संदर्भ:
हालिया आँकड़ों से इस बात की पुष्टि होती है भारत में विश्व स्तर पर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु की संख्या सबसे अधिक बनी हुई है। रोकी जा सकने वाली इन मौतों का लगातार बने रहना इस बात की पुष्टि करता है कि सुदृढ़ संस्थागत समन्वय, संवैधानिक सुधार तथा जवाबदेह सड़क सुरक्षा शासन की त्वरित आवश्यकता को उजागर करता है।
भारत में सड़क सुरक्षा की स्थिति:
- सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के अनुसार, 2024 में लगभग 1.77 लाख लोगों की मृत्यु सड़क दुर्घटनाओं में हुई।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने विभिन्न रिपोर्टिंग प्रणालियों के माध्यम से 1.75 लाख तथा 1.81 लाख मृत्यु के अलग-अलग आँकड़े प्रस्तुत किए।
- यह अंतर अनेक डेटा-संग्रहण प्रणालियों तथा सड़क दुर्घटनाओं के लिए एकीकृत (Unified) राष्ट्रीय डेटाबेस के अभाव को दर्शाता है।
सड़क दुर्घटनाएँ और शासन संबंधी चुनौती
- रोकी जा सकने वाली मौतें: अधिकांश सड़क दुर्घटनाएँ अपरिहार्य घटनाओं के बजाय मानवीय त्रुटि, खराब अवसंरचना तथा नियमों के कमजोर प्रवर्तन का परिणाम होती हैं।
- अनुच्छेद 21: रोकी जा सकने वाली सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के अधिकार (Right to Life) को कमजोर करती हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन: एस. राजसीकरन बनाम भारत संघ (2014) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सड़क दुर्घटनाएँ भाग्य का विषय नहीं, बल्कि रोकी जा सकने वाली घटनाएँ हैं।
सड़क सुरक्षा के चार ‘E’ :
- इंजीनियरिंग (Engineering): खराब सड़क संरचना, अपर्याप्त रखरखाव तथा असुरक्षित अवसंरचना दुर्घटनाओं के जोखिम को बढ़ाते हैं।
- प्रवर्तन (Enforcement): यातायात नियमों, ओवरलोडिंग संबंधी मानकों तथा गति-सीमा का कमजोर क्रियान्वयन सड़क दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण है।
- शिक्षा (Education): सड़क सुरक्षा एवं जिम्मेवार वाहन संचालन के प्रति जन-जागरूकता का अभाव दुर्घटनाओं की संभावना को बढ़ाता है।
- आपातकालीन देखभाल (Emergency Care): पर्याप्त एम्बुलेंस, ट्रॉमा केयर (Trauma Care) सुविधाओं की कमी तथा आपातकालीन प्रतिक्रिया में विलंब के कारण दुर्घटना पीड़ितों के जीवित बचने की संभावना कम हो जाती है।
संस्थागत एवं संवैधानिक चुनौतियाँ:
- खंडित उत्तरदायित्व : सड़क सुरक्षा से संबंधित विषय संघ सूची, राज्य सूची तथा समवर्ती सूची में विभाजित हैं, जिससे समन्वित नीति-निर्माण और कार्यान्वयन कठिन हो जाता है।
- अनेक हितधारक : सड़कें, पुलिस, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा मोटर वाहन अलग-अलग प्राधिकरणों के अधीन आते हैं, जिसके कारण संस्थागत समन्वय कमजोर रहता है।
- जवाबदेही का अभाव : सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम अथवा सड़क सुरक्षा उपायों के समन्वित एवं प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कोई एकल संस्था उत्तरदायी नहीं है।
संस्थागत सुधारों की आवश्यकता:
- सड़क सुरक्षा समन्वय परिषद : सड़क सुरक्षा के लिए GST परिषद की तर्ज पर एक स्थायी केंद्र-राज्य समन्वय निकाय की स्थापना की जानी चाहिए ।
- एकीकृत मानक (Unified Standards): निम्नलिखित क्षेत्रों के लिए समान एवं एकरूप मानक विकसित किए जाएँ—
- सड़क अभियांत्रिकी
- वाहनों का रखरखाव
- यातायात नियमों का प्रवर्तन
- आपातकालीन चिकित्सा सेवाएँ
