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सरकार द्वारा स्टेम सेल एवं जीन थेरेपी को केंद्रीय लाइसेंसिंग ढाँचे के अंतर्गत लाया गया

Lokesh Pal July 04, 2026 02:30 10 0

संदर्भ 

केंद्र सरकार ने औषधि नियम, 1945 में संशोधन कर स्टेम सेल-आधारित उत्पादों, जीन थेरेपी संबंधी उत्पादों तथा जेनोग्राफ्ट को केंद्रीय लाइसेंस अनुमोदन प्राधिकरण (CLAA) के दायरे में शामिल कर दिया है।

हालिया संशोधन के बारे में

  • CLAA के दायरे का विस्तार: इस संशोधन के माध्यम से स्टेम सेल-आधारित उत्पादों, जीन थेरेपी उत्पादों तथा जेनोग्राफ्ट (एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में ऊतक या अंग का प्रत्यारोपण) को केंद्रीय लाइसेंस अनुमोदन प्राधिकरण (CLAA) के दायरे में शामिल किया गया है। इससे पहले इसके अंतर्गत टीके, बड़ी मात्रा में अंतःशिरा द्रव तथा पुनर्संयोजित DNA (r-DNA) आधारित औषधियाँ आती थीं।
  • नियामकीय निगरानी को सुदृढ़ बनाना: इन उन्नत जैविक उत्पादों के निर्माताओं को अब उत्पादन एवं विपणन से पहले राज्य नियामक प्राधिकरणों के साथ-साथ केंद्र सरकार से भी अनुमोदन प्राप्त करना होगा।
  • उद्देश्य: जटिल जैविक उपचारों की गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों, वैज्ञानिक मूल्यांकन तथा एकरूप नियमन को सुदृढ़ बनाना।

स्टेम सेल थेरेपी के बारे में

  • स्टेम सेल थेरेपी: यह पुनर्योजी चिकित्सा की एक विधि है, जिसमें स्टेम सेल का उपयोग क्षतिग्रस्त ऊतकों एवं अंगों की मरम्मत, प्रतिस्थापन अथवा पुनर्निर्माण कर उनकी सामान्य कार्यक्षमता बहाल करने के लिए किया जाता है।
  • कार्यप्रणाली: स्टेम सेल में स्वयं को पुनः उत्पन्न करने तथा रक्त, तंत्रिका, मांसपेशी अथवा अस्थि कोशिकाओं जैसी विशिष्ट कोशिकाओं में विकसित होने की क्षमता होती है, जिससे ऊतकों का पुनर्निर्माण संभव होता है।
  • स्टेम सेल के प्रकार
    • भ्रूणीय स्टेम सेल (ESCs): ये बहु-क्षमतायुक्त कोशिकाएँ होती हैं, जो लगभग किसी भी प्रकार की कोशिका में विकसित हो सकती हैं।
    • वयस्क (दैहिक) स्टेम सेल: ये अस्थि मज्जा तथा वसा ऊतक जैसे ऊतकों में पाए जाते हैं और मुख्यतः ऊतक मरम्मत में उपयोग किए जाते हैं।
    • इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल्स (iPSCs) (iPSCs): ये वयस्क कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें आनुवंशिक रूप से परिवर्तित कर भ्रूणीय स्टेम सेल जैसी क्षमता प्रदान की जाती है, जिससे नैतिक चिंताओं से बचा जा सकता है।
  • उपयोग: इनका उपयोग रक्त कैंसर (अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण), मेरुदंड की चोट, पार्किंसन रोग, मधुमेह, जलन, कॉर्निया संबंधी विकारों तथा अन्य अपक्षयी रोगों के उपचार में किया जाता है।

जीन थेरेपी के बारे में

  • जीन थेरेपी: यह एक उन्नत चिकित्सा तकनीक है, जिसमें दोषपूर्ण जीनों से होने वाले रोगों के उपचार या रोकथाम के लिए रोगी की कोशिकाओं में जीनों का संशोधन, प्रतिस्थापन, मरम्मत अथवा नए जीनों का समावेश किया जाता है।
  • कार्यप्रणाली: कार्यात्मक आनुवंशिक पदार्थ को विषाणु वाहकों (जैसे- एडेनोवायरस, लेंटिवायरस, एडेनो-संबद्ध विषाणु) अथवा गैर-विषाणु वितरण प्रणालियों के माध्यम से लक्षित कोशिकाओं तक पहुँचाया जाता है, जिससे रोग उत्पन्न करने वाले जीन उत्परिवर्तनों को ठीक किया जा सके।
  • प्रकार
    • दैहिक जीन थेरेपी: यह शरीर की कोशिकाओं को लक्षित करती है। इसके प्रभाव अगली पीढ़ी में स्थानांतरित नहीं होते।
    • जनन कोशिका जीन थेरेपी: इसमें जनन कोशिकाओं या भ्रूण के जीनों में परिवर्तन किया जाता है। इसके प्रभाव अगली पीढ़ी में भी स्थानांतरित होते हैं, किंतु नैतिक कारणों से अधिकांश देशों में मनुष्यों पर इसकी अनुमति नहीं है।
  • उपयोग: इसका उपयोग आनुवंशिक रोगों (जैसेथैलेसीमिया, हीमोफीलिया, स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी), कुछ कैंसर (CAR-T जीन थेरेपी), वंशानुगत रेटिना विकारों तथा अन्य दुर्लभ रोगों के उपचार में किया जाता है।
  • हाल की प्रगति: CRISPR-Cas9 जीन एडिटिंग, CAR-T जीन थेरेपी तथा बेस एडिटिंग जैसी तकनीकों ने जीन थेरेपी की उपचार क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार किया है।
  • चुनौतियाँ: उच्च लागत, अनपेक्षित आनुवंशिक परिवर्तन, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, नैतिक चिंताएँ तथा दीर्घकालिक सुरक्षा एवं प्रभावशीलता सुनिश्चित करना प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

