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निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर बहस

Lokesh Pal July 06, 2026 02:30 6 0

संदर्भ 

हाल ही में वर्ष 2020 के दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में उमर खालिद एवं शरजील इमाम सहित अन्य आरोपियों की सुनवाई प्रारंभ हुए बिना लगातार कारावास में रहना, विशेषकर विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 [UAPA] के संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शीघ्र न्याय तथा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के मध्य संतुलन पर पुनः बहस का विषय बन गया है।

निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार (Right to a Fair Trial) के बारे में

  • यह अनुच्छेद-21 का अभिन्न अंग है, जो सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित न्यायसंगत, निष्पक्ष एवं युक्तिसंगत प्रक्रिया के अतिरिक्त उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है।
  • प्रमुख घटक: इसमें निर्दोष होने की धारणा, शीघ्र सुनवाई, विधिक प्रतिनिधित्व, निष्पक्ष न्यायपालिका, निष्पक्ष जाँच, साक्ष्यों तक पहुँच, युक्तिसंगत न्यायिक निर्णय तथा अपील का अधिकार सम्मिलित हैं।
  • न्यायिक मान्यता: सर्वोच्च न्यायालय ने निरंतर यह माना है कि निष्पक्ष सुनवाई विधि के शासन की आधारशिला है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी दे।
  • अंतरराष्ट्रीय मानक: इस अधिकार को मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद-10 तथा अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अनुबंध’ (ICCPR) के अनुच्छेद-14 के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है, जो स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायाधिकरण के समक्ष निष्पक्ष एवं सार्वजनिक सुनवाई की गारंटी देते हैं।
  • लोकतांत्रिक महत्त्व: निष्पक्ष सुनवाई व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है, राज्य की मनमानी शक्तियों के प्रयोग को रोकती है, गलत दोषसिद्धि से संरक्षण प्रदान करती है तथा न्याय वितरण प्रणाली में जनविश्वास को सुदृढ़ करती है।

संवैधानिक एवं विधिक ढाँचा

  • अनुच्छेद-21: जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, जिसकी न्यायिक व्याख्या में निष्पक्ष एवं शीघ्र सुनवाई का अधिकार भी सम्मिलित किया गया है।
  • अनुच्छेद-22(1): गिरफ्तारी के तुरंत बाद प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के विधिक अधिवक्ता से परामर्श करने एवं उसके द्वारा प्रतिरक्षा प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद-14: विधि के समक्ष समानता की गारंटी देता है तथा आपराधिक न्याय के सिद्धांतों का समान, निष्पक्ष एवं गैर-मनमाना अनुप्रयोग सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद-39A (राज्य के नीति-निर्देशक तत्त्व): राज्य को समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है, ताकि आर्थिक अथवा अन्य कारणों से किसी भी व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने से वंचित न होना पड़े।
  • विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967: धारा 43D(5) के अंतर्गत जमानत के लिए अत्यंत कठोर शर्तें निर्धारित की गई हैं, जिससे दोष सिद्ध होने से पूर्व भी रिहाई कठिन हो जाती है।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ: भारत अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार अनुबंध (ICCPR) का हस्ताक्षरकर्ता है, जो प्रत्येक व्यक्ति को युक्तिसंगत समय के भीतर सुनवाई अथवा सुनवाई लंबित रहने तक रिहाई का अधिकार प्रदान करता है।

यह मुद्दा चर्चा में क्यों आया?

  • लंबे समय तक विचाराधीन कैद: दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले के कुछ आरोपी सुनवाई हुए बिना लगभग 6 वर्ष से कारावास में हैं, जिससे यह चिंता पुनः उभरी है कि न्यायिक प्रक्रिया ही दंड का रूप धारण कर रही है।
  • न्यायालयों के भिन्न दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की विभिन्न पीठों ने इस प्रश्न पर अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाए हैं कि क्या केवल लंबे समय तक कारावास में रहना, कठोर कानूनों के अंतर्गत जमानत देने का पर्याप्त आधार हो सकता है।
  • विशेष कानूनों का बढ़ता उपयोग: विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 [UAPA] तथा अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी कानूनों के बढ़ते उपयोग ने दोष सिद्ध हुए बिना लंबे समय तक निरुद्ध रखने को लेकर चिंताओं को बढ़ा दिया है।
  • न्यायिक लंबित मामले: आपराधिक मामलों की अत्यधिक लंबित संख्या के कारण सुनवाई में निरंतर विलंब हो रहा है, जिससे समय पर न्याय की संवैधानिक गारंटी प्रभावित हो रही है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर बहस: इस मुद्दे ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा तथा प्रभावी आपराधिक न्याय प्रशासन के मध्य संतुलन को लेकर पुनः व्यापक चर्चा प्रारंभ कर दी है।

शीघ्र सुनवाई (Speedy Trial) मौलिक क्यों है?