- सड़क दुर्घटना संबंधी आँकड़ों की रिपोर्टिंग
- जिला सड़क सुरक्षा समितियाँ : जिला स्तर की समितियों को सड़क सुरक्षा उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन एवं निगरानी के लिए वैधानिक शक्तियाँ तथा स्पष्ट जवाबदेहिता प्रदान की जानी चाहिए ।
चुनौतियाँ:
- अंतर-सरकारी समन्वय की कमजोरी: संवैधानिक रूप से शक्तियों के विभाजन के कारण केंद्र एवं राज्यों के मध्य प्रभावी समन्वय का अभाव है ।
- निम्न गुणवत्ता वाले आँकड़े: विश्वसनीय डेटा की कमी साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को प्रभावित करती है।
- अपर्याप्त अवसंरचना: सड़कों, ट्रॉमा केयर (Trauma Care) सुविधाओं तथा अन्य आवश्यक अवसंरचना का अभाव।
- यातायात नियमों का कमजोर प्रवर्तन: कानूनी प्रावधान मौजूद होने के बावजूद उनका प्रभावी अनुपालन नहीं हो पाता।
- सीमित संस्थागत जवाबदेही: सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम करने के लिए संस्थागत उत्तरदायित्व स्पष्ट एवं प्रभावी नहीं है।
आगे की राह:
- संवैधानिक समन्वय को सुदृढ़ करना : सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में केंद्र एवं राज्यों के मध्य बेहतर सहयोग सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संस्थागत सुधारों पर विचार किया जाए।
- राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा समन्वय परिषद की स्थापना करना : समेकित नीति-निर्माण एवं प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा समन्वय परिषद (National Road Safety Coordination Council) का गठन किया जाए।
- एकीकृत सड़क दुर्घटना डेटाबेस विकसित करना : सड़क दुर्घटनाओं की सटीक और स्पष्ट रिपोर्टिंग तथा प्रभावी नीति-निर्माण सुनिश्चित करने के लिए एकीकृत राष्ट्रीय सड़क दुर्घटना डेटाबेस (Unified Road Accident Database) तैयार किया जाए।
- सड़क सुरक्षा के चार ‘E’ को सुदृढ़ करना : सुरक्षित सड़क अभियांत्रिकी (Engineering), कड़े प्रवर्तन (Enforcement), व्यापक जन-जागरूकता एवं शिक्षा (Education) तथा सुदृढ़ आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं (Emergency Care) में निवेश बढ़ाया जाए।
- जवाबदेहिता में वृद्धि : जिला सड़क सुरक्षा समितियों को स्पष्ट उत्तरदायित्व, वैधानिक अधिकार तथा मापनीय परिणामों (Measurable Outcomes) के आधार पर सशक्त बनाया जाए।
निष्कर्ष:
निष्कर्षतः सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली अधिकांश मौतें रोकी जा सकती हैं; इसलिए इन्हें त्रासदी के रूप में नहीं, बल्कि सुशासन एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती के रूप में देखा जाना चाहिए। जीवन की रक्षा करने तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार को प्रभावी रूप से सुनिश्चित करने के लिए समन्वित संस्थागत ढाँचा, सुदृढ़ जवाबदेही तथा सड़क सुरक्षा उपायों का प्रभावी क्रियान्वयन की अत्यंत आवश्यकता है।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में सड़क दुर्घटनाएँ केवल व्यक्तिगत लापरवाही का ही परिणाम नहीं हैं, बल्कि रोकी जा सकने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं सुशासन की विफलता का भी प्रतीक हैं। सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपायों की विवेचना कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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