संदर्भ
भारत में लोकोपकार का स्वरूप विदेशी वित्तपोषण से हटकर घरेलू संसाधनों पर आधारित सामाजिक विकास की ओर अग्रसर है। इसमें पारिवारिक लोकोपकार, निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व, व्यक्तिगत दानदाताओं तथा डिजिटल माध्यम से दान की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इसके लिए विदेशी अंशदान विनियमन व्यवस्था के बेहतर प्रशासन तथा घरेलू लोकोपकार को अधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।
लोकोपकार के बदलते स्वरूप
- घरेलू अंशदान में वृद्धि: पिछले एक दशक में परिवार, कंपनियों और व्यक्तियों द्वारा किए जाने वाले निजी लोकोपकार की दर में तीव्र वृद्धि दर्ज की गई है।
- अंशदानदाताओं की बदलती सोच: उद्यमियों की नई पीढ़ी, लोकोपकार को संपत्ति के उत्तरदायी उपयोग का महत्त्वपूर्ण भाग मानने लगी है।
- डिजिटल भागीदारी: पारस्परिक निवेश कोष, व्यवस्थित निवेश योजनाएँ, डीमैट खाते तथा एकीकृत भुगतान प्रणाली के विस्तार ने जनसहभागिता आधारित लोकोपकार के लिए एक मजबूत आधारभूत संरचना तैयार की है।
- विमर्श में परिवर्तन: विदेशी अंशदान विनियमन व्यवस्था पर होने वाली चर्चा को अब भारत के आत्मनिर्भर लोकोपकार व्यवस्था की ओर हो रहे व्यापक परिवर्तन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
विदेशी अंशदान के विनियमन की आवश्यकता
- संप्रभु दायित्व: प्रत्येक देश को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक जीवन और सार्वजनिक नीतियों को प्रभावित करने वाली संस्थाओं में आने वाली विदेशी पूँजी का विनियमन करे।
- वैश्विक स्तर पर इसका प्रचलन : अनेक देशों में भी विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं के लिए प्रकटीकरण और विनियमन अनिवार्य है।
- मुख्य प्रश्न: वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि विदेशी वित्तपोषण का विनियमन किया जाना चाहिए अथवा नहीं, बल्कि यह है कि वह संतुलित, पूर्वानुमेय और प्रभावी ढंग से संचालित हो।
धारणा और वास्तविकता
- विशाल स्वैच्छिक क्षेत्र: स्वैच्छिक संगठन पोर्टल पर भारत की तकरीबन छह लाख स्वैच्छिक संस्थाएँ पंजीकृत हैं।
- सीमित निर्भरता: इनमें से केवल 14,500 संस्थाओं के पास ही विदेशी अंशदान प्राप्त करने का सक्रिय पंजीकरण है।
- विदेशी वित्तपोषण में वृद्धि: पिछले दशक में वार्षिक विदेशी अंशदान लगभग ₹10,000 करोड़ से बढ़कर ₹22,000 करोड़ के स्तर तक पहुँच गई ।
- क्षेत्र संसाधन-विहीन नहीं: विनियमन के सख्त होने के बावजूद विदेशी लोकोपकार आधारित अंशदान पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, यद्यपि अनेक संस्थाओं को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
घरेलू लोकोपकार का उदय
- घरेलू संसाधनों का विस्तार: घरेलू निजी लोकोपकार का वार्षिक आकार लगभग ₹1.18 लाख करोड़ तक पहुँच चुका है, जो विदेशी अंशदान से पाँच गुना से भी अधिक है।
- पारिवारिक लोकोपकार: समृद्ध परिवारों तथा प्रथम पीढ़ी के उद्यमियों द्वारा किए जाने वाले दान में निरंतर दो अंकों की दर से वृद्धि हो रही है।
- निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व: वर्तमान में निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व के माध्यम से प्रतिवर्ष ₹40,000 करोड़ से अधिक की राशि विकास कार्यों में लगाई जा रही है।
- घरेलू लोकोपकार का केंद्र: भारत का लोकोपकार तंत्र अब बढ़ते हुए भारतीय नागरिकों, व्यवसायों और परिवारों द्वारा वित्तपोषित और संचालित किया जा रहा है।
विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम के संक्रमणकाल की चुनौतियाँ
