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Lokesh Pal
July 06, 2026 02:30
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हाल ही में वर्ष 2020 के दिल्ली दंगा षड्यंत्र मामले में उमर खालिद एवं शरजील इमाम सहित अन्य आरोपियों की सुनवाई प्रारंभ हुए बिना लगातार कारावास में रहना, विशेषकर विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 [UAPA] के संदर्भ में राष्ट्रीय सुरक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शीघ्र न्याय तथा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के मध्य संतुलन पर पुनः बहस का विषय बन गया है।

आपराधिक न्याय प्रणाली की वैधता केवल दोषियों को दंडित करने पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी आधारित है कि किसी भी व्यक्ति को समय पर न्यायिक निर्णय के बिना वर्षों तक उसकी स्वतंत्रता से वंचित न रखा जाए। शीघ्र सुनवाई, जमानत संबंधी सुसंगत न्यायिक दृष्टिकोण, न्यायिक क्षमता, संस्थागत दक्षता तथा संवैधानिक सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करना विधि के शासन एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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