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अंटार्कटिका में बर्फ का पिघलना

Lokesh Pal May 20, 2026 04:28 9 0

संदर्भ

हाल ही में वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ में आई रिकॉर्ड गिरावट का संबंध गहरे समुद्र के गर्म होने और तीव्र पश्चिमी हवाओं से जोड़ा है, जो दक्षिणी महासागर की प्राकृतिक परत प्रणाली (लेयरिंग सिस्टम) को बाधित कर रही हैं।

दक्षिणी महासागर की प्राकृतिक परत प्रणाली

दक्षिणी महासागर की प्राकृतिक परत प्रणाली (लेयरिंग सिस्टम) घनत्व पर आधारित है, जिसमें अंटार्कटिका के चारों ओर ठंडे और कम खारे जल की ऊपरी परत, अधिक गर्म और खारे गहरे जल के ऊपर स्थित होती है।

जल स्तंभ की मुख्य परतें

  • सतही मिश्रित परत: यह ऊपरी ठंडे और अपेक्षाकृत कम खारे जल का क्षेत्र है, जो सीधे वायुमंडल और समुद्री बर्फ के साथ संपर्क स्थापित करता है।
  • परिध्रुवीय गहन जल (Circumpolar Deep Water – CDW): यह सतह के नीचे स्थित जल का एक अधिक गर्म, खारा और सघन द्रव्यमान है, जो बड़ी मात्रा में गर्मी और घुले हुए कार्बन को संचित रखता है।
  • अंटार्कटिक बॉटम वाटर (Antarctic Bottom Water- AABW): यह सबसे ठंडा, सबसे सघन और सबसे गहरा जल द्रव्यमान है, जिसका निर्माण तब होता है, जब अत्यधिक ठंडा और खारा जल समुद्र के तल में स्थिर हो जाता है।

परत प्रणाली की मुख्य भूमिकाएँ

  • क्लाइमेट बफर (Climate Buffer): दक्षिणी महासागर की यह परतदार प्रणाली अत्यधिक गर्मी और वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड की भारी मात्रा को अवशोषित करती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की गति धीमी हो जाती है।
  • अंटार्कटिक समुद्री बर्फ की सुरक्षा: ठंडे जल की यह सतही परत एक इन्सुलेटिंग बैरियर (रोधी परत) के रूप में कार्य करती है, जो गर्म जल को अंटार्कटिक की समुद्री बर्फ को तेजी से पिघलाने से रोकती है।
  • कार्बन भंडारण तंत्र (Carbon Storage Mechanism): महासागर की गहरी परतें सदियों तक कार्बन को सुरक्षित रूप से अपने भीतर संगृहीत रखती हैं, जिससे वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता कम हो जाती है।
  • समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों को सहायता: अंटार्कटिक परिध्रुवीय धारा (Antarctic Circumpolar Current) के माध्यम से पोषक तत्त्वों से भरपूर गहरे जल का ऊपर आना (Upwelling) फाइटोप्लैंकटन की वृद्धि में सहायता करता है और अंटार्कटिक समुद्री खाद्य शृंखलाओं को बनाए रखता है।

अंटार्कटिका के पिघलने में हालिया रुझान

  • सापेक्ष स्थिरता का चरण (2000 का दशक–2010 के दशक की शुरुआत): ग्लोबल वार्मिंग के बावजूद, आर्कटिक के विपरीत अंटार्कटिका की समुद्री बर्फ कई वर्षों तक अपेक्षाकृत स्थिर रही है।
    • कुछ वर्षों में, जटिल महासागरीय-वायुमंडलीय अंतःक्रियाओं के कारण समुद्री बर्फ के विस्तार में सामान्य वृद्धि भी देखी गई।
    • वैज्ञानिकों ने शुरुआत में अंटार्कटिका को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति तुलनात्मक रूप से प्रतिरोधी माना था।
  • संक्रमण और परिवर्तन का चरण (वर्ष 2015 के आस-पास): दशकों की स्थिरता के बाद, वर्ष 2015 के आस-पास अंटार्कटिक की समुद्री बर्फ में तेजी से गिरावट आने लगी।
    • शोधकर्ताओं ने पाया कि गहरे समुद्र के गर्म होते जल ने धीरे-धीरे उस सुरक्षात्मक ठंडी सतही परत को कमजोर कर दिया, जिसे विंटर वाटर लेयर’ (Winter Water Layer) के रूप में जाना जाता है।
    • इसने बर्फ के तेजी से पिघलने और समुद्री बर्फ के क्षेत्र के सिकुड़ने की शुरुआत को चिह्नित किया।
  • रिकॉर्ड गिरावट का चरण (वर्ष 2023 से आगे): अंटार्कटिका ने वर्ष 2023 में ऐतिहासिक रूप से समुद्री बर्फ का न्यूनतम स्तर दर्ज किया और यह नुकसान पश्चिमी यूरोप के कुल क्षेत्रफल से भी बड़ा था।
    • वैज्ञानिक अब अंटार्कटिका को बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग से आकार लेने वाली एक नई जलवायु प्रणाली’ (New Climate System) के रूप में वर्णित कर रहे हैं।
    • इस बर्फ में लगातार आ रही गिरावट वैश्विक जलवायु नियमन और ध्रुवीय पारिस्थितिकी प्रणालियों के लिए एक बड़ा खतरा है।