- स्वीकृतियों में विलंब: अनेक संस्थाओं को पंजीकरण के नवीनीकरण, लंबी प्रक्रिया तथा पंजीकरण निरस्तीकरण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
- विकास कार्यों में बाधा: विनियामक अनिश्चितता के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास तथा आजीविका सृजन से जुड़े कार्य प्रभावित हुए।
- असमान सुशासन: जहाँ कई संस्थाओं ने उच्च सुशासन मानकों को बनाए रखा, वहीं अन्य संस्थाओं में कमज़ोर अभिलेख, निष्क्रिय संरचनाएँ तथा अपर्याप्त अनुपालन व्यवस्था पाई गई।
- असंगत दंड: कई बार सामान्य प्रशासनिक त्रुटियों पर भी वही परिणाम लागू हो जाते हैं, जो जानबूझकर किए गए धोखाधड़ीपूर्ण कार्यों पर लागू होते हैं।
- विश्वास का अभाव: पारदर्शिता और अनुपालन की कमी से दानदाताओं का विश्वास तथा सामाजिक क्षेत्र की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
केवल कठोर नहीं, बल्कि बेहतर विनियमन की आवश्यकता
- चरणबद्ध प्रवर्तन: प्रशासनिक त्रुटियों को धोखाधड़ी, धन के दुरुपयोग तथा जानबूझकर किए गए उल्लंघनों से अलग माना जाना चाहिए।
- त्रुटि के विषय में पूर्व सूचना: दंडात्मक कार्रवाई से पहले संस्थाओं को औपचारिक सूचना देकर उनकी कमियों से अवगत कराया जाना चाहिए।
- त्रुटि-सुधार की अवधि: वास्तविक और ईमानदार संस्थाओं को अभिलेखीय एवं अनुपालन संबंधी त्रुटियों को सुधारने के लिए निर्धारित समय दिया जाना चाहिए।
- स्पष्टीकरण का अधिकार: संस्थाओं को प्रक्रियागत कमियों के संबंध में अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
- स्वतंत्र अपील व्यवस्था: निष्पक्ष अपीलीय तंत्र विनियमन की विश्वसनीयता और संस्थाओं के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार—दोनों की रक्षा कर सकता है।
- जोखिम-आधारित निगरानी: विदेशी अंशदान विनियमन व्यवस्था का उन्नत डिजिटल मंच डिजिटल अनुपालन, त्वरित प्रक्रिया तथा जोखिम के आधार पर अलग-अलग स्तर की जाँच को सुविधाजनक बना सकता है।
भारत में लोकोपकार के चरण
- विदेशी सहायता पर निर्भर चरण: प्रारंभिक दौर में विकास संबंधी संस्थाएँ मुख्यतः विदेशी न्यासों और अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं पर निर्भर थीं।
- निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व आधारित चरण: अनिवार्य निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व ने विकास कार्यों के लिए घरेलू वित्तपोषण का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत उपलब्ध कराया।
- नागरिक-नेतृत्व वाला चरण: अगला चरण भारतीय परिवारों, उद्यमियों, निवेशकों और सामान्य नागरिकों की सक्रिय भागीदारी पर आधारित होना चाहिए।
उच्च संपन्न व्यक्तियों के अंशदान को बढ़ावा
- अप्रयुक्त क्षमता: उच्च संपन्न व्यक्तियों के लोकोपकार संबंधी योगदान उनकी बढ़ती संपत्ति के अनुपात में नहीं बढ़े हैं।
- नीतिगत संकेत: कर नीति के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया जाना चाहिए कि लोकोपकार राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकता है।
- कर छूट की सीमा: वर्तमान व्यवस्था में सामान्यतः दान की गई राशि का केवल 50 प्रतिशत ही कर छूट के लिए पात्र होता है तथा यह समायोजित सकल कुल आय के 10 प्रतिशत की अधिकतम सीमा के अंतर्गत है।
- सुधार: कर छूट को 100 प्रतिशत तक बढ़ाने तथा सीमा को 25 प्रतिशत करने से बड़े और दीर्घकालिक अंशदान, दानों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
