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संविधान संशोधन पर सहमति का अभाव: 131वें संशोधन विधेयक का पारित न होना

Lokesh Pal April 21, 2026 03:43 6 0

संदर्भ 

लोकसभा में संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित न होने से संसद में महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर पुनः व्यापक बहस प्रारंभ हो गई है। यद्यपि इस सिद्धांत को व्यापक राजनीतिक समर्थन प्राप्त है, फिर भी यह घटना दर्शाती है कि भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए केवल सहमति पर्याप्त नहीं है, बल्कि संस्थागत विश्वास और संतुलित दृष्टिकोण भी आवश्यक है।

संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 की आवश्यकता

  • समान प्रतिनिधित्व की पुनर्स्थापना: एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत के अनुरूप लंबे समय से चली आ रही सीटों की स्थिरता के बाद, जनसंख्या के अनुसार सीटों का पुनर्संतुलन सुनिश्चित करना।
  • परिसीमन विकृतियों का सुधार: वर्ष 1971 से लंबित परिसीमन (जिसे 42वें एवं 84वें संविधान संशोधन द्वारा आगे बढ़ाया गया) के कारण विकसित असमान निर्वाचन क्षेत्रों एवं मतदाता असंतुलन को दूर करना।
  • महिला आरक्षण का क्रियान्वयन: विधायिकाओं में 33% महिला आरक्षण को समयबद्ध रूप से लागू करने हेतु आवश्यक संवैधानिक आधार प्रदान करना।
  • परिसीमन में लचीलापन सुनिश्चित करना: परिसीमन के समय एवं जनगणना के आधार को निर्धारित करने हेतु संसद को अधिक अधिकार देकर प्रक्रियात्मक विलंब को कम करना।
  • लोकसभा का विस्तार: जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप लोकसभा की सीटों में वृद्धि कर प्रतिनिधित्व की पर्याप्तता को बढ़ाना।

संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के बारे में

  • मुख्य प्रावधान: इस विधेयक ने लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (33%) सीटों का आरक्षण प्रस्तावित किया, जो विधायी निकायों में लैंगिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।
    • महत्त्वपूर्ण रूप से, यह आरक्षण मौजूदा SC/ST कोटे के भीतर क्षैतिज रूप से लागू (Horizontally applied) किया जाना था, जिससे सामाजिक वर्गों के भीतर समावेशिता सुनिश्चित हो सके।

  • लोकसभा की संख्या में विस्तार: विधेयक ने लोकसभा की वर्तमान 543 सदस्यों की संख्या को बढ़ाकर अधिकतम 850 सदस्य करने का प्रस्ताव रखा।
    • इसका उद्देश्य प्रतिनिधित्व क्षमता बढ़ाना तथा संसदीय संरचना को जनसंख्या वृद्धि के अनुरूप बनाना था।
  • क्रियान्वयन ढाँचा: आरक्षण के कार्यान्वयन को दो प्रमुख संरचनात्मक प्रक्रियाओं से जोड़ा गया:
    • नवीन जनगणना का आयोजन, जिससे अद्यतन जनसंख्या आँकड़े प्राप्त होंगे।
    • परिसीमन प्रक्रिया का संचालन, जिससे पुनर्निर्धारित जनसांख्यिकी के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन हो सके।
      • इस क्रम ने तत्काल कार्यान्वयन को टाल दिया और इसे व्यापक चुनावी पुनर्संरचना से जोड़ दिया।

