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1991 का भारत के लिए सबसे बड़ी सीख केवल कूटनीति ही नहीं है

1991 का भारत के लिए सबसे बड़ी सीख केवल कूटनीति ही नहीं है 22 Jul 2026

संदर्भ

हाल के दौर में पश्चिम एशिया और यूरोप में एक साथ उत्पन्न हो रहे भू-राजनीतिक संकट एक बार फिर भारत की आर्थिक अवस्थिति तथा रणनीतिक धारणाओं की परीक्षा ले रहे हैं। वर्ष 1991 के अनुभव से ज्ञात होता है कि ऐसी बाह्य चुनौतियों का सामना केवल कूटनीतिक समायोजन से नहीं, बल्कि गहन घरेलू सुधारों के माध्यम से किया जा सकता है।

1990–91 की भू-राजनीतिक समस्याएँ

  • इराक–कुवैत युद्ध 
    • अगस्त 1990 में इराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण और उसके बाद अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य हस्तक्षेप की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई।
    • इससे भारत को मिलने वाला प्रवासी भारतीयों का रमिटेन्स (Remittances) भी प्रभावित हुआ।
  • भुगतान संतुलन संकट: ऊर्जा आयात की बढ़ी हुई लागत तथा विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट ने भारत के गंभीर भुगतान संतुलन संकट (BoP Crisis) को और भी गहरा कर दिया।
  • सोवियत संघ का विघटन : सोवियत संघ के विघटन से भारत की शीत युद्ध (Cold War) काल की विदेश नीति का मुख्य रणनीतिक आधार समाप्त हो गया।
  • रणनीतिक परिवर्तन 
    • इन दोहरी चुनौतियों ने भारत को—
      • आर्थिक उदारीकरण (Economic Liberalisation) अपनाने,
      • अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों में विविधता लाने तथा
      • वैश्विक भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए प्रेरित किया।

वर्तमान परिस्थितियों से समानताएँ 

  • पश्चिम एशियाई संघर्ष 
    • ईरान से जुड़ा संघर्ष ऊर्जा लागत को बढ़ा रहा है।
    • हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से समुद्री आवागमन प्रभावित हो रहा है।
    • इससे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर भारत की निर्भरता उजागर हुई है।
  • लंबा खिंचता यूक्रेन युद्ध 
    • यूक्रेन युद्ध अपने पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है।
    • इससे रूस की घरेलू एवं वैश्विक स्थिति को लेकर अनिश्चितता अभी भी बनी हुई है।
  • एक साथ बढ़ता दबाव: 1991 की तरह आज भी यूरोप और पश्चिम एशिया की अस्थिरता भारत को अपनी राष्ट्रीय रणनीति (National Strategy) पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर रही है।
  • भिन्न परिणाम 
    • रूस के सोवियत संघ की तरह विघटित होने की संभावना कम है।
    • फिर भी लंबा खींचता युद्ध, आर्थिक दबाव और चीन पर बढ़ती निर्भरता और उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं को बदल सकती है।

भारत पहले से अधिक मजबूत, लेकिन अधिक संवेदनशील 

  • अधिक क्षमता
    • वर्तमान भारत के पास—
      • कहीं बड़ी अर्थव्यवस्था,
      • अधिक व्यापक कूटनीतिक प्रभाव,
      • तथा विविध अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ हैं।
  • वैश्विक एकीकरण: वैश्विक ऊर्जा, व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी नेटवर्क से गहरे जुड़ाव ने नई तथा बाह्य समस्याओं को भी उजागर किया है।
  • ऊर्जा निर्भरता 
    • ईरान, रूस या हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अस्थिरता से भारत की—
      • तेल आपूर्ति,
      • समुद्री व्यापार,
      • मुद्रास्फीति,
      • तथा बाह्य आर्थिक स्थिरता को सीधे प्रभावित कर सकती है।
  • प्रतिबंधों का दबाव : रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी दंडात्मक उपायों के प्रस्ताव तथा ईरान से जुड़े प्रतिबंध भारत की ऊर्जा कूटनीति को जटिल बना सकते हैं।

भारत का कठिन होता संतुलन 

  • अनेक हित 
    • भारत को एक साथ निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है —
      • ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना,
      • विदेशों में फँसे नागरिकों को सुरक्षित निकालना,
      • संप्रभुता के सिद्धांत का सम्मान करना,
      • तथा प्रतिस्पर्धी वैश्विक शक्तियों से संबंध बनाए रखना इत्यादि।
  • 1991 का अनुभव : कुवैत संकट के दौरान भारत ने इराक और अरब देशों से संबंध बनाए रखने के साथ-साथ अमेरिका की सैन्य शक्ति को भी ध्यान में रखा तथा भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की।
  • वर्तमान परिदृश्य : वर्तमान सरकार ने रूस, ईरान और अमेरिका के साथ संबंधों में संतुलन अथापित करते हुए उल्लेखनीय सुधार प्रदर्शित किया है।
  • घरेलू नीति पर अधिक कड़ाई : भारत की आधिकारिक कूटनीति अपेक्षाकृत व्यावहारिक है, जबकि विदेश नीति विमर्श के कुछ बिंदुओं में वैचारिक कठोरता दिखाई देती है।