- वैश्विक स्तर के प्रमुख उदाहरण: सिंगापुर अधिक उदार कर छूट प्रदान करता है, यूनाइटेड किंगडम में अंशदान प्रोत्साहन की विशेष व्यवस्था की गई है तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में कर छूट को आगामी वर्षों में भी समायोजित करने की अनुमति दी जाती है।
सूचीबद्ध अंशदान
- अंश-आधारित संपत्ति: अनेक प्रथम पीढ़ी के उद्यमियों की अधिकांश संपत्ति नकद के बजाय कंपनी के अंशदानों के रूप में होती है।
- अंशदान की व्यवस्था: दानदाताओं को अपने मूल्यवृद्धि प्राप्त सूचीबद्ध अंशों को सीधे पात्र धर्मार्थ संस्थाओं को हस्तांतरित करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
- आवश्यक सुरक्षा प्रावधान: प्राप्तकर्ता संस्थाओं को इन अंशों का सुव्यवस्थित तरीके से निपटान करने हेतु एक से तीन वर्ष की उचित अवधि प्रदान की जानी चाहिए।
- संभावित प्रभाव: ऐसी व्यवस्था से उद्यमियों को पहले अपनी अंश-आधारित संपत्ति बेचने की आवश्यकता नहीं होगी तथा घरेलू लोकोपकार आधारित पूँजी का एक बड़ा स्रोत उपलब्ध हो सकेगा।
अंशदाताओं के आधार का विस्तार
- वित्तीय आधारभूत संरचना: भारत में तकरीबन 22 करोड़ से अधिक डीमैट खाते, व्यवस्थित निवेश योजनाओं में व्यापक भागीदारी तथा एकीकृत भुगतान प्रणाली का व्यापक प्रसार है।
- सूक्ष्म लोकोपकार: प्रतिमाह ₹100, ₹500 या ₹1,000 का योगदान लाखों परिवारों को नियमित रूप से विकास कार्यों का सहभागी बना सकता है।
- डिजिटल मंच: विश्वसनीय ऑनलाइन प्रणालियाँ दान प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और उत्तरदायी बना सकती हैं।
- नागरिक स्वामित्व: व्यापक जनभागीदारी पर आधारित लोकोपकार से शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में नागरिकों की भागीदारी बढ़ सकती है।
सामाजिक प्रतिभूति विनिमय की भूमिका
- विश्वसनीय मंच: सामाजिक प्रतिभूति विनिमय विश्वसनीय सामाजिक संस्थाओं को व्यक्तिगत तथा संस्थागत अंशदाताओं से जोड़ सकता है।
- पारदर्शी प्रकटीकरण: मानकीकृत प्रतिवेदन से धन के उपयोग, सुशासन तथा सामाजिक प्रभाव के संबंध में बेहतर जानकारी उपलब्ध हो सकती है।
- प्रभाव का आकलन: मापनीय परिणाम जवाबदेही और अंशदाताओं के विश्वास को मजबूत कर सकते हैं।
- अंशदान का लोकतंत्रीकरण: यह सामाजिक पूँजी के लिए वही भूमिका निभा सकता है जो प्रतिभूति बाजार ने वित्तीय पूँजी के लिए निभाई है।
घरेलू लोकोपकार का महत्त्व
- अधिक स्वामित्व: घरेलू वित्तपोषण से भारतीय नागरिकों और व्यवसायों की राष्ट्रीय सामाजिक चुनौतियों के समाधान में प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ती है।
- बेहतर सुशासन: घरेलू दानदाता प्रबंधकीय विशेषज्ञता, संस्थागत निगरानी तथा व्यावसायिक नेटवर्क उपलब्ध करा सकते हैं।
- अधिक जवाबदेही: स्थानीय दानदाता परियोजनाओं की निगरानी करने और मापनीय परिणामों की अपेक्षा रखने की बेहतर स्थिति में होते हैं।
- मजबूत सामाजिक अनुबंध: लोकोपकार में नागरिकों की भागीदारी संपत्ति सृजनकर्ताओं, नागरिक समाज तथा वंचित समुदायों के मध्य सहयोग और विश्वास को बढ़ाती है।
- विकासात्मक संप्रभुता: घरेलू वित्तपोषण विकास की प्राथमिकताओं के निर्धारण में बाहरी पक्षों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करता है।
विदेशी लोकोपकार की भूमिका
- अनुसंधान एवं नवाचार: विदेशी पूँजी वैज्ञानिक अनुसंधान, सामाजिक नवाचार तथा प्रयोगात्मक विकास मॉडलों को समर्थन देती रह सकती है।
- ज्ञान का आदान-प्रदान: अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ तकनीकी विशेषज्ञता और वैश्विक श्रेष्ठ कार्य-पद्धतियों के आदान-प्रदान के लिए महत्त्वपूर्ण बनी रहेंगी।