  • आरक्षित क्षेत्रों का रोटेशन: विधेयक में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के चक्रानुक्रम (Rotation) की व्यवस्था का प्रावधान था, जिससे समय-समय पर विभिन्न क्षेत्रों को आरक्षण का लाभ मिल सके।
    • इसका उद्देश्य भागीदारी का विस्तार एवं स्थायी आरक्षण संबंधी स्थायित्व से बचाव था, यद्यपि इससे राजनीतिक जवाबदेही एवं निरंतरता पर बहस भी उत्पन्न हुई।
  • चुनावी सुधारों के साथ एकीकरण: इस विधेयक की एक विशिष्ट विशेषता इसका लैंगिक न्याय को परिसीमन एवं सीट विस्तार जैसे संरचनात्मक चुनावी सुधारों के साथ जोड़ना था।
    • यद्यपि यह एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता था, फिर भी इसे राजनीतिक विवाद का विषय बनाया गया है क्योंकि इसमें सामाजिक सुधार को संवेदनशील प्रतिनिधित्व एवं संघीय संतुलन के प्रश्नों से जोड़ दिया गया।
  • संरचनात्मक महत्त्व: संक्षेप में, यह विधेयक केवल महिला सशक्तीकरण का उपाय नहीं, बल्कि भारत की प्रतिनिधिक प्रणाली के व्यापक पुनर्गठन का प्रयास था, जिससे इसकी परिवर्तनकारी क्षमता के साथ-साथ इसकी स्वीकृति की जटिलता भी बढ़ गई।

संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित न होने के कारण

  • विशेष बहुमत प्राप्त करने में विफलता: यह विधेयक संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक विशेष बहुमत प्राप्त करने में असफल रहा। मतदान में 528 सदस्यों में से 298 मत पक्ष में और 230 मत विपक्ष में पड़े, जिससे यह निर्धारित सीमा से नीचे रह गया और पारित नहीं हो सका।

  • परिसीमन से जुड़ी विवादास्पद कड़ी: महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया से जोड़ने का निर्णय प्रमुख विवाद का विषय बन गया है।
    • परिसीमन, जो जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व का पुनर्वितरण करता है, राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील प्रक्रिया है।
    • इससे उत्पन्न प्रमुख चिंताएँ थीं:
      • उत्तर–दक्षिण क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व असंतुलन की संभावना
      • दक्षिणी राज्यों की संसदीय शक्ति में संभावित कमी
      • संघीय संतुलन के प्रभावित होने का जोखिम
      • इस प्रकार, एक सामाजिक न्याय सुधार को व्यापक संघीय एवं राजनीतिक विवाद से जोड़ दिया गया।
  • असुलझे सामाजिक न्याय मुद्दे: कई वर्गों से संबंधित महत्त्वपूर्ण चिंताओं का समाधान नहीं किया गया:
    • महिलाओं के आरक्षण के भीतर OBC उप-कोटा की माँग को शामिल नहीं किया गया।
    • आरक्षित सीटों पर अभिजात्य वर्ग (Elite capture) की संभावना को लेकर कुछ वर्गों में समर्थन कमजोर हुआ।

पारित न होने के बाद की स्थिति (Post-Defeat Scenario) 

  • अस्थायी तनाव, विचार का अस्वीकार नहीं: यह विफलता एक राजनीतिक एवं प्रक्रियात्मक तनाव है, न कि महिला आरक्षण के विचार का अस्वीकार, जिसे व्यापक रूप से अब भी वैचारिक समर्थन प्राप्त है।
  • राजनीतिक विश्वास के पुनर्निर्माण की आवश्यकता: यह प्रकरण निम्नलिखित की आवश्यकता को रेखांकित करता है—
    • राजनीतिक पक्षों के मध्य विश्वास बहाली,
    • समावेशी एवं परामर्श-आधारित विधायी प्रक्रिया सुनिश्चित करना,
    • संस्थागत विश्वसनीयता को सुदृढ़ करना।
  • सार्वजनिक विमर्श में निरंतर प्रासंगिकता: महिला आरक्षण आगे भी चुनावी तथा नीतिगत चर्चाओं का केंद्रीय विषय बना रहेगा, जिसमें सुधार की स्वामित्व, इच्छा और डिजाइन को लेकर विभिन्न दृष्टिकोण बने रहेंगे।
  • कार्यपालिका की आगे की जिम्मेदारी: अब जिम्मेदारी कार्यपालिका पर है कि वह—
    • व्यापक परामर्श के माध्यम से सुधार प्रक्रिया को पुनः प्रारंभ करे।
    • सामाजिक न्याय एवं संघीय संतुलन से जुड़े लंबित मुद्दों का समाधान करे।
    • भविष्य में विधायी सफलता हेतु क्रमबद्ध एवं सहमति-आधारित दृष्टिकोण अपनाए।

