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भारत में ऊर्जा शासन एवं सुरक्षा

Lokesh Pal June 02, 2026 05:21 22 0

संदर्भ

हॉर्मुज जलडमरूमध्य संकट ने भारत की ऊर्जा भेद्यता को उजागर किया तथा ऊर्जा सुरक्षा, समन्वय, और लचीलेपन को सुदृढ़ करने हेतु एक एकीकृत संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता को रेखांकित किया।

ऊर्जा शासन एवं ऊर्जा सुरक्षा के बारे में

  • ऊर्जा शासन से आशय उन संस्थाओं, नीतियों, विनियमों तथा समन्वय तंत्रों से है, जो किसी देश के ऊर्जा उत्पादन, वितरण, उपभोग, सुरक्षा तथा सततता की ओर संक्रमण का प्रबंधन करते हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ है किसी राष्ट्र की वर्तमान एवं भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु सस्ती, विश्वसनीय तथा सतत् ऊर्जा की निरंतर उपलब्धता।

भारत की ऊर्जा प्रस्थिति

  • ऊर्जा मिश्रण एवं उपभोग पैटर्न: भारत का ऊर्जा मिश्रण मुख्यतः कोयला पर आधारित है, इसके बाद तेल, प्राकृतिक गैस, जलविद्युत, परमाणु ऊर्जा तथा नवीकरणीय स्रोत जैसे सौर एवं पवन ऊर्जा का स्थान आता है।
    • तेजी से बढ़ते शहरीकरण, औद्योगीकरण, बढ़ती आय तथा बढ़ते विद्युतीकरण के कारण उद्योग, परिवहन, कृषि तथा घरेलू क्षेत्रों में ऊर्जा की माँग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

  • माँग–आपूर्ति परिदृश्य: भारत विश्व के सबसे तेजी से बढ़ते ऊर्जा उपभोक्ताओं में से एक है। यद्यपि घरेलू ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि हुई है, फिर भी यह बढ़ती माँग के अनुरूप नहीं है, जिससे ऊर्जा आवश्यकताओं और घरेलू उपलब्धता के बीच निरंतर अंतर बना हुआ है।
    • विश्वसनीय एवं सस्ती ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना एक प्रमुख नीतिगत चुनौती बना हुआ है।
  • आयात निर्भरता: भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विशेष रूप से कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस तथा महत्त्वपूर्ण खनिजों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
    • यह निर्भरता देश को वैश्विक मूल्य अस्थिरता, भू-राजनीतिक व्यवधानों तथा आपूर्ति शृंखला जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनाती है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा एक रणनीतिक प्राथमिकता बन जाती है।

संस्थागत एवं शासन ढाँचा

  • केंद्र एवं राज्य सरकारों की भूमिका: केंद्र सरकार राष्ट्रीय ऊर्जा नीतियों का निर्माण करती है, रणनीतिक योजना का पर्यवेक्षण करती है, अंतरराज्यीय ऊर्जा अवसंरचना का विनियमन करती है तथा अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा सहयोग का प्रबंधन करती है।
    • राज्य सरकारें विद्युत वितरण, नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी क्रियान्वयन, भूमि आवंटन, तथा स्थानीय ऊर्जा शासन प्रबंधन के लिए उत्तरदायी होती हैं।

  • नियामक निकाय एवं संस्थान: प्रमुख संस्थानों में शामिल हैं:
    • विद्युत मंत्रालय
    • पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय
    • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय
    • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण
    • केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग
    • पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड।
  • नीतिगत संरचना एवं समन्वय तंत्र
    • भारत का ऊर्जा शासन ढाँचा विभिन्न राष्ट्रीय नीतियों, मिशनों तथा विनियामक ढाँचों द्वारा निर्देशित है।
      • उदाहरण: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, जिसे जनवरी 2023 में ₹19,744 करोड़ के बजट के साथ प्रारंभ किया गया, का उद्देश्य भारत को हरित हाइड्रोजन के उत्पादन, उपयोग तथा निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना है।