भावनात्मक विदेश नीति की मुख्य समस्याएँ

  • सद्दाम हुसैन : भारत के कुछ राजनीतिक वर्गों ने सद्दाम हुसैन को अमेरिका का विरोध करने वाले धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवादी के रूप में देखा, जबकि कुवैत के अवैध विलय को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया।
  • सोवियत मोह : सोवियत पतन के स्पष्ट संकेतों के बावजूद अनेक विश्लेषकों ने मिखाइल गोर्बाचेव के सुधारों का विरोध किया और पुराने सोवियत ढाँचे के बने रहने की उम्मीद की।
  • ईरान के प्रति सहानुभूति : कई बार ईरान के प्रति समर्थन उसकी नीतियों के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के बजाय अमेरिका-विरोधी छवि पर आधारित होता है।
  • रूस पर व्यक्तिकेंद्रित वाद-विवाद : भारत में रूस पर चर्चा अक्सर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सोवियत काल की स्मृतियों तक सीमित रहती है, जबकि रूस की बदलती आंतरिक और बाह्य परिस्थितियों पर कम ध्यान दिया जाता है।
  • नीतिगत जोखिम: किसी विशेष सरकार के प्रति भावनात्मक लगाव भारत को बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप समय रहते नीति बदलने से रोक सकता है।

सीख संख्या –I : कोई भी शक्ति संतुलन स्थायी नहीं होता 

  • स्थिरता का भ्रम : 1991 में स्थिर दिखने वाला सोवियत संघ, द्विध्रुवीय विश्व व्यवस्था और शीत युद्ध की साझेदारियाँ अचानक समाप्त हो गईं।
  • स्थायी अनिश्चितता : अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एकाएक होने वाला परिवर्तन सामान्य बात है।
  • योजना परिदृश्य : भारत को रूस, ईरान, पश्चिम एशिया, यूरोप और वैश्विक शक्ति संतुलन में संभावित परिवर्तनों के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • हित-आधारित संबंध : साझेदारियों का मूल्यांकन राष्ट्रीय हितों के आधार पर होना चाहिए, न कि स्थायी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के आधार पर।

सीख संख्या–II : रणनीतिक बहस एक राष्ट्रीय संपत्ति है

  • सहमति : बिना चुनौती वाली विदेश नीति संभावित भू-राजनीतिक परिवर्तनों की अनदेखी कर सकती है।
  • क्षेत्रीय विशेषज्ञता : भारत को रूस, ईरान, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया पर विशेषज्ञता विकसित करनी चाहिए।
  • भाषाई क्षमता : क्षेत्रीय भाषाओं, इतिहास, संस्कृति और राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन में निवेश आवश्यक है।
  • वैकल्पिक विश्लेषण : रणनीतिक संस्थानों को वैकल्पिक परिदृश्यों और आलोचनात्मक विश्लेषण को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • घरेलू समझ : साझेदार देशों की आंतरिक राजनीति और अर्थव्यवस्था को गहराई से समझना आवश्यक है।

सीख संख्या –III : कूटनीति घरेलू सुधारों का विकल्प नहीं हो सकती 

मुख्य सीख

  • 1991 के संकट का सबसे प्रभावी उत्तर केवल कूटनीतिक प्रयास ही नहीं, बल्कि घरेलू आर्थिक परिवर्तन भी था।
  • आर्थिक उदारीकरण : इससे उत्पादकता बढ़ी, आर्थिक आधार मजबूत हुआ और वैश्विक भागीदारी विस्तृत हुई।
  • रणनीतिक क्षमता : मजबूत अर्थव्यवस्था भारत को प्रतिबंधों, ऊर्जा संकट और आपूर्ति व्यवधानों से बेहतर ढंग से निपटने में सक्षम बनाती है।
  • कूटनीति की सहायक भूमिका : विदेश नीति का उद्देश्य बाजार, पूँजी, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी तक पहुँच सुनिश्चित करना होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक सुलभता : भारत को विदेशों में रणनीतिक सुलभता और देश के भीतर संरचनात्मक सुधार—दोनों को साथ लेकर चलना होगा।