महिला आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं आगे की राह

  • प्रारंभिक विधायी प्रयास (1990 के दशक से आगे): विधानमंडलों में महिलाओं के लिए आरक्षण की माँग 1990 के दशक से चली आ रही है, जब महिला आरक्षण विधेयक, 1996 प्रस्तुत किया गया।
    • इसका उद्देश्य संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना था, लेकिन इसे प्रारंभ से ही तीव्र राजनीतिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
  • बार-बार विफलताएँ और संरचनात्मक मतभेद: विभिन्न सरकारों के दौरान इसे अनेक बार पुनः प्रस्तुत किए जाने के बावजूद, विधेयक राजनीतिक सहमति के अभाव के कारण पारित नहीं हो सका।
    • प्रमुख विवाद बिंदुओं में कुल आरक्षण के भीतर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए उप-कोटा की माँग।
    • तथा निर्वाचन क्षेत्रों के चक्रानुक्रम (Rotation) को लेकर चिंताएँ शामिल थीं, जिसे चुनावी निरंतरता और पदस्थता को प्रभावित करने वाला माना गया।
    • इन मतभेदों ने लंबे समय तक विधायी गतिरोध उत्पन्न किया।
  • 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023: एक बड़ी उपलब्धि तब प्राप्त हुई, जब नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) को अधिनियमित किया गया, जिसने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को संवैधानिक आधार प्रदान किया। हालाँकि, इसका क्रियान्वयन ;
    • भविष्य की जनगणना
    • और उसके पश्चात् निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से जोड़कर स्थगित कर दिया गया।
    • इस प्रकार, जबकि ढाँचा कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त हो गया, इसका क्रियान्वयन शर्ताधीन बना रहा।
  • वर्ष 2026 का विधेयक: संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक, 2026 को वर्ष 2023 के संशोधन के प्रावधानों को क्रियान्वित करने के लिए प्रस्तुत किया गया।
    • हालाँकि, पूर्व की चिंताओं को हल करने के बजाय, इसने उन्हें और अधिक बढ़ा दिया, विशेष रूप से परिसीमन, सीट विस्तार और प्रतिनिधित्व संतुलन के संदर्भ में।
    • भारत में महिलाओं के आरक्षण की यात्रा व्यापक मानक समर्थन के बावजूद निरंतर राजनीतिक विवाद को दर्शाती है। प्रत्येक विधायी प्रयास ने यह स्पष्ट किया है कि लैंगिक न्याय को सामाजिक न्याय, संघीय संतुलन और चुनावी रणनीति की प्रतिस्पर्द्धी माँगों के साथ संतुलित करना एक जटिल चुनौती है।