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • आयात निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं का लगभग 85% आयात करता है, जिससे वह बाह्य ऊर्जा स्रोतों पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है।
  • रणनीतिक संकीर्ण मार्ग संबंधी सुभेद्यता: भारत के तेल एवं द्रवीकृत प्राकृतिक गैस आयात का एक बड़ा हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिससे भारत की ऊर्जा आपूर्ति भू-राजनीतिक व्यवधानों के प्रति संवेदनशील हो जाती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा: ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी प्रकार का व्यवधान सीधे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक स्वायत्तता तथा रक्षा तैयारी को प्रभावित कर सकता है।
  • मुद्रास्फीति संबंधी दबाव: कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन एवं उत्पादन लागत बढ़ती है, जिससे संपूर्ण अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति को बढ़ावा मिलता है।
  • चालू खाता घाटा: ऊर्जा आयात बिल में वृद्धि से चालू खाता घाटा बढ़ता है तथा विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है।
    • उदाहरण: वित्तीय वर्ष 2024-25 में कच्चे तेल आयात कुल आयात बिल का एक प्रमुख घटक रहा, जो लगभग 166.73 अरब अमेरिकी डॉलर था, जिससे विदेशी ऊर्जा स्रोतों पर निरंतर निर्भरता परिलक्षित होती है।
  • राजकोषीय भार: ऊर्जा आयात एवं सब्सिडी पर बढ़ता व्यय सरकार की राजकोषीय स्थिति पर दबाव डाल सकता है।
  • कृषि उत्पादकता: ऊर्जा सिंचाई, उर्वरक उत्पादन तथा कृषि यंत्रीकरण के लिए आवश्यक है, जिससे यह कृषि विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • परिवहन एवं कनेक्टिविटी: विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति परिवहन क्षेत्र तथा आपूर्ति शृंखलाओं के कुशल संचालन के लिए आवश्यक है।
  • प्रौद्योगिकी एवं अर्द्धचालक निर्माण: अर्द्धचालक निर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों को निरंतर एवं उच्च गुणवत्ता वाली विद्युत आपूर्ति की आवश्यकता होती है।
  • अत्यधिक औद्योगिक विकास: इस्पात, सीमेंट तथा रसायन जैसे उद्योग, सस्ती एवं विश्वसनीय ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर करते हैं।
  • अवसंरचना एवं शहरीकरण: निरंतर ऊर्जा उपलब्धता अवसंरचना विकास, शहरीकरण, तथा दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक है।

भारत के ऊर्जा शासन में प्रमुख समस्याएँ

  • खंडित संस्थागत संरचना
    • विभिन्न मंत्रालय: ऊर्जा शासन विभिन्न मंत्रालयों में विभाजित है, जिससे नीति निर्माण खंडित हो जाता है तथा समन्वय में कमी आती है।
    • नीतिगत पृथकता: मंत्रालय प्रायः स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं, जिससे ऊर्जा योजना के लिए एकीकृत दृष्टिकोण सीमित हो जाता है।
    • समन्वय संबंधी अंतराल: एकल नोडल प्राधिकरण के अभाव में मंत्रालयों तथा केंद्र-राज्य कार्यों के बीच अंतराल उत्पन्न होता है।
    • निर्णयों में विलंब: बहु-स्तरीय स्वीकृतियाँ तथा अंतर-मंत्रालयी परामर्श नीति क्रियान्वयन को धीमा कर देते हैं।
  • समग्र प्रणाली दृष्टिकोण का अभाव
    • विच्छिन्न योजना: ऊर्जा क्षेत्र अत्यधिक परस्पर जुड़े होने के बावजूद अलग-अलग योजनाबद्ध किए जाते हैं।
    • उपेक्षित अंतर्संबंध: नीति निर्माण में प्रायः ऊर्जा, उद्योग, परिवहन, कृषि तथा जलवायु लक्ष्यों के बीच संबंधों की अनदेखी होती है।
    • कम दक्षता: कमजोर एकीकरण से संसाधनों का उप-इष्टतम आवंटन होता है तथा ऊर्जा असुरक्षा बढ़ती है।
  • अवसंरचनात्मक बाधाएँ
    • सीमित संप्रेषण नेटवर्क: अपर्याप्त ग्रिड अवसंरचना ऊर्जा के कुशल संप्रेषण एवं वितरण को सीमित करती है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा बाधाएँ: अपर्याप्त संप्रेषण क्षमता के कारण नवीकरणीय परियोजनाओं का प्रायः पूर्ण क्षमता से उपयोग नहीं हो पाता है।
    • सीमित भंडारण क्षमता: अपर्याप्त भंडारण अवसंरचना ग्रिड स्थिरता एवं ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करती है।
    • निवेशकों की चिंताएँ: निरंतर अवसंरचनात्मक कमियाँ लागत बढ़ाती हैं तथा निजी निवेश को हतोत्साहित करती हैं।
  • विनियामक खंडन
    • अनेक नियामक: कई विनियामक निकायों की उपस्थिति एक जटिल शासन ढाँचा उत्पन्न करती है।
    • अतिव्यापी अधिकार-क्षेत्र: विनियामक अतिव्यापन से संस्थागत संघर्ष एवं त्रुटियाँ उत्पन्न होती हैं।
    • नीतिगत अनिश्चितता: बार-बार परिवर्तन एवं असंगत विनियम निवेशकों के विश्वास को कम करते हैं।
    • विवाद समाधान में विलंब: जटिल विनियामक प्रक्रियाएँ ऊर्जा क्षेत्र के विवादों के निपटान का समय अधिक कर देती हैं।

