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निर्वासन (Externment)

Lokesh Pal July 06, 2026 02:15 65 0

संदर्भ 

हाल ही में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि केवल सरकार के विरुद्ध आंदोलनों अथवा विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के आधार पर किसी व्यक्ति के विरुद्ध निर्वासन (Externment) की कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

निर्वासन (Externment) के बारे में

  • निर्वासन एक निवारक प्रशासनिक उपाय है, जिसके अंतर्गत किसी व्यक्ति को लोक व्यवस्था, लोक शांति अथवा लोक सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों को रोकने के उद्देश्य से एक निर्धारित अवधि के लिए किसी निर्धारित भौगोलिक क्षेत्र को छोड़ने का निर्देश दिया जाता है।
  • वैधानिक आधार: इसका प्रावधान राज्य पुलिस कानूनों, जैसे महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम, 1951, के अंतर्गत किया गया है। इसका उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि निवारक उपाय के रूप में कार्य करना है।
  • उद्देश्य: इस शक्ति का प्रयोग आदतन अपराधियों अथवा आसन्न खतरा उत्पन्न करने वाले व्यक्तियों को गवाहों को भयभीत करने, लोक व्यवस्था भंग करने अथवा पुनः अपराध करने से रोकने के लिए किया जाता है।
  • शक्ति का स्वरूप: चूँकि निर्वासन किसी व्यक्ति की आवागमन की स्वतंत्रता, निवास तथा जीविका के अधिकार को सीमित करता है, इसलिए इसका प्रयोग आवश्यकता, आनुपातिकता तथा प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की कसौटियों पर खरा उतरना चाहिए।

बॉम्बे उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन अपराध नहीं है: मोर्चा, धरना तथा सरकारी नीतियों के विरुद्ध शांतिपूर्ण प्रदर्शन आयोजित करना, अपने आप में निर्वासन का आधार नहीं बन सकता है।
  • सरकार की आलोचना संवैधानिक रूप से संरक्षित है: सत्तारूढ़ सरकार अथवा राजनीतिक नेताओं के विरुद्ध नारे लगाना केवल राजनीतिक आलोचना होने के कारण लोक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं माना जा सकता है।
  • मौलिक अधिकारों का संरक्षण: मनमाना निर्वासन अनुच्छेद-19 एवं अनुच्छेद-21 के अंतर्गत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, गरिमा तथा लोकतांत्रिक भागीदारी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
  • पुलिस को संस्थागत रूप से तटस्थ रहना चाहिए: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारी किसी राजनीतिक कार्यपालिका के नहीं, बल्कि संविधान एवं कानून के सेवक हैं। यह पुलिस की राजनीतिक तटस्थता के सिद्धांत को सुदृढ़ करता है।
  • निर्वासन के लिए लोक व्यवस्था से जुड़ी वास्तविक आशंका आवश्यक है: केवल सरकारी निर्णयों का विरोध करने के आधार पर निवारक शक्तियों का प्रयोग नहीं किया जा सकता, जब तक कि लोक शांति के लिए आसन्न खतरे के विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध न हों।

निर्णय का महत्त्व

  • लोकतांत्रिक असहमति को सुदृढ़ करता है: यह पुनः स्पष्ट करता है कि सरकारी नीतियों से शांतिपूर्ण असहमति व्यक्त करना संवैधानिक लोकतंत्र का एक अनिवार्य तत्त्व है।
  • कार्यपालिका के अतिक्रमण पर नियंत्रण: यह राजनीतिक विरोध अथवा नागरिक समाज की गतिविधियों को दबाने के लिए पुलिस की निवारक शक्तियों के दुरुपयोग को रोकता है।
  • विधि के शासन को सुदृढ़ करता है: यह सुनिश्चित करता है कि निवारक उपायों का प्रयोग केवल संवैधानिक एवं वैधानिक सीमाओं के भीतर ही किया जाए।
  • राजनीतिक स्वतंत्रताओं का संरक्षण: यह विपक्षी दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नागरिक समाज संगठनों तथा लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करने वाले नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
  • जवाबदेह पुलिस व्यवस्था को बढ़ावा देता है: यह अपेक्षा को सुदृढ़ करता है कि पुलिस अपनी वैधानिक शक्तियों का प्रयोग निष्पक्ष एवं राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र होकर करे।

असहमति का संवैधानिक संरक्षण

अनुच्छेद-19(1)(d) भारत के प्रत्येक नागरिक को भारत के समस्त क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवागमन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है।

  • अनुच्छेद-19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें सरकारी नीतियों की शांतिपूर्ण आलोचना करने का अधिकार भी सम्मिलित है।
  • अनुच्छेद-19(1)(b): शांतिपूर्ण एवं निरस्त्र सभा करने के अधिकार का संरक्षण करता है, जो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों एवं आंदोलनों का संवैधानिक आधार है।
  • अनुच्छेद-19(1)(c): संघों एवं राजनीतिक संगठनों के गठन का अधिकार प्रदान करता है, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी सुदृढ़ होती है।
  • अनुच्छेद-21: जीवन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गरिमा के अधिकार का संरक्षण करता है, जिन्हें कार्यपालिका की मनमानी कार्रवाई द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता है।
  • युक्तिसंगत प्रतिबंध: यद्यपि अनुच्छेद-19 के अंतर्गत लोक व्यवस्था, भारत की संप्रभुता, सुरक्षा तथा सदाचार जैसे आधारों पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, किंतु ऐसे प्रतिबंध युक्तिसंगत, आनुपातिक तथा विधि द्वारा उचित रूप से समर्थित होने चाहिए।

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