महिलाओं के आरक्षण का तर्क

  • लोकतांत्रिक और प्रतिनिधिकारी अंतर: महिलाएँ अभी भी संसद और राज्य विधानसभाओं में अत्यधिक कम प्रतिनिधित्व रखती हैं, जिससे समावेशी और प्रतिनिधिक शासन का मूल लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर होता है।
    • ऐसी विधायिका जो लैंगिक विविधता को प्रतिबिंबित नहीं करती, वह नीति-निर्धारण और विधि-निर्माण में प्रणालीगत पक्षपात का जोखिम उत्पन्न करती है।
    • संसद में लगभग 14 से 15 प्रतिशत (18वीं लोकसभा) ही महिलाएँ हैं, जो वैश्विक औसत लगभग 26 प्रतिशत से काफी कम है।
      • यह एक निरंतर लोकतांत्रिक घाटे को दर्शाता है और सुधारात्मक संस्थागत उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
  • सारभूत समानता और संवैधानिक प्रावधान: यद्यपि संविधान के अनुच्छेद-14 और 15 के अंतर्गत औपचारिक समानता की गारंटी दी गई है, लेकिन सारभूत समानता प्राप्त करने के लिए सकारात्मक कार्रवाई आवश्यक है।
    • अतः महिलाओं का आरक्षण एक सुधारात्मक तंत्र है, जिसका उद्देश्य उन ऐतिहासिक और संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना है, जो महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करती हैं।
  • शासन के बेहतर परिणाम: पंचायती राज संस्थाओं से प्राप्त अनुभवजन्य साक्ष्य दर्शाते हैं कि महिला प्रतिनिधि प्रायः स्वास्थ्य, शिक्षा, जल और पोषण जैसे सामाजिक क्षेत्रों को प्राथमिकता देती हैं।
    • यह संकेत देता है कि अधिक प्रतिनिधित्व से अधिक समावेशी और कल्याण-उन्मुख शासन परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ और मानक: भारत संयुक्त राष्ट्र की महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अभिसमय का हस्ताक्षरकर्ता है, जो राजनीतिक भागीदारी में समानता का आह्वान करता है।
    • महिला आरक्षण इन अंतरराष्ट्रीय दायित्वों और मानक प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
  • राजनीतिक सशक्तीकरण का गुणक प्रभाव: विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व व्यापक सशक्तीकरण के लिए एक गुणक प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे महिलाएँ नीतिगत प्राथमिकताओं, संस्थागत संस्कृति और सामाजिक-आर्थिक अवसरों को प्रभावित कर सकती हैं। यह पितृसत्तात्मक बाधाओं को तोड़ने, आदर्श प्रस्तुत करने और सार्वजनिक जीवन में महिला नेतृत्व को सामान्य बनाने में भी सहायता करता है।

राजनीति में लैंगिक समानता हेतु वैश्विक मानक ढाँचे

  •  सतत् विकास प्रतिबद्धताएँ: संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्य 5 (लैंगिक समानता) में नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में महिलाओं की समान भागीदारी पर बल दिया गया है तथा राजनीतिक समावेशन को सतत् विकास के लिए केंद्रीय माना गया है।
  • अंतरराष्ट्रीय कानूनी दायित्व: संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत अपनाया गया महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय (CEDAW) राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन में भेदभाव समाप्त करने का आदेश देता है तथा आरक्षण एवं कोटा सहित सकारात्मक उपायों को प्रोत्साहित करता है, ताकि सारभूत समानता सुनिश्चित की जा सके।
  • वैश्विक एवं संस्थागत समर्थन: अंतर-संसदीय संघ (Inter-Parliamentary Union) तथा UN वुमेन (संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था) जैसी संस्थाएँ सक्रिय रूप से निम्नलिखित को बढ़ावा देती हैं:
    • लैंगिक-संवेदनशील चुनावी सुधार,
    • विधायी कोटा,
    • महिला नेतृत्वकर्ताओं के लिए क्षमता निर्माण।
      • इस प्रकार ये संस्थाएँ वैश्विक मानकों एवं सर्वोत्तम प्रथाओं को आकार प्रदान करती हैं।