- पूरक भूमिका: विदेशी लोकोपकार को भारत की विकास प्राथमिकताओं का पूरक होना चाहिए, उनका निर्धारक नहीं।
प्रमुख चुनौतियाँ
- कमज़ोर लोकोपकार संस्कृति: देश की बढ़ती वित्तीय संपन्नता की तुलना में नियमित व्यक्तिगत दान अभी भी सीमित है।
- विनियामक अनिश्चितता: स्वीकृतियों में देरी और अनिश्चितता से वैध विकास गतिविधियाँ बाधित हो सकती हैं।
- सीमित कर प्रोत्साहन: वर्तमान कर छूट बड़े और दीर्घकालिक दान को पर्याप्त रूप से प्रोत्साहित नहीं कर पाती।
- विश्वास का अभाव: कुछ संस्थाओं की सुशासन संबंधी कमियाँ पूरे गैर-लाभकारी क्षेत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करती हैं।
- प्रभाव के आकलन की कमी: अनेक संस्थाओं के पास सामाजिक परिणामों के मापन और प्रतिवेदन की विश्वसनीय व्यवस्था नहीं है।
- डिजिटल बहिष्करण: छोटे जमीनी स्तर के संगठन प्रौद्योगिकी आधारित धन-संग्रह मंचों तक पहुँच स्थापित करने में कठिनाई का सामना कर सकते हैं।
आगे की राह
- विदेशी अंशदान विनियमन व्यवस्था में सुधार : समयबद्ध स्वीकृतियाँ, चरणबद्ध तरीके से दंड की व्यवस्था, त्रुटि-सुधार की अवधि तथा स्वतंत्र अपीलीय व्यवस्था को अपनाया जाना चाहिए।
- सुशासन को सुदृढ़ बनाना : गैर-लाभकारी संस्थाओं में पारदर्शी लेखांकन, पेशेवर प्रबंधन, लेखापरीक्षा तथा सार्वजनिक प्रकटीकरण को बढ़ावा दिया जाए।
- कर प्रोत्साहनों में सुधार : दान पर उपलब्ध कर छूट का विस्तार किया जाए तथा दीर्घकालिक लोकोपकार आधारित प्रतिबद्धताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।
- अंश दान को सक्षम बनाना : सूचीबद्ध अंशदानों को पात्र धर्मार्थ संस्थाओं तक पहुँचाने के लिए एक सुव्यवस्थित और विनियमित व्यवस्था को विकसित किए जाने की आवश्यकता है ।
- छोटे अंशदानों को प्रोत्साहन : एकीकृत भुगतान प्रणाली, व्यवस्थित निवेश जैसी व्यवस्थाओं तथा डिजिटल मंचों के माध्यम से नियमित छोटे अंश दानों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ।
- सामाजिक प्रतिभूति विनिमय को मजबूती प्रदान करना : प्रकटीकरण मानकों, प्रभाव मूल्यांकन तथा विश्वसनीय जमीनी स्तर की संस्थाओं की पहुँच में सुधार किया जाना चाहिए ।
- संपत्ति के उत्तरदायित्वपूर्ण उपयोग को बढ़ावा : उद्यमियों और समृद्ध परिवारों में लोकोपकार को संपत्ति सृजन के साथ जुड़ी सामाजिक जिम्मेवारी के रूप में विकसित किए जाने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः एक आत्मनिर्भर लोकोपकार व्यवस्था का अर्थ विदेशी वित्तपोषण को समाप्त करना नहीं; बल्कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी अंशदान एक विशाल, पारदर्शी और सहभागी घरेलू व्यवस्था का पूरक बने, जहाँ भारत का सामाजिक परिवर्तन बढ़ते हुए भारतीय नागरिकों, संस्थाओं और व्यवसायों द्वारा वित्तपोषित, संचालित और स्वामित्वयुक्त हो।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: “आत्मनिर्भर लोकोपकार व्यवस्था” भारत के सामाजिक विकास को अधिक जवाबदेह, सहभागी और टिकाऊ बना सकती है। इस संदर्भ में विदेशी अंशदान विनियमन व्यवस्था, घरेलू लोकोपकार तथा निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न : विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
- यह अधिनियम व्यक्तियों तथा संगठनों द्वारा विदेशी अंशदान की स्वीकृति और उपयोग को विनियमित करता है।
- इस अधिनियम के अंतर्गत चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार, न्यायाधीश, सरकारी सेवक तथा विधायिका के सदस्य विदेशी अंशदान स्वीकार नहीं कर सकते।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2उत्तर: (c) 1 और 2 दोनों |