आगे की राह

  • ऊर्जा मंत्रालय का गठन
    • एकीकृत संरचना: पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालयों को मिलाकर एक एकल ऊर्जा मंत्रालय का गठन किया जाए।
    • केंद्रीकृत नेतृत्व: राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के निर्माण एवं क्रियान्वयन के लिए एकल प्राधिकरण की स्थापना की जाए।
  • ऊर्जा संसाधन एवं सुरक्षा विभाग (DERS) की स्थापना
    • समन्वित शासन: प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत एक विशेष विभाग का गठन किया जाए, जो मौजूदा मंत्रालयों को प्रतिस्थापित किए बिना ऊर्जा नीति का समन्वय करे।
  • निवेशों की समरूपता सुनिश्चित करना
    • संतुलित अवसंरचना विकास: उत्पादन, प्रसारण, भंडारण तथा वितरण क्षेत्रों में निवेश का समन्वय किया जाए।
    • संसाधनों का कुशल उपयोग: यह सुनिश्चित किया जाए कि अवसंरचना विस्तार मूल्य शृंखला के सभी चरणों में समन्वित रूप से हो।
  • इंडिया एनर्जी इंक.” (India Energy Inc.) का निर्माण
    • ऊर्जा कूटनीति: विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को सुदृढ़ किया जाए।
    • प्रौद्योगिकी सहयोग: अनुसंधान साझेदारियों को बढ़ावा दिया जाए तथा उन्नत ऊर्जा प्रौद्योगिकियों तक पहुँच सुनिश्चित की जाए।
    • विदेशी ऊर्जा परिसंपत्तियाँ: आपूर्ति सुरक्षा बढ़ाने हेतु विदेशों में ऊर्जा संसाधनों में निवेश को प्रोत्साहित किया जाए।
    • महत्त्वपूर्ण खनिजों तक पहुँच: स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों एवं बैटरी निर्माण के लिए आवश्यक रणनीतिक खनिजों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
  • ऊर्जा लोकपाल का गठन
    • विनियामक सामंजस्य: विभिन्न ऊर्जा क्षेत्रों एवं एजेंसियों के मध्य विनियमों को सुव्यवस्थित किया जाए।
    • विवाद समाधान: नियामक एवं वाणिज्यिक विवादों के समाधान हेतु एक प्रभावी तंत्र प्रदान किया जाए।
    • श्रेष्ठ प्रथाओं का प्रसार: वैश्विक विनियामक मानकों एवं नवाचारों को अपनाने को प्रोत्साहित किया जाए।
  • सार्वजनिक संचार एवं जागरूकता
    • ऊर्जा संरक्षण: जिम्मेदार ऊर्जा उपभोग एवं दक्षता उपायों को बढ़ावा दिया जाए।
    • जन जागरूकता: ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित चुनौतियों एवं नीतिगत विकल्पों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए।
    • हितधारक सहभागिता: सुधारों एवं दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों के लिए जन समर्थन विकसित किया जाए।
  • ऊर्जा उत्तरदायित्व एवं सुरक्षा अधिनियम: भारत में ऊर्जा सुरक्षा, सततता, जवाबदेही, तथा दीर्घकालिक ऊर्जा संक्रमण योजना को सुदृढ़ करने हेतु एक प्रस्तावित ढाँचा।

निष्कर्ष

  • भारत की ऊर्जा चुनौती केवल संसाधनों की उपलब्धता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन एवं समन्वय से भी संबंधित है।
  • ऊर्जा संसाधन एवं सुरक्षा विभाग जैसे एक एकीकृत संस्थागत तंत्र की स्थापना से नीतिगत पृथकता को समाप्त किया जा सकता है तथा ऊर्जा आत्मनिर्भरता एवं सततता की दिशा में संक्रमण को तीव्र किया जा सकता है।

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