महिलाओं के प्रतिनिधित्व के तुलनात्मक अंतरराष्ट्रीय मॉडल

  • संवैधानिक कोटा मॉडल – रवांडा: यहाँ पर संवैधानिक रूप से अनिवार्य कोटा की प्रभावशीलता को दर्शाता है, जिसके परिणामस्वरूप संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 60% से अधिक हो गया है, जो वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक है।
  • प्रवर्तन सहित विधायी उम्मीदवार कोटा – फ्राँस: यहाँ पर विधायी उम्मीदवार कोटा प्रणाली अपनाई गई है, जिसके अंतर्गत राजनीतिक दलों को महिलाओं का न्यूनतम अनुपात नामांकित करना अनिवार्य है तथा अनुपालन न करने पर आर्थिक दंड लगाया जाता है।
  • स्वैच्छिक पार्टी कोटा – नॉर्वे एवं स्वीडन: इन देशों ने राजनीतिक दलों के आंतरिक स्वैच्छिक कोटा के माध्यम से उच्च महिला प्रतिनिधित्व प्राप्त किया है, जो लैंगिक समानता के प्रति मजबूत संस्थागत प्रतिबद्धता एवं सामाजिक समर्थन को दर्शाता है।
  • संवैधानिक समावेशन मॉडल – नेपाल: यहाँ पर संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से महिलाओं का महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है, जिसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व तंत्र के साथ संयोजित किया गया है, जिससे विधायी निकायों में व्यापक समावेशन प्राप्त होता है।
    • अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दर्शाता है कि महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए संवैधानिक समर्थन, निर्वाचन रीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति का संयोजन आवश्यक है, जिसे सतत् संस्थागत एवं सामाजिक प्रतिबद्धता द्वारा समर्थन प्राप्त होता है।

विधायिकाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लाभ

विधायिकाओं में महिलाओं का समावेशन केवल “प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व’ का संख्यात्मक अभ्यास नहीं है। यह एक संरचनात्मक आवश्यकता है, जो औपचारिक समानता को सारभूत लोकतंत्र में परिवर्तित करती है। विविध जीवनानुभवों को सदन में लाकर, महिला विधायक शासन की गुणवत्ता और संस्थागत परिणामों की शुद्धता को मूल रूप से परिवर्तित करती हैं।

  • लोकतांत्रिक वैधता और समावेशिता को सुदृढ़ करना
    • प्रतिबिंबात्मक प्रतिनिधित्व (Reflective Representation): एक प्रतिनिधिक लोकतंत्र को अपनी जनसंख्या का प्रतिबिंब होना चाहिए। महिलाओं का प्रणालीगत बहिष्कार एक संरचनात्मक लोकतांत्रिक घाटा उत्पन्न करता है, जो लोक संप्रभुता के मूल सिद्धांत को कमजोर करता है।
    • संस्थागत विश्वसनीयता: अधिक महिला भागीदारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता और उत्तरदायित्वशीलता को बढ़ाती है, जिससे जनता की इच्छा वास्तव में समावेशी बनती है।
    • समृद्ध विचार-विमर्श: विविध लैंगिक दृष्टिकोणों को सम्मिलित करने वाली नीति-निर्माण प्रक्रिया अधिक समग्र विधायी परिणाम देती है, जिससे कानून एकांगी दृष्टि से नहीं बनाए जाते।

