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इंडियन ओशन डाइपोल (IOD)

Lokesh Pal July 06, 2026 02:00 7 0

संदर्भ 

भारत के वर्ष 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून में अल-नीनो के सशक्त होने के कारण जून 2026 के दौरान लगभग 40% वर्षा की कमी दर्ज की गई। इसके बाद इस बात पर ध्यान केंद्रित हुआ कि क्या सकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (Indian Ocean Dipole–IOD) मानसूनी मौसम में वर्षा की मात्रा में वृद्धि कर सकता है।

इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) के बारे में

  • यह उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर में पाया जाने वाला महासागर-वायुमंडल युग्मित जलवायु तंत्र है, जिसकी विशेषता निम्नलिखित क्षेत्रों के बीच समुद्री सतही तापमान’ (SST) में अंतर होना है:
    • पश्चिमी हिंद महासागर (पूर्वी अफ्रीका के निकट)
    • पूर्वी हिंद महासागर (इंडोनेशिया के निकट)
  • इसका मापन डाइपोल मोड इंडेक्स (DMI) द्वारा किया जाता है।

 IOD के चरण

चरण विशेषताएँ भारत पर प्रभाव
सकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (Positive IOD) पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक गर्म तथा पूर्वी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक ठंडा रहता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून को सुदृढ़ करता है; सामान्य से अधिक वर्षा होती है।
नकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (Negative IOD) पूर्वी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक गर्म तथा पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक ठंडा रहता है। मानसून को कमजोर करता है; सामान्य से कम वर्षा होती है।
तटस्थ ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (Neutral IOD) ‘समुद्री सतही तापमान’ (SST) में कोई उल्लेखनीय अंतर नहीं होता है। मानसून पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है।

सकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) तथा भारत के मानसून पर इसका प्रभाव

  • भारत की ओर आर्द्रता के परिवहन को सुदृढ़ करता है: सकारात्मक IOD की स्थिति में पश्चिमी हिंद महासागर का जल पूर्वी हिंद महासागर की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है।
    • गर्म जल के कारण वाष्पीकरण बढ़ता है, जिससे आर्द्रता युक्त पवनें उत्पन्न होती हैं।
    • ये पवनें भारतीय उपमहाद्वीप की ओर प्रवाहित होती हैं, जिससे मानसूनी वर्षा के लिए आवश्यक आर्द्रता की आपूर्ति बढ़ जाती है।
  • अरब सागर के ऊपर संवहन को बढ़ाता है: पश्चिमी हिंद महासागर में अधिक ‘समुद्री सतही तापमान’ (SST) के कारण तीव्र संवहन अर्थात् गर्म एवं आर्द्र वायु ऊपर उठती है।
    • इसके परिणामस्वरूप अरब सागर के ऊपर अधिक बादलों का निर्माण तथा निम्न दाब प्रणालियों का विकास होता है।
    • सुदृढ़ मानसूनी परिसंचरण अधिक आर्द्रता को भारत के आंतरिक भागों तक पहुँचाने में सहायक होता है।
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून की वर्षा में वृद्धि करता है: आर्द्रता की अधिक उपलब्धता तथा मजबूत वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण भारत के अनेक भागों में सामान्य से अधिक वर्षा होती है।
    • सकारात्मक IOD प्रायः मानसून के उत्तरार्द्ध (अगस्त–सितंबर) में वर्षा को बढ़ाता है, जिससे वर्षा आधारित कृषि को लाभ मिलता है।
    • यह जलाशयों में जल संचय, भूजल पुनर्भरण तथा समग्र जल उपलब्धता में भी सुधार करता है।
  • अल-नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित करता है: जहाँ अल-नीनो वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) को कमजोर करके मानसूनी वर्षा को घटाता है, वहीं सकारात्मक IOD हिंद महासागर से आर्द्रता के परिवहन को सुदृढ़ कर इसके प्रभाव को आंशिक रूप से संतुलित करता है।
    • यद्यपि यह प्रबल अल नीनो के प्रभाव को पूर्णतः समाप्त नहीं कर सकता, फिर भी यह वर्षा की कमी को उल्लेखनीय रूप से कम कर मानसून में सुधार कर सकता है।
      • उदाहरण: वर्ष 1997 तथा वर्ष 2019 में प्रबल सकारात्मक IOD ने अल-नीनो से उत्पन्न मानसून में कमी की आंशिक भरपाई की थी, जिसके परिणामस्वरूप अपेक्षा से बेहतर मौसमी वर्षा दर्ज की गई।

नकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) तथा भारत के मानसून पर इसका प्रभाव