निजी सुधारों की प्राथमिकताएँ 

  • ऊर्जा विविधीकरण : अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किसी एक देश या मार्ग पर निर्भरता को कम करना।
  • रणनीतिक भंडार : पेट्रोलियम भंडारण क्षमता और आपातकालीन आपूर्ति व्यवस्था का विस्तार करना।
  • विनिर्माण क्षमता : घरेलू उत्पादन एवं तकनीकी क्षमता का सुदृढीकरण।
  • राजकोषीय सुदृढ़ता : ऊर्जा एवं परिवहन लागत संबंधी चुनौतियों से निपटने हेतु व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखना।
  • निर्यात प्रतिस्पर्धा : लॉजिस्टिक्स, उत्पादकता और बाजार विविधीकरण में सुधार करना ।
  • रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता : स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देते हुए विविध तकनीकी साझेदारियाँ बनाए रखना।

विदेश नीति की प्राथमिकताएँ 

  • रणनीतिक स्वायत्तता : अमेरिका, यूरोप, रूस, ईरान, इज़राइल और अरब खाड़ी देशों के साथ समानांतर संबंध बनाए रखना।
  • द्विआधारी विकल्पों से बचाव : कठोर गुटबंदी और वैचारिक विभाजन से दूर रहना।
  • संस्थागत पूर्वानुमान: भू-राजनीतिक पूर्वानुमान, जोखिम मूल्यांकन और आकस्मिक योजना को मजबूत करना।
  • सहानुभूतिपूर्ण विश्लेषण : साझेदार देशों की घरेलू परिस्थितियों को समझना, परंतु उनकी सरकारों का स्वतः समर्थन न करना।
  • साझेदारियाँ: ऊर्जा, संपर्क, रक्षा, प्रौद्योगिकी और समुद्री सुरक्षा में विषय-आधारित सहयोग विकसित करना।
  • नागरिक सुरक्षा : विदेशों में भारतीयों की सुरक्षित निकासी और कल्याण व्यवस्था को सुदृढ़ करना।

चुनौतियाँ 

  • ऊर्जा संवेदनशीलता : आयातित हाइड्रोकार्बन पर अत्यधिक निर्भरता।
  • प्रतिस्पर्धा: अमेरिका, चीन, रूस और क्षेत्रीय शक्तियों के मध्य बढ़ती प्रतिस्पर्धा।
  • रणनीतिक अतीतमोह : ऐतिहासिक स्मृतियों के कारण वस्तुनिष्ठ विश्लेषण में बाधा।
  • विशेषज्ञता में कमी : क्षेत्रीय भाषाओं और विशेषज्ञ ज्ञान का अभाव।
  • संस्थागत अनुरूपता : वैकल्पिक दृष्टिकोण के लिए सीमित स्थान।
  • घरेलू सुधारों की धीमी गति : राजनीतिक कारणों से संरचनात्मक सुधारों में देरी।

आगे की राह

  • सुधारों को रणनीति से जोड़ना: आर्थिक, ऊर्जा, तकनीकी और संस्थागत सुधारों को विदेश नीति के साथ समाहित करना।
  • अनिश्चितताओं के लिए तैयारी: राजनीतिक परिवर्तन, क्षेत्रीय युद्ध और ऊर्जा आपूर्ति संबंधी बाधाओं के लिए आकस्मिक योजनाएँ विकसित करना।
  • ज्ञान में निवेश: विश्वविद्यालयों, थिंक टैंक और सरकारी विशेषज्ञता को सशक्त बनाना।
  • वाद-विवाद को प्रोत्साहित करना: वैकल्पिक विश्लेषण और प्रतिस्पर्धी भू-राजनीतिक परिदृश्य को बढ़ावा देना।
  • संबंधों का विविधीकरण : किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचना।
  • राष्ट्रीय क्षमता का सुदृढ़ीकरण : कूटनीति का उपयोग घरेलू आधुनिकीकरण, तकनीकी प्रगति और आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने के लिए करना।

निष्कर्ष

1991 की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि केवल कूटनीतिक लचीलापन भारत को वैश्विक प्रणालीगत संकटों से सुरक्षित नहीं रख सकता। वास्तविक रणनीतिक स्वायत्तता का आधार मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था, संस्थागत अनुकूलन क्षमता, क्षेत्रीय विशेषज्ञता तथा समय रहते सुधार करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है, ताकि बाह्य संकट राष्ट्रीय आपातस्थिति में परिवर्तित न हो सकें।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: वर्ष 1991 के आर्थिक एवं भू-राजनीतिक संकट से भारत ने जो सबक सीखे, वे वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में किस प्रकार प्रासंगिक हैं। भारत के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियों तथा आवश्यक उपायों की चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: निम्नलिखित में से किस देश के साथ भारत का सर्वाधिक लंबा समुद्री व्यापार मार्ग “हॉर्मुज जलडमरूमध्य” से होकर गुजरता है?

(a) जर्मनी
(b) अफ्रीका के पूर्वी तट के देश
(c) इराक
(d) संयुक्त राज्य अमेरिकाउत्तर: (c) इराक

1991 का भारत के लिए सबसे बड़ी सीख केवल कूटनीति ही नहीं है

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