  • शासन की गुणवत्ता और नीतिगत परिणामों में सुधार
    • सार्वजनिक वस्तुओं को प्राथमिकता: पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) के अनुभव से स्पष्ट है कि महिला नेतृत्व स्वास्थ्य, शिक्षा, जल, स्वच्छता और पोषण जैसी आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं को प्राथमिकता देता है।
    • कल्याण-उन्मुख नीतियाँ: महिलाओं की भागीदारी विधायी एजेंडे को मानव विकास-केंद्रित नीतियों की ओर मोड़ती है, जो दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से बेहतर परिणाम देती हैं।
    • व्यावहारिक नीति-निर्माण: विविध जीवनानुभवों को सम्मिलित कर महिला विधायक अधिक व्यावहारिक कानून निर्माण में योगदान देती हैं।
    • पंचायती राज संस्थाओं से प्राप्त साक्ष्य: यह दर्शाता है कि 1.4 मिलियन से अधिक निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों, जिन्हें 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों द्वारा सक्षम किया गया, ने स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता और स्थानीय शासन में महत्त्वपूर्ण सुधार किए हैं।
  • लैंगिक न्याय और सारभूत समानता को आगे बढ़ाना
    • मुख्य एजेंडा में परिवर्तन: महिला विधायक लैंगिक मुद्दों को परिधि से हटाकर राष्ट्रीय एजेंडा के केंद्र में लाती हैं, जैसे लैंगिक आधारित हिंसा, कार्यस्थल समानता और मातृत्व स्वास्थ्य।
    • संवैधानिक दायित्व: यह प्रतिनिधित्व संविधान के अनुच्छेद-14–16 को सार्थक बनाता है, जिससे औपचारिक समानता से सारभूत समानता की ओर संक्रमण संभव होता है।
  • परिवर्तनकारी सामाजिक प्रभाव और रोल मॉडलिंग
    • पितृसत्तात्मक संरचना को चुनौती: सत्ता में महिलाओं की उपस्थिति नेतृत्व एवं क्षमता से जुड़े पितृसत्तात्मक मानदंडों और रूढ़ियों को चुनौती देती है।
    • गुणक प्रभाव (Multiplier Effect): वे रोल मॉडल के रूप में कार्य करती हैं, जिससे लड़कियों में शिक्षा, नेतृत्व और सार्वजनिक जीवन के प्रति आकांक्षा बढ़ती है।
    • सामाजिक परिवर्तन: समय के साथ यह उपस्थिति सामाजिक दृष्टिकोणों में प्रगतिशील परिवर्तन लाती है और निर्णय-निर्माण के उच्चतम स्तरों पर महिलाओं की भूमिका को सामान्य बनाती है।
  • उत्तरदायित्व और संस्थागत अखंडता को बढ़ाना
    • भ्रष्टाचार में कमी: प्रायोगिक अध्ययनों के अनुसार महिलाओं की अधिक भागीदारी अक्सर अधिक पारदर्शिता और कम भ्रष्टाचार से जुड़ी होती है, यद्यपि यह संदर्भ-निर्भर है।
    • मूल उत्तरदायित्व: महिला नेत्री, समुदाय की आवश्यकताओं के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, जिससे उत्तरदायित्व तंत्र मजबूत होता है और अंतिम व्यक्ति तक आवाज पहुँचती है।
  • समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देना
    • आर्थिक सशक्तीकरण: महिला विधायक वित्तीय समावेशन, स्वयं सहायता समूह (SHGs) और सूक्ष्म वित्त से जुड़ी नीतियों का अधिक समर्थन करती हैं।
    • गुणक प्रभाव: महिलाओं का सशक्तीकरण परिवार कल्याण पर व्यापक प्रभाव डालता है, जिससे उनका नेतृत्व व्यापक आर्थिक विकास और मानव पूँजी निर्माण को बढ़ावा देता है।
  • शांति, स्थिरता और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करना
    • संघर्ष समाधान: वैश्विक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी अधिक समावेशी शांति-निर्माण प्रक्रियाओं और टिकाऊ संघर्ष समाधान से जुड़ी होती है।
    • सहमति निर्माण: महिला नेतृत्व अक्सर सहयोग और सहमति पर बल देता है, जो विविध तथा बहुलवादी समाजों जैसे भारत में स्थिरता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

महिलाओं के प्रतिनिधित्व से संबंधित चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

यद्यपि महिलाओं का आरक्षण मानक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, परंतु इसकी संरचना में कई ऐसी चुनौतियाँ हैं, जिनका समाधान आवश्यक है ताकि परिणाम केवल प्रतीकात्मक न होकर सारभूत हों।

