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जमानत नियम है और कारावास अपवाद

Lokesh Pal May 20, 2026 04:23 7 0

संदर्भ

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने गैर-कानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम (UAPA) के कड़े प्रावधानों के अंतर्गत भी जमानत नियम है और जेल अपवाद” (Bail is the rule and jail the Exception) नियम की पुनः पुष्टि की।

मामले की पृष्ठभूमि

  • अंद्राबी नार्को-आतंक मामला: यह निर्णय सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत प्रदान करते समय दिया गया, जिन्हें वर्ष 2020 में NIA (राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण) द्वारा जाँच किए जा रहे नार्को-आतंक मामले में गिरफ्तार किया गया था।
  • UAPA और NDPS के तहत आरोप: अंद्राबी पर सीमा-पार हेरोइन तस्करी में संलिप्तता का आरोप था, जिसका संबंध कथित रूप से लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठनों से बताया गया।
  • मुकदमे में विलंब: न्यायालय ने यह उल्लेख किया कि मुकदमे की प्रक्रिया धीमी है और अभियोजन पक्ष के सैकड़ों गवाहों की अभी जाँच शेष है।
  • उमर खालिद जमानत आदेश पर आपत्ति: न्यायालय ने यह चिंता व्यक्त की कि उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने का पूर्व निर्णय, भारत संघ बनाम K.A. नजीब (2021) की बड़े पीठ के निर्णय के साथ असंगत प्रतीत होता है।

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन

  • जमानत एक संवैधानिक सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत एक संवैधानिक सिद्धांत है, जो अनुच्छेद-21 और 22 से उत्पन्न होता है, यहाँ तक कि UAPA जैसे आतंकवाद-रोधी कानूनों के मामलों में भी।
  • त्वरित सुनवाई के अधिकार का हनन नहीं हो सकता: न्यायालय ने कहा कि मुकदमे के समय पर पूर्ण न होने के कारण लंबी अवधि तक हिरासत में रखना, अनुच्छेद-21 के तहत त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
  • बड़ी पीठ के निर्णय बाध्यकारी होते हैं: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि छोटी पीठें बड़ी पीठों के निर्णयों को कमजोर या नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं, यह न्यायिक अनुशासन और ‘स्टेयर डेसिसिस’ (Stare Decisis) के सिद्धांत के अंतर्गत आता है।
  • प्रथम दृष्टया मामला हिरासत का आधार नहीं: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल प्रथम दृष्टया मामला (Prima facie case) का अस्तित्व, UAPA की धारा 43D(5) के तहत अनिश्चितकालीन पूर्व-परीक्षण हिरासत को उचित नहीं ठहरा सकता है।

जमानत (Bail) के बारे में

  • जमानत का अर्थ है किसी आरोपी व्यक्ति को मुकदमे की प्रतीक्षा के दौरान अस्थायी रूप से रिहा करना, जो इस सिद्धांत पर आधारित है कि जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाता है।
  • जमानत संबंधी प्रावधान
    • नियमित जमानत (Regular Bail): नियमित जमानत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 480 और 483 के तहत दी जाती है, जो दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के प्रावधानों का स्थान लेती है।
    • अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail): अग्रिम जमानत किसी व्यक्ति को गैर-जमानती अपराध में गिरफ्तारी की आशंका से संरक्षण प्रदान करती है।
    • अंतरिम जमानत (Interim Bail): अंतरिम जमानत अल्प अवधि के लिए अस्थायी राहत प्रदान करती है, जब तक कि जमानत याचिका पर अंतिम सुनवाई न हो जाए।
    • डिफॉल्ट जमानत (Default Bail): यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर जाँच पूरी नहीं होती है, तो डिफॉल्ट जमानत एक वैधानिक अधिकार बन जाती है।
  • जमानत से संबंधित प्रमुख चिंताएँ
    • उच्च विचाराधीन कैदी संख्या: भारत की कुल जेल आबादी में लगभग 74.2% कैदी विचाराधीन हैं, जहाँ लगभग 3.75 लाख व्यक्ति मुकदमे की प्रतीक्षा में हिरासत में हैं, जबकि कुल जेल आबादी 5 लाख से अधिक है।
    • आर्थिक और सामाजिक असमानता: गरीब और वंचित वर्ग के लोग अक्सर कानूनी सहायता प्राप्त करने और जमानत की शर्तें पूरी करने में कठिनाई का सामना करते हैं।
    • न्यायिक प्रक्रिया में देरी: न्यायिक विलंब के कारण पूर्व-परीक्षण हिरासत दंडात्मक कारावास में परिवर्तित हो जाती है, जबकि अभी दोष सिद्ध नहीं हुआ होता।
  • जमानत अस्वीकृति की परिस्थितियाँ
    • कठोर विशेष कानून: UAPA (1967), NDPS अधिनियम (1985) और धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 जैसे कानून कड़े जमानत प्रावधान लागू करते हैं, जिससे रिहाई कठिन हो जाती है।
    • फरार होने की संभावना: यदि आरोपी के न्याय से भागने की संभावना हो, तो न्यायालय जमानत अस्वीकार कर सकता है।
    • साक्ष्य से छेड़छाड़ का जोखिम: यदि यह आशंका हो कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है या साक्ष्य नष्ट कर सकता है, तो जमानत नहीं दी जाती।
    • पुनः अपराध की संभावना: न्यायालय जमानत देने से पहले आरोपी के आपराधिक इतिहास और पुनः अपराध करने की संभावना पर विचार करता है।

