्री के माध्यम से फैलते हैं, जिससे डिजिटल संचार चुनावी राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण घटक बन गया है।

युवाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में चुनौतियाँ

विधायिकाओं में युवाओं का घटता प्रतिनिधित्व

  • भारत की युवा जनसंख्या के बावजूद 25–40 वर्ष आयु वर्ग के सांसदों (MPs) का अनुपात उल्लेखनीय रूप से घटा है।
  • युवा सांसदों की हिस्सेदारी वर्ष 1952 में तकरीबन 30% से घटकर आज लगभग 10% रह गई है, जिससे समाज की जनसांख्यिकीय संरचना और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मध्य असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

वरिष्ठ नेतृत्व का राजनीतिक वर्चस्व

  • राजनीतिक निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया अब भी मुख्यतः वरिष्ठ राजनीतिक नेतृत्व और स्थापित राजनीतिक अभिजात वर्ग (Political Elites) के हाथों में ही केंद्रित है।
  • युवा सामान्यतः राजनीतिक दलों में केवल चुनाव अभियानों के सहभागी बनकर रह जाते हैं, जबकि निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भूमिका सीमित रहती है।

डिजिटल प्रगतिशीलता : राजनीतिक भागीदारी की नई वास्तविकता

विकेंद्रीकृत जन-आंदोलन

  • डिजिटल नेटवर्क नागरिकों को केंद्रीय राजनीतिक नेतृत्व के बिना भी बड़े पैमाने पर जन-आंदोलनों का संगठन करने में सक्षम बनाते हैं।
  • 2017 का जल्लीकट्टू आंदोलन सोशल मीडिया-आधारित प्रगतिशीलता की शक्ति का प्रमुख उदाहरण है, जिसमें लाखों युवाओं ने सक्रिय भागीदारी की।

मुद्दा-आधारित राजनीतिक भागीदारी

  • युवा अब पारंपरिक वैचारिक विभाजनों के बजाय रोजगार, सुशासन, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों के आधार पर अधिक संगठित हो रहे हैं।
  • डिजिटल सक्रियता (Digital Activism) संवैधानिक लोकतांत्रिक भागीदारी का एक प्रमुख पूरक माध्यम बन गई है।

डिजिटल राजनीति से जुड़ी चिंताएँ

  • भ्रामक सूचना (Misinformation) और फेक न्यूज जनमत को तेज़ी से प्रभावित कर सकते हैं।
  • इको चैंबर (Echo Chambers) के कारण लोगों का विभिन्न दृष्टिकोण से परिचय सीमित हो सकता है।
  • एल्गोरिदम-आधारित सामग्री (Algorithm-driven Content) राजनीतिक विमर्श को अधिक ध्रुवीकृत (Polarised) बना सकती है।
  • ऑनलाइन सक्रियता (Online Activism) को संस्थागत लोकतांत्रिक भागीदारी का पूरक होना चाहिए, उसका विकल्प नहीं।

आगे की राह

  • युवाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाना: राजनीतिक दलों को चुनावों तथा संगठनात्मक नेतृत्व में युवा उम्मीदवारों को अधिक अवसर और प्रतिनिधित्व दिए जाने की आवश्यकता है।
  • युवाओं की संस्थागत भागीदारी सुनिश्चित करना: सरकार को नीति-निर्माण, परामर्श प्रक्रियाओं तथा स्थानीय शासन संस्थाओं में युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए।
  • नागरिक शिक्षा को सुदृढ़ करना : शैक्षणिक संस्थानों को संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक भागीदारी और जागरूक राजनीतिक सहभागिता को बढ़ावा देना चाहिए।
  • उत्तरदायी डिजिटल नागरिकता को प्रोत्साहित करना: डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से तथ्य-जाँच (Fact-checking), नैतिक ऑनलाइन व्यवहार और रचनात्मक राजनीतिक संवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • युवाओं की आकांक्षाओं को प्राथमिकता देना: सरकारों को रोजगार सृजन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उद्यमिता तथा कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है क्योंकि यह युवा नागरिकों की प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः भारत के युवा अब केवल भविष्य के नेता के रूप में ही नहीं हैं, बल्कि वे आज के लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार (Stakeholders) बन चुके हैं। डिजिटल प्रौद्योगिकी, मुद्दा-आधारित लामबंदी और जागरूक राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से वे लोकतांत्रिक राजनीति को नई दिशा दे रहे हैं। युवाओं का सार्थक प्रतिनिधित्व तथा संस्थागत भागीदारी सुनिश्चित करने से भारत का लोकतांत्रिक शासन और अधिक सुदृढ़ होगा तथा देश अपने जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) की पूर्ण क्षमता का प्रभावी उपयोग कर सकेगा।

भारतीय राजनीति में युवा: भविष्य के नेताओं से वर्तमान के भागीदार तक

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