  • प्रतिनिधित्व की प्रॉक्सी प्रकृति एवं प्रतिनिधित्व की समस्या
    • प्रतीकात्मक उपस्थिति: एक निरंतर जोखिम यह है कि आरक्षण से सदन में केवल “भौतिक उपस्थिति” तो सुनिश्चित हो जाती है, लेकिन वास्तविक शक्ति और निर्णय-निर्माण अधिकार नहीं मिल पाता है।
    • सरपंच-पति” (Sarpanch-Pati) की अवधारणा: पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) से प्राप्त अनुभव यह दर्शाते हैं कि कई मामलों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पुरुष परिजन वास्तविक नियंत्रण रखते हैं। उचित संस्थागत सुरक्षा के अभाव में प्रतिनिधित्व स्वतंत्र निर्णय-निर्माण में परिवर्तित नहीं हो पाता है।
  • अभिजात वर्गीय अधिकार एवं अंतः-लैंगिक असमानता
    • आंतरिक असमानता: यदि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) एवं हाशिए पर स्थित समूहों के लिए उप-कोटा न हो, तो आरक्षण का लाभ मुख्यतः शहरी एवं सामाजिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं तक सीमित रह सकता है।
    • समावेशिता की कमी: जाति, वर्ग एवं क्षेत्रीय विविधता के आधार पर अंतः-लैंगिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना “लैंगिक न्याय के भीतर सामाजिक न्याय” की दृष्टि से एक प्रमुख विवाद का विषय है।
  • संस्थागत एवं उत्तरदायित्व संबंधी समस्याएँ
    • निर्वाचन क्षेत्रों का चक्रानुक्रम: आरक्षित सीटों के बार-बार रोटेशन से प्रतिनिधि और निर्वाचन क्षेत्र के बीच संबंध कमजोर हो सकता है, जिससे दीर्घकालिक राजनीतिक निवेश तथा उत्तरदायित्व प्रभावित होता है।
    • स्थापित प्रतिनिधियों का विस्थापन: अनिवार्य आरक्षण से पुरुष प्रभाव का विस्थापन होता है, जिससे राजनीतिक दलों के भीतर प्रतिरोध उत्पन्न होता है तथा कई बार महिलाओं को औपचारिक रूप से टिकट मिलने के बावजूद अनौपचारिक रूप से हाशिये पर रखा जाता है।
  • संघवाद और परिसीमन की समस्या
    • शक्ति का पुनर्वितरण: आरक्षण को परिसीमन आयोग की प्रक्रिया से जोड़ने से उत्तर–दक्षिण के मध्य प्रतिनिधित्व असंतुलन की आशंका उत्पन्न हुई है।
    • संघीय समानता: जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, वे इसे अपने राजनीतिक प्रभाव में कमी के रूप में देखते हैं, जिससे संवैधानिक संशोधन हेतु आवश्यक सहमति जटिल हो जाती है।
  • संरचनात्मक एवं सामाजिक बाधाएँ
    • क्षमता संबंधी सीमाएँ: पहली बार निर्वाचित प्रतिनिधियों को पुरुष-प्रधान विधायी संस्कृति में सीखने की तीव्र प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यदि व्यवस्थित क्षमता निर्माण न हो, तो उनके प्रदर्शन का अनुचित मूल्यांकन हो सकता है।
    • आर्थिक एवं सामाजिक पूँजी की कमी: चुनावी राजनीति में प्रचार-प्रसार वित्त और अनौपचारिक नेटवर्क पर अत्यधिक निर्भरता होता है, जहाँ पितृसत्तात्मक संरचनाओं के कारण महिलाओं को गंभीर संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
  • एकल समाधान की जोखिमपूर्ण धारणा
    • एकांगी दृष्टिकोण संबंधी त्रुटि: केवल आरक्षण को समाधान मान लेना पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी और उम्मीदवार चयन की असमान प्रक्रियाओं जैसे व्यापक मुद्दों की अनदेखी करता है।
    • सहायक सुधारों की आवश्यकता: यदि 131वाँ संविधान संशोधन वास्तव में परिवर्तनकारी बनाना है, तो इसे राजनीतिक दलों की संस्थागत संस्कृति में परिवर्तन के साथ जोड़ा जाना आवश्यक है।