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण: सुनवाई से पूर्व निरुद्ध रखना केवल अपवाद होना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक आरोपी को दोष सिद्ध होने तक निर्दोष माना जाता है।
  • निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी: न्याय में विलंब होने से अभियोजन तथा बचाव पक्ष दोनों प्रभावित होते हैं, क्योंकि इससे गवाहों, साक्ष्यों, स्मृति तथा प्रक्रियात्मक निष्पक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • विधि के शासन की रक्षा: दोष सिद्ध हुए बिना अनिश्चितकाल तक कारावास में रखना आपराधिक न्याय प्रणाली के प्रति जनविश्वास को कमजोर करता है।
  • मानवीय गरिमा का संरक्षण: न्यायिक निर्णय के बिना वर्षों तक कारावास में रहने से व्यक्ति पर सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक तथा व्यावसायिक स्तर पर ऐसे दुष्प्रभाव पड़ते हैं, जिनकी भरपाई बाद में दोषमुक्त होने पर भी संभव नहीं होती है।
  • लोकतांत्रिक सुरक्षा: समय पर न्यायिक परीक्षण यह सुनिश्चित करता है कि आपराधिक कानून का उपयोग राजनीतिक असहमति अथवा नागरिक स्वतंत्रताओं को दबाने के साधन के रूप में न किया जाए।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • न्यायिक प्रक्रिया का ही दंड बन जाना: विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 जैसे कठोर कानूनों में जमानत संबंधी सख्त प्रावधान तथा सुनवाई से पूर्व लंबे समय तक कारावास के कारण, दोष सिद्ध हुए बिना ही व्यक्ति को वास्तविक रूप से दंड का सामना करना पड़ता है।
  • आपराधिक न्याय प्रणाली में विलंब: धीमी जाँच, मामलों की अत्यधिक लंबित संख्या, बार-बार स्थगन तथा प्रक्रियागत जटिलताओं के कारण सुनवाई प्रारंभ होने एवं पूर्ण होने में अत्यधिक विलंब होता है।
  • संस्थागत क्षमता की कमी: न्यायाधीशों, लोक अभियोजकों, न्यायालय कर्मचारियों, फॉरेंसिक सुविधाओं तथा डिजिटल अवसंरचना की कमी समय पर न्याय उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न करती है।
  • विचाराधीन कैदियों की समस्या एवं जेलों में भीड़: विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या के कारण जेलों में अत्यधिक भीड़ हो रही है, जिससे वित्तीय, प्रशासनिक एवं मानवीय चुनौतियाँ बढ़ रही हैं।
  • जमानत संबंधी न्यायिक दृष्टिकोण में असंगति: न्यायालयों द्वारा जमानत के संबंध में भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ किए जाने से व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण तथा विधि के समक्ष समानता के अनुप्रयोग में अनिश्चितता उत्पन्न होती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा एवं मौलिक अधिकारों के मध्य संतुलन: राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विधिसम्मत प्रक्रिया, शीघ्र सुनवाई तथा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की रक्षा करना एक प्रमुख संवैधानिक चुनौती है।

आगे की राह

  • शीघ्र सुनवाई की व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना: समयबद्ध सुनवाई, प्रभावी वाद प्रबंधन प्रणाली तथा लंबे समय से लंबित विचाराधीन मामलों के प्राथमिकता के आधार पर निस्तारण की व्यवस्था विकसित की जाए।
  • जमानत संबंधी व्यवस्था में सुधार: ऐसे स्पष्ट संवैधानिक दिशा-निर्देश विकसित किए जाएँ, जिनके अनुसार सुनवाई के बिना लंबे समय तक कारावास सामान्यतः जमानत के पक्ष में माना जाए, साथ ही वास्तविक सुरक्षा संबंधी चिंताओं का भी उचित संतुलन बना रहे।
  • न्यायिक क्षमता का विस्तार: न्यायाधीशों की नियुक्तियों में वृद्धि, न्यायालय अवसंरचना का विस्तार तथा अभियोजन, फॉरेंसिक एवं जाँच एजेंसियों की क्षमता को सुदृढ़ किया जाए।
  • नियमित न्यायिक समीक्षा: विशेष रूप से विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 जैसे विशेष कानूनों के अंतर्गत लंबे समय से विचाराधीन कैद की नियमित न्यायिक समीक्षा अनिवार्य की जाए।
  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा में संतुलन: यह सुनिश्चित किया जाए कि आतंकवाद-निरोधी विशेष कानूनों का संचालन निष्पक्षता, आनुपातिकता, आवश्यकता तथा विधिसम्मत प्रक्रिया के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप हो।
  • प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग: ई-कोर्ट, आभासी सुनवाई, डिजिटल वाद प्रबंधन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित प्रशासनिक सहायता तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य प्रबंधन का विस्तार किया जाए, ताकि न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखते हुए प्रक्रियागत विलंब कम किया जा सके।

निष्कर्ष

आपराधिक न्याय प्रणाली की वैधता केवल दोषियों को दंडित करने पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी आधारित है कि किसी भी व्यक्ति को समय पर न्यायिक निर्णय के बिना वर्षों तक उसकी स्वतंत्रता से वंचित न रखा जाए। शीघ्र सुनवाई, जमानत संबंधी सुसंगत न्यायिक दृष्टिकोण, न्यायिक क्षमता, संस्थागत दक्षता तथा संवैधानिक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना विधि के शासन एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।

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