गैर-कानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1967 (UAPA) के बारे में

  • गैर-कानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1967 भारत का प्रमुख आतंकवाद-रोधी कानून है, जिसका उद्देश्य गैर-कानूनी और आतंकवादी गतिविधियों को रोकना है।
  • किसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है?
    • आतंकवाद, अलगाववाद या भारत की संप्रभुता के लिए खतरा उत्पन्न करने वाली गतिविधियों में संलिप्त व्यक्तियों, संगठनों और संघों के विरुद्ध UAPA के तहत कार्यवाही की जा सकती है।
  • UAPA के प्रमुख प्रावधान
    • आतंकवादी संगठनों की घोषणा: सरकार इस अधिनियम के तहत संगठनों को आतंकवादी संगठन घोषित कर सकती है।
    • व्यक्तियों को आतंकवादी घोषित करना: वर्ष 2019 के संशोधन के माध्यम से सरकार को व्यक्तियों को भी आतंकवादी घोषित करने की शक्ति दी गई।
    • कठोर जमानत प्रावधान: धारा 43D(5) के तहत, यदि न्यायालय को आरोपी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया साक्ष्य मिलते हैं, तो जमानत देना प्रतिबंधित हो जाता है।
    • विस्तारित हिरासत और जाँच: UAPA में सामान्य आपराधिक कानून की तुलना में अधिक अवधि तक हिरासत और जाँच की समय-सीमा का विस्तार किया गया है।

जमानत पर न्यायिक दृष्टांत

  • भारत संघ बनाम K.A. नजीब (2021): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि लंबी अवधि की हिरासत और मुकदमे में देरी, UAPA के कठोर जमानत प्रावधानों को भी निष्प्रभावी कर सकती है।
  • NIA बनाम जहूर अहमद शाह वाटाली (2019): न्यायालय ने UAPA के तहत जमानत देने के लिए प्रथम दृष्टया मामले (Prima facie test) पर बल देते हुए कठोर मानदंड अपनाया।
  • गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य (2026): सर्वोच्च न्यायालय ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया, जबकि दिल्ली दंगों की साजिश मामले में कुछ सह-आरोपियों को राहत दी।
  • गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (1980): सर्वोच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत को व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्त्वपूर्ण संरक्षण के रूप में मान्यता दी।

हालिया निर्णय का महत्त्व

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सुदृढ़ीकरण: यह निर्णय मनमानी और दीर्घकालीन हिरासत के विरुद्ध संवैधानिक संरक्षण को मजबूत करता है।
  • सुरक्षा और अधिकारों के बीच संतुलन: यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं और नागरिक स्वतंत्रताओं तथा विधिक प्रक्रिया (Due process) के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
  • न्यायिक अनुशासन का संरक्षण: न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि छोटी पीठों को बड़ी पीठों द्वारा स्थापित बाध्यकारी उदाहरणों का पालन करना चाहिए।
  • त्वरित न्याय पर बल: यह निर्णय समयबद्ध मुकदमों की आवश्यकता को रेखांकित करता है, ताकि निवारक हिरासत प्रावधानों के दुरुपयोग को रोका जा सके।

निष्कर्ष

यह निर्णय पुनः स्थापित करता है कि संवैधानिक स्वतंत्रता, न्यायिक अनुशासन और त्वरित सुनवाई जैसे सिद्धांत, UAPA जैसे कठोर राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के अंतर्गत भी केंद्रीय महत्त्व रखते हैं।

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