आगे की राह

  • विमर्श प्रक्रिया को पुनर्स्थापित करना
    • व्यापक राजनीतिक सहमति का निर्माण: इस स्तर के संवैधानिक सुधार से पूर्व संरचित सर्वदलीय परामर्श तथा संसदीय समिति द्वारा गहन परीक्षण आवश्यक है।
      • कार्यपालिका को एकतरफा निर्णयकर्ता के बजाय सहमति निर्माण के सुगमकर्ता (Facilitator) के रूप में कार्य करना चाहिए, जिससे संस्थागत विश्वास पुनः स्थापित हो सके।
    • आरक्षण को परिसीमन से पृथक करना: संघीय चिंताओं को कम करने हेतु महिलाओं का आरक्षण परिसीमन प्रक्रिया से स्वतंत्र रूप से लागू किया जाना चाहिए।
      • भारत के परिसीमन आयोग द्वारा संचालित परिसीमन अपनी पारदर्शी एवं नियम-आधारित समय-सारिणी के अनुसार होना चाहिए, ताकि आरक्षण को क्षेत्रीय जनसंख्या राजनीति का बंधक न बनाया जा सके।
  • समावेशिता और उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना
    • अंतः-लैंगिक प्रतिनिधित्व को संबोधित करना: समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु डिजाइन में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं तथा हाशिए पर स्थित अल्पसंख्यकों के लिए उप-कोटा शामिल होना चाहिए।
      • यह लैंगिक न्याय के भीतर सामाजिक न्याय” की अवधारणा को सुदृढ़ करता है, जिससे लाभ केवल शहरी अभिजात वर्ग तक सीमित न रहें।
    • चक्रानुक्रम तंत्र में सुधार: निरंतरता और उत्तरदायित्व बनाए रखने हेतु निर्वाचन क्षेत्रों के अत्यधिक या बार-बार चक्रानुक्रम से बचना चाहिए।
      • दीर्घकालिक आरक्षण चक्र या आंशिक चक्रानुक्रम मॉडल महिला प्रतिनिधियों को नेतृत्व क्षमता विकसित करने और गहन निर्वाचन क्षेत्रीय संबंध बनाने में सक्षम बनाएँगे।
  • संस्थागत एवं पार्टी-स्तरीय सुधार
    • आंतरिक पार्टी अनिवार्यता: संवैधानिक बाध्यता के अतिरिक्त राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन में अनिवार्य आंतरिक कोटा अपनाना चाहिए।
      • आंतरिक पार्टी लोकतंत्र को सुदृढ़ करने से महिलाएँ वास्तविक निर्णयकर्ता बनेंगी, केवल औपचारिक प्रत्याशी नहीं।
    • क्षमता निर्माण: मेंटरशिप नेटवर्क और विधायी सहायता प्रणाली स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है।
      • अनुसंधान सहायता और नीतिगत इनपुट तक पहुँच सुनिश्चित करने से बहस एवं कानून-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी सार्थक तथा प्रभावी होगी।
  • संरचनात्मक बाधाओं का समाधान
    • सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन: विधिक प्रावधानों के साथ-साथ सामाजिक दृष्टिकोणों को बदलने हेतु जागरूकता अभियान और लैंगिक संवेदनशीलता कार्यक्रम आवश्यक हैं।
      • वित्तीय संसाधनों और राजनीतिक नेटवर्क तक पहुँच में सुधार कर समान अवसर सुनिश्चित करना आवश्यक है।
    • वैश्विक समन्वय: भारत को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से सीख लेते हुए विधायी कोटा और पार्टी सुधारों का संयोजन अपनाना चाहिए। यह SDG 5 (लैंगिक समानता) के अनुरूप रहते हुए भारतीय सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ के अनुसार अनुकूलित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

महिलाओं का आरक्षण एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक अनिवार्यता है, किंतु इसकी सफलता सहमति निर्माण, समावेशी डिजाइन और संस्थागत विश्वसनीयता पर निर्भर करती है। लैंगिक न्याय को संघीय एवं सामाजिक चिंताओं के साथ संतुलित करने वाला एक संतुलित दृष्टिकोण प्रतिनिधित्व को वास्तविक सशक्तीकरण में परिवर्तित कर सकता है तथा लोकतंत्र की अधिक गहन वैधता सुनिश्चित कर सकता है।

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