केंद्रीय लाइसेंस अनुमोदन प्राधिकरण (CLAA) के बारे में

  • केंद्रीय लाइसेंस अनुमोदन प्राधिकरण (CLAA): यह औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 तथा औषधि नियम, 1945 के अंतर्गत स्थापित एक नियामकीय व्यवस्था है, जिसके तहत कुछ महत्त्वपूर्ण जैविक उत्पादों का विनियमन केंद्रीय एवं राज्य औषधि प्राधिकरणों द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है।
  • नोडल प्राधिकरण: केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO), जिसके प्रमुख भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI) होते हैं, औषधियों एवं जैविक उत्पादों की निर्दिष्ट श्रेणियों के लिए केंद्रीय अनुमोदन प्रदान करता है।
  • उद्देश्य: उच्च जोखिम वाले जैविक उत्पादों के लिए पूरे देश में एकरूप गुणवत्ता मानकों, रोगी सुरक्षा, वैज्ञानिक परीक्षण तथा नियामकीय एकरूपता सुनिश्चित करना।

ये उभरती हुई उपचार पद्धतियाँ क्या हैं?

  • स्टेम सेल-आधारित उत्पाद: ये स्टेम सेल से विकसित उपचारात्मक उत्पाद हैं, जो क्षतिग्रस्त ऊतकों के पुनर्निर्माण या प्रतिस्थापन में सहायक होते हैं। इनका उपयोग पुनर्योजी चिकित्सा, तंत्रिका संबंधी रोगों तथा ऊतक मरम्मत में किया जाता है।
  • जीन थेरेपी: यह एक ऐसी उपचार पद्धति है, जिसमें रोगी की कोशिकाओं में आनुवंशिक पदार्थ का संशोधन, प्रतिस्थापन अथवा समावेश कर वंशानुगत रोगों, कैंसर तथा अन्य गंभीर रोगों का उपचार या रोकथाम की जाती है।
  • जेनोग्राफ्ट: ये ऐसे जैविक ऊतक या चिकित्सीय उत्पाद हैं, जिन्हें पशुओं से प्राप्त कर मनुष्यों में प्रत्यारोपित किया जाता है। उदाहरण के लिए सूअर के हृदय वाल्व, त्वचा प्रत्यारोपण तथा अन्य जैविक प्रत्यारोपण।
  • CAR-T सेल थेरेपी: यह जीन-संशोधित प्रतिरक्षा चिकित्सा का एक रूप है, जिसमें रोगी की T-कोशिकाओं को आनुवंशिक रूप से परिवर्तित कर कैंसर कोशिकाओं की पहचान एवं उन्हें नष्ट करने योग्य बनाया जाता है। इसका उपयोग विशेष रूप से रक्त कैंसर, जैसे ल्यूकेमिया तथा लिंफोमा के उपचार में किया जाता है।

सुदृढ़ नियमन की आवश्यकता

  • तेजी से हो रही तकनीकी प्रगति: जीन एडिटिंग, जीन थेरेपी तथा पुनर्योजी चिकित्सा में हो रही तीव्र प्रगति के कारण वैज्ञानिक नवाचारों के अनुरूप विशेषीकृत नियामकीय निगरानी की आवश्यकता है।
  • रोगी सुरक्षा: इन उपचार पद्धतियों में जटिल जैविक प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं, जिनसे प्रतिरक्षा प्रतिक्रियाएँ, आनुवंशिक परिवर्तन, दीर्घकालिक सुरक्षा तथा उपचार की प्रभावशीलता से जुड़े जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।
  • एकरूप राष्ट्रीय मानक: केंद्रीय अनुमोदन व्यवस्था पूरे देश में गुणवत्ता, विनिर्माण मानकों तथा नैदानिक मूल्यांकन में एकरूपता सुनिश्चित करती है।
  • जनविश्वास को सुदृढ़ बनाना: एक मजबूत नियामकीय व्यवस्था उन्नत उपचार पद्धतियों के प्रति जनविश्वास बढ़ाती है तथा उनके सुरक्षित उपयोग को प्रोत्साहित करती है।

हाल की प्रमुख पहलें

  • भारत की पहली स्वदेशी CAR-T थेरेपी: हाल ही में भारत ने ‘नेक्सकार19’ (NexCAR19) विकसित किया, जो देश की पहली स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी है। इससे उन्नत कैंसर उपचार अधिक किफायती हुआ है तथा भारत की जैव-प्रौद्योगिकी क्षमता को भी सुदृढ़ किया है।
  • राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन: यह जैव औषधियों, टीकों, बायोसिमिलर औषधियों तथा उन्नत उपचार पद्धतियों के अनुसंधान, नवाचार एवं स्वदेशी विकास को प्रोत्साहित करता है।
  • बायोE3 नीति (2024): यह उच्च दक्षता वाले जैव-विनिर्माण को बढ़ावा देती है तथा परिशुद्ध चिकित्सा, सिंथेटिक बायोलॉजी एवं जैव-प्रौद्योगिकी आधारित स्वास्थ्य सेवाओं में नवाचार को प्रोत्साहित करती है।

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