  • आर्द्रता को इंडोनेशिया की ओर स्थानांतरित करता है: नकारात्मक IOD की स्थिति में इंडोनेशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के निकट स्थित पूर्वी हिंद महासागर का जल पश्चिमी हिंद महासागर की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है।
    • अधिक गर्म पूर्वी हिंद महासागर के कारण वाष्पीकरण एवं संवहन में वृद्धि होती है।
    • इसके परिणामस्वरूप आर्द्रता युक्त पवनें तथा वर्षा इंडोनेशिया एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित हो जाती हैं, जिससे भारत के लिए उपलब्ध आर्द्रता कम हो जाती है।
  • दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करता है: भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आर्द्रता का परिवहन कम होने से दक्षिण-पश्चिम मानसून का परिसंचरण कमजोर पड़ जाता है।
    • इसके परिणामस्वरूप भारत के अनेक भागों, विशेषकर वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों, में सामान्य से कम वर्षा होती है।
    • कम वर्षा के कारण जलाशयों में जल संचय, भूजल पुनर्भरण तथा मृदा की आर्द्रता भी घट जाती है, जिससे कृषि एवं जल सुरक्षा प्रभावित होती है।
  • अल-नीनो के वर्षों में सूखे की स्थिति को और गंभीर बनाता है: जब नकारात्मक IOD और अल-नीनो एक साथ होते हैं, तो दोनों मिलकर भारतीय मानसून को और अधिक कमजोर कर देते हैं।
    • इन दोनों के संयुक्त प्रभाव से मानसून की विफलता, सूखे की स्थिति, फसल हानि तथा जल संकट की संभावना काफी बढ़ जाती है।
    • ऐसे वर्षों में प्रायः कृषि उत्पादन में कमी, ग्रामीण संकट तथा खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि देखी जाती है, जिससे अर्थव्यवस्था एवं आपदा प्रबंधन के समक्ष गंभीर चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

भारत के लिए ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) का महत्त्व

  • कृषि स्थिरता: सकारात्मक IOD मानसूनी वर्षा को बढ़ाता है, जिससे खरीफ की फसलों की समय पर बुवाई, मृदा की आर्द्रता में वृद्धि तथा कृषि उत्पादकता में सुधार होता है।
  • जल सुरक्षा: सकारात्मक IOD के दौरान सामान्य से अधिक वर्षा होने से जलाशयों में जल संचय, भूजल पुनर्भरण तथा सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता बढ़ती है, जिससे जल सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
  • आर्थिक विकास: सकारात्मक IOD से प्रेरित अच्छा मानसून ग्रामीण आय में वृद्धि करता है, खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में सहायता करता है तथा समग्र आर्थिक विकास को गति देता है।
  • आपदा जोखिम में कमी: अधिक वर्षा से सूखे का जोखिम कम होता है, जलविद्युत उत्पादन में वृद्धि होती है तथा घरेलू एवं औद्योगिक उपयोग के लिए पर्याप्त जल उपलब्धता सुनिश्चित होती है।

इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD) से जुड़ी चुनौतियाँ

  • अल-नीनो के प्रभाव को पूरी तरह संतुलित करने में सीमित क्षमता: सकारात्मक IOD विशेषकर गंभीर सूखे वाले वर्षों में, प्रबल अल-नीनो के प्रतिकूल प्रभाव को पूर्णतः समाप्त नहीं कर सकता है।
  • वर्षा का असमान वितरण: सकारात्मक IOD की स्थिति में भी वर्षा का वितरण सभी क्षेत्रों में समान नहीं होता, जिससे कुछ क्षेत्र जल संकट का सामना करते रहते हैं।
  • जल-मौसम संबंधी जोखिमों में वृद्धि: मानसून की अधिक सक्रियता के कारण कुछ क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सूखे की स्थिति बनी रह सकती है, जिससे आपदा प्रबंधन अधिक जटिल हो जाता है।
  • जलवायु परिवर्तन से बढ़ती अनिश्चितता: महासागरों के बढ़ते तापमान तथा वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन के कारण IOD तथा भारतीय मानसून के व्यवहार का पूर्वानुमान लगाना लगातार अधिक कठिन होता जा रहा है।

आगे की राह

  • मौसमी पूर्वानुमान को सुदृढ़ बनाना: उन्नत महासागर-वायुमंडल युग्मित जलवायु मॉडल तथा महासागरों के वास्तविक समय के प्रेक्षणों का उपयोग करके मानसून पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाई जाए।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना: सूखा-सहिष्णु फसलों, जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियों तथा आकस्मिक कार्ययोजनाओं को प्रोत्साहित कर मानसून संबंधी जोखिमों को कम किया जाए।
  • जल संसाधन प्रबंधन को सुदृढ़ बनाना: वर्षा जल संचयन, कुशल सिंचाई, भूजल पुनर्भरण तथा जलाशयों के वैज्ञानिक संचालन का विस्तार कर जल सुरक्षा को मजबूत किया जाए।
  • पूर्व चेतावनी प्रणाली को सुदृढ़ बनाना: किसानों एवं आपदा प्रबंधकों के लिए जिला-स्तरीय मौसम परामर्श, प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान तथा पूर्व चेतावनी प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
  • जलवायु अनुसंधान को प्रोत्साहित करना: अल-नीनो, इंडियन ओशन डाइपोल’ (IOD), मैडन–जूलियन ऑसिलेशन (Madden–Julian Oscillation–MJO) तथा जलवायु परिवर्तन के मध्य अंतःक्रियाओं पर अनुसंधान को बढ़ावा देकर पूर्वानुमान की सटीकता तथा नीतिगत योजना में सुधार किया जाए।

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