अंटार्कटिका के पिघलने की गति में तेजी के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारक

  • गहरे समुद्री क्षेत्र का गर्म होना (Deep Ocean Warming): दक्षिणी महासागर की परतदार संरचना के बाधित होने के बाद, गहरे समुद्र का गर्म और खारे जल सतह की ओर ऊपर उठ गया।
    • इस गर्म जल ने नीचे से समुद्री बर्फ को पिघला दिया और बर्फ की दीर्घकालिक स्थिरता को कमजोर कर दिया।
  • तीव्र पछुआ पवनें (Stronger Westerly Winds): तेज होती पश्चिमी परिध्रुवीय हवाओं (Western Circumpolar Winds) ने ठंडे सतही जल का उत्तर की ओर अवरोहण किया।
    • इसने गर्म उप-सतही जल (Subsurface Waters) को अंटार्कटिका के पास ऊपर उठने की स्थिति उत्पन्न की, जिससे बर्फ का पिघलना और तेज हो गया।
  • सकारात्मक प्रतिक्रिया तंत्र/चक्र (Positive Feedback Mechanism): जैसे-जैसे समुद्री बर्फ पिघली, गहरे रंग के महासागरीय जल ने सूर्य की रोशनी को परावर्तित करने के स्थान पर अधिक सौर विकिरण को अवशोषित करना शुरू कर दिया।
    • गर्मी के कारण सर्दियों में बर्फ के जमने की प्रक्रिया और धीमी हो गई तथा दीर्घकालिक गिरावट को बढ़ावा दिया।
  • जलवायु परिवर्तन और ओजोन के प्रभाव (Climate Change and Ozone Effects): बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने अंटार्कटिका के आस-पास वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) को और तीव्र कर दिया।
    • इसके साथ ही, अंटार्कटिक ओजोन छिद्र (Ozone Hole) ने भी बदलती वायु प्रणालियों और महासागरीय गतिशीलता में योगदान दिया।

अंटार्कटिका के बारे में

  • अंटार्कटिका पृथ्वी का सबसे दक्षिणी, सबसे ठंडा, सबसे शुष्क और सर्वाधिक पवनों वाला महाद्वीप है।
  • सबसे बड़ा बर्फ भंडार
    • इसमें दुनिया की लगभग 90% हिमनद (ग्लेशियर) बर्फ मौजूद है और यह वैश्विक जलवायु प्रणाली को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • यह महाद्वीप बड़े पैमाने पर निर्जन है और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एक प्राकृतिक प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है।
  • भौगोलिक स्थिति: अंटार्कटिका दक्षिणी ध्रुव को घेरे हुए है और पूरी तरह से दक्षिणी गोलार्द्ध में अवस्थित है।
    • यह चारों ओर से दक्षिणी महासागर से घिरा हुआ है।
    • इस महाद्वीप का लगभग 98% हिस्सा एक मोटी बर्फ की चादर से ढका हुआ है, जिसकी औसत मोटाई लगभग 1.9 किलोमीटर है।
  • आवास / पर्यावास
    • आंतरिक क्षेत्र (Inland Region): आंतरिक हिस्सा अत्यधिक ठंडा और शुष्क है, जिससे अधिकांश स्थलीय जीवों के लिए जीवित रहना कठिन हो जाता है। यहाँ कोई स्थायी मानव बस्तियाँ नहीं हैं।
    • तटीय क्षेत्र (Coastal Region): तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पेंगुइन, सील, व्हेल, अलबेट्रोस और अन्य समुद्री प्रजातियों का समर्थन करते हैं। अंटार्कटिक क्रिल (Krill) दक्षिणी महासागर की खाद्य शृंखला का मुख्य आधार है।
    • सूक्ष्मजीव (Microscopic): बर्फ-मुक्त क्षेत्रों में टार्डिग्रेड्स, निमेटोड्स, शैवाल और रोटिफर्स जैसे सूक्ष्मजीव पाए जाते हैं।
  • वनस्पतियाँ
    • अत्यधिक विषम जलवायु परिस्थितियों के कारण अंटार्कटिका में कोई पेड़ या झाड़ियाँ नहीं हैं।
    • यहाँ की वनस्पति में मुख्य रूप से काई (Mosses), लाइकेन, लिवरवर्ट्स और शैवाल शामिल हैं।
    • यहाँ केवल दो स्थानीय पुष्पीय पौधे पाए जाते हैं, जिन्हें अंटार्कटिक हेयर ग्रास (Antarctic Hair Grass) और अंटार्कटिक पर्लवर्ट (Antarctic Pearlwort) कहा जाता है।
  • बढ़ते तापमान के कारण अंटार्कटिक प्रायद्वीप (Antarctic Peninsula) के कुछ हिस्सों में काई (Moss) की बढ़ती वृद्धि के साथ ‘हरियाली’ देखी गई है।

अंटार्कटिका की अंतरराष्ट्रीय स्थिति

  • अंटार्कटिक संधि प्रणाली (Antarctic Treaty System)
    • अंटार्कटिका का संचालन वर्ष 1959 में हस्ताक्षरित अंटार्कटिक संधि प्रणाली के तहत किया जाता है। यह संधि अंटार्कटिका को एक वैज्ञानिक संरक्षित क्षेत्र (Scientific Preserve) घोषित करती है, जो शांतिपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • मुख्य प्रावधान
    • सैन्य गतिविधियाँ, परमाणु परीक्षण और रेडियोधर्मी अपशिष्ट का निपटान पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं।
    • पर्यावरण संरक्षण प्रोटोकॉल के तहत वाणिज्यिक खनिज खनन (Commercial Mineral Mining) पर प्रतिबंध है।
    • वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता और विभिन्न देशों के बीच आँकड़ों को साझा करना सुनिश्चित किया गया है।

अंटार्कटिका में प्रमुख अनुसंधान केंद्र

  • अंतरराष्ट्रीय स्टेशन
    • मैकमर्डो स्टेशन (USA): यह अंटार्कटिका का सबसे बड़ा अनुसंधान केंद्र है।
    • अमुंडसेन-स्कॉट साउथ पोल स्टेशन (USA): यह भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर अवस्थित है।
    • वोस्तोक स्टेशन (रूस): यहाँ पृथ्वी के कुछ सबसे ठंडे तापमान दर्ज किए गए हैं।
    • कॉनकॉर्डिया स्टेशन (फ्राँस-इटली) और ट्रोल स्टेशन (नॉर्वे): ये वायुमंडलीय और आइस-कोर (बर्फ के नमूनों) के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
  • भारत के अंटार्कटिक अनुसंधान केंद्र (India’s Antarctic Research Stations): भारत के अंटार्कटिक कार्यक्रम का प्रबंधन राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (NCPOR) द्वारा किया जाता है।
    • दक्षिण गंगोत्री: वर्ष 1983 में भारत के पहले अंटार्कटिक स्टेशन के रूप में स्थापित किया गया था। बर्फ के नीचे दब जाने के बाद, अब इसका उपयोग मुख्य रूप से एक आपूर्ति बेस के रूप में किया जाता है।
    • मैत्री: वर्ष 1989 से शिरमाकर ओएसिस’ (Schirmacher Oasis) में सक्रिय है। यह भू-विज्ञान, मौसम विज्ञान और हिमनद विज्ञान (ग्लेशियोलॉजी) में अनुसंधान का समर्थन करता है।
    • भारती: वर्ष 2012 में लार्समैन हिल्स’ क्षेत्र में शुरू किया गया था। यह मुख्य रूप से समुद्र विज्ञान (ओशिनोग्राफी), जलवायु अध्ययन और महाद्वीपीय विखंडन (Continental Breakup) के अनुसंधान पर केंद्रित है।

निष्कर्ष 

दक्षिणी महासागर की प्राकृतिक परत प्रणाली का कमजोर होना अंटार्कटिक की स्थिरता, वैश्विक जलवायु नियमन, समुद्री जैव विविधता और पृथ्वी की दीर्घकालिक कार्बन भंडारण क्षमता के लिए एक बड़